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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

२१२ | रसरत्नसमुच्चये—

राजावर्तो गैरिकाश्चाख्याता उपरसा अमी ।
पूज्या अष्टदलेष्वेते पूर्वादीशामगङ्गरुमात् ॥ ४४ ॥

गन्धक, हरताल, कासीस, मैनशोल कङ्कुष्ठ, अञ्जन, राजावर्त तथा गैरिक ये आठ उपरस हैं । इनको अष्टदल कमल में क्रम से पूर्वदिशा से लेकर ईशान कोणतक स्थापन करके पूजन करनी चाहिए ॥ ४४ ॥

तत्र महारसाः—

रसकं विमला ताप्यं चपला तुत्थमञ्जनम् ।
हिङ्गुलं सस्यकं चैव ख्याता एते महारसाः ।
पूर्वादीशानपर्यन्तं पत्राग्रेषु प्रपूजयेत् ॥ ४५ ॥

खर्पर, विमल, सुवर्ण माक्षिक, चपल, तुत्थ, अञ्जन, हिङ्गुल, सस्यक ये आठ महारस हैं । इनको पूर्वदिशा से ईशान कोण तक अष्टदल मण्डल की पखड़ियों के अग्रभाग में स्थापन करके पूजन करनी चाहिए ॥ ४५ ॥

तत्र अष्टलोहपूजाक्रमः—

पूर्वद्वारे स्वर्णरौप्ये दक्षिणे ताम्रसीसके ।
पश्चिमे वङ्गकान्तौ च उत्तरे मुण्डतीक्ष्णके ।
सर्वमेतदघोरेण पूजयेदङ्कुशान्वितम् ॥ ४६ ॥

मण्डप की वेदी के चारप्रकार पहिले बताये हैं उन में से पूर्व के द्वारपर स्वर्ण और चांदी, दक्षिण के द्वार पर ताम्बा और सीसा, पश्चिम के द्वार पर वङ्ग और कौन्तलौह और उत्तर के द्वार पर मुण्ड तथा तीक्ष्णलौह की स्थापना करके उन की अंकुश विद्या के साथ अघोर मन्त्र को पढ़ते हुए पूजन करनी चाहिए ॥४६॥

तत्र उपकरणानां पूजाविधिः—

बिडं काञ्जिकयन्त्राणि क्षारमृल्लवणानि च ।
कोष्ठी मूषा वङ्कनालि तुषाङ्गारवनोपलाः ॥ ४७ ॥
भस्त्रिका दण्डिकानेका शिला खल्वान्युलूखलम् ।
स्वर्णकारोपकरणं समस्ततुलनानि च ॥ ४८ ॥
मृत्काष्ठताम्रलोहोत्थपात्राणि विविधानि च ।
दिव्यौषधीनां वर्गांश्च रञ्जकस्नेहनानि च ॥
एतानि द्वारबाह्ये तु मूलमन्त्रेण पूजयेत् ॥ ४९ ॥

षष्ठोऽध्यायः ।

षष्ठोऽध्यायः । २१३

वाङ्माया ह्रीं ततः क्षें च दमश्च पञ्चाक्षरो मनुः । अनेन मूलमन्त्रेण भैरवं तत्र पूजयेत् ॥ सर्वेषां रससिद्धानां नाम सङ्कीर्तयेत्तदा ॥ ५० ॥

विड् (रस के जारण के लिये क्षार पदार्थों से बनाया हुआ पदार्थ विशेष) काञ्जी, विविध यन्त्र, क्षार वर्गके आठों क्षार, पञ्चमृत्तिका, पाञ्चो लवण, कोष्ठियां, सब प्रकार की मूषा, वङ्क नाल, तुष, कोयले, जङ्गली कण्डे, धौंकनी, विविध प्रकार की औषधियां चलाने के दण्ड, कल्क पीसने की शिला, खरलें, ओखलियां, सुनार के विविध उपकरण, सब प्रकार की तुलाएं और सर्व प्रकार की मिट्टी, काष्ठ, ताम्बा और लौह के पात्र तथा आश्चर्यजनक गुण करने वाली दिव्य औषधियों के वर्ग (समूह) यथा जीवक, ऋषभक, ऋद्धि, वृद्धि, इत्यादि, तथा परदादि को रङ्गने वाले पदार्थ और स्नेह, इन को द्वार के बाहर स्थापन करके मूलमन्त्र के द्वारा पूजन करनी चाहिए । मूलमन्त्र का स्वरूप—वाङ्माया ह्रीं ततः क्षेञ्च क्ष्माश्च पञ्चाक्षरो मनुः । तथा इसी मन्त्र से भैरव का पूजन भी करें, पश्चात् सब रस के सिद्ध आचार्यो का भी वहां स्मरण करना चाहिए ॥ ४७–५० ॥

अथ रससिद्धेश्वरब्राह्मणादीनां पूजनम्—

व्यालाचार्यश्चंद्रसेनः सुबुद्धिर्नरवाहनः । नागार्जुनो रत्नघोषः सुरानन्दो यशोधनः ॥ ५१ ॥ इन्द्रधूमश्च माण्डव्यश्चर्पटी शूरसेनकः । आगमो नागबुद्धिश्च खण्डः कापालिको मतः ॥ ५२ ॥ कामारिस्तान्त्रिकः शम्भुर्लङ्कालम्पटशारदौ । बाणासुरो मुनिश्रेष्ठो गोविन्दः कपिलो बलिः ॥ ५३ ॥ एते सर्वे तु सूतेन्द्रा रससिद्धा महाबलाः । चरन्ति सर्वलोकेषु नित्या भोगपरायणाः ॥ ५४ ॥ सप्तविंशतिसङ्ख्याका रससिद्धिप्रदायकाः । वैद्याः पूज्याः प्रयत्नेन ततः कुर्याद्रसार्चनम् ॥ ५५ ॥ हर्षयन्द्विजदेवानां तर्पयेदिष्टदेवताः । कुमारीयोगिनीयोगीश्वरान्मेलकसाधकान् ॥ तर्पयेत्पूजयेद्भक्त्या यथाशक्त्यनुसारतः ॥ ५६ ॥

२१४ रसरत्नसमुच्चये—

इत्येवं सर्वसम्भारयुक्तं कुर्याद्रसोत्सवम् ।
सर्वविघ्नप्रशान्त्यर्थं सर्वैप्सितफलप्रदम् ॥ ५७ ॥

