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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—६१ देवता—सरस्वती

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इन्द्राग्नी शृणुतं हवं यजमानस्य सुन्वतः. वीतं हव्यान्या गतं पिबतं सोम्यं मधु.. (१५) हे इंद्र एवं अग्नि! तुम सोमरस निचोड़ने वाले यजमान की पुकार सुनो, उसके हव्य की अभिलाषा करो. उसके यज्ञ में आओ एवं उसका मधुर सोम पिओ. (१५) सूक्त—६१ देवता—सरस्वती इयमददाद्रभसमृणच्युतं दिवोदासं वध्रयश्वाय दाशुषे. या शश्वन्तमचाखादावसं पणिं ता ते दात्राणि तविषा सरस्वति.. (१) इन सरस्वती ने हव्य देने वाले वध्र्यश्व को शीघ्रगामी एवं ऋण से छुटकारा दिलाने वाला दिवोदास नामक पुत्र दिया था. इन्होंने सदा अपने को तृप्त करने वाले एवं दान न करने वाले पणि को नष्ट किया था. तुम्हारे ये दान महान् हैं. (१) इयं शुष्मेभिर्बिसखा इवारुजत्सानु गिरीणां तविषेभिरूर्मिभिः. पारावतघ्नीमवसे सुवृक्तिभिः सरस्वतीमा विवासेम धीतिभिः.. (२) यह सरस्वती अपने बलों एवं महान् लहरों द्वारा किनारे के पहाड़ों की चोटियों को इस प्रकार तोड़ती हैं, जिस प्रकार कमल की जड़ खोदने वाला कीचड़ को बिखेर देता है, मैं दूरवर्ती वृक्षादि को नष्ट करने वाली सरस्वती की अपनी स्तुतियों एवं यज्ञकर्मों द्वारा अपनी रक्षा के निमित्त सेवा करता हूं. (२) सरस्वति देवनिदो निबर्हय प्रजां विश्वस्य बॄसयस्य मायिनः. उत क्षितिभ्योऽवनीरविन्दो विषमेभ्यो अस्रवो वाजिनीवति.. (३) हे सरस्वती! देवनिंदकों एवं सर्वत्र-व्याप्त मायावी वृत्र असुर का नाश करो. हे अन्न की स्वामिनी! तुम असुरों द्वारा छीनी हुई धरती मनुष्यों को दिलाओ एवं इनके लिए जल प्रवाहित करो. (३) प्र णो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती. धीनामवित्र्यवतु.. (४) अन्न की स्वामिनी एवं स्तोताओं की रक्षा करने वाली सरस्वती अन्नों द्वारा हमारी रक्षा करें. (४) यस्त्वा देवि सरस्वत्युपब्रूते धने हिते. इन्द्रं न वृत्रतूर्ये.. (५) हे सरस्वती देवी! जो स्तोता धन निमित्तक युद्ध में इंद्र के समान तुम्हारी स्तुति करता है, तुम उसकी रक्षा करो. (५) त्वं देवि सरस्वत्यवा वाजेषु वाजिनि. रदा पूषेव नः सनिम्.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे अन्नयुक्त सरस्वती देवी! तुम सग्रांम में हमारी रक्षा करो एवं सूर्य के समान हमें धन दो. (६) उत स्या नः सरस्वती घोरा हिरण्यवर्तनिः. वृत्रघ्नी वष्टि सुष्टुतिम्.. (७) प्रसिद्ध, शत्रुओं को डराने वाली सोने के रथ वाली एवं शत्रुओं को मारने वाली सरस्वती हमारी शोभनस्तुति की अभिलाषा करें. (७) यस्या अनन्तो अह्रुतस्त्वेषश्चरिष्णुरर्णवः. अमश्चरति रोरुवत्.. (८) सरस्वती का बल अनंत, अपराजित, दीप्तियुक्त, गतिशील एवं जलसहित है तथा बार- बार शब्द करता हुआ घूमता है. (८) सा नो विश्वा अति द्विषः स्वसॄरन्या ऋतावरी. अतन्नहेव सूर्यः.. (९) सरस्वती हमें सभी शत्रुओं से छुटकारा पाने तथा जल से भरी अन्य नदियां पार करने में हमारी सहायता करें. जिस प्रकार सूर्य सदा चलता रहता है, उसी प्रकार सरस्वती सदा बहें. (९) उत नः प्रिया प्रियासु सप्तस्वसा सुजुष्टा. सरस्वती स्तोम्या भूत्.. (१०) हमारी सबसे अधिक प्रिया, गंगा आदि सात बहिनों वाली एवं पुराने ऋषियों द्वारा सेवित सरस्वती हमारी स्तुतियां सुनें. (१०) आपप्रुषी पार्थिवान्युरु रजो अन्तरिक्षम्. सरस्वती निदस्पातु.. (११) धरा संबंधी विस्तीर्ण लोकों, अंतरिक्ष एवं आकाश को अपने तेज से पूर्ण करने वाली सरस्वती निंदकों से हमारी रक्षा करें. (११) त्रिषधस्था सप्तधातुः पञ्च जाता वर्धयन्ती. वाजेवाजे हव्या भूत्.. (१२) तीनों लोकों में व्याप्त, गंगा आदि सात-संबंधियों वाली एवं पांच-वर्गों को बढ़ाने वाली सरस्वती प्रत्येक युद्ध में बुलाने योग्य है. (१२) प्र या महिम्ना महिनासु चेकिते द्युम्नेभिरन्या अपसामपस्तमा. रथ इव बृहती विभ्वने कृतोपस्तुत्या चिकितुषा सरस्वती.. (१३) माहात्म्य के द्वारा महान्, यशों से युक्त व अन्य नदियों में प्रधान सरस्वती सर्वश्रेष्ठ जलवाली मानी जाती है. प्रजापति ने सरस्वती को विस्तार के लिए अधिक गुण वाली बनाया है. (१३) सरस्वत्यभि नो नेषि वस्यो माप स्फरीः पयसा मा न आ धक्. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—६२ देवता—अश्विनीकुमार

