झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
लक्ष्मीबाई १७५ एलिस ने कहा, 'इन लोगो के धर्म में सब कुछ अनन्त है, इसलिये समय की पाबन्दी को महत्व नही देते।' उठकर एक तरफ गया। लौटकर आकर बोला। 'आ गये हैं। मैंने झाक कर देखा। पूरा पूर्वीय ठाठ है। पगडी पग्गड, फेंटे दुपट्टे। हाथो गलो और पैरो तक में जेवर!' गार्डन ने राजसी मुस्कराहट के साथ कहा, 'मैंने दरबारो में यह सब ठाठ देखा है।' स्कीन—'यह भी दरबार है गार्डन। डिप्टी कमिश्नर साहब बहादुर का दरबार।' स्कीन हँसा। सब अङ्गरेज हँसे। स्कीन बोला, 'हम लोग जाते हैं। एलिस और डनलप के सिवाय और किसी की जरूरत नही।' स्कीन इत्यादि गये। एलिस वाली कोठी में एक कमरा लम्बा चौडा था। उसी में 'दरबार' की योजना की गई थी। एक ऊँचे चबूतरे पर भी एक और छोटा सा चबूतरा था। उस पर दो कुर्सियाँ थी। उन पर एलिस और गार्डन जा बैठे। नीचे वाले चबूतरे पर आमने सामने दो कुर्सियाँ पडी हुई थी। एक पर डनलप बैठ गया। दूसरी खाली थी। चबूतरे के नीचे एलिस का पेशकार खडा था। थोडी देर में बस्ती के आदमी, सेठ, साहूकार इत्यादि आये और प्रणाम कर कर के खडे हो गये। उनमें नवाब अलीबहादुर भी थे। एलिस ने पेशकार को इशारा किया। वह नवाब अलीबहादुर को चबूतरे के पास लिवा लाया। उन्होने फिर झुककर प्रणाम किया। एलिस ने उनको नीचे वाले चबूतरे की खाली कुर्सी पर बिठला लिया। नवाब साहब की बाछे खिल गई । पेशकार ने बस्ती के सब लोगो को फर्श पर लगी हुई कुर्सियो पर बिठलाया। सन्नाटा छा गया।
झाँसी की रानी १७६ एलिस खडे होकर बोला, 'हमने अपना काम कप्तान गार्डन साहव बहादुर को सौप दिया है। कमिश्नर साहव वहादुर अभी हम लोगो को हुक्म दे गये हैं कि आप लोगो की और प्रजा की भलाई पर खूब ध्यान दिया जाय। आप लोगो की कुशल क्षेम हम लोगो की चिन्ता का दिन रात कारण रहेगा। खूब बेखटके रोज़गार करिये। वहा से बम्बई तक अमन चैन कायम है। चोर उचक्को को कुचलने के लिये हमारे हाथ मे बहुत बडी ताकत है। आप अपने अपने धर्म का पालन, दूसरो को नुकसान पहुचाये वगैर, चाहे जैसा करिये। हमको उससे कोई सरोकार नही। हालाकि हम समझते हैं कि हमारा ईसाई धर्म सर्वश्रेष्ठ है। बहुत जल्दी मदरसे खोले जायँगे। आपकी भाषा के साथ साथ अङ्गरेजी भी पढ़ाई जावेगी, जिससे आप लोगो की सतान विलायत की अच्छी बातो को भी जान सके। अच्छे पढे लिखे हिन्दुस्थानियो को, बडी बडी नौकरिया दी जावेगी, जिससे आप लोग शासन में हाथ वटा सके। अदालते कायम कर दी गई हैं। सब लोग बिना सकोच के इन अदालतो में अपनी फरियाद पेश कर सकते हैं। न्याय किया जावेगा। किसी के साथ रियायत न की जावेगी। अपराधियो को जो दड दिये जावेगे वे कठोर होते हुये भी अमानुपिक नही होगे—किसी का भी हाथ पैर नहीं कटवाया जा सकेगा, किसी को भी बिच्छुओ से नही कटवाया जा सकेगा। आप लोग सुखी हो, हम अग्रेज केवल यही चाहते हैं। आप लोगो में से किसी को कुछ कहना हो, तो कह सकते हैं।' एलिस बैठ गया। झासी के उपस्थित लोग एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। एक साहूकार मगन गन्धी बोला, 'हुज़ूर से हमको केवल एक विनती करनी है। हमारे देश में पहले कभी गाय नही काटी गई। मुसलमान बादशाहो ने भी कभी इस बात को नही होने दिया। आपकी अमलदारी होते ही इसका आरम्भ हो गया। इसको बन्द कर देना चाहिये, आप शक्तिशाली हैं।'