व्यालाचार्य, चन्द्रसेन, सुबुद्धि, नरवाहन, नागार्जुन रत्नघोष, सुरानन्द, यशोधन, इन्द्रधूम, माण्डव्य, चर्टी, शूरसेन, आगम, नागबुद्धि, खण्ड, कपालिक, कामारि, तान्त्रिक, शम्भु, लंक, लम्पक, शारद, बाणासुर, मुनिश्रेष्ठ, गोविन्द, कपिल और वलि ये २७ पारद के साधन में इन्द्रके समान श्रेष्ठ, रससिद्ध, और महान बल से सम्पन्न आचार्य हैं । ये भोगों में लिप्त हो कर सर्वदा सब लोकों में विचरण करते रहते हैं । ये २७ आचार्य रससिद्धि का प्रदान करते हैं तथा इनकी यथाविधि पूजन करके पारद की पूजन करनी चाहिए । ब्राह्मण और देवताओं को भोजन तथा पूजनादिक से प्रसन्न करके इष्ट देवी देवताओं का भी पूजन करे । फिर अपनी शक्ति के अनुसार छोटी २ कन्याएं, योगिनी, योगीश्वर तथा पारद का साधन करने वाले इत्यादि का भक्तिपूर्वक पूजन करके उन्हें प्रसन्न करें, इस प्रकार सर्व सामग्री से युक्त और सर्व प्रकार की मनोरथपूर्ति करने वाला, सर्वविघ्न शान्ति के लिये रसोत्सव करना चाहिए ॥ ५१-५७ ॥

अदीक्षितस्य रसविद्यासाधनवैफल्यनिर्देशः—

अन्यथा यो विमूढात्मा मन्त्रदीक्षाक्रमाद्विना ।
कर्तुमिच्छति सूतस्य साधनं गुरुवर्जितः ॥ ५८ ॥
नासौ सिद्धिमवाप्नोति यत्नकोटिशतैरपि ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शास्त्रोक्तां कारयेत्क्रियाम् ॥ ५९ ॥

जो मूर्ख मन्त्र और दीक्षा क्रम को छोड़ कर गुरु की सहायता के विना ही रस की सिद्धि करने की इच्छा करता है वह करोड़ों प्रयत्न करने पर भी सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता है, इस लिये शास्त्र के कथनानुसार यत्न पूर्वक प्रथम दीक्षा पूजादि क्रिया करनी चाहिए ॥ ५८-५९ ॥

अथ रससाधने सिद्धिलाभहेतुनिर्देशः—

सम्यक्साधनसोध्मा गुरुयुता राजाज्ञयाऽलङ्कृता
नानाकर्मपराङ्मुखा रसपराश्चाढ्या जनैश्चार्थिताः ।
मात्रायन्त्रसुपाककर्मकुशलाः सर्वौषधे कोविदाः
तेषां सिध्यति नान्यथा विधिबलाच्छ्रीपारदः पारदः ॥ ६० ॥

षष्ठोऽध्यायः । २९५

जो मनुष्य उद्योग शील, सब साधनों को प्राप्त किया हुआ तथा गुरु से शास्त्र पढा हो, जिसको राजा का आधार हो और दूसरे मनुष्यों से रस सिद्धि करने के लिये प्रार्थित हो तथा अन्य सांसारिक कार्यों में जो आसक्त न हो, धनी हो, औषधादियों की मात्रा, मन्त्र, पाकक्रिया और सब काष्ठादि औषधियों के पहचानने में जो कुशल हो, भाग्य से वही शोभा और देहसिद्धि करने वाले पारद को सिद्ध कर सकता है ॥ ६० ॥

अथ कस्मै किमर्थं रसविद्या दातव्या तन्निर्देशः— रसशास्त्रं प्रदातव्यं विप्राणां धर्महेतवे । राज्ञे वैश्याय वृद्ध्यर्थं दास्यार्थमितरस्य च ॥ ६१ ॥

रस शास्त्र ब्राह्मणों को चिकित्सा द्वारा परोपकारादि धर्म कार्य करने के लिये, राजा ( क्षत्रिय ) और वैश्य को उक्त शास्त्र की वृद्धि के लिये और अन्य श्रेष्ठ शूद्रादि मनुष्यों को तीनों वर्णों को सेवा करने के लिये पढ़ाना चाहिए ॥ ६१ ॥

अथ गुरुसन्तोषस्य सर्वसिद्धिहेतुत्वनिर्देशः— गुरौ तुष्टे शिवस्तुष्येच्छिवे तुष्टे रसस्तथा । रसे तुष्टे क्रियाः सर्वाः सिध्यन्त्येवं न संशयः ॥ ६२ ॥

सुश्रूषादिक से गुरू के प्रसन्न होने से महादेव जी प्रसन्न होते हैं, महादेवजी के प्रसन्न होने से पारद प्रसन्न होता है और पारद के प्रसन्न होने से प्रायः सब काम सफल हो जाते हैं । इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ ६२ ॥

अथ रसविद्याया अवश्यंगोप्यत्वनिर्देशः— रसविद्या दृढं गोप्या मातृगुह्यमिवध्रुवम् । भवेद्वीर्यवती गुप्ता निर्वीर्या च प्रकाशनात् ॥ ६३ ॥ न रोगिविदितं कार्यं बहुभिर्विदितं तथा । रोगिणां बहुभिर्ज्ञातं भवेन्निर्वीर्यमौषधम् ॥ ६४ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये शिष्योपनयनं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥


रसविद्या को माता के गोप्याङ्ग के समान गुप्त रखनी चाहिए, क्योंकि गुप्त रखने से वह वीर्य्यवती होती है, और प्रकाशित करने से निर्वीर्य हो जाती है ।

२१६ रसरत्नसमुच्चये—

जो औषधि रोगी तथा अन्य बहुत से मनुष्यों से जानी हुई होती है वह निर्वीर्य्य हो जाती है इसलिये प्रायः किसी भी औषधि को रोगी या अन्य मनुष्य को नहीं बताना चाहिये ॥ ६३-६४ ॥

इति श्रीकृष्णार्त्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां
रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्य-भाषाटीकायां
शिष्योपनयननिरूपणं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥


अथ सप्तमोऽध्यायः ॥

अथ रसशाला—

रसशालां प्रकुर्वीत सर्वबाधाविवर्जिते ।
सर्वौषधिमये देशे रम्ये कूपसमन्विते ॥ १ ॥
यक्षत्र्यक्षसहस्राक्षदिग्विभागे सुशोभने ।
नानोपकरणोपेतां प्राकारेण सुशोभिताम् ॥ २ ॥
शालायाः पूर्वदिग्भागे स्थापयेद्रसभैरवम् ।
वह्निकर्माणि चाग्नेये याम्ये पाषाणकर्म च ॥ ३ ॥
नैर्ऋत्ये शस्त्रकर्माणि वारुणे क्षालनादिकम् ।
शोषणं वायुकोणे च वेधकर्मोत्तरे तथा ॥
स्थापनं सिद्धवस्तूनां प्रकुर्यादीशकोणके ॥ ४ ॥

जो स्थान सर्व प्रकार के विघ्नों से रहित हो, सब तरह की सूखी और आर्द्र औषधियां जहां मिलती हो तथा जो देखने में सुन्दर हो और कूप नदी तालाब से सुशोभित हो ऐसे स्थान में कुवेर की उत्तर दिशा, महादेव का ईशान कोण अथवा इन्द्र की पूर्व दिशा में अनेक प्रकार के औषधि बनाने के उपकरणों से युक्त और चारों ओर घेरा ( प्राकार ) जिस के हो ऐसी रसशाला का निर्माण करना चाहिए । रसशाला की पूर्वदिशा में रस भैरव ( रसलिङ्ग ) की स्थापना करे और आग्नेय कोण में अग्नि सम्बन्धी कार्य जैसे भट्ठियां चूल्हे इत्यादि बनवाना चाहिए । दक्षिणदिशा में शिलापर कल्क का मर्दन आदि पाषाण कर्म करना चाहिए और नैर्ऋत्य कोण में धातुओं की परीक्षा के लिये अथवा यन्त्रादियों के.