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जुषस्व नः सख्या वेश्या च मा त्वत्क्षेत्राण्यरणानि गन्म.. (१४) हे सरस्वती! हमें प्रसिद्ध धन के पास ले चलो. हमारी अवनति मत करो. हमें जलद्वारा पीड़ा न पहुंचाओ. हमारे मैत्रीकार्यों और प्रवेशों को स्वीकार करो. हम तुम्हारे पास से वनों अथवा बुरे स्थानों में न जावें. (१४) सूक्त—६२ देवता—अश्विनीकुमार स्तुषे नरा दिवो अस्य प्रसन्ताश्विना हुवे जरमाणो अर्कैः. या सद्य उस्रा व्युषि ज्मो अन्तान्युयुषतः पर्युंरू वरांसि.. (१) मैं स्वर्ग के नेता एवं भुवन के स्वामी अश्विनीकुमारों की स्तुति करता हूं एवं मंत्रों द्वारा उनकी प्रशंसा करता हुआ उन्हें बुलाता हूं. वे तुरंत शत्रुओं का निवारण करते हैं तथा रात्रि की समाप्ति पर धरती को ढकने वाला अंधेरा दूर करते हैं. (१) ता यज्ञमा शुचिभिश्चक्रमाणा रथस्य भानुं रुरुचू रजोभिः. पुरू वरांस्यमिता मिमानापो धन्वान्यति याथो अज्रान्.. (२) मेरे यज्ञ की ओर आते हुए अश्विनीकुमार अपने निर्मल तेजों से अपने रथ की दीप्ति प्रकट करते हैं एवं विविध तेजों को असीमित बनाते हुए जल प्राप्ति के लिए अपने घोड़ों को मरुभूमि के पार ले जाते हैं. (२) ता ह त्यद्धर्तिर्यदरध्रमूग्रेत्था धिय ऊहथुः शश्वदश्वैः. मनोजवेभिरिषि रैः शयध्यै परि व्यथिर्दाशुषो मर्त्यस्य.. (३) हे उग्र अश्विनीकुमारो! तुम यजमान के दरिद्र घर को समृद्ध बनाने के लिए जाते हो. तुम स्तोताओं द्वारा अभिलषित एवं मन के समान वेगशाली घोड़ों द्वारा स्तोताओं को स्वर्ग में ले जाओ एवं हव्य देने वाले मनुष्य के शत्रुओं को गहरी नींद में सुला दो. (३) ता नव्यसो जरमाणस्य मन्मोप भूषतो युयुजानसप्ती. शुभं पृक्षमिषमूर्जं वहन्ता होता यक्षत्प्रत्नो अध्रिगुं युवाना.. (४) रथ में घोड़े जोड़ते हुए, शोभन अन्न, पुष्टि एवं रस को वहन करते हुए अश्विनीकुमार नए स्तोता के स्तोत्र के समीप जाते हैं. हे होता, प्राचीन एवं द्रोहहीन अग्नि! युवा अश्विनीकुमारों का यज्ञ करो. (४) ता वल्गू दस्रा पुरुशाकतमा प्रत्ना नव्यसा वचसा विवासे. या शंसते स्तुवते शम्भविष्ठा बभूवतुर्गृणते चित्रराती.. (५) मैं नवीन स्तुतियों द्वारा उन्हीं रुचिर, अनेक-कर्म करने वाले तथा प्राचीन अश्विनीकुमारों ebook converter DEMO Watermarks*

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की सेवा करता हूं, जो स्तोत्ररचना करने वाले एवं स्तुति बोलने वाले व्यक्ति को सुखदाता एवं अनेक प्रकार का दान करने वाले हैं. (५) ता भुज्युं विभिरद्भ्यः समुद्रात्तुग्रस्य सूनूमूहथू रजोभिः. अरेणुभिर्योजनेभिर्भुजन्ता पतत्रिभिरण्वसो निरुपस्थात्.. (६) तुमने तुग के पुत्र भुज्यु की सागर में नाव टूट जाने पर रक्षा की एवं अंतरिक्ष में चलने वाले रथसहित घोड़ों की सहायता से सागर से बाहर निकाला. (६) वि जयुषा रथ्या यातमद्रिं श्रुतं हवं वृषणा वध्रिमत्याः. दशस्यन्ता शयवे पिप्यथुर्गामिति च्यवाना सुमतिं भुरण्यू.. (७) हे रथस्वामी अश्विनीकुमारो! तुम अपने विजयरथ द्वारा मार्ग में खड़े पहाड़ों को नष्ट करो. हे कामपूरको! तुम पुत्र चाहने वाली यजमान-पत्नी की पुकार सुनो, स्तोताओं की अभिलाषा पूर्ण करो, अपने स्तोता की बछड़ा न देने वाली गाय को दुधारू बनाओ तथा शोभनबुद्धि वाले बनकर सब जगह जाओ. (७) यद्रोदसी प्रदिवो अस्ति भूमा हेळो देवानामुत मर्त्यत्रा. तदादित्या वसवो रुद्रियासो रक्षोयुजे तपुरघं दधात.. (८) हे धरती-आकाश, आदित्यो, वसुओ और मरुतो! अश्विनीकुमारों के सेवक मनुष्यों के प्रति देवों का जो महान् क्रोध है, उस तापकारी क्रोध का प्रयोग राक्षसों के स्वामी को मारने के लिए करो. (८) य ईं राजानावृतुथा विदधद्रजसो मित्रो वरुणश्चिकेतत्. गम्भीराय रक्षसे हेतिमस्य द्रोघाय चिद्वचस आनवाय.. (९) जो मनुष्य सभी लोकों के स्वामी अश्विनीकुमारों की समय-समय पर सेवा करता है, उसे मित्र और वरुण जानते हैं. वह महाबली राक्षस एवं द्रोहात्मक वचन बोलने वाले मनुष्य पर शस्त्र फेंकता है. (९) अन्तरैश्चक्रैस्तनयाय वर्तिर्द्युमन्ता यातं नृवता रथेन. सनुत्येन त्यजसा मर्त्यस्य वनुष्यतामपि शीर्षा ववृक्तम्.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! तुम उत्तम पहियों, प्रकाशयुक्त एवं सारथि वाले रथ पर सवार होकर संतान देने के लिए हमारे घर आओ एवं छिपे हुए क्रोध द्वारा अपने भक्तों के विघ्नकर्त्ताओं के सिर काट डालो. (१०) आ परमाभिरुत मध्यमाभिर्नियुद्भिर्यातमवमाभिर्वाक्. दृळ्हस्य चिद् गोमतो वि व्रजस्य दुरो वर्तं गृणते चित्रराती.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—६३ देवता—अश्विनीकुमार

