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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 526 में से

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पृष्ठ 186

लक्ष्मीबाई १७५ एलिस ने कहा, 'इन लोगो के धर्म में सब कुछ अनन्त है, इसलिये समय की पाबन्दी को महत्व नही देते।' उठकर एक तरफ गया। लौटकर आकर बोला। 'आ गये हैं। मैंने झाक कर देखा। पूरा पूर्वीय ठाठ है। पगडी पग्गड, फेंटे दुपट्टे। हाथो गलो और पैरो तक में जेवर!' गार्डन ने राजसी मुस्कराहट के साथ कहा, 'मैंने दरबारो में यह सब ठाठ देखा है।' स्कीन—'यह भी दरबार है गार्डन। डिप्टी कमिश्नर साहब बहादुर का दरबार।' स्कीन हँसा। सब अङ्गरेज हँसे। स्कीन बोला, 'हम लोग जाते हैं। एलिस और डनलप के सिवाय और किसी की जरूरत नही।' स्कीन इत्यादि गये। एलिस वाली कोठी में एक कमरा लम्बा चौडा था। उसी में 'दरबार' की योजना की गई थी। एक ऊँचे चबूतरे पर भी एक और छोटा सा चबूतरा था। उस पर दो कुर्सियाँ थी। उन पर एलिस और गार्डन जा बैठे। नीचे वाले चबूतरे पर आमने सामने दो कुर्सियाँ पडी हुई थी। एक पर डनलप बैठ गया। दूसरी खाली थी। चबूतरे के नीचे एलिस का पेशकार खडा था। थोडी देर में बस्ती के आदमी, सेठ, साहूकार इत्यादि आये और प्रणाम कर कर के खडे हो गये। उनमें नवाब अलीबहादुर भी थे। एलिस ने पेशकार को इशारा किया। वह नवाब अलीबहादुर को चबूतरे के पास लिवा लाया। उन्होने फिर झुककर प्रणाम किया। एलिस ने उनको नीचे वाले चबूतरे की खाली कुर्सी पर बिठला लिया। नवाब साहब की बाछे खिल गई । पेशकार ने बस्ती के सब लोगो को फर्श पर लगी हुई कुर्सियो पर बिठलाया। सन्नाटा छा गया।

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