सप्तमोऽध्यायः ।

सप्तमोऽध्यायः । २१७

निर्माण के लिये तथा भेदन आदि शस्त्र कर्म करने के लिए भवननिर्माण करना चाहिए । पश्चिम दिशा में औषधियों का प्रक्षालन, वायव्यदिशा में आर्द्रद्रव्यों को सुखाने का कार्य, उत्तर दिशा में रसेन्द्र का वेधकर्म और सिद्धहुए पदार्थों को जैसे भस्म, रस, घृत, तैल, अवलेह, पाक इत्यादि ईशान कोण में रखना चाहिए ॥ १-४ ॥

अथ रससाधनीयपदार्थाः— पदार्थसङ्ग्रहः कार्यो रससाधनहेतुकः । सत्त्वपातनकोष्ठीं भ्रष्टकोष्ठीं सुशोभनाम् ॥ ५ ॥ भूमिकोष्ठीं चलत्कोष्ठीं जलद्रोण्याऽप्यनेककः । भस्त्रिकायुगलं तद्वन्नलिके वंशलोहयोः ॥ ६ ॥ स्वर्णायोधोषशुल्वाश्मकुण्ड्यश्चर्मकृतां तथा । करणानि विचित्राणि द्रव्याण्यपि समाहरेत् ॥ ७ ॥ कण्डणीपेषणीस्वल्पाद्रोणीरूपाश्च वर्तुलाः आयसास्तप्तखल्लाश्च मर्दकाश्च तथाविधाः ॥ ८ ॥ सूक्ष्मच्छिद्रसहस्राढ्या द्रव्यगालनहेतवे । चालनी च कटत्राणि शलाका हिच कुण्डली ॥ ९ ॥

रस के साधन करने के लिये जो उत्तम पदार्थ होंउनका संग्रह करना चाहिए । सत्त्वपातन करने की कोष्ठी, सुन्दर आसव तैय्यार करने की कोष्ठी, तैल निकालने की भूमिकोष्ठी तथा इधर उधर आसानी से ले जाने लायक छोटी २ कोठियां, अनेक प्रकार के जल भरने के धातुनिर्मित या मिट्टी के द्रोणाकार पात्र, दो धौंक-नियां, लौह की बनी हुई या बांस की बनी हुई दो नालियां ( भोंगली ) और स्वर्ण, लौह, ताम्र, कांस्य और पत्थर की बनी हुई छोटी २ कुंडियां ( स्थाली ) तथा चर्म के उपकरण और भी अन्य विचित्र तथा औषध कर्म के उपयोगी उपकरण तथा द्रव्यों का सम्पादन करना चाहिए। खाण्डने के लिये ओखली, पीसने के लिये चक्की तथा छोटी २ द्रोणी के स्वरूप की खरलें, गोल खरलें, तप्तखरल, उसी प्रकार के लौह के बने हुए घोटने के हत्थे, औषध चूर्ण के छानने के लिये हजारों छोटे २ सूराखों वाली चलनी और धातुओं को काटने वाली तीखी धार की वस्तुएं, रससिन्दूरादि के पाक करने के लिये चलानेवाली लौह की पतली २ शलाकाएं ( हाटें ) तथा स्थाली और कड़ाह वगैरे के रखने के लिए तृण की बनी

२१८ | रसरत्नसमुच्चये—

हुई कुण्डलियां, इत्यादि पदार्थों का संग्रह करना चाहिए ॥ ५-९ ॥

चालनीभेदलक्षणादिकम्—

चालनी त्रिविधा प्रोक्ता तत्स्वरूपं च कथ्यते ।
वैणवीभिः शलाकाभिर्निर्मिता ग्रथिता गुणैः ।
कीर्तिता सा सदाऽस्थूलद्रव्याणां गालने हिता ॥ १० ॥
चूर्णचालनहेतोश्च चालन्यन्यापि वंशजा ॥ ११ ॥
कर्णिकारस्य शाल्मल्या हरिजातस्य कम्बया ।
चतुरङ्गुलविस्तारयुक्तया निर्मिता शुभा ॥ १२ ॥
कुण्डल्यरत्निविस्तारा छागचर्माभिवेष्टिता ।
वाजिवालाम्बरानद्धतला चालनिका परा ॥
तया प्रचालनं कुर्याद्धर्तुं सूक्ष्मतरं रजः ॥ १३ ॥

औषध चूर्ण को छानने वाली चालनी तीन तरह की होती है । आगे उनका स्वरूप लिखते हैं यथा बांसों की सलियों से बनी हुई और मजबूत धागे से बंधी हुई जो चालनी होती है वह मोटे २ द्रव्यों के चालने के लिये उपयोगी होती है । दूसरी चालनी भी बांस ही से बनाई जाती है उसके द्वारा चूर्ण वगैरह छानना चाहिए । एक तीसरी चलनी होती है जो कि अमलतास, सेमल और चन्दन या बांस के कम्ब ( वल्कल ) से बनाई जाती है जो कि चार अङ्गुल ऊंची और उसकी चौड़ाई लम्बाई एक बैंत ( वालिस्त ) होनी चाहिए और बकरे के चर्म से चारों ओर मढकर के उसके तलभाग में घोड़े के बाल या वस्त्र बांधना चाहिए, इसके द्वारा औषधियों के छोटे २ चूर्ण को चालते हैं ॥ १०-१३ ॥

रससिद्धावुपकरणानि—

मूषा-मृत्तुष-कार्पासवनोपलकपिष्टकम् ।
त्रिविधं भेषजं धातुजीवमूलमयं तथा ॥ १४ ॥
शिखित्रा गोवरं चैव शर्करा च सितोपला ।
शिखित्राः पावकोच्छिष्टा अङ्गारा कोकिला मताः ॥ १५ ॥
कोकिलाश्चेतिताङ्गारा निर्वाणाः पयसा विना ॥ १६ ॥

पांचों प्रकार की मिट्टी, मूषा, तुष ( जो गेहूं आदि की भूसी ), कार्पास ( रुई या बिनौले ), जंगलीकण्डे, तण्डुलपिष्ट और तीन प्रकार की धातु स्वर्णादि,