लक्ष्मीबाई १७७ एलिस ने बैठे बैठे ही कहा, 'आपकी बस्ती में तो यह जानवर नहीं काटा जाता—सिर्फ छावनी में खाने वालो के लिए विवश होकर ऐसा किया जाता है।' मगन गन्धी बैठ गया। उसने अपनी आँख का एक आँसू पोछा। एलिस ने धीरे से गार्डन से कहा, 'ए सैन्टीमैन्टल फूल (एक भावुक मूर्ख।)' अलीबहादुर ने एलिस और गार्डन की ओर ताका, जैसे कुछ कहना चाहते हो। उन्होने अनुमत दी। अलीबहादुर बोले, 'हम लोग परमात्मा को धन्यवाद देते हैं, कि महान कम्पनी सरकार का राज्य हो गया है। हमारे हाकिम बहुत नेक हैं। शहर और इलाके का बहुत अच्छा, बेमिसाल बन्दोबस्त कर रहे हैं। सब लोग चैन से अपने घर सोते हैं। चोर, उठाईगीरे लापता हो गए हैं। किसी को कोई कष्ट नही। अब मदरसे और पाठशालाये खुलेगी। सारा देश झकाझक हो जावेगा। आप लोगो का 'व्योपार बढेगा और आप मालामाल हो जावेंगे।' अलीबहादुर बैठ गये। पीछे की कुर्सी पर बैठा हुआ एक सेठ हँसना चाहता था,. परन्तु उसकी हसी मुस्कराहट में परिवर्तित होगई। एलिस और गार्डन ने देख लिया। गार्डन ने दरबार को समाप्त करने के लिए धीरे से अनुरोध किया। एलिस ने दरबार समाप्त किया। वह 'पूर्वीय दरबार' इत्रपान की अनुपस्थिति से विशिष्ठ था। सेठ- साहूकार कोरे कोरे, फीके घर लौट लौट आए। सब लोगो के चले जाने पर एलिस ने गार्डन से कहा. स्क्रीन की मार्फत आज की कारवाई की सूचना लैफ्टिनेट गवर्नर के पास आगरा भेज देना।' 'अलीबहादुर चतुर और प्रभावशाली आदमी है। इसको हाथ में रखना। ठाकुर मुश्किल मे दबेगे. परन्तु उनको दबाना है अवश्य। यदि
१७८ झाँसी की रानी इनकी जाति के कुछ लोगो को पुलिस का थानेदार बना सको, तो अच्छा होगा। रानी अगर बुलाये तो चले जाना, परन्तु उसको कोई वचन न देना क्योकि उसके मामले में अब और कुछ नही हो सकता। मदरसो के खोलने की जल्दी मत करना। नौकरिया देने में हिन्दू-मुसलमानो का लाभकारी समीकरण रखना और यथाशक्ति दोनो को उनके अलग अलग हक समझाते रहना।' गार्डन बोला, 'मैं मूर्ख नही हू। मैने शिक्षा-नीति के सम्बन्ध मे जो बात कही थी वह केवल यह देखने को कि स्कीन कितने गहरे पानी में है।' एलिस—'स्कीन खुर्राट है रे।'
लक्ष्मीबाई १७६ [ ३६ ] कप्तान गार्डन डिप्टी-कमिश्नर बहादुर का 'बन्दोवस्त' 'बहादुरी' के साथ चला । जागीरे ज़ब्त हुईं, ज़िमीदारियाँ कम हुईं । मन्दिरो को सेवा-पूजा के लिये जो जायदादे लगी थी वे खत्म हुईं । पुजारियो को, पूजको को यह बहुत अखरा । अर्जी-पुर्जिया कीं । बगलो पर माथे रगडे एक न चली । गार्डन की दृढ़ता ने चोर-डाकुओ से लेकर पुजारियो तक के होश ठिकाने लगा दिये । हर बात में अर्जी और अर्जीनवीस का दौरदौरा बढ गया । कानून की प्रतिष्ठा के, लिये वकीलो को आदर मिला । पहले कोई परीक्षा इस पेशे के लिये जारी नही की गई थी । वकालत की सनद डिप्टी-कमिश्नर 'अता' किया करता था—ठीक उसी तरह जैसे जिमीदारी या नौकरी 'अता' होती थी । होशियार लोगो ने झटपट अङ्गरेज़ी कानून, अदब, ढग सीखा और आगे चलकर बिना उसके अदालत का पत्ता भी न हिला । इस वर्ग ने उस युग में सब प्रकार की निष्ठाओ के ऊपर कानून की निष्ठा को बिठलाने में जाने-अनजाने सहायता की । केवल यह एक ऐसा अङ्गरेज़ी सस्कार है जिसके प्रति हिन्दुस्थानियो की आत्मगत भावनाओ में श्रद्धा होनी चाहिये थी, परन्तु जिस प्रेरणा और जिस वातावरण में होकर और जिन उपकरणो के साथ न्याय का यह साधन आया था, वे सब हिन्दुस्थानियो को कतई अच्छे नही लगे और इसीलिये कानून भी अखरा । परोपकार की वृत्ति से प्रेरित होकर अंगरेजो ने कानून की प्राण प्रतिष्ठा हिन्दुस्थान के न्याय-मन्दिर में की हो सो बात नही थी । देश में पूर्ण शांति हो, अगरेजो का अधिकार सदा-सर्वदा इस देश में बना रहे और अगरेजी व्यापार, व्यवसाय निर्वाध चलते रहे, बस इसी वृत्ति से प्रेरित होकर कानून बनाये गये और चलाये गये । गवर्नर जनरल से लेकर पटवारी और चौकीदार तक कायदा-कानून मे बँधकर अपना अपना काम करते चले जाय, अनुशासन में शिथिलता न आने
