झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई १३६ बोली, 'क्या आशा है ?' तात्या ने कहा, 'दामोदरराव की गोद स्वीकार की जावेगी, ऐसा विश्वास है । एलिस ने गोलमोल अवश्य लिखा है, परन्तु कलकत्ते में अपने कुछ मित्र हैं । वे लोग कुछ सहायता करेंगे । रानी ने कहा, 'एलिस, मालकम सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं । ये लोग अपने लाट की नेत्रकोर के संकेत पर चलते हैं । मैने यहां से पूरनचन्द बंगाली बाबू को कलकत्ते भेजा है । वह बहुत अङ्गरेजी पढ़ा है । लाट से स्वयं मिलेगा और हमारी बात को समझाएगा । क्या कम्पनी सरकार का लाट हमारे इतने बड़े सन्धिपत्र को समूचा निगल जायगा ?' तात्या ने सहेलियो की ओर देखा । रानी समझ गईं । बोली, 'ये तीनो मेरी अत्यन्त विश्वासपात्र हैं । बिना किसी हिचक के बात किये जाओ ।' नाना ने कहा, 'मुझको मालूम है । ये मराठा हैं ।' 'झांसी की लगभग सभी स्त्रियो का विश्वास किया जा सकता है ।' रानी बोली, 'ये तीनो तो स्त्रियो की मानो पराग हैं ।' नाना ने कहा, 'बाईसाहब, यह लाट और इसके भाई बन्द 'यावच्चन्द्र दिवाकरौ' वाली सन्धि को समूचा ही पचा गये हैं । झासी वाली सन्धि में न तो दिवाकर की सौगन्ध है और न चन्द्रमा की । ये लोग किसी चीज को पवित्र नही समझते । इनकी लिखतम का, इनकी बात का, कोई भरोसा नही । हमारी पेंशन के छीनने के समय कहा था तीस बत्तीस साल में आठ लाख रुपया साल के हिसाब से तीन करोड रुपया बैठता है । वह सब कहा डाला ? इनका विश्वास नही करना चाहिए ।' रानी ने वैसे ही मुस्करा कर पूछा, 'क्या ये लोग सीधे साधे गणित को भी धोखा देते हैं ?' नाना जरा हँसा ।