सप्तमोऽध्यायः । २१९

सप्तमोऽध्यायः । २१९

जीवमयक्षीर, मूत्र, पुरीष, मूलमय वनौषधादिक औषधियों का भी संग्रह करना चाहिए। इनके अतिरिक्त शिखित्र, गोबर, बालुका, कठिनी ( सफेदा, रेता ) इनका भी संग्रह करे। जिस तरह कुम्भकार कच्चे घड़ों को पकाता है उसी तरह से लकड़ों के टुकड़ों के ढेर को ऊपर से बन्दकर भीतेर ही भीतर अग्नि द्वारा लकड़ियें पकाकर कोयले बनाये जाते हैं इन्हीं को प्रायः शिखित्र, कोकिला आदि नाम से कहते हैं। परन्तु मूलपाठ की संगति के लिये शिखित्र का स्वरूप इसतरह है जो अग्नि से जलकर शेष रहे हुए कोयले हैं वे शिखित्र कहलाते हैं और जो लकड़ी के टुकड़े कुम्भकार के आंवे की तरह अन्दर ही अन्दर अग्नि से जलकर पानी के बिना ही बुझ जाते हैं वे कोयले कहे जाते हैं ॥ १४-१६ ॥

उपलनामानि— पिष्टकं छागणं छाणमुपलं चोत्पलं तथा । गिरिण्डोपलसाठी च संशुष्कच्छागणाभिधाः ॥ १७ ॥

पिष्टक, छगण, छाण, उपल, उत्पल, गिरिण्डोपल और साठी ये सात नाम सूखे गोबर के हैं ॥ १७ ॥

कूपीनिर्माणद्रव्याणि— काचायोमृद्वराटानां कूपिका चषकानि च ॥ १८ ॥

काच, लौह, मिट्टी और कौड़ियें इनकी बनाई हुई शीशिएं तथा प्याले एकत्रित करे ॥ १८ ॥

कूपीपर्यायाः— कूपिका कुपिका सिद्धा गोला चैव गिरिण्डिका ॥ १९ ॥

शीशियों के नाम कूपिका, कुपिका, सिद्धा, गोला, गिरिण्डिका ये हैं ॥ १९ ॥

अथ चषकस्य पर्यायाः— चषकं च कटोरी च वाटिका खारिका तथा । कञ्चोली ग्राहिका चेति नामान्येकार्थकानि हि ॥ २० ॥

चषक, कटोरी, वाटिका, खारिका, कंचोली, और ग्राहिका ये नाम परस्पर एकार्थ को कहते हैं ॥ २० ॥

शूर्पादीनां समर्चनम्— शूर्पादिवेणुपात्राणि क्षुद्रशिप्राश्च शङ्खिकाः । क्षुरप्राश्च तथा पाक्यः यच्चान्यत्तत्र युज्यते ॥

२२० रसरत्नसमुच्चये—

पालिका कर्णिका चैव शाकच्छेदनशस्त्रकाः ॥ २१ ॥
शालासम्मार्जनार्थं हि रसपाकान्तकर्म यत् ।
तत्रापयोगि यच्चान्यत्तत्सर्वं परविद्यया ॥ २२ ॥
श्रीरसाङ्कुशया सर्वं मन्त्रयित्वा समर्चयेत् ।
अन्यथा तद्गतं तेजः परिगृह्णन्ति भैरवाः ॥ २३ ॥

सूप आदि बांस के बने हुए पात्र, छोटी २ सीपीं ( शुक्तियां ), छोटे २ शंख, छुरियां, पाक करने योग्य पात्र और जो कुछ वस्तु औषध कर्म में उपयुक्त समझी जाय वह तथा शाकादि काटने के शस्त्र पालिका, कर्णिका, रस-शाला का सम्मार्जन करने के लिये सम्मार्जनी ( झाडू ) आदि से लेकर पाककर्म तक जो कुछ भी उपकरण आवश्यक हों उनका संग्रह करके श्रेष्ठ जो रसांकुशी विद्या है उसके द्वारा उन सबको अभिमन्त्रित करके पूजें । इस तरह उनका पूज-नादिक नहीं करने से उनके अन्दर के तेज (शक्ति) को भैरव हर लेते हैं ॥२१-२३॥

अथ रसक्रियायां कीदृशा वैद्या अन्ये वा नियोज्यास्तत्कथनम्—

रससञ्चिन्तका वैद्या निघण्टुज्ञाश्च वार्तिकाः ।
सर्वदेशजभाषाज्ञाः सङ्ग्राह्यास्तेऽपि साधकैः ॥ २४ ॥

रस के साधक को जो वैद्य रससिद्धि के करने का विचार रखते हों और जो निघण्टु (औषधियों के नाम, लक्षण, गुण, दोष, प्रयोग) के उत्तम ज्ञान से सम्पन्न हों और जो वैद्य परिभाषा ( सांकेतिक शब्दार्थ ) तथा वार्तिक "उक्तानुक्तदुरुक्ता-र्थव्यक्तकारितुवार्त्तिकम्" के अर्थ को तथा सब देशों की भाषाओं को जानते हों उन वैद्यों का संग्रह करना चाहिए ॥ २४ ॥

अथ रसपाककाले मन्त्रजपस्य कर्त्तव्यतानिर्देशः—

रसपाकावसानं हि सदाऽघोरं च जापयेत् ॥ २५ ॥

जब तक रस का पाक होता रहे तब तक अघोर मन्त्र का किसी ब्राह्मण के द्वारा जप कराते रहना चाहिए ॥ २५ ॥

अथ परिचारकलक्षणम्—

सोद्यमाः शुचयः शूरा बलिष्ठाः परिचारकाः ॥ २६ ॥

जो परिचारक उद्योगशील, पवित्र, शूरवीर और बलवान् हों उन्हें रस के कार्य में नियुक्त करना चाहिए ॥ २६ ॥

सप्तमोऽध्यायः । .२२१

पद्महस्तवैद्यलक्षणम्—

धर्मिष्ठः सत्यवाग्विद्वान् शिवकेशवपूजकः ।
सदयः पद्महस्तश्च संयोज्यो रसवैद्यके ॥ २७ ॥
जो धर्म में तत्पर, सत्य बोलने वाला, रसशास्त्र का विद्वान् और शिव, विष्णु का भक्त, दयावान् तथा जिसके हाथ में कमल का चिन्ह हो वह पद्महस्त वैद्य है उसको रससिद्धि करने में नियुक्त करें ॥ २७ ॥

अमृतहस्तवैद्यलक्षणम्—

पताकाकुम्भपाथोजमत्स्यचापाङ्कपाणिकः ।
अनामाधस्थरेखाङ्कः सस्यादमृतहस्तवान् ॥ २८ ॥
जिस के हस्त में ध्वजा, घट, कमल, मत्स्य और धनुष इनका चिन्ह हो तथा जिसकी अनामिका अङ्गुली के मूल में रेखाएं हों वह अमृतहस्त वैद्य कहलाता है ॥ २८ ॥