१८० झांसी की रानी पावे । तभी तो अङ्गरेजी राज्य निर्विघ्न चल सकता था । उन लोगो ने हिन्दू नरेशो और मुसलमान बादशाहो के उत्थान-पतन के इतिहास पढे- गुने थे, इसलिये वे अपने शासन को उन सब गड्ढो से बचाना चाहते थे, जिनमें नरेशो और वादशाहो के सूबेदार और अन्य कर्मचारी मौका पाते ही उसको ढकेल दिया करते थे । समय समय पर गार्डन शहर के बडे आदमियो को मुलाकात के आकर्षण देता रहा । चिरौरी करना तो वे जानते ही थे, इसकी भी करते थे, परन्तु जब वे इसके सामने झुकते थे उनकी रीढ में दर्द हो उठता था और माथे पर बल पड जाते थे । घर आकर लाभ-हानि को आकने के साथ वे साहब की हेकडी पर जलते थे और अपनी चिरौरी पर हँसते थे । रानी को भी समाचार दे आते थे । वे चुपचाप सुन लेती थी और उनके बाल-बच्चो के समाचार विस्तृत ब्योरे के साथ पूछ लेती थी । अन्य कोई बात न कहने का उन्होने अपने मन पर बन्धेज कर रक्खा था । शहर वाले महल के ठीक सामने राजकीय पुस्तकालय था । वह उन्हीके हाथ में था । पुस्तकालय के पीछे एक ढाल था और ढाल के नीचे उनका सुन्दर बडा बाग ।* इस बाग में वह घुडसवारी इत्यादि व्यायाम किया करती थी । नगर की जो स्त्रिया उनके पास आती थी, उनको वह बडी निष्ठा के साथ इसी बाग में कसरते सिखलाती थी । अब तो सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई इतना सीख गई थी, कि दूसरो को सिखाने में रानी को इनसे बडी सहायता मिलने लगी । फिर भी रानी सोचती थी कि अश्वारोहण और शस्त्र-चालन में मै सर्वश्रेष्ठ नही हुई हूँ । पुरानी लडाइयो के नकशे उनके महल में थे । वे उनका बारीकी के साथ अध्ययन करती थी । बनावटी लडाइयो के नकशे कागज़ पर बनाती और बिगाडती । अपनी सहेलियो के साथ भिन्न भिन्न प्रकार की अनेक युद्ध-परिस्थितियो पर वाद-विवाद करती । उनको पहाडियो पर अश्वारोहण *यह बाग अब हार्डिगञ्ज हो गया है ।
लक्ष्मीबाई १८१ का शौक हुआ । झासी के आसपास पहाडिया हैं ही, उस समय जंगल और विषम स्थल भी थे । रानी तेजी के साथ सहेलियो सहित इन पर आश्वारोहण करती । झासी के आसपास की भूमि का उनको राई-रत्ती परिचय प्राप्त हो गया । इस भौगोलिक परिचय के क्षेत्र को वे निरन्तर, अनवरत बढ़ाती रहती थी । जो स्त्री-पुरुष उनके पास भेंट के लिये आते उन सबसे कहती— ‘शरीर को इतना कमाओ कि फौलाद हो जावे, तभी मन दृढता पूर्वक भगवान की ओर जायगा ।’ उनका कसरतो का शौक शीघ्र विख्यात हो गया । अमीरखाँ, वज़ीरखा दो नामी उस्ताद उनको मिले । बाला गुरु भी बिठूर से आये और मल्लविद्या के सूक्ष्मतम दाव-पेच बतला कर चले गये । नरसिंहराव टौरिया के नीचे दक्षिणियो के मुहल्ले में, वे एक अखाडा जारी कर गये । रानी कुश्ती का अभ्यास अपनी सहेलियो के साथ करती थी । तीर, बन्दूक, छुरी, बिछुआ, रैंकला इत्यादि चलाने में पहले दर्जे की श्रेष्ठता, उन्होने अमीरखा, वजीरखा, के निर्देशन से प्राप्त की—ऐसी और इतनी कि उनकी कुशाग्रबुद्धि, शक्ति और हस्त-कुशलता पर वे दोनो नामी उस्ताद विस्मय में डूब जाते थे । वे जानते थे । कि रानी उद्दण्ड प्रकृति हैं, इसलिये कभी कभी लगता था कि हथियार चलाने या परीक्षा के लिये, ललकार न बैठें । यह उनका भ्रम था । रानी का वाह्य रूप प्रचण्ड तेज पूर्ण था, परन्तु अन्तर बहुत कोमल और उदार । इस प्रकार महीनो पर महीने बीत गये । एक दिन तात्या टोपे आया । रानी की सेना बहुत दिन पहले समाप्त कर दी गई थी, परन्तु सैनिक और उनके नायक, अपने कौशल को न भूले थे । और न उनका स्वाभिमान गारत हुआ था । मुहम्मद जमाखा अपने को कर्नल अब भी कहता था, अठवारे पखवारे रानी को वह प्रणाम कर आया करता था । उसी की हवेली के एक भाग में तात्या पूर्ववत ठहरा । रात के आठ बजे के बाद तात्या रानी के पास
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पहुँचा। वे तीनों सहेलियां उनके साथ थी। अबकी बार तात्या ने जो रानी को देखा, तो बहुत सतेज पाया। कुशल वार्ता के बाद बातचीत हुई। 