झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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जब महीने भर से ऊपर हो गया और कलकत्ते से कोई जवाब न आया तो एलिस, मालकम इत्यादि को चिन्ता हुई । शायद गवर्नर जनरल रानी के पक्ष में फैसला करदें और झाँसी सरकारी 'वन्दोबस्त' की हुकूमत से वंचित रह जाय । एलिस के सामने सदाशिवराव नेवालकर नाम का एक व्यक्ति दावेदार बन कर आया । खूब रहा—प्यादे से प्यादा कट जावेगा । सदाशिवराव को एलिस ने प्रोत्साहित किया । सदाशिवराव ने एक लम्बे खर्रे की अर्जी पेश की । गङ्गाधरराव के वंश का कुर्सी नामा अर्जी में दर्ज किया—ठीक पांचवी पीढ़ी पर । और रानी बिचारी तो किसी भी पीढ़ी में न थी ! गत राजा की धर्मपत्नी ! तो भी क्या हुआ ? स्त्री तो थी । स्त्री राज्य करने लायक ! लेकिन इङ्गलैंड की रानी विक्टोरिया तो पुरुष नही । मगर हिन्दुस्थान इङ्गलेंड नही है । सदाशिवराव की अर्जी को रानी की अर्जी से लड़वा ही तो दिया । डलहौजी रानी के लिये अब क्या खाक करेगा ? और न इस मूर्ख के लिये ही कुछ । मालकम ने ३१ दिसम्बर सन् १८५३ को सदाशिवराव की सिफारिश करते हुये लिखा, 'यदि मृत राजा के पुरखो के किसी मर्द वारिस का ही हक कबूल किया जाना है, तो यह व्यक्ति वास्तव में गद्दी का सब से अधिक निकट का हकदार है ।' सदाशिवराव के पास कही से कुछ धन भी आ गया और वह मजे में राजसी ठाठ से रहने लगा । राज्य मिलने में कितनी कसर रह गई थी ? पोलिटिकल अफसरों ने सिफारिश कर ही दी थी । कोडा हाथ में आ गया । बस । कसर रही थोडी—जीन लगाम घोडी । रानी गंभीरता पूर्वक सारी स्थिति का अवलोकन कर रही थी । वे झाँसी राज्य को अपने किसी उद्देश्य की पूर्ति का साधन मात्र समझती