भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 441

पाकः पृच्छामि मनसाविजानन्देवानामेना निहिता पदानि. वत्से बष्कयेऽधि सप्त तन्तून्वि तत्निरे कवय ओतवा उ.. (५) मैं अपरिपक्व बुद्धि वाला मन से न जानने के कारण यह सब पूछ रहा हूं. ये संदेहास्पद बातें देवों के लिए भी गूढ़ हैं. एक वर्ष के बछड़े को लपेटने के लिए मेधावियों ने जो सात धागे बताए हैं, वे क्या हैं? (५) अचिकित्वाञ्चिकितुषश्चिदत्र कवीन्पृच्छामि विद्मने न विद्वान्. वि यस्तस्तम्भ षळिमा रजांस्यजस्य रूपे किमपि स्विदेकम्.. (६) मैं अज्ञानी हूं, पर जानने की इच्छा रखता हूं, इसीलिए तत्त्वज्ञानी क्रांतदर्शियों से पूछ रहा हूं. जिसने इन छः लोकों को स्थिर किया है, जो जन्मरहित होकर रहते हैं, वे क्या एक हैं? (६) इह ब्रवीतु य ईमङ्ग वेदास्य वामस्य निहितं पदं वे:. शीर्ष्णः क्षीरं दुहते गावो अस्य वव्रिं वसाना उदकं पदापुः.. (७) जो यह सब भली प्रकार जानता है, वह बतावे. इस सुंदर सूर्य का स्वरूप अत्यंत गूढ़ है. शिर के समान सबसे ऊंचे सूर्य की किरणों रूपी गाएं दूध के समान जल बरसाती हैं. वे ही किरणें विशाल तेज से तप्त होने पर जल निर्माण की तरह ही पी लेती हैं. (७) माता पितरमृत आ बभाज धीत्यग्रे मनसा सं हि जग्मे. सा बीभत्सुर्गर्भरसा निविद्धा नमस्वन्त इदुपवाकमीयुः.. (८) पृथ्वीरूपी माता जलवर्षा के निमित्त आकाश स्थित सूर्यरूपी पिता की यज्ञरूपी कर्म द्वारा पूजा करती है. इससे पहले ही पिता अभिप्राय वाले मन से धरती से संगत हुए हैं. इसके बाद गर्भ धारण करने की इच्छा वाली माता गर्भ की उत्पत्ति के हेतु जल से बिंध गई है. उन्होंने अनेक प्रकार की फसलें-गेहूं, जौ आदि उत्पन्न करने के लिए आपस में बातचीत की है. (८) युक्ता मातासीद्धुरि दक्षिणाया अतिष्ठद्गर्भो वृजनीष्वन्तः. अमीमेदद्वत्सो अनु गामपश्यद्विश्वरूप्यं त्रिषु योजनेषु.. (९) आकाश इच्छा पूर्ण करने वाली धरती के ऊपर वर्षा करने में समर्थ था. गर्भ रूपी जल मेघों के बीच था. इसके बाद बछड़े रूपी जल ने शब्द किया. इसके बाद मेघ, वायु और सूर्यकिरण इन तीनों के सहयोग से विश्वरूपा धरती फसलों वाली बनी. (९) तिस्रो मातृस्त्रीन्पितॄन्बिभ्रदेक ऊर्ध्वस्तस्थौ नेमव ग्लापयन्ति. मन्त्रयन्ते दिवो अमुष्य पृष्ठे विश्वविदं वाचमविश्वमिन्वाम्.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*