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हे अश्विनीकुमारो! तुम अपने उत्तम, मध्यम एवं अधम घोड़ों की सहायता से हमारे सामने आओ. तुम सुरक्षित एवं गायों से भरी गोशाला का द्वार खोलो और मुझ स्तुतिकर्त्ता को भली-भांति का धन दो. (११) सूक्त—६३ देवता—अश्विनीकुमार क्व१त्या वल्गू पुरुहूताद्य दूतो न स्तोमोऽविद्वन्नमस्वान्. आ यो अर्वाङ् नासत्या ववर्त्त प्रैषा ह्यसथो अस्य मन्मन्.. (१) सुंदर एवं बहुतों द्वारा बुलाए गए अश्विनीकुमार जहां कहीं रहते हैं, वहीं हव्यसहित स्तोत्र उन्हें दूत के समान प्राप्त हों. इसी स्तोत्र ने अश्विनीकुमारों को मेरी ओर अभिमुख किया था. हे अश्विनीकुमारो! तुम स्तोता की स्तुतियों पर परम प्रसन्न होते हो. (१) अरं मे गन्तं हवनायास्मै गृणाना यथा पिबाथो अन्धः. परि ह त्यद्धर्त्तिर्याथो रिषो न यत्परो नान्तरस्तुतुर्यात्.. (२) हे अश्विनीकुमारो! मेरे बुलाने पर तुम भली प्रकार आओ एवं मेरी स्तुति सुनकर सोमरस पिओ. शत्रु से हमारे घर की इस प्रकार रक्षा करो कि कोई भी उसे हानि न पहुंचावे (२) अकारि वामन्धसो वरीमन्न्स्तारि बर्हिः सुप्रायणतमम्. उत्तानहस्तो युवयुर्ववन्दा वां नक्षन्तो अद्रय आज्जन्.. (३) हे अश्विनीकुमारो! तुम्हारे कारण सोमरस निचोड़ा गया है, मुलायम कुश बिछाए गए हैं, तुम्हारी कामना करता हुआ स्तोता हाथ जोड़कर स्तुति करता है एवं तुम्हें व्याप्त करते हुए पत्थर सोमरस निकाल रहे हैं. (३) ऊर्ध्वो वामग्निरध्वरेष्वस्थात्प्र रातिरेति जूर्णिनी घृताची. प्र होता गूर्तमना उराणोऽयुक्त यो नास्त्या हवीमन्.. (४) हे अश्विनीकुमारो! हव्य एवं घृत के स्वामी अग्नि तुम्हारे यज्ञ में ऊंचे उठते हैं. जो स्तोता तुम्हारा स्तोत्र बोलता है, वही स्तोता अनेक यज्ञकर्त्ता एवं उत्साही होता है. (४) अधि श्रिये दुहिता सूर्यस्य रथं तस्थौ पुरुभुजा शतोतिम्. प्र मायाभिर्मायिना भूतमत्र नरा नृतू जनिमन्त्यज्ञियानाम्.. (५) हे बहुतों के रक्षक अश्विनीकुमारो! सूर्यपुत्री तुम्हारे शतरक्षक रथ में आश्रय लेने के लिए बैठी थी. तुम यज्ञपात्र, देवों की इसी जन्म की बुद्धि से बुद्धिमान् नेता और नृत्य करने वाले बनो. (५) युवं श्रीभिर्दर्शताभिराभिः शुभे पुष्टिमूहथुः सूर्यायाः. ebook converter DEMO Watermarks*

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प्र वां वयो वपुषेऽनु पप्तन्नक्षद्वाणी सुष्टुता धिष्ण्या वाम्.. (६) हे अश्विनीकुमारो! तुम इस दर्शनीय कांति के द्वारा अपनी पत्नी सूर्या की शोभा के लिए पुष्टि प्राप्त करो. तुम्हारे घोड़े शोभा पाने के लिए दौड़ें. हे भली प्रकार स्तुत देवो! शोभन स्तुतियां तुम्हें प्राप्त हों. (६) आ वां वयोऽश्वासो वहिष्ठा अभि प्रयो नास्त्या वहन्तु. प्र वां रथो मनोजवा असर्जीषः पृक्ष इषिधो अनु पूर्वीः.. (७) हे अश्विनीकुमारो! तेज चलने वाले व बोझा ढोने में कुशल घोड़े तुम्हें सोमरूपी अन्न के समीप ले जावें. तुम्हारा मन के समान तेज चलने वाला रथ अपनाने-योग्य, चाहने-योग्य एवं अधिक मात्रा वाले सोमरूपी अन्न के हेतु छोड़ा गया है. (७) पुरु हि वां पुरुभुजा देषणं धेनुं नइषं पिन्वतमसक्राम्. स्तुतश्च वां माध्वी सुष्टुतिश्च रसाश्च ये वामनु रातिमग्नम्.. (८) हे बहुतों का पालन करने वाले अश्विनीकुमारो! तुम्हारा धन बहुत है. हमें दूसरों के पास न जाने वाली तथा प्रसन्न करने वाली गाय एवं अन्न दो. हे प्रमुदित होने वाले अश्विनीकुमारो! स्तोता, स्तुतियां एवं तुम्हारे दान के उद्देश्य से तैयार किया जाने वाला सोमरस तुम्हारे लिए है. (८) उत म ऋज्रे पुरयस्य रघ्वी सुमीळ्हे शतं पेरुके च पक्वा. शाण्डो दाद्धिरिणिनः स्मद्दिष्टीन् दश वशासो अभिषाच ऋष्वान्.. (९) पुण्य की सी सीधी और तेज चलने वाली दो घोड़ियां, सुमीढ़व की सौ गाएं और पेरुक के पके हुए अन्न मेरे पास हैं. शांड नामक राजा ने अश्विनीकुमारों के स्तोताओं को सोने का बना रथ, सुंदर दस घोड़े और शत्रुओं को हराने वाले घोड़े दिए थे. (९) सं वां शता नासत्या सहस्राश्वानां पुरुपन्था गिरे दात्. भरद्वाजाय वीर नू गिरे दाद्धता रक्षांसि पुरुदंससा स्युः.. (१०) हे अश्विनीकुमारो! पुरुपंथा नामक राजा ने तुम्हारे स्तोताओं को सैकड़ों और हजारों घोड़े दिए थे. हे वीरो! तुम्हारे स्तोता मुझ भरद्वाज को यह दक्षिणा दें. हे अनेक कर्म करने वाले देवो! तुम्हारी कृपा से राक्षस नष्ट हों. (१०) आ वां सुम्ने वरिमन्त्सूरिभिः ष्याम्.. (११) हे अश्विनीकुमारो! मै विद्वानों के साथ तुम्हारा दिया हुआ सुखद धन प्राप्त करूं. (११) सूक्त—६४ देवता—उषा eBook converter DEMO Watermarks*