'अबकी बार राजस्थान, पन्जाब इत्यादि भी घूमे ?' रानी ने पूछा। तात्या ने उत्तर दिया, 'अब की बार बहुत घूमा हू और एकाध जगह तो पकडे जाने की ही नौबत आगई।' वे सब सतर्क होकर सुनने लगी। तात्या कहता गया, 'मै अपना हाल राजपूताने से आरम्भ करता हू। बडे बड़े राज्य जैसे जयपुर, जोधपुर, बीकानेर इत्यादि किसी विशेष पक्ष में नही। तटस्थ से हैं परन्तु सब कहते हैं कि झाँसी के साथ अङ्गरेज़ो ने बेईमानी की। हम लोगो के प्रति उनका भाव उदासीन है। इसके लिये हमारा उनका, दोनो में से किसी का भी दोष नही है। हम लोग एकत्र स्वराज्य स्थापित करना चाहते थे और वे लोग अपनी अपनी अलग स्वतन्त्रता की धुन में थे। राजपूताने में एकाध ठिकाना ऐसा भी है जो महाराष्ट्र नाम से ही अप्रसन्न है, परन्तु हिन्दुस्थान की स्वाधीनता के लिये उपयुक्त अवसर आने पर अपना सर्वस्व होमने के लिये तैयार हैं। लेकिन वहाँ के अधिकांश राजा अपने को, अङ्गरेजो की सहायता के कारण ही, निरापद समझते हैं, इसलिये न अपने जागीरदारो की परवाह करते हैं, और न प्रजा की। जैसा ढर्रा चला आया है, मजे में उसको चालू रखने के पक्षपाती हैं। अच्छे नेतृत्व की हीनता में जनता जीवन के साधारण उद्देश्यो में ही लिप्त है। ऐसी अवस्था में वहा से कोई आशा नही करना चाहिये। परन्तु यह विश्वास है कि वहा की सेना अपनी सेना का साथ देगी। पन्जाब का हाल कम आशाजनक है। रणजीतसिंह का पञ्जाब, अङ्गरेजी इलाके और पाच रियासतो में विभक्त हो गया है। इन रियासतो के राजा, हाथ आई रोटी को किसी प्रकार भी फेकने को तैयार नही। जनता नेता-विहीन है, इसलिये विवश सी है। दिल्ली का बादशाह बहादुरशाह वृद्ध है। परन्तु उसकी बेगम तेजस्वी है। मुसलमान लोग
लक्ष्मीबाई १८३ बादशाह के नाम पर बलिदान होने को तैयार हो सकते हैं। मैं कई प्रभाव- शाली मुसलमानों से मिला; वे कहते हैं कि हिन्दुस्थान में फिर वादशाहत कायम करो। मैंने कहा, 'स्वराज्य' और वादशाहत का सामञ्जस्य हो सकता है। जब उन्होने पूछा कैसे होगा तब मैंने उनको बतलाया कि अपने अपने प्रान्तो और प्रदेशो में सब लोग स्वराज्य नियुक्त करेंगे-बादशाह को उनमें दखल देने का अधिकार तो न रहेगा परन्तु अन्तर्प्रान्तीय बड़े कार्यो से सम्बन्ध रखने वाले हुकुमो पर मुहर बादशाह के नाम की रहेगी। सिर्फ दिल्ली के आसपास का प्रदेश बादशाह का खालसा रहेगा। बाहर के शत्रुओं से सब प्रान्त और प्रदेश सम्मिलित होकर स्वराज्य और बादशाह के नाम पर लडेंगे और इस तरह मिलकर हिन्दुस्थान का शासन चलावेंगे। पर हर हालत में पहले सब मिलकर इस बला को इस देश से टालें। बहुत लोग इस योजना से सहमत हुये, क्योकि इस समय यही व्यवहारिक जान पडतीं है, परन्तु यही पर मैं पकडे जाने से बालबाल बच गया। एक नायब डिप्टी कमिश्नर ने, जो हिन्दुस्थानी था, कैद कर लिया परन्तु सिपाहियों की आंखमिचौनी में से भाग निकला। इसके बाद मैं दक्षिण गया।' रानी ने कहा, 'तात्या तुम बहुत चतुर हो। अपनी वार्ता सुनाते जाओ। मैं ध्यान दिये हूँ।' तात्या मुस्कराकर बोला, 'मराठा रियासतो के राजाओ का जो हाल पहले देखा था, वही अब भी है। केवल एक अन्तर है। जनता सजग है और सिपाही स्वाभिमानी हैं। महाराष्ट्र की जनता अब भी स्वराज्य-मत्त है। दरिद्र और धनाढ्य, किसान, मजदूर और जागीरदार लगभग सब एक संकेत पर खडे हो सकते हैं।' 'और एक बार फिर', रानी ने सहसा कहा, 'वे पर्वतमालायें और मैदान, वे घाटिया और उपत्यकायें 'हर हर महादेव' से गूंज उठेंगी, काप उठेंगी।'
१८४ झांसी की रानी रानी का सतेज मुख और भी तेजमय हो गया । परन्तु वे तुरन्त मुस्करा उठी । बोली, 'तात्या, मुझको तुम्हारे सामने तक नियन्त्रण के साथ बोलना चाहिये । कभी कभी मैं वाक्संयम की कमी के कारण अपने ऊपर खीझ उठती हूँ ।' तात्या ने दृढ स्वर में कहा, 'बाईसाहब, मेरे हृदय में, इनके हृदय में, और सब जनता के हृदय में, जो बात गड़ी हुई है, वही आपके मुँह से निकल पड़ी ।' रानी बोली, 'अभी उसका समय नहीं आया । समय पर ही निकलनी चाहिये । तुम आगे की वार्ता कहो ।' तात्या ने कहा, 'मैं हैदराबाद गया । नवाब, अन्य रईसो की तरह अङ्गरेजो के आतंक से दबा हुआ है । सेना जिस पक्ष का पासा पड़े उस ओर जायगी । जनता हमारे साथ होगी । मे मैसूर और तञ्जोर भी गया था । यही हाल वहा का भी है ।' रानी के होठो पर वही मुस्कान आई, जिसके मृदुल मधुर आवरण में फौलादी