दग्धहस्तवैद्यस्य लक्षणम्—

अदेशिकः कृपामुक्तो लुब्धो गुरुविवर्जितः ।
कृष्णरेखाकरो वैद्यो दग्धहस्तः स उच्यते ॥ २९ ॥
जो अन्य देश से आया हो तथा दयारहित, लोभी, गुरुदीक्षा से रहित हो तथा जिसके हाथ में काली रेखा हो वह वैद्य दग्धहस्त कहलाता है, उसको रसकर्म में नियुक्त नहीं करना चाहिए ॥ २९ ॥

निधिरक्षायोग्यपुरुषाः—

भूतनिग्रहमन्त्रज्ञास्ते योज्या निधिसाधने ॥ ३० ॥
भूत, प्रेत, पिशाचादि को दूर करने या वशमें करने के मन्त्र जो जानते हों उन्हें सिद्ध भस्म, पाक आदि की रक्षा के लिये नियुक्त करना चाहिए ॥ ३० ॥

अथ बलिसाधने नियोज्यपुरुषलक्षणम्—

बलिष्ठाः सत्यवन्तश्च रक्ताक्षाः कृष्णविग्रहाः ।
भूतत्रासनविद्याश्च ते योज्या बलिसाधने ॥ ३१ ॥
जो पुरुष बलवान् , सत्यवादी, लालनेत्र और काले शरीर के हों और जो भूत प्रेतों को डराने वाली विद्या को जानते हों उन्हें बलिदान करने के कार्य में नियुक्त करना उत्तम है ॥ ३१ ॥

२२२ | रसरत्नसमुच्चये—

अथ रसायने नियोज्यपुरुषलक्षणम्—

निर्लोभाः सत्यवक्तारो देवब्राह्मणपूजकाः ।
यमिनः पथ्यभोक्तारो योजनीया रसायने ॥ ३२ ॥

जो मनुष्य लोभरहित, सत्यवक्ता, देवता और ब्राह्मणों के पूजक, इन्द्रियनिग्रहशील और पथ्यभोजी हों उनको रससिद्धि में नियुक्त करें ॥ ३२ ॥

स्वर्णादिधातुसिद्धिनियुक्तियोग्यपुरुषाः—

धनवन्तो वदान्याश्च सर्वोपस्करसंयुताः ।
गुरुवाक्यरता नित्यं धातुवादेषु ते शुभाः ॥ ३३ ॥

जो पुरुष धनाढ्य, दान करने वाले तथा गुरु के वचनों का पालन करते हों उन्हें स्वर्ण, रौप्य आदि धातुओं के शोधन और मारण कर्म में नियुक्त करें ॥ ३३ ॥

अथ भेषजाहरणे नियोज्यपुरुषलक्षणम्—

तत्तदौषधनामज्ञाः शुचयो वञ्चनोज्झिताः ।
नानाविषयभाषाज्ञास्ते मता भेषजाहृतौ ॥ ३४ ॥

जो मनुष्य सब औषधियों के नाम को भलिभांति जानते हों और पवित्र, धूर्ततारहित तथा सबदेश की भाषा से परिचित हों उन्हें औषधियां लाने के लिये नियुक्त करना चाहिए ॥ ३४ ॥

अथ केषां रससिद्धिर्भवतीत्याह—

शुचीनां सत्यवाक्यानामास्तिकानां मनस्विनाम् ।
सन्देहोज्झितचित्तानां रसः सिद्ध्यति सर्वदा ॥ ३५ ॥

जिन की अन्तरात्मा, मन, कर्म और शरीर शुद्ध हो तथा जो सत्यवादी, आस्तिक (इहलोक, परलोक, आत्मा, परमात्मा इत्यादि के अस्तित्व का ज्ञान रखने वाले ), मन को जीतने वाले, रसादिसिद्धि के सन्देह से रहित हों उन्हीं को पारदकी सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ३५ ॥

अथ रससिद्धसाधकस्य कर्त्तव्यनिर्देशः—

दशाष्टक्रियया सिद्धो रसोऽसौ साधकोत्तमः ।
हा रसो नष्टमित्युक्त्वा सेवेतान्यत्र तं रसम् ॥ ३६ ॥

जो पुरुष स्वेदनमर्दनादि १८ संस्कारों के द्वारा रस को सिद्ध कर लेता है वह रस के साधकों में उत्तम साधक है तथा वह रस मूर्च्छना वगैरह से मृत हो गया

सप्तमोऽध्यायः । २२३

इस तरह का विषाद कर फिर किसी अन्य स्थान में रस साधन का कर्म प्रारम्भ कर देता है ॥ ३६ ॥

**विमर्शः—**कुछ पुस्तकों में "हारसोनए" के स्थान में 'महारसोऽयमित्युक्त्वा, ऐसा पाठ है वह भी ठीक है, उसका अर्थ यह महारस है ऐसा कह कर उसका सेवन करें। जहां पर "सिद्धो रसः" के स्थान में "सिद्धे रसे" ऐसा पाठ है वहां का अर्थ 'रस के सिद्ध होने पर यह है। यदि कोई शङ्का करे कि रस के सिद्ध होने पर उसके विषय में विषाद क्यों किया जाता है। उत्तर—जिस तरह राम, युधिष्ठिर आदि महापुरुष शत्रुओं को मार कर भी उनके लिये विषाद करते हैं वैसे ही यहां पर भी विषाद करना असङ्गत नहीं है ॥

रससिद्धमर्त्यफलम्— रससिद्धो भवेन्मर्त्यो दाता भोक्ता न याचकः । जरामुक्तो जगत्पूज्यो दिव्यकान्तिः सदा सुखी ॥ ३७ ॥

इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये रसशालाप्रकरणं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥


जो पुरुष रससिद्धि प्राप्त कर लेता है वह दाता, भोक्ता, संसार का पूज्य, जरा (बुढौती) से रहित, दिव्य कान्ति से युक्त और सर्वदा सुखी रहता है और वह किसी के पास याचक बन कर मांगने नहीं जाता है अर्थात् उसके पास सब सिद्धिएं आजाती हैं ॥ ३७ ॥

इति श्रीकृष्णात्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्जवलाख्य-भाषाटीकायां रसशालानिरूपणं नाम सप्तमोऽध्यायः ।

२२४ रसरत्नसमुच्चये—

अथ अष्टमोऽध्यायः ॥

अथ परिभाषा—

कथ्यते सोमदेवेन मुग्धवैद्यप्रबुद्धये ।
परिभाषा रसेन्द्रस्य शास्त्रैः सिद्धैश्च भाषिता ॥ १ ॥

अब सोमदेव नामक रसशास्त्र के आचार्य, अल्प मति वैद्यों को सहज में ज्ञान हो जाय इसलिये शास्त्र और सिद्ध पुरुषों से कही हुई रस सम्बन्धी परिभाषा को कहते हैं ॥ १ ॥

धन्वन्तरिभागः—

अर्धं सिद्धरसस्य तैलघृतयोर्लेहस्य भागोऽष्टमः
संसिद्धाखिललोहचूर्णवटकादीनां तथा सप्तमः ।
यो दीयेत भिषग्वराय गदिभिर्निर्दिश्य धन्वन्तरिम् ।
सर्वाऽऽरोग्यसुखाप्तये निगदितो भागः स धन्वन्तरेः ॥ २ ॥

