रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्यायः । १६१
अथाशोधितमारितलोहस्य दोषाः— आयुः शुक्रं बलं हन्ति तापविड्बन्धरोगकृत् । अशुद्धं न मृतं तारं शुद्धं मार्यमतोबुधैः ॥ ३० ॥ अशुद्ध और भस्म न की हुई चान्दी अवस्था, बल तथा शुक्र को नष्ट करती है और मलावरोध, जलन आदि रोग पैदा करती है, इसलिये विद्वानों को चाहिये कि चांदी को शुद्ध कर भस्म करें ॥ ३० ॥
अथ रौप्यस्य विशेषशोधनम्— नागेन टङ्कणेनैव वापितं शुद्धिमृच्छति । तारं त्रिवारं निक्षिप्तं तैले ज्योतिष्मतीभवे ॥ ३१ ॥ चांदी को समान सीस भस्म और सुहागे के साथ पीसकर प्रतप्त कर के ज्योतिष्मती ( मालकांगनी ) के तैल में तीन बार बुझाने से इसकी शुद्धि होती है ॥ ३१ ॥
अन्यविधिः— खर्परे भस्मचूर्णाभ्यां परितः पालिकां चरेत् । तत्र रूप्यं विनिक्षिप्य समसीससमन्वितम् ॥ ३२ ॥ जातसीसक्षयं यावद्धमेत्तावत्पुनः पुनः । इत्थं संशोधितं रूप्यं योजनीयं रसादिषु ॥ ३३ ॥ अथवा किसी मिट्टी के पात्र में भस्म (राख) और सुहागे के चूर्ण का आलवाल (क्यारी) बनाकर उसमें समान सीसभस्म और सुहागे के साथ पिसी हुई चांदी को रखकर धौंकनी से चांदी में सीसभस्म नहीं मिले तब तक धमन करना चाहिये इस तरह शुद्ध हुई चांदी का सब कार्यों में प्रयोग करना चाहिये ॥ ३२-३३ ॥
अथ रौप्यमारणम्— लकुचद्रवसूताभ्यां तारपत्रं प्रलेपयेत् । ऊर्ध्वाधो गन्धकं दत्त्वा मूषामध्ये निरुध्य च ॥ ३४ ॥ स्वेदयेद्वालुकायन्त्रे दिनमेकं दृढाग्निना । स्वाङ्गशीतां च तां पिष्टिं साम्लतालेन मर्दिताम् । पुटेद्द्वादशवाराणि भस्मीभवति रूप्यकम् ॥ ३५ ॥ बड़हल वृक्ष के फल के रस में पारद को घोटकर चांदी के पत्रों पर मर्दन-विधि से लेप कर के ऊपर और नीचे गन्धक का चूर्ण रखकर मूषा यन्त्र
रस० ११