आदर्श निहित थे । बोली, 'तात्या अभी कुछ विलम्ब और है । तब तक महत्वपूर्ण स्थानो के भूगोल का बारीकी के साथ अध्ययन करलो । कहा किस प्रकार सेनाओ को ले जाना पड़ेगा, कहा आसानी के साथ युद्ध किया जा सकता है और अपने अभीष्ट स्थान पर किस प्रकार शत्रु को एकत्र करके लड़ाई के लिये विवश किया जा सकता है । इन विषयो पर काफी समय और परिश्रम खर्च करने की आवश्यकता है । इसके सिवाय बारबरदारी के जानवरो और अच्छे घोडो के इकट्ठा करने की योजना पर विचार करते रहने को भी मनमें बहुत स्थान मिलना चाहिये । तोपे, बन्दूकें, बारूद, गोला, गोली इत्यादि युद्ध सामग्री के बनाने वाले कारीगरो को भी, हाथ में ले लो । अङ्गरेजी कारखानो में अपने आदमी नौकर रखवाओ ।
लक्ष्मीबाई १८५ ' वे लगन के साथ सब क्रियाये सीखें। अपनी पुरानी बारगी युद्ध परिपाटी* को तो गाठ ही मे बाध लो। हमारा देश उस परिपाटी को छोडकर अङ्गरेजो से लडा, इसलिये भी हारा।' तात्या—मैने नाना साहब और रावसाहब के प्रोत्साहन और आज्ञा से इन सब बातो का ध्यान रक्खा है और आपकी भी आज्ञा मिली। पूरा ध्यान दूंगा। में इतने महीनो पैदल अधिक फिरा हू इसलिये मुझको देश का भूगोल बहुत अच्छी तरह याद हो गया है। किसी न किसी तरह बहुत से आदमी, सामान और जानवर लेकर कही का कही पहुँच सकता हूँ।' रानी—'लड़ाइयो के नकशो का अध्ययन किया ?' तात्या—'अच्छी तरह। पञ्जाब मे जो लड़ाइया अङ्गरेजो से सिक्ख लडे हैं उनका भी मैने अध्ययन किया। व्यर्थ ही सिक्खो ने इतनी वीरता खर्च की। इतनी युद्ध सामग्री, ऐसी अच्छी सीखी-सिखाई फौज यदि अच्छे नायको के हाथ मे होती तो अङ्गरेज सिक्खो को कभी न हरा पाते। परन्तु कदाचित् उनकी हार देश-द्रोहियो के कारण हुई है।' रानी—'वे लोग कहते होगे कि भाग्य ने हरा दिया ?' तात्या—निरसन्देह यही कहते हैं।' रानी—'पञ्जाब में स्त्रियो को कुछ स्वाधीनता है ?' तात्या—'हिन्दू और सिक्ख स्त्रियो को है।' रानी—'तब पञ्जाब किसी दिन फिर खडा होगा।' तात्या—'परन्तु मुसलमान स्त्रियो में कम है।' रानी—'यह खेद की बात है, किन्तु वे भी किसी दिन अपनी बहिनो के प्रभाव में आवेगी।' तात्या—'मै पञ्जाब को भी अपनी योजना में ले रहा हू। जिस समय इस ओर की बाढ पञ्जाब से जोट करावेगी, उस समय पञ्जाब भी नीचे पडा न रह सकेगा।' Guirella warfare.
१८६ झांसी की रानी रानी— मैं सिक्खो की लडाइयो के नकशो का अध्ययन करना चाहती हू ।' तात्या ने कागज़ो पर मानचित्र बनाकर समझाया । रानी ने और उनकी सहेलियो ने भी समझा । तात्या ने अनुरोध किया, 'हमको एक अपने विश्वसनीय जासूसी विभाग की वडी आवश्यकता है ।' रानी ने मुस्कराकर कहा, 'मैने स्थापना कर दी है ।' तात्या ने उत्सुक होकर पूछा, 'कैसे ? कहाँ ?' रानी ने उत्तर दिया, 'यही । मेरी ये तीनो सहेलियां काम सीख रही हैं और कर रही हैं । मे और स्त्रियो को भी तैयार कर रही हू, परन्तु काम सावधानी का है, इसलिये धीरे-धीरे कर रही हू ।' तात्या प्रसन्न हुआ । बोला, 'झांसी में एक विलक्षण बात देखी । जो यहा निवास करता है वह तो आपका भक्त है ही, किन्तु यहा का निवासी जो बाहर चला गया है, वह भी झांसी के लिये अपना तन मन वलिदान करने के लिये प्रस्तुत है ।' रानी बोली, 'मुझको इसी लिये झांसी का बहुत अभिमान है ।' तात्या ने कहा, 'बाईसाहब, जब मे ग्वालियर राज्य का हाल लेता हुआ हाल में दक्षिण की ओर गया, तब वहा बाजार में एक फटियल ब्राह्मण मिला । उसने मुझको पहिचान लिया । मैने भी उसको चीन्ह लिया । वह झांसी का रहने वाला नारायण शास्त्री निकला । उसको स्वर्गीय सरकार ने, एक अपराध में देश निकाले की सजा दी थी...।' रानी बोली, 'मैंने उस अपराध के विषय में सुना है ।' तात्या ने कहा, 'नारायण शास्त्री आश्वासन देता था कि जो कुछ भी कार्य भार उसको दिया जायगा, वह प्राणपण से करेगा ।' रानी ने पूछा, 'वह जिस स्त्री को लेकर यहा से गया था, क्या उसको त्याग दिया ?'