जो रोगी अपने रोगमुक्ति के लिये तथा आरोग्य और सुखप्राप्ति के निमित्त वैद्य के द्वारा अपने द्रव्य से औषध निर्माण कराकर उसमें से निर्माता वैद्य को जारणमारणादिविधि से सिद्ध हुए रस और सिद्धकिये हुए घृत, तैल का आधाभाग, अवलेह का आठवांभाग, सिद्ध हुए सप्तलोह, चूर्ण, वटक इत्यादि में से सप्तमांश (सातवां) भाग धन्वन्तरि के निमित्त देता है वह धन्वन्तरि का भाग कहलाता है ॥२॥

रुद्रभागः—

भैषज्यक्रीणितद्रव्यभागोऽप्येकादशो हि यः ।
वणिग्भ्यो गृह्यते वैद्यै रुद्रभागः स उच्यते ॥ ३ ॥

औषधि के लिये खरीदे हुए द्रव्यों में का व्यापारियों से जो ग्यारहवां भाग वैद्य लेते हैं वही रुद्रभाग कहलाता है ॥ ३ ॥

अथ विश्वासघातकवैद्यलक्षणम्—

प्रगृह्याऽधिकरुद्रांशं योऽसमीचीनमौषधम् ।
दापयेल्लुब्धधीर्वैद्यः स स्याद्विश्वासघातकः ॥ ४ ॥

जो लोभी वैद्य अधिक मात्रा से रुद्रभाग लेकर खराब औषधि को श्रेष्ठ कह कर देता है या अन्य से दिला देता है वह वैद्य विश्वासघातक है ॥ ४ ॥

अष्टमोऽध्यायः ।
२२५

अथ कज्जली—
धातुभिर्गन्धकाद्यैश्च निर्द्रवैर्मर्दितो रसः ।
सुश्लक्ष्णः कज्जलाभोऽसौ कज्जलीत्यभिधीयते ॥ ५ ॥
गन्धक आदि धातुओं के साथ पारद को किसी द्रवपदार्थ (अम्लरस इत्यादि) के बिना ही घोटकर उसका अत्यन्त चिकना और कज्जल के समान काला चूर्ण तैयार करते हैं उसी को कजली कहते हैं ॥ ५ ॥

अथ रसपङ्कः—
सद्रवा मर्दिता सैव रसपङ्क इति स्मृतः ॥ ६ ॥
यदि उपर्युक्तविधि से बनी कज्जली में द्रवपदार्थ मिलाकर घोटा जाय तब उसको रसपङ्क कहते हैं ॥ ६ ॥

अथ पिष्टी—
अर्कांशतुल्याद्रसतोऽथगन्धान्निष्कार्धतुल्यात्त्रुटिशोऽभिखल्ले ।
अर्कातपे तीव्रतरे विमर्द्यात् पिष्टीभवेत्सा नवनीतरूपा ॥ ७ ॥
आधा निष्क ( २ माषा ) गन्धक और गन्धक से द्वादशांश (१२ वां भाग) शुद्ध पारद लेकर खरल में डालकर तेजधूप में घोटना चाहिए । जब घोटते २ मक्खन के समान चिकना चूर्ण होजाय तब उसको पिष्टि कहते है ॥ ७ ॥

मतान्तरम्—
खल्ले विमर्द्य गन्धेन दुग्धेन सह पारदम् ।
पेषणात्पिष्टतां याति सा पिष्टीति मता परैः ॥ ८ ॥
खरल के अन्दर दुग्ध के साथ बराबर २ शुद्ध पारद तथा गन्धक को घोटने से जब वह पिष्टि के रुप में हो जाय तब पिष्टि कहलाती है। यह भी अन्य आचार्य का मत है ॥ ८ ॥

अथ पातनपिष्टी—
चतुर्थांशसुवर्णेन रसेन घृष्टपिष्टिका ।
भवेत्पातनपिष्टी सा रसस्योत्तमसिद्धिदा ॥ ९ ॥
एक भाग शुद्ध पारद को चौथाई भाग सुवर्ण पत्रों के साथ घोटने से जो पिष्टी ( कज्जली ) तैयार होती है उसको पातन पिष्टी कहते हैं ( अर्थात् सुवर्ण के साथ इस तरह पारद को घोटकर पिष्टि बना के उसका उर्ध्वपातन करते हैं ) । इससे पारद के अन्दर अनेक गुणों का आधान होता है ॥ ९ ॥

रस० १५

२२६ :रसरत्नसमुच्चये—

अथ स्वर्णरौप्ययोः कृष्टिः—

रूप्यं वा जातरूपं वा रसगन्धादिभिर्हतम् ।
समुत्थितं च बहुशः सा कृष्टी हेमतारयोः ॥ १० ॥

पारद और गन्धक आदि के द्वारा भस्म किये हुए स्वर्ण तथा रजत को उर्ध्व-पातन यन्त्र द्वारा अनेक औषधियों से जो पुनरुत्थापित कहते हैं, वह स्वर्ण और रजत की कृष्टी कही जाती है ॥ १० ॥

अथ कृष्ट्या उपयोगः—

कृष्टीं क्षिपेत्सुवर्णांन्तर्न वर्णो हीयते तया ॥ ११ ॥

उक्तविधि से की हुई स्वर्ण या रौप्य की कृष्टी को अग्निपर गलाकर स्वर्ण में मिलाने से स्वर्ण का रङ्ग कम नहीं होता है ॥ ११ ॥

स्वर्णकृष्ट्याः कार्यम्—

स्वर्णकृष्ट्या कृतं बीजं रसस्य परिरञ्जनम् ॥ १२ ॥

स्वर्ण कृष्टी से किया हुआ बीज (बनाने की विधि आगे है) पारद का रञ्जन करता है ॥ १२ ॥

अथ वरलोहकम्—

ताम्रं तीक्ष्णसमायुक्तं द्रुतं निक्षिप्य भूरिशः ।
सगन्धलकुचद्रावे निर्गतं वरलोहकम् ॥ १३ ॥

तीक्ष्णलौह तथा ताम्र को बहुतवार (प्रायः ७ वार) साथ ही पिघलाकर गन्धक के चूर्ण को बड़हल के रस में मिलाकर उसमें बुझाने से लोह को वरलोह कहा जाता है ॥ १३ ॥

अथ हेमरक्ती—

तेन रक्तीकृतं स्वर्णं हेमरक्तीत्युदाहृतम् ॥ १४ ॥

इस वरलोह के साथ स्वर्ण को पिघलाने से वह उत्तम लालवर्ण का हो जाता है उसको हेमरक्ती कहते हैं ॥ १४ ॥

हेमरक्तीप्रयोगः—

निक्षिप्ता सा द्रुते स्वर्णे स्वर्णोत्कर्षविधायिनी ।
तारस्य रञ्जनी चापि बीजरागविधायिनी ॥ १५ ॥