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उदु श्रिय उषसो रोचमाना अस्थुरपां नोर्मयो रुशन्तः. कृणोति विश्वा सुपथा सुगान्यभूदु वस्वी दक्षिणा मघोनी.. (१) चमकती हुई व शुक्लवर्ण वाली उषाएं शोभा के लिए पानी की लहरों के समान उठती हैं. धन की स्वामिनी, प्रशंसा योग्य एवं समृद्ध करने वाली उषा सभी स्थानों को सुंदरमार्ग वाला एवं सुगम बनाती है. (१) भद्रा ददृक्ष उर्विया वि भास्युत्ते शोचिर्भानवो द्यामपप्तन्. आविर्वक्षः कृणुषे शुम्भमानोषो देवि रोचमाना महोभिः.. (२) हे देवी उषा! तुम कल्याणी जान पड़ती हो एवं विस्तीर्ण होकर शोभा पा रही हो. तुम्हारी चमकीली किरणें आकाश से गिर रही हैं. तुम महान् तेजों से सुशोभित एवं दीप्त होकर अपना रूप प्रकट करती हो. (२) वहन्ति सीमरुणासो रुशन्तो गावः सुभगामुर्विया प्रथानाम्. अपेजते शूरो अस्तेव शत्रून् बाधते तमो अजिरो न वोळ्हा.. (३) लाल रंग की एवं चमकीली किरणें सुभगा, विस्तृत एवं उत्तम उषा को वहन करती हैं. जिस प्रकार अस्त्र फेंकने वाला शूर शत्रुओं को दूर भगाता है, उसी प्रकार उषा अंधकार को भगाती है तथा शीघ्रगामी सेनापति के समान अंधेरे को रोकती है. (३) सुगोत ते सुपथा पर्वतेष्ववाते अपस्तरसि स्वभानो. सा न आ वह पृथुयामन्पृष्वे रयिं दिवो दुहितरिषयध्यै.. (४) हे उषा देवी! पहाड़ एवं बिना हवा वाले स्थान तुम्हारे लिए सुगम एवं सरल मार्ग वाले हों. हे स्वयंप्रकाश वाली उषा! तुम अंतरिक्ष को पार करती हो. विशाल रथवाली, दर्शनीय एवं स्वर्ग की पुत्री उषा हमें अभिलाषा करने योग्य धन दें. (४) सा वह योक्षभिरवातोपो वरं वहसि जोषमनु. त्वं दिवो दुहितर्या ह देवी पूर्वहूतौ मंहना दर्शता भूः.. (५) हे उषा! तुम बिना विराम लिए घोड़ों की सहायता से स्तोताओं के लिए प्रेमपूर्वक धन ढोती हो. हे स्वर्गपुत्री उषा देवी! तुम प्रथम आह्वान में पूजा के योग्य एवं दर्शनीय बनो. (५) उत्ते वयश्चिद्वसतेरपप्तन्नरश्च ये पितुभाजो व्युष्टौ. अमा सते वहसि भूरि वाममुषो देवि दाशुषे मर्त्याय.. (६) हे उषा देवी! तुम्हारे प्रकट होने पर चिड़ियां अपने घोंसलों से उड़ती हैं एवं अन्न पैदा करने वाले मनुष्य अपने घरों से निकलते हैं. तुम अपने समीपवर्ती एवं हव्यदाता मनुष्य को बहुत धन देती हो. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

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सूक्त—६५ देवता—उषा एषा स्या नो दुहिता दिवोजाः क्षितीरुच्छन्ती मानुषीरजीगः. या भानुना रुशता राम्यास्वज्ञाायि तिरस्तमसश्चिद्दक्तून्.. (१) स्वर्ग से उत्पन्न, अतएव स्वर्ग की पुत्री उषा हमारे कल्याण के लिए अंधकार मिटाती हुई मानवी प्रजाओं को प्रकाशित करती है. यह चमकीली किरणों के द्वारा रात्रि के अंत में तेजस्वी तारों एवं अंधकार को तिरस्कृत करती हुई दिखाई देती है. (१) वि तद्ययुररुणयुग्भिरश्वैश्चित्रं भान्त्युषसश्चन्द्ररथाः. अग्रं यज्ञस्य बृहतो नयन्तीर्वि ता बाधन्ते तम ऊर्म्यायाः.. (२) चमकीले रथ वाली उषाएं प्रातःकाल विशालयज्ञ का प्रथम भाग पूरा करती हुई, लाल रंग वाले घोड़ों की सहायता से विस्तृत गमन करती हैं, विचित्र रूप से शोभा पाती हैं तथा रात के अंधेरे को समाप्त करती हैं. (२) श्रवो वाजमिषमूर्जं वहन्तीर्नि दाशुष उषसो मर्त्याय. मघोनीर्वीरवत्पत्यमाना अवो धात विधते रत्नमद्य.. (३) हे उषाओ! तुम हव्य देने वाले मनुष्य को कीर्ति, बल, अन्न और रस धारण कराती हुई धन स्वामिनी एवं गतिशील बनती हो. आज मुझ सेवक को पुत्र-पौत्र युक्त अन्न एवं रत्न दो. (३) इदा हि वो विधते रत्नमस्तीदा वीराय दाशुष उषासः. इदा विप्राय जरते यदुक्था नि ष्म मावते वहथा पुरा चित्.. (४) हे उषाओ! तुम्हारे पास अपने सेवक को इसी समय देने के लिए धन है एवं वीर हव्यदाताओं को इसी समय देने के लिए धन है. बुद्धिमान् स्तोता को इसी समय देने के लिए तुम्हारे पास धन है. मुझ जैसे उक्थ मंत्र जानने वाले के लिए तुम पहले के समान धन दो. (४) इदा हि त उषो अद्रिसानो गोत्रा गवामङ्गिरसो गृणन्ति. व्य१र्केण बिभिदुर्ब्रह्मणा च सत्या नृणामभवद्देवहूतिः.. (५) हे पर्वत की चोटियों का आदर करने वाली उषा! अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने तुम्हारी कृपा से गायों का समूह तुरंत प्राप्त किया एवं आदरणीय स्तोत्र द्वारा अंधकारों का विनाश किया. नेतारूप अंगिरागोत्रीय ऋषियों की देवविषयक स्तुति सत्य हुई थी. (५) उच्छा दिवो दुहितः प्रत्नवन्नो भरद्वाजवद्विधते मघोनि. सुवीरं रयिं गृणते रिरीह्युरुगायमध्धि धेहि श्रवो नः.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—६६ देवता—मरुद्गण

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हे स्वर्ग पुत्री उषा! पुराने लोगों के समान हमारे लिए भी तुम अंधेरा दूर करो. हे धन- स्वामिनी उषाओ! भरद्वाज के समान सेवा एवं स्तुति करने वाले मुझको पुत्र-पौत्रों से युक्त धन दो. हमें बहुतों द्वारा अभिलषित-अन्न अधिक मात्रा में दो. (६) सूक्त—६६ देवता—मरुद्गण वपुर्नु तच्चिकितुषे चिदस्तु समानं नाम धेनु पत्यमानम्. मर्तेष्वन्यद्दोहसे पीपाय सकृच्छुक्रं दुदुहे पृश्निरूधः.. (१) विद्वान् स्तोता के सामने मरुतों का परस्पर समान, अतिशय-स्थिर, प्रसन्न करने वाला एवं सर्वदा गतिशीलरूप शीघ्र प्रकट हो. वह रूप मर्त्यलोक में वनस्पति के रूप में अभिलाषा पूरी करने को प्रकट होता है एवं वर्ष में एक बार आकाश से सफेद रंग का जल टपकाता है. (१) ये अग्नयो न शोशुचन्निधाना द्विर्य॑त्रिर्मरुतो वावृधन्त. अरेणवो हिरण्ययास एषां साकं नृम्णैः पौंस्येभिश्च भूवन्.. (२) जो मरुत् जलती हुई अग्नियों के समान प्रकाशित होते हैं एवं अपनी इच्छानुसार दूनेतिगुने बढ़ते हैं, उनके रथ धूलिरहित एवं सोने के अलंकारों वाले हैं. वे धनों एवं बलों के साथ प्रकट होते हैं. (२) रुद्रस्य ये मीळ्हुषः सन्ति पुत्रा यांश्चो नु दाधृविर्भर्धयै. विदेहि माता महो मही षा सेत्पृश्निः सुभ्वे३ गर्भमाधात्.. (३) जो मरुत् कामवर्षी रुद्र के पुत्र हैं एवं धारण करने वाला अंतरिक्ष जिन्हें भरण करने में समर्थ है, उन मरुतों की परमप्रसिद्ध एवं महती माता पृश्नि मानवों के शोभनजन्म के लिए गर्भ धारण करती है. (३) न य ईषन्ते जनुषोऽया न्व१न्तः सन्तोऽवद्यानि पुनानाः. निर्यद दुहे शुचयोऽनु जोषमनु श्रिया तन्वमुक्षमाणाः.. (४) मरुद्गण अपने स्तुतिकर्त्ताओं के पास सवारी से नहीं जाते, अपितु सबके अंतःकरण में रहकर पापों को नष्ट करते हैं. दीप्तिशाली मरुद्गण जब स्तोताओं की इच्छानुसार जल दुहते हैं, तब शोभा से युक्त होकर अपने शरीर को प्रकट करते एवं धरती को सींचते हैं. (४) मक्षू न येषु दोहसे चिदया आ नाम धृष्णु मारुतं दधानाः. न ये स्तौना अयासो मह्ना नू चित्सुदानुरव यासदुग्रान्.. (५) मरुतों के प्रति प्रभावशाली मारुतस्तोत्र का उच्चारण करके स्तोता शीघ्र ही अभिलाषाएं ebook converter DEMO Watermarks*