लक्ष्मीबाई १८७
तात्या ने उत्तर दिया, 'नही वाईसाहब । उसने मुझसे स्पष्ट कहा ।' रानी—'समाज ने उसको कैसे ग्रहण किया होगा ?' तात्या—'वह समाज से बाहर है । मूंछ मुडाये, वैरागी वेश में रहता है । साथ में वह स्त्री रहती है ।' रानी—'उसको क्या काम दिया ?' तात्या—'सेना के साथ सम्पर्क रखने का काम । नारायण शास्त्री । ज्योतिष जानता है और कविताये गाता है । उनके प्रयोग से वह सेना । के सम्पर्क में रहेगा ।' 'रानी—'सेना के साथ घनिष्ठ सम्पर्क उत्पन्न करने को बहुत महत्व देना होगा ।' तात्या—'दे रहा हूँ ।' रानी—'तुमको, जान पडता है अकेले ही बहुत काम करना पडता है ।' तात्या—'नही वाईसाहब, नाना साहब, राव साहब इत्यादि बहुत लोग काम में जुटे हुये हैं । दिल्ली और मेरठ इत्यादि प्रदेशो के अनेक मुसलमान भी प्राणो की होड लगा कर निरत हैं ।' रानी—'मुझको ऐसा लगता है कि शीघ्र ही कुछ न हो बैठे परन्तु मैं सोचती हूँ कि अधकचरी तैयारी मे कुछ भी न किया जाना चाहिये । बहुत दिन हुये, मदरास की ओर कुछ सिपाहियो ने अचानक उपद्रव कर डाला था वह व्यर्थ गया । फल यह हुआ कि मदरासी अब सेना में कम भर्ती किये जाते हैं। और अग्रेजो ने अपनी सावधानी को कसकर बढा लिया है ।' तात्या—'कैसी भी सावधानी, कुटिलता और बुद्धि से अङ्गरेज लोग काम लें, हमारी विशाल, असख्य जनता, उनका राज्य नही चाहती । इसलिये राजाओ और नवावो का साथ न पाते हुये भी हमको अपने उत्साह में कमी प्रतीत नही होती ।' रानी ने मुस्कराकर कहा, 'मैं जानती हूँ ।'
१८८ झांसी की रानी तात्या बोला, 'बाईसाहब, अब आपके शयन का समय आने को है—भोजन तो अभी हुआ ही नही है । जाता हूँ । यहा एकाध दिन रह कर चला जाऊँगा । शीघ्र ही फिर सेवा में उपस्थित होऊँगा अर्थात् जैसे ही कोई महत्व की बात सामने आई, मैं आऊँगा ।' रानी—'भोजन अब मै नही करूँगी । केवल दूध पिऊँगी नही तो कल के कार्य क्रम का व्यतिक्रम हो जावेगा । तुम दीवान रघुनाथसिंह और दीवान जवाहरसिंह से मिले हो ?' तात्या—'पिछली बार आया तब मिला था । अबकी बार नही मिल पाया हू ।' रानी—'उनसे मिलना । रघुनाथसिंह नई बस्ती में गनपत खिडकी बाहर रहते हैं और जवाहरसिंह कटीली गाव में होगे ।' तात्या—'मै इनसे मिलूँगा ।' तात्या चला गया ।
लक्ष्मीबाइ १८६ [ ३७ ] रानी के पास आठ बजे के लगभग तात्या, रघुनाथसिंह और जवाहरसिंह आये । रघुनाथसिंह पुष्ट देहका बडा बलशाली पुरुष था । जवाहरसिंह जरा छरहरे शरीर का परन्तु काफी बलवान । प्रणाम करके तीनो बैठ गये । रानी ने पूछा, 'दीवान जवाहरसिंह को क्या कटीली से ले आये तात्या ?' हाथ जोडकर जवाहरसिंह ने उत्तर दिया, 'दीवान रघुनाथसिंह का एक साडिनी सवार लिवा लाया । उसने प्रात काल के बहुत पहले ही सोते से जगाया था ।' तात्या ने कहा, 'मै स्वय नही गया । दीवान साहब से प्रार्थना की और इन्होने तुरन्त रात को ही, साडिनी-सवार भेज दिया । घुडसवार जाता तो दीवान साहब को भी घोडे पर ही आना पडता । शायद कोई सन्देह करता, इसलिये ऊँट भेजा ।' जवाहरसिंह बोला, 'श्रीमन्त सरकार, मुझे किसी का भी डर नही है । उस दिन के लिये तरस रहा हूँ, जब झाँसी और अपने स्वामी के लिये अपना शरीर त्याग दू ।' रघुनाथसिंह झूमने लगा । रानी ने मुस्कराकर कहा, 'आप ही लोगो का बल-भरोसा है । एक दिन आवेगा जब आप लोगो के जौहर का उपयोग होगा । तात्या ने कुछ बतलाया होगा ?' रघुनाथसिंह—'बतलाया है सरकार । थोडे में समझ लिया । हम लोगो को ज्यादा सुनने समझने की दरकार ही नही है । अपनी माता के दर्शन करने थे, इसलिये चले आये ।' जवाहरसिंह—'हम लोगो को सरकार के हाथो अपनी तलवार पर गगाजल छिटकवाना है ।'
