भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लक्ष्मीबाई १५७

राज्य मिलेगा या न मिलेगा—इन दोनो के व्यवधान मे वे महीने चले जा रहे थे । मोरोपन्त ताम्बे और अन्य कर्मचारी यथावत कार्य कर रहे थे । एलिस वर्ग अपना पाया मजबूत बनाने की तैयारी करता चला जा रहा था, बहुत सतर्कता, वडी सावधानी के साथ । जब कई महीने हो गये और डलहौली का उत्तर न आया तब मोरोपन्त, नाना भोपटकर इत्यादि की सम्मति से एलिस और मालकम के द्वारा एक खरीता और भेजा । उसमे पुरानी सधियो को दुहराया गया और जिनके सामने गोद ली गई थी उनके नाम प्रकट किये गये । एलिस ने सिफारिश की । लिखा, 'ओर्छा राज्य के दत्तक की स्वीकृति दी गई है । जैसा ओर्छा राज्य वैसा झासी राज्य । एक को अनुमति देना और दूसरे को न देना अनुचित मालूम होना है ।' यह बात नही कि एलिस रानी की अर्जी का स्वीकृत किया जाना पसन्द करता हो । वह ओर्छा राज्य को दत्तक की स्वीकृति के मिलने पर कुढ गया था — एक अच्छा खासा ग्रास कम्पनी सरकार के मुँह से छुटका दिया गया । कई महीने उपरान्त डलहौजी अवध के दौरे से कलकत्ता लौटा । झाँसी की मिसिल पेश हुई । जगह जगह ऐमे उद्गार जो नाक तक नफरत पैदा करे । बुन्देलखण्ड मे कम्पनी के राज्य की स्थापना हमारे पुरखो की सहायता से हुई है ! हमारी राजभक्ति की कदर की जानी चाहिये । जरूर ! अब किस साधना के लिए राजभक्ति की अटक है ? सन्धिया पवित्र होती हैं । बेशक ! तुम पेशवा के नौकर थे । पेशवा हमसे हारा और उसने अपना स्वामित्व हमारे हवाले किया । अब तुम हमारे नौकर हुये । मर्जी हमारी, माने हम तुम्हारी गोद-वोद को या न माने । डलहौजी सोचता-सोचता, जिस निष्कर्ष पर पहुचा, उसकी काउन्सिल भी उससे सहमत हो गई ।