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पूरी कर लेते हैं. जो तिरोहित, गतिशील एवं महान् हैं, उन्हीं उग्र-मरुत को शोभनहवि धारण करने वाला यजमान क्रोधरहित करता है. (५) त इदुग्राः शवसा धृष्णुषेणा उभे युजन्त रोदसी सुमेके. अध स्मैषु रोदसी स्वशोचिरामवत्सु तस्थौ न रोकः.. (६) उग्र एवं शक्तिशाली मरुद्गण शक्तिशाली-सेवा को शोभनरूप वाले धरती-आकाश से मिलाते हैं. रुद्रपत्नी मध्यमा वाक् मरुतों में अपनी दीप्ति के साथ रहती है. शक्तिशाली मरुतों का कोई भी बाधक नहीं है. (६) अनेनो वो मरुतो यामो अस्तवश्वश्चिद्धामजत्यरथीः. अनवसो अनभीशू रजस्तूर्वि रोदसी पथ्या याति साधन्.. (७) हे मरुतो! तुम्हारा रथ पापरहित हो. स्तोता सारथि न होने पर भी जिस रथ को चलाता है, वह बिना घोड़ों वाला, भोजनशून्य एवं पाशरहित होकर भी जल का प्रेरक एवं स्तोताओं की अभिलाषा पूर्ण करने वाला बनकर स्वर्ग, धरती एवं आकाश में चलता है. (७) नास्य वर्ता न तरुता न्वस्ति मरुतो यमवथ वाजसातौ. तोके वा गोषु तनये यमप्सु स व्रजं दर्ता पार्ये अध द्योः.. (८) हे मरुतो! युद्ध में तुम जिसकी रक्षा करते हो, उसका न कोई प्रेरक होता है और न कोई हिंसक. तुम जिसके पुत्रों, पौत्रों, गायों एवं जल की रक्षा करते हो, वह युद्ध में तेजस्वी शत्रु की भी गायों को नष्ट करता है. (८) प्र चित्रमर्कं गृणते तुराय मारुताय स्वतवसे भरध्वम्. य सहांसि सहसा सहन्ते रेजते अग्ने पृथिवी मखेभ्यः.. (९) हे अग्नि! शब्द करने वाले, शीघ्रगति वाले एवं अपनी शक्ति वाले मरुतों को दर्शनीय हवि दो. वे अपने बल से शत्रुओं का बल पराजित करते हैं. आदरणीय मरुतों से पृथ्वी कांपती है. (९) त्विषीमन्तो अध्वरस्येव दिद्युत्तृषुच्यवसो जुह्वो३ नाग्नेः. अर्चत्रयो धुनयो न वीरा भ्राजज्जन्मानो मरुतो अधृष्टाः.. (१०) यज्ञ के समान प्रकाश वाले, शीघ्रगामी, आग की लपटों के समान दीप्तिशाली एवं शत्रुओं को कंपाने वाले वीरों के समान आदरणीय मरुद्गण तेजस्वी शरीर वाले तथा अपराजेय हैं. (१०) तं वृधन्तं मारुतं भ्राजदृष्टिं रुद्रस्य सूनुं हवसा विवासे. दिवः शर्धाय शुचयो मनीषा गिरयो नाप उग्रा अस्पृध्रन्.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

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मैं उन वृद्धिशाली व तेजस्वी खड्ग-वाले रुद्रपुत्रों की सेवा स्तोत्रों द्वारा करता हूं. स्तोता की पवित्र स्तुतियां उग्र बनकर मरुतों के बल की उसी प्रकार समानता करती हैं, जिस प्रकार बादल करते हैं. (११) सूक्त—६७ देवता—मित्र व वरुण विश्वेषां वः सतां ज्येष्ठतमा गीर्भिर्मित्रावरुणा वावृधध्ये. सं या रश्मेव यमतुर्यमिष्ठा द्वा जनाँ असमा बाहुभिः स्वैः.. (१) हे सकल विश्व में श्रेष्ठ मित्र एवं वरुण! मैं स्तुतियों द्वारा तुम्हें बढ़ाता हूं. परस्पर असमान एवं उत्तम-नियंता तुम दोनों रस्सी के समान मनुष्यों को बांध लेते हो. (१) इयं मद्वां प्र स्तृणीते मनीशोप प्रिया नमसा बर्हिरच्छ. यन्तं नो मित्रावरुणावधृष्टं छर्दैर्यद्वां वरूथ्यं सुदानू.. (२) हे प्रिय मित्र एवं वरुण! मेरी यह स्तुति तुम्हें ढक लेती है, हव्य के साथ तुम्हारे पास जाती है एवं तुम्हारे यज्ञ में पहुंचती है. हे शोभनदान वाले मित्र और वरुण! हमें ठंड और हवा रोकने वाला तथा शत्रुओं द्वारा अविजित घर दो. (२) आ यातं मित्रावरुणा सुशस्त्युप प्रिया नमसा हूयमाना. सं यावप्रः स्थो अपसेव चनाञ्छुधीयतश्चिद्यतथो महित्वा.. (३) हे मित्र और वरुण! शोभनवचन वाले स्तोत्रों एवं हव्यान्न द्वारा बुलाए हुए तुम दोनों आओ. कर्म का अधिकारी जिस प्रकार कर्म द्वारा अन्न चाहने वाले लोगों को वश में करता है, उसी प्रकार तुम अपने महत्त्व से ऐसे लोगों को वश में करो. (३) अश्वा न या वाजिना पूतबन्धू ऋता यद् गर्भमदितिर्भरध्यै. प्र या महि महान्ता जायमाना घोरा मर्ताय रिपवे नि दीधः.. (४) अश्वों के समान बलशाली, पवित्र स्तुतियों वाले एवं सत्ययुक्त मित्र एवं वरुण को अदिति ने गर्भ के रूप में धारण किया. अदिति ने महान् लोगों से भी बड़े एवं हिंसकों की भी हिंसा करने वाले मित्र और वरुण को धारण किया. (४) विश्वे यद्वां मंहना मन्दमानाः क्षत्रं देवासो अदधुः सजोषाः. परि यद्भूथो रोदसी चिदुर्वी सन्ति स्पशो अदब्धासो अमूराः.. (५) सब देवों ने परस्पर प्रेमपूर्वक तुम्हारे महत्त्व की स्तुति करते हुए बल धारण किया था. तुमने विस्तृत धरती-आकाश को पराजित किया है एवं तुम्हारी किरणें अपराजित तथा शक्तिशालिनी हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