१६० झाँसी की रानी रघुनाथसिंह—'और अपनी माता का आशीर्वाद प्राप्त करना है।' रानी मुस्कराई । बोली, 'आप लोगो को मै अच्छी तरह जानती हू । आप लोग सहज ही प्राणो की होड लगा सकते हैं। परन्तु मै चाहती हूँ कि प्राणो को सहज ही न खोया जाय। अवसर आने पर ही तलवार म्यान से वाहर निकले। छोटी छोटी सी वात पर न खिंच जावे।' तात्या—'इन लोगो को लाट की आज्ञा पर बहुत क्षोभ हुआ । और ये तुरन्त कुछ जवाव देना चाहते थे।' रानी—'अङ्गरेजो के अन्याय बढते जावे तो अच्छा ही है। फिर भगवान हमारी जल्दी सुनेंगे । असल में अभी इन छोटी बातो पर खीझ कसर का निकालना, अच्छा नही है।' उन दोनो ठाकुरो ने स्वीकार किया । फिर उन दोनो ने अपनी चमचमाती हुई तलवारे, रानी के पैरो के पास रखदी और हाथ जोडकर खडे हो गये । रानी ने मुन्दर से कहा, 'गगाजल ला ।' मुन्दर गंगाजल ले आई । रानी ने पहले जवाहरसिंह की तलवार पर छींटे दिये और फिर रघुनाथसिंह की तलवार पर । उन दोनो ने रानी के चरण स्पर्श करके तलवारें म्यान में डाल ली । रानी पुलकित हुई । एक क्षण में अपने को सयत करके बोली, गगाजल की पवित्रता को निभाना । आपस की कलह में इसका प्रयोग मत करना और न किसी कलुषित काम में ।' उन दोनो ने मस्तक नवाये । रघुनाथसिंह ने कहा, 'सरकार अब आशीर्वाद मिलना चाहिये ।' रानी का गला भर आने को हुआ । उन्होने नियन्त्रण कर लिया । बोली, 'तुम्हारे हाथो स्वराज्य के आदर्श का पालन हो । सुखी रहो और अपने पीछे ऐसा नाम छोड जाओ कि आने वाली अन त पीढिया. तुम्हारे स्मरण से अपने को शुद्ध करती रहे ।'
लक्ष्मीबाई १६१ जवाहरसिंह ने कहा, 'माता का यह आशीर्वाद और वह पवित्र गगाजल सदा हमारे साथ रहेगा।' रघुनाथसिंह बोला, 'मा आज न जाने क्यो ऐसा भास रहा है मानो हम लोग अनेक युद्धो पर विजय प्राप्त कर चुके हो।' रानी ने कहा, 'मुझको सन्देह नही है, युद्धो पर विजय प्राप्त करोगे।' रघुनाथसिंह ज़रा मचलते हुये बोला, 'माता हमको आशीर्वाद तो मिल गया, अव प्रसाद और मिलना चाहिये।' रानी ने तुरन्त मुन्दर से कहा, 'लड्डू ला मुन्दर। मैने अपने हाथो आज ही बनाये हैं।' मुन्दर थाल भर लड्डू ले आई। 'नही सरकार, इतने नही,' जवाहरसिंह हँसकर बोला, 'हम लोग भोजन कर आये हैं।' रानी उठी। दोनो हाथो में एक एक लड्डू लिया। 'अपने हाथ के बनाये लड्डू अपने ही हाथो खिलाऊँगी। तात्या तुम भी खाओ।' रानी ने कहा। उन लोगो ने मुँह खोले। रानी ने आग्रह के साथ खिलाया। बचे हुये लड्डू उन तीनो सहेलियो को खिला दिये। हाथ-मुँह धोकर वे सब बैठ गये। रानी ने कहा, 'आप लोग अभी केवल इतना करे—नातेदारियो में अपना मेल वढायें और उनको अपनावें। सबके काम में पडें और छोटी से छोटी जाति के पुरुष या स्त्री का, गरीव से गरीव, मजदूर या किसान को, कदापि छोटा न समझे। सब जातियो और सब वर्गों को, बिना अपना उद्देश्य बतलाये, हथियार चलाना सिखलाएँ। इस काम के लिये काफी अवसर मिल सकते हैं, जैसे शिकार, उत्सव, ब्याह-बारात इत्यादि। जवाहरसिंह ने कहा, 'बहुत अच्छा।' रघुनाथसिंह ने कहा, 'ऐसा ही होगा।'
१६२ झाँसी की रानी तात्या बोला, 'मैने इनसे कहा है कि ऐसी कोशिश करो कि कोई नातेदार डाका न डाले । ये कहते हैं कि वडी मुश्किल पडेगी । मैंने कहा कि डाके डालने ही हैं तो खजानो पर डालो और थाने लूटो ।' रानी ने निवारण करते हुये कहा, 'नही तात्या, यह उचित नही अनाचार और अत्याचार को प्रोत्साहन एक बार मिला, कि वह बार बार सिर उठाता है । जब स्वराज्य का युद्ध शुरू होगा तब खजाने और थाने सब अपने अधिकार में किये जावेगे । अभी नही ।' जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह ने हामी भरी । तात्या बोला, 'अभी तो गार्डन अपना प्रबन्ध पक्का किये जा रहा है । समझता होगा