भारतकोश
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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लछमीबाई १५३

'यही के राजा को न देखो ।- नाटक चेटक और नाचने गाने में सब समाप्त कर दिया ।' खुदाबख्श के कान खड़े हुये । क्षोभ आया । उसी आदमी से पूछा, 'यहा के राजा ने रैयत को तो कोई दुख दिया नही ?' 'दुख न देना और बात है, सुख पहुचाना दूसरी बात ।' 'अङ्गरेजो का राज हो गया, तो याद आवेगी ।' 'अङ्गरेज कौन कच्चा खाये जाते हैं ।' 'जनाब वह ऐसी कौम है कि बिना खाये ही पचा जावेगी ।' 'ऐसा नही हो सकता । यहा का राज अङ्गरेजो के हाथ नही जावेगा ।' 'कुछ नही कहा जा सकता । यदि चला गया तो ?' तम्बोली ने पान बनाते बनाते कहा, 'ठट्ठा है जो चला जावेगा । रानी हमारी बनी रहे, हम तो अपने सिर कटवा देंगे ।' पीरअली ने हँसकर कहा, 'तुम तो पान काटते कतरते जाओ भाई । सिर काटना, कटवाना हम सिपाहियो का काम है ।' तम्बोली ने ध्यान पूर्वक पीरअली को देखा । बोला, 'आप झाँसी के रहने वाले नही जान पडते । परदेशी हैं ?' 'क्यो ? क्या फर्क पड गया ?' 'धरती आकाश का ।' 'कैसे ?' 'अभी कुछ नही कह सकता । समय आने पर देखना ।' 'समय आने पर तेली तम्बोली भी तलवार बन्दूक चलावेगे, यह देखना बाकी है ।' 'अभी न देखलो । ले आओ अपनी ढाल-तलवार मैं अपनी लाता हूँ । फिर देखलो झांसी का पानी ।' पीरअली हँसा । खुदाबख्श उसको वहा से ले गया । दूकान के पास झम्मीसिंह और भग्गी दाउजू सुनार खड़े थे ।