यह हेमरक्ती पिघले हुए स्वर्ण के साथ डालकर उसमें मिलाने से उसका रङ्ग

अष्टमोऽध्यायः । २२७

अष्टमोऽध्यायः । २२७

श्रेष्ठ बनादेती है तथा चांदी को रङ्ग देती है और उसके बीजराग को भी बनाती है॥१५॥

अथ ताररक्ती— एवमेव प्रकर्तव्या ताररक्ती मनोहरा । रञ्जनी खलु रूप्यस्य बीजानामपि रञ्जनी ॥ १६ ॥ हेमरक्ती की तरह वरलोह के साथ चांदी को गला कर ताररक्ती बनाते हैं, यह ताररक्ती चांदी को तथा चांदी के बीजों को भी रङ्ग देती है ॥ १६ ॥

अथ दलम्— मृतेन वा बद्धरसेन वाऽन्यल्लोहेन वा साधितमन्यलोहम् । सितं च पीतत्वमुपागतं तद्दलं हि चन्द्रानलयोः प्रसिद्धम् ॥१७॥ भस्महुए पारद अथवा निगडीकरण क्रिया द्वारा संयमित ( बद्ध ) पारद के साथ या किसी अन्य लोह आदि धातु के साथ सिद्ध की हुई कोई धातु जब श्वेत वर्ण की होजाती है तब उसको चन्द्रदल कहते हैं और जब वह पीतवर्ण की होजाती है तब उसको अग्निदल कहते हैं ॥ १७ ॥

अथ अन्यविधदलम्— आमासकृतबद्धेन रसेन सह योजितम् । साधितं वाऽन्यलोहेन सितं पीतं च तद्दलं ॥ १८ ॥ एक मास तक रस को निगडीकरण क्रिया द्वारा बद्ध करके उस (बद्ध हुए) के साथ या उसकी भस्म के साथ या किसी अन्य लोह के साथ सिद्ध की हुई किसी धातु को श्वेत होनेपर सितदल और पीत होने पर पीतदल कहते हैं ॥१८॥

अथ शुल्वनागम्— माक्षिकेण हतं ताम्रं दशवारं समुत्थितम् । तद्वद्विशुद्धनागं हि द्वितयं तच्चतुष्पलम् ॥ १६ ॥ नीलाञ्जनहतं भूयः सप्तवारं समुत्थितम् । इति संसिद्धमेतद्धि शुल्वनागं प्रकीर्त्यते ॥ २० ॥ शुद्ध स्वर्णमाक्षिक चूर्ण के साथ शुद्ध ताम्र की भस्म बनाकर उसको उत्थापित करें, इस तरह फिर उस उत्थापित ताम्र की शुद्धस्वर्ण माक्षिक के साथ भस्म बनाकर उसको पुनः उत्थापित करें इसी प्रकार से यह क्रिया दसवार करनी चाहिए । शुद्ध नाग को भी शुद्धस्वर्णमाक्षिक के साथ भस्म करके उत्थापित करें इस तरह

२२८ रसरत्नसमुच्चये—

इसको भी दसवार भस्म बनाकर उत्थापित करना चाहिए। पश्चात् इस नाग और ताम्र को चारपलकी मात्रा में ग्रहणकर नीलाञ्जन के साथ भस्म करके उत्थापन करें। इस तरह भस्म करके सात वार उत्थापन करना चाहिए। इस क्रिया से शुद्ध नाग और ताम्र को शुल्बनाग कहते हैं ॥ १९-२० ॥

अथ शुल्बनागगुणाः—

सान्निस्तेन सूतेन्द्रो वदने विधृतो नृणाम् ।
निहन्ति मासमात्रेण मेहव्यूहं विशेषतः ॥ २१ ॥
पथ्याशनस्य वर्षेण पलितं वलिभिः सह ।
गृध्रदृष्टिर्लसत्पुष्टिसर्वारोग्यसमन्वितः ॥ २२ ॥

इस शुल्बनाग के साथ पारद की भस्म बना करके गोली बनाकर एक मास तक मुख में धारण करने से मनुष्यों के बीस प्रकार के प्रमेह नष्ट हो जाते हैं, इसी तरह जो मनुष्य पथ्य का पालन करता हुआ एक वर्ष तक इस गोली को मुख में धारण करता रहे तो उसके वली (युवावस्था में ही मुख तथा अन्य अङ्ग के चर्म में झुर्रियों का पड़ना) और पलित (असमय में बालों का सफेद होना) रोग नष्ट हो जाते हैं तथा उस मनुष्य की अवलोकन शक्ति (दृष्टि) गृध्र के समान बढ़ जाती है, शरीर पुष्ट हो जाता है, तथा उसका शरीर सब तरह से नीरोग होजाता है ॥ २१-२२ ॥

अथ पिञ्जरी—

लोहं लोहान्तरे क्षिप्तं ध्मातं निर्वापितं द्रवे ।
पाण्डुपीतप्रभं जातं पिञ्जरीत्यभिधीयते ॥ २३ ॥

एक धा को अन्य धातु के साथ मिलाकर अग्नि में विद्रुत करके किसी त्रिफला इत्यादि के क्वाथ में बुझाने ने से यदि वह धातु पाण्डुवर्ण लिये हुई पीत वर्ण की हो जाय तब उसको पिञ्जरी कहते हैं ॥ २३ ॥

अथ चन्द्रार्कम्—

भागाः षोडश तारस्य यथा द्वादश भास्वतः ।
एकत्रावर्तितास्तेन चन्द्रार्कंमिति कथ्यते ॥ २४ ॥

चांदी १६ भाग और ताम्र १२ भाग लेकर दोनों को अग्नि में विद्रुत करके घोटकर जो रस तैयार होता है उसको चन्द्रार्क कहते हैं ॥ २४ ॥

अष्टमोऽध्यायः । २२९

अष्टमोऽध्यायः । २२९

अथ निर्वापणम्—

साध्यलोहेऽन्यलोहं चेत्प्रक्षिप्तं वङ्कनालतः ।
निर्वापणं तु तत्प्रोक्तं वैद्यैर्निर्वाहिणं खलु ॥ २५ ॥

अग्नि में विद्रुत हुई धातु में अन्य धातु को विद्रुत कर वङ्कनाल द्वारा डालने को निर्वापण कहते हैं और उसी का पर्याय वैद्य जनोने निर्वाहिण भी कहा है॥ २५॥

निर्वापणद्रव्यमात्रा—

क्षिपेन्निर्वापणं द्रव्यं निर्वाह्ये समभागिकम् ।
आवाह्यं वापनीये च भागे दृष्टे च दृष्टवत् ॥ २६ ॥

साध्य लोह में निर्वापण द्रव्य की मात्रा साध्य लोह के बराबर ही होनी चाहिए अथवा जैसी निर्वापण द्रव्य की मात्रा गुरुपरम्परा से सीखी या देखी हो उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए ॥ २६ ॥