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ता हि क्षत्रं धारयेथे अनु द्यून् दृंहेथे सानुमुपमादिव द्योः. दृळ्हो नक्षत्र उत विश्वदेवो भूमिमातान्द्यां धासिनायोः.. (६) हे मित्र और वरुण! तुम प्रतिदिन बल धारण करते हो. तुम अंतरिक्ष के उन्नत प्रदेश को खंभे के समान दृढ़ करते हो. तुम्हारे द्वारा दृढ़ किए गए नक्षत्र एवं संपूर्ण देव मानवों के हव्य से तृप्त होकर धरती और आकाश को व्याप्त करते हैं. (६) ता विग्रं धैथे जठरं पृणध्या आ यत्सद्म सभृतयः पृणन्ति. न मृष्यन्ते युवतयोऽवाता वि यत्पयो विश्वजिन्वा भरन्ते.. (७) हे मित्र एवं वरुण! तुम अपना पेट सोमरस से भरने के लिए यजमान की रक्षा करते हो. हे विश्वजिन्वा! जब ऋत्विज् यज्ञशाला को भर देते हैं एवं तुम जल बरसाते हो. उस समय युवतियां—सरिताएं धूल से पराजित नहीं होतीं, अपितु सूखी, नदियां भी जल से भर जाती हैं. (७) ता जिह्वया सदमेदं सुमेधा आ यद्वां सत्यो अरतिर्ऋते भूत्. तद्वां महित्वं घृतान्नावस्तु युवं दाशुषे वि चयिष्टमंहः.. (८) हे घृत एवं अन्न धारण करने वाले मित्र और वरुण! शोभनबुद्धि वाले लोग स्तुतिवचनों द्वारा तुमसे सदा जल की याचना करते हैं. जिस प्रकार तुम्हारा भक्त यज्ञ में मायारहित होता है, उसी प्रकार तुम्हारा महत्त्व हो. तुम हव्यदाता का पाप नष्ट करो. (८) प्र यद्वां मित्रावरुणा स्पूर्धन्प्रिया धाम युवधिता मिनन्ति. न ये देवास ओहसा न मर्ता अयज्ञसाचो अप्यो न पुत्राः.. (९) हे मित्र एवं वरुण! तुम्हारे प्रिय एवं तुम्हारे द्वारा किए जाते हुए यज्ञकर्मों को जो अयाजक लोग तुमसे स्पर्धा करते हुए नष्ट करते हैं, जो देव एवं मानव स्तोत्र नहीं बोलते, जो कर्म करते हुए भी यज्ञहीन हैं एवं जो पुत्रयुक्त नहीं हैं, उन सबको नष्ट करो. (९) वि यद्वाचं कीस्तासो भरन्ते शंसन्ति के चिन्निविदो मनानाः. आद्वां ब्रवाम सत्यान्युक्था नकिर्देवेभिर्यथथो महित्वा.. (१०) हे मित्र एवं वरुण! मेधावी उद्गाता जब अलग-अलग स्तुतियां बोलते हैं, कुछ अग्नि आदि देवों की स्तुति करते हुए स्तोत्र बोलते हैं एवं तुम्हारे उद्देश्य से हम सच्चे मंत्र बोलते हैं, तब तुम अन्य देवों के साथ मत चले जाना. (१०) अवोरित्था वां छर्दिषो अभिष्टौ युवौर्मित्रावरुणावस्कृधोयु. अनु यद् गावः स्फुरानृजिष्यं धृष्णुं यद्रणे वृषणं युनजन्.. (११) हे रक्षक मित्र और वरुण! जिस समय स्तुतियां बोली जाती हैं एवं यजमान यज्ञ में ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—६८ देवता—इंद्र व वरुण

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सरल-गति, शत्रु-पराभवकारी तथा कामवर्षी सोमरस को प्रस्तुत करते हैं, उस समय तुम घर देने के लिए आते हो और तुम्हारा दिया हुआ घर नष्ट नहीं होता. (११) सूक्त—६८ देवता—इंद्र व वरुण श्रुष्टी वां यज्ञ उद्यतः सजोषा मनुष्वद् वृक्तबर्हिषो यजध्यै. आ य इन्द्रावरुणाविषे अद्य महे सुम्नाय मह आववर्तत्.. (१) हे महान् इंद्र व वरुण! आज यज्ञ में ऋत्विजों द्वारा तुम्हारे निमित्त वही सोमरस तैयार किया गया है, जो मनु के समान यजमान द्वारा कुश बिछाने के पश्चात् महान् एवं सुख के लिए किया जाता है. (१) ता हि श्रेष्ठा देवताता तुजा शूराणां शविष्ठा ता हि भूतम्. मघोनां मंहिष्ठा तुविशुष्म ऋतेन वृत्रतुरा सर्वसेना.. (२) हे इंद्र व वरुण! तुम श्रेष्ठ, यज्ञ में धन देने वाले एवं शूरों में अतिशय शक्तिशाली हो. तुम दानकर्त्ताओं में अति महान्, अतिशय बलयुक्त, सत्य द्वारा शत्रुओं की हिंसा करने वाले एवं सभी सेनाओं के स्वामी हो. (२) ता गृणीहि नमस्येभिः शूषैः सुम्नेभिरिन्द्रावरुणा चकाना. वज्रेणान्यः शवसा हन्ति वृत्रं सिषक्त्यन्यो वृजनेषु विप्रः.. (३) हे भरद्वाज! स्तुतियोग्य, शक्तिशालीयों व सुखी लोगों द्वारा प्रशंसित इंद्र एवं वरुण की स्तुति करो. इन में एक वज्र द्वारा वृत्र को मारता है और दूसरा बुद्धिमान् शक्ति द्वारा स्तोताओं के उपद्रवों में रक्षक बनता है. (३) ग्नाश्च यन्नरश्च वावृधन्त विश्वे देवासो नरां स्वगूर्ताः. प्रैभ्य इन्द्रावरुणा महित्वा द्यौश्च पृथिवि भूतमूर्वी.. (४) हे इंद्र एवं वरुण! मनुष्यों में स्त्रियां और पुरुष एवं सब देव स्वयं तत्पर होकर जब स्तुतियों द्वारा तुम्हारी वृद्धि करते हैं, तब तुम इन स्तोताओं के स्वामी बनो. हे द्यावा-पृथ्वी! तुम भी इनके स्वामी बनो. (४) स इत्सुदानुः स्ववाँ ऋतावेन्द्रा यो वां वरुण दाशति त्मन्. इषा स द्विषस्तरेद्दास्वान्वंसद रयिं रयिवतश्च जनान्.. (५) हे इंद्र एवं वरुण! जो यजमान अपने आप तुम्हें हव्य देता है, वह शोभनदान वाला, धनवान् एवं यज्ञकर्त्ता बने. ऐसा दाता जयशील शत्रु से जीतता है एवं धन के साथ संपत्तिशाली-पुत्र प्राप्त करता है. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

