रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१२ | रसरत्नसमुच्चये—
राजावर्तो गैरिकाश्चाख्याता उपरसा अमी ।
पूज्या अष्टदलेष्वेते पूर्वादीशामगङ्गरुमात् ॥ ४४ ॥
गन्धक, हरताल, कासीस, मैनशोल कङ्कुष्ठ, अञ्जन, राजावर्त तथा गैरिक ये आठ उपरस हैं । इनको अष्टदल कमल में क्रम से पूर्वदिशा से लेकर ईशान कोणतक स्थापन करके पूजन करनी चाहिए ॥ ४४ ॥
तत्र महारसाः—
रसकं विमला ताप्यं चपला तुत्थमञ्जनम् ।
हिङ्गुलं सस्यकं चैव ख्याता एते महारसाः ।
पूर्वादीशानपर्यन्तं पत्राग्रेषु प्रपूजयेत् ॥ ४५ ॥
खर्पर, विमल, सुवर्ण माक्षिक, चपल, तुत्थ, अञ्जन, हिङ्गुल, सस्यक ये आठ महारस हैं । इनको पूर्वदिशा से ईशान कोण तक अष्टदल मण्डल की पखड़ियों के अग्रभाग में स्थापन करके पूजन करनी चाहिए ॥ ४५ ॥
तत्र अष्टलोहपूजाक्रमः—
पूर्वद्वारे स्वर्णरौप्ये दक्षिणे ताम्रसीसके ।
पश्चिमे वङ्गकान्तौ च उत्तरे मुण्डतीक्ष्णके ।
सर्वमेतदघोरेण पूजयेदङ्कुशान्वितम् ॥ ४६ ॥
मण्डप की वेदी के चारप्रकार पहिले बताये हैं उन में से पूर्व के द्वारपर स्वर्ण और चांदी, दक्षिण के द्वार पर ताम्बा और सीसा, पश्चिम के द्वार पर वङ्ग और कौन्तलौह और उत्तर के द्वार पर मुण्ड तथा तीक्ष्णलौह की स्थापना करके उन की अंकुश विद्या के साथ अघोर मन्त्र को पढ़ते हुए पूजन करनी चाहिए ॥४६॥
तत्र उपकरणानां पूजाविधिः—
बिडं काञ्जिकयन्त्राणि क्षारमृल्लवणानि च ।
कोष्ठी मूषा वङ्कनालि तुषाङ्गारवनोपलाः ॥ ४७ ॥
भस्त्रिका दण्डिकानेका शिला खल्वान्युलूखलम् ।
स्वर्णकारोपकरणं समस्ततुलनानि च ॥ ४८ ॥
मृत्काष्ठताम्रलोहोत्थपात्राणि विविधानि च ।
दिव्यौषधीनां वर्गांश्च रञ्जकस्नेहनानि च ॥
एतानि द्वारबाह्ये तु मूलमन्त्रेण पूजयेत् ॥ ४९ ॥