झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ झांसी की रानी थी । झाँसी का राज्य उनके लिए सुरपुर न था-किन्तु, जिस सुरपुर के पाने की उनके मन मे लालसा थी, झाँसी उसकी एक सीढी मात्र थी । पति के देहान्त के बाद से रानी की दिनचर्या इस प्रकार हो गई — वह नित्य प्रातःकाल चार बजे स्नान करके आठ बजे तक महादेव का पूजन करती और उसी समय गवैये भजन-गायन सुनाते । फिर ग्यारह बजे तक महल के समीपवर्ती खुले आँगन में घोडे की सवारी, तीरन्दाजी, नेजा चलाना, दौडते हुए घोडे पर चढे चढे, दाँतो से लगाम पकड कर दोनो हाथो से तलवार भाँजना, बन्दूक से निशाना लगाना, मलखब कुश्ती इत्यादि करती थी और अपनी सहेलियो तथा नगर से आने वाली कुछ स्त्रियो को ये सब कामे सिखलाती थी । इन मे भाऊबख्शी की पत्नी प्रमुख थी और बहुधा आने वालो में, झलकारी कोरिन । ग्यारह बजे के उपरान्त रानी फिर स्नान करती और भूखो को खिलाकर तथा कुछ दान-धर्म करके तब भोजन करती । भोजन के उपरात थोडा सा विश्राम । फिर तीन बजे तक ग्यारह सो राम नाम लिख कर आटे की गोलिया मछलियो को खिलाती । उस समय वे किसी से बात-चीत नही करती थी और न कोई उस समय उनके पास बैठ सकता या आ सकता था । वे किसी गूढ चिन्ता, किसी गूढ विचार में निमग्न रहती थी । तीन बजे के उपरान्त सध्या तक फिर वे ही व्यायाम और कसरते—शरीर को फौलाद बनाने की क्रियाये । सध्या के उपरान्त आठ बजे तक कथावार्ता, पुराण, भगवद्गीता का अठारहवा अध्याय और भजन सुनती । इसके बाद एक घटा आगन्तुको को भेट के लिये दिया जाता था । तीसरी बार स्नान करती । इसके बाद थोडे समय तक इष्टदेव का एकान्त ध्यान । फिर ब्यालू भोजन । पश्चात् सुन्दर, मुन्दर और काशीबाई के साथ थोडा सा वार्तालाप और फिर ठीक दस बजे शयन । वे समय की बहुत पाबन्द थी । शिथिलता तो छूकर नही निकली थी ।