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यं युवं दाश्वधराय देवा रयिं धत्थो वसुमन्तं पुरुक्षुम्. अस्मे स इन्द्रावरुणावापि ष्यात्प्र यो भनक्ति वनुषामशस्तीः.. (६) हे इंद्र एवं वरुण देवो! तुम हव्य देने वाले यजमान को संपत्ति एवं बहुविध अन्न वाला जो धन देते हो, शत्रुओं संबंधी अपयश को मिटाने वाला वही धन हमें दो. (६) उत नः सुत्रात्रो देवगोपाः सुरिभ्य इन्द्रावरुणा रयिः ष्यात्. येषां शुष्मः पृतनासु साह्वान्प्र सद्यो द्युम्ना तिरते ततुरिः.. (७) हे इंद्र एवं वरुण! हम स्तोताओं को सुरक्षित व देवों द्वारा रक्षित धन दो. हमारा बल युद्धों में शत्रुओं को पराजित एवं हिंसित करके उनके यशों का शीघ्र तिरस्कार करे. (७) नू न इन्द्रावरुणा गृणाना पृङ्क्तं रयिं सौश्रवसाय देवा. इत्था गृणन्तो महिनस्य शर्धोऽपो न नावा दुरिता तरेम.. (८) हे इंद्र एवं वरुण देवो! तुम हमारी स्तुति सुनकर हमें शोभन अन्न के लिए धन दो. हम महान् कहकर तुम्हारे बल की स्तुति करते हैं. जैसे लोग नाव के सहारे जल को पार करते हैं, उसी प्रकार हम पापों से पार हों. (८) प्र सम्राजे बृहते मन्म नु प्रियमर्च देवाय वरुणाय सप्रथः. अयं य उर्वी महिना महिव्रतः क्रत्वा विभात्यजरो न शोचिषा.. (९) हे स्तोता! राजाओं के शासक एवं विराट वरुण देव के निमित्त प्रिय एवं सभी प्रकार विशाल स्तोत्र पढ़ो. वे महत्त्वयुक्त, महान् कर्मों वाले, बुद्धिमान्, तेजस्वी एवं जरारहित होने के साथ-साथ धरती-आकाश को प्रकाशित करते हैं. (९) इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतं सोमं पिबतं मद्यं धृतव्रता. युवो रथो अध्वरं देववीतये प्रति स्वरसरमुप याति पीतये.. (१०) हे सोमकर्त्ता इंद्र एवं वरुण! इस नशीले एवं निचोड़े हुए सोमरस को पिओ. हे व्रतधारको! तुम्हारा रथ देवों के साथ सोमपान के निमित्त यज्ञ के मार्ग पर बढ़ता है. (१०) इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम्. इदं वामन्धः परिषिक्तमस्मे आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयेथाम्.. (११) हे कामवर्षी इंद्र व वरुण! तुम अतिशय मधुर, अभिलाषापूरक एवं वृद्धिकर्त्ता सोम का पान करो. हमने यह सोमरूप अन्न तुम्हारे लिए ही पात्रों में रखा. इन कुशों पर बैठकर सोमपान से प्रसन्न बनो. (११) सूक्त—६९ देवता—इंद्र व विष्णु ebook converter DEMO Watermarks*