कि जनता को अपनाते चले जा रहे हैं ।' रानी ने कहा, 'जनता मूर्ख नही है ।' तात्या, दीवान जवाहरसिंह और दीवान रघुनाथसिह प्रणाम करके चले गये । रानी ने अपनी सहेलियो से पूछा, 'बतलाओ, इन दोनो मे से, झाँसी की स्वराज्य-सेना का प्रधान सेनानायक बनाने योग्य कौन है ?' मुन्दर—'दीवान रघुनाथसिंह ।' सुन्दर—'मै भी ऐसा ही सोचती हूँ ।' काशीबाई—'जवाहरसिंह ।' फिर वे तीनो रानी का मुँह ताकने लगी । मुन्दर बोली, 'हम दोनो की बात सही निकलेगी ।' सुन्दर ने कहा, 'बाईसाहब देखे क्या कहती हैं ।' काशीबाई हँसकर बोली, 'वे अभी बतला देवेगी ।' रानी ने कहा, 'समय बतलावेगा ।'
लक्ष्मीबाई १६३ [ ३८ ] ब्रिटिश सरकार के शासन की गति-विधि में अफ़सरो का ज़िले भर में दौरा करने, प्रत्येक दफ्तर के काम को बारीकी के साथ देखने भालने, थानो, तहसीलो और जेलखानो का निरीक्षण करने का महत्वपूर्ण स्थान था। ग्राम पञ्चायतो का स्थान अङ्गरेजी अदालते दौरे के साधन द्वारा आसानी के साथ ले सकती थी। इसके सिवाय दौरे का जीवन शिकार देता था, नवीन नवीन प्राकृतिक दृश्यो के दर्शन कराता था और सम्पूर्ण देहात को सम्पर्क में इन लोगो के लाता था। शासन की जडें मजबूत बनती थी। गार्डन दौरा करता हुआ मऊ गया। निरीक्षण के लिये थाने पर पहुचा। नायब थानेदार आनन्दराय रियासती पगडी बांधे, लम्बी दाढी, बीच में से कंधी कर, कानो पर चढाये इन्सपेक्टर और थानेदार सहित स्वागत के लिये आगे बढा। आनन्दराय की वह दाढी गार्डन को खटक गई। उसी समय अपनी आलोचना और आज्ञा प्रकट करना चाहता था, परन्तु ठहर गया। निरीक्षण करने के बाद उसने आनन्दराय को बुलाया। बोला, 'तुम डाकुओ की सी दाढी क्यो रक्खे हो?' आनन्दराय कोई उत्तर नही दे सका। गार्डन ने कहा, 'इस थाने का तेरा कोई अफसर इस तरह की दाढी नही रचाता। क्या अपने को इनसे वडा समझता है?' आनन्दराय का कलेजा जल उठा, परन्तु मुँह से निकला, 'नही तो।' 'बातचीत करने का भी तमीज नही,' गार्डन ने कहा। आनन्दराय ने सिर नीचा कर लिया। गार्डन ने हुकुम दिया, 'दाढी रखनी ही है तो सीधी रख। कानो पर कभी मत चढा। जा सीधी करके आ।' आनन्दराय गया और दाढी को कानो पर से उतार कर सीधी करके आगया। चेहरा बिलकुल पीला पड गया।
१६४ झाँसी की रानी गार्डन के चेहरे पर सन्तोष की मुस्कराहट आगई । बोला, 'अब ठीक है । जाओ ।' उसी समय झाँसी से एक हरकारा कमिश्नर स्क्रीन की चिट्ठी लेकर आया । स्क्रीन ने उसको समाचार दिया था कि सागरसिंह नामक डाकू पकड़ा गया है, जेल में बन्द है । जेल का निरीक्षण करना चाहता हूँ । एक दिन के लिये जल्दी आजाओ । गार्डन ने घोड़ा गाड़ी से झांसी की ओर कूच कर दिया । मार्ग में घोड़े बदलता हुआ दूसरे दिन झाँसी पहुँच गया । उसके दूसरे दिन जेल का मुआइना हुआ । स्कीन और गार्डन साथ थे । बख्शिशअली जेल का दरोगा था बड़े विनम्र भाव से सलामें झुकाता हुआ, उन दोनों के सामने आया । दोनों प्रसन्न हुये । उनको इस प्रकार का शाही अदब कायदा पसन्द था । जेल के भीतर जाकर सागरसिंह को देखा । तगड़ा फुर्तीला आदमी था । आंख तीक्ष्ण और चमकदार, दाढी कानो पर चढी हुई; हथकडी बेडी से जकडा हुआ । स्क्रीन ने पूछा, 'क्या नाम है ?' 'क्या आपको मालूम नहीं ?' 'तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ ।' 'कुँवर सागरसिंह ।' 'कहाँ के रहने वाले हो ?' 'रावली के-बरुआसागर से कुछ दूर ।' 'तुमने यह पेशा क्यों अपनाया ?' 'क्योंकि इससे बढ़िया कुछ और मिला नहीं ।' 'हमारी फौज में नौकरी क्यों नहीं की ? अच्छा वेतन मिलता ।' 'हमारे घराने में अफसरी होती आई है । हम कोरी सिपाहीगीरी कैसे करते ?' 'तुम धीरे धीरे नायक, हवलदार और फिर सूबेदार तक हो सकते थे ।'