अथ वारितरलोहलक्षणम्—

मृतं तरति यत्तोये लोहं वारितरं हि तत् ॥ २७ ॥

जो धातु फूंकने के पश्चात् अर्थात् उस धातु की भस्म जल पर तैरती रहे उसमें डूबे नहीं उसको वारितरभस्म या लोह कहते हैं ॥ २७ ॥

मृतलोहलक्षणम्—

अङ्गुष्ठतर्जनीघृष्टं यत्तद्रेखान्तरे विशेत् ।
मृतलोहं तदुद्दिष्टं रेखापूर्णाभिधानतः ॥ २८ ॥

किसी भी लोह (सप्तलोह) की भस्म को अङ्गुष्ठ तथा तर्जनी अङ्गुली के बीच में लेकर घर्षित करने से यदि वह भस्म उन दोनों की रेखाओं में प्रविष्ट हो जाय तथा नीचे नहीं गिरे तब उस धातु की भस्म को मृतलोह अथवा रेखापूर्ण नाम से कहते हैं ॥ ॥ २८ ॥

अपुनर्भव लक्षणम्—

गुडगुञ्जासुखस्पर्श मध्वाज्यैः सह योजितम् ।
नायाति प्रकृतिं ध्मानादपुनर्भवमुच्यते ॥ २९ ॥

गुड़, गुञ्जाचूर्ण, सुहागा, शहद, घृत, इनके साथ किसी भी धातु की भस्म को मिलाकर अग्नि में फूंकने से यदि वह अपने स्वरूप को धारण नहीं करे तब उसको अपुनर्भव भस्म कहते हैं ॥ २९ ॥

२३० रसरत्नसमुच्चये—

उत्तमभस्मलक्षणम्—

तस्योपरि गुरु द्रव्यं धान्यं चोपनयेद्ध्रुवम् ।
हंसवत्तीर्यते वारिण्युत्तमं परिकीर्तितम् ॥ ३० ॥

फिर इस भस्म को जल पर तैराकर इसके ऊपर कोई वजनी पदार्थ अथवा धान के दाने रखने से यदि वह जल में डूबे नहीं और हंस के समान उस भस्म के सहारे तैरती रहे तब वह उत्तम भस्म होती है। कुछ ग्रन्थकरों ने इसको ऊनम भस्म भी कहा है ॥ ३० ॥

निरुत्थलौहलक्षणम्—

रौप्येन सह संयुक्तं ध्मातं रौप्येन चेल्लगेत् ।
तदा निरुत्थमित्युक्तं लोहं तदपुनर्भवम् ॥ ३१ ॥

लोह ( सातलोह ) भस्म को चांदी के पत्रों के साथ मिलाकर फूंकने से यदि वह उन रजत पत्रों के साथ मिश्रित हो जाय तब उसको निरुत्थ कहते हैं ॥३१॥

अथ बीज लक्षणम्—

निर्वापणविशेषेण तत्तद्वर्णं भवेद्यदा ।
मृदुलं चित्रसंस्कारं तद्बीजमिति कथ्यते ॥ ३२ ॥
इदमेव विनिर्दिष्टं वैद्यैरुत्तरणं खलु ॥ ३३ ॥

किसी धातु को गलाकर उसमें अन्य धातु का निर्वापण करने से वह धातु कोमल और अद्भुत गुणों को करने वाली होजाती है इसी को बीज कहते हैं तथा वैद्य लोग इसको उत्तरण भी कहते हैं ॥ ३२–३३ ॥

ताडनस्वरूपम्—

संस्पृष्टलोहयोरेकलाहस्य परिनाशनम् ।
प्रध्मातं वङ्कनालेन तत्ताडनमुदाहृतम् ॥ ३४ ॥

दो धातु जब परस्पर मिली हो उनमें से एक धातु की शुद्धि करने के लिये और अन्य धातु को नष्ट करने के लिये उनको मूषायन्त्र में रखकर वङ्कनाल के द्वारा फूंकते हैं इसी को ताडन कहते हैं ॥ ३४ ॥

अथ धान्याभ्रलक्षणम्—

चूर्णाभ्रं शालिसंयुक्तं वस्त्रबद्धं हि काञ्जिके ।
निर्यातं मर्दनाद्वस्त्राद्धान्याभ्रमिति कथ्यते ॥ ३५ ॥

अष्टमोऽध्यायः । २३१

शुद्ध अभ्रक के छोटे २ टुकड़े ( चूर्ण ) बनाकर उसको धान के साथ ( भूषी युक्त चावल ) एक वस्त्र में रखकर पोटली बांध लेते हैं, फिर उस पोटली को काञ्जी में भिगोकर रख देते हैं । बाद में पोटली को कूटने से उसमें से जो अभ्रक का चूर्ण निकलता है उसको धान्याभ्रक कहते हैं ॥ ३५ ॥

अथ सत्त्वलक्षणम्—

क्षाराम्लद्रावकैर्युक्तं ध्मातमाकरकोष्ठके ।
यस्ततो निर्गतः सारः सत्त्वमित्यभिधीयते ॥ ३६ ॥

किसी धातु की भस्म को क्षार ( टंकण ) अम्ल ( काञ्जी ) और द्रावकवर्ग ( गुञ्जा, मधु, घृत, गुड़, ) के पदार्थों के साथ मिला कर कोष्ठिकायन्त्र में या मूषामें रखकर फूंक देने से जो उस भस्म का सार निकलता है उसको सत्त्व कहते हैं ॥ ३६ ॥

अथ एककोलिसकलक्षणम्—

कोष्ठिका शिखरापूर्णैः कोकिलैर्धमनियोगतः ।
मूषाकण्ठमनुप्राप्यैरेककोलीसको मतः ॥ ३७ ॥

एक कोष्ठिका को कोयलों से भरकर उन के बीच में द्रव्यों से भरी मूषा रखकर धौंकनी से फूंकना चाहिये । जब तक मूषा के भीतर का पदार्थ ( धातु ) उड़कर उसके कण्ठ में संलग्न न हो जाय तबतक यह क्रिया जारी रखनी चाहिए, इसी का नाम एककोलीसक है ॥ ३७ ॥

अथ द्रावणादिकर्मसाधने काष्ठनिर्देशः—

द्रावणे सत्त्वपाते च माधुकाः खादिराः शुभाः ।
दुर्द्भावे वंशजास्ते तु स्वेदने बादराः शुभाः ॥ ३८ ॥

किसी धातु के द्रावण या सत्त्वपातन करने के लिये महुए या खैरके काष्ठ या कोयले श्रेष्ठ हैं तथा जो वस्तु कठिनता से द्रव होती है उसके लिये बांस के काष्ठ या कोयले और स्वेदन कर्म में बैर के कोयलों अथवा लकड़ियों का प्रयोग करना चाहिए ॥ ३८ ॥

अथ हिङ्गुलाकृष्टरसः—

विद्याधराख्ययन्त्रस्थादार्द्रकद्रावमर्दितात् ।
समाकृष्टो रसो योऽसौ हिङ्गुलाकृष्ट उच्यते ॥ ३६ ॥