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सं वां कर्मणा समिषा हिनोमीन्द्राविष्णू अपसस्पारे अस्य. जुषेथां यज्ञं द्रविणं च धत्तमरिष्टैर्नः पथिभिः पारयन्ता.. (१) हे इंद्र एवं विष्णु! मैं तुम्हारे निमित्त स्तोत्र एवं हवि प्रदान करता हूं. इस उक्थ की समाप्ति पर तुम यज्ञ का सेवन करना. हमें उपद्रवरहित मार्ग पर पार ले जाने वाले तुम दोनों धन दो. (१) या विश्वासां जनितारा मतीनामिन्द्राविष्णू कलशा सोमधाना. प्र वां गिरः शस्यमाना अवन्तु प्र स्तोमासो गीयमानासो अर्कैः.. (२) हे समस्त स्तुतियों के जनक एवं कलशरूप में सोमरस के आधार इंद्र एवं विष्णु! बोली जाती हुई स्तुतियां तुम्हें प्राप्त हों. स्तोताओं द्वारा गाए जाते हुए स्तोत्र तुम्हारे पास पहुंचें. (२) इन्द्राविष्णू मदपती मदानामा सोमं यातं द्रविणो दधाना. सं वामञ्जन्वक्तुभिर्मतीनां सं स्तोमासः शस्यमानास उक्थैः.. (३) हे मदकारक-सोम के स्वामी इंद्र एवं विष्णु! तुम धन देते हुए सोमरस के सामने आओ. स्तोताओं के स्तोत्र एवं बोले जाते हुए उक्थ तुम्हें तेज के साथ प्राप्त हों. (३) आ वामश्वासो अभिमातिषाह इन्द्राविष्णू सधमादो वहन्तु. जुषेथां विश्वा हवना मतीनामुप ब्रह्माणि शृणुतं गिरो मे.. (४) हे इंद्र एवं विष्णु! हिंसकों को हराने वाले एवं परस्पर प्रसन्न होने वाले घोड़े तुम्हें वहन करें. तुम स्तोताओं के समस्त स्तोत्रों के साथ-साथ मेरे स्तुतिवचनों को भी सुनो. (४) इन्द्राविष्णू तत्पनयाय्यं वां सोमस्य मद उरु चक्रमाथे. अकृणुतमन्तरिक्षं वरीयोऽप्रथतं जीवसे नो रजांसि.. (५) हे इंद्र एवं विष्णु! तुम सोम के नशे में महान् कर्म करते हो, अंतरिक्ष को विस्तृत बनाते हो एवं लोगों को हमारे जीवन में उपयोगी बनाते हो. ये सब कर्म प्रशंसा के योग्य हैं. (५) इन्द्राविष्णू हविषा वावृधानाग्रा मद्द्वाना नमसा रातहव्या. घृतासुती द्रविणं धत्तमस्मे समुद्रः स्थः कलशः सोमधानः.. (६) हे सोम द्वारा बढ़े हुए इंद्र एवं विष्णु! तुम घी एवं अन्न से युक्त हो. तुम सोम के उत्तम भाग का सेवन करने वाले यजमानों द्वारा नमस्कार के साथ हव्य प्रदान करने वाले हो. तुम सागर एवं कलश के रूप में सोम के आधार हो. तुम हमें धन दो. (६) इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वो अस्य सोमस्य दस्रा जठरं पृणेथाम्. आ वामन्धांसि मदिराण्यूग्मन्नुप ब्रह्माणि शृणुतं हवं मे.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे दर्शनीय इंद्र एवं विष्णु! तुम इस नशीले सोमरस को पीकर अपना पेट भरो. नशीला सोम अन्न के रूप में तुम्हें प्राप्त हो. तुम मेरी स्तुतियां और पुकार सुनो. (७) उभा जिग्यथुर्न परा जयेथे न परा जिग्ये कतरश्चनैनोः. इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधां सहस्रं वि तदैरयेथाम्.. (८) हे विजयी इंद्र एवं विष्णु! तुम कभी हारते नहीं हो. इन दोनों में कोई भी हारने वाला नहीं है. तुमने जिसे तीन स्थानों पर स्थित किया एवं असंख्य वस्तुओं के लिए असुरों के साथ स्पर्धा की, उसे अपने पराक्रम से पा लिया. (८) सूक्त—७० देवता—द्यावा-पृथ्वी घृतवती भुवनानामभिश्रियोर्वी पृथ्वी मधुदुघे सुपेशसा. द्यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अजरे भूरिरेतसा.. (१) हे द्यावा-पृथ्वी! तुम जलयुक्त, प्राणियों के आश्रय-स्थल, विस्तीर्ण, अनेक कार्य के रूप में प्रसिद्ध, जल-दोहन करने वाली, सुंदररूप वाली, सबके नियामक वरुण द्वारा अलग-अलग धारित, नित्य एवं बहुत शक्ति वाली हो. (१) असश्चन्ती भूरिधारे पयस्वती घृतं दुहाते सुकृते शुचिव्रते. राजन्ती अस्य भुवनस्य रोदसी अस्मे रेतः सिञ्चतं यन्मनुर्हितम्.. (२) हे परस्पर पृथक्, अनेक धाराओं वाली, जलयुक्त एवं पवित्र कर्म वाली द्यावा-पृथ्वी! तुम उत्तमकर्म करने वाले व्यक्ति को जल देती हो. इस संसार की स्वामिनी द्यावा-पृथ्वी! तुम मानव हितकारी शक्ति हमें दो. (२) यो वामृजवे क्रमणाय रोदसी मर्तो ददाश धिष्णे स साधति. प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि युवोः सिक्ता विषुरूपाणि सव्रता.. (३) हे सकल भुवन की निवास द्यावा-पृथ्वी! जो मनुष्य तुम्हारे सरल गमन के लिए हव्य देता है, वह अपनी कामनाएं पूर्ण करता है एवं पुत्र-पौत्रादि के द्वारा उन्नति करता है. कर्मों के ऊपर वर्तमान तुम्हारा वीर्य नानारूप धारण करता है. (३) घृतेन द्यावापृथिवी अभीवृते घृतश्रिया घृतपृचा घृतावूधा. उर्वी पृथ्वी होतूर्वूर्ये पुरोहिते ते इद्विप्रा ईळते सुम्नमिष्टये.. (४) द्यावा-पृथ्वी जल से ढकी हुई, जल को सहारा देती हुई, जल से व्याप्त, जल की वृद्धि करने वाली, विस्तृत, प्रसिद्ध व यज्ञ में यजमानों द्वारा पुरस्कृत हैं. विद्वान् यज्ञ करने के निमित्त इनसे सुख की याचना करते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

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मधु नो द्यावापृथिवी मिमिक्षतां मधुश्चुता मधुदुघे मधुव्रते. दधाने यज्ञं द्रविणं च देवता महि श्रवो वाजमस्मे सुवीर्यम्.. (५) जल क्षरण करने वाली, जल टपकाने वाली, जल के निमित्त कर्म करने वाली, देवतारूप, हम लोगों को यज्ञ, धन, विशाल-यश, अन्न एवं शोभनवीरता देती हुई द्यावा-पृथ्वी हमें मधु से सींचें. (५) ऊर्जं नो द्यौश्च पृथिवी च पिन्वतां पिता माता विश्वविदा सुदंससा. संरराणे रोदसी विश्वशम्भुवा सनिं वाजं रयिमस्मे समिन्वताम्.. (६) हे पिता द्यौ एवं माता पृथ्वी! हमें अन्न दो. सबको जानने वाली, शोभनकर्म वाली, परस्पर रमण करती हुई एवं सबको सुख देने वाली द्यावा-पृथ्वी हमें संतान, बल एवं धन दें. (६) सूक्त—७१ देवता—सविता उदु ष्य देवः सविता हिरण्यया बाहू अयंस्त सवनाय सुक्रतुः. घृतेन पाणी अभि प्रुष्णुते मखो युवा सुदक्षो रजसो विधर्मणि.. (१) शोभनकर्म वाले सविता देव अपनी स्वर्णमय भुजाओं को दान के लिए उठाते हैं. महान्, नित्ययुवा व शोभनबुद्धि सविता लोक को धारण करने के लिए अपने जलपूर्ण हाथों को बढ़ाते हैं. (१) देवस्य वयं सवितुः सवीमनि श्रेष्ठे स्याम वसुनश्च दावने. यो विश्वस्य द्विपदो यश्चतुष्पदो निवेशने प्रसवे चासि भूमनः.. (२) हम उन्हीं सविता देव के अनुज्ञात एवं प्रशंसनीय दान पाने में समर्थ हों, जो सभी द्विपद एवं चतुष्पद और प्राणियों की स्थिति और जन्म में स्वतंत्र हैं. (२) अदब्धेभिः सवितः पायुभिष्ट्वं शिवेभिरद्य परि पाहि नो गयम्. हिरण्यजिह्वः सुविताय नव्यसे रक्षा माकिर्नो अघशंस ईशत.. (३) हे सविता! तुम अपने अहिंसित एवं सुखकारक तेजों द्वारा हमारे घर की रक्षा करो. हे हिरण्यवाक्! तुम नवीन सुख एवं रक्षा के कारण बनो. हमारा अहित चाहने वाला हमारा स्वामी न हो. (३) उदु ष्य देवः सविता दमूना हिरण्यपाणिः प्रतिदोषमस्थात्. अयोहनुर्यजतो मन्द्रजिह्व आ दाशुषे सुवति भूरि वामम्.. (४) दानयुक्त मन वाले, स्वर्णमय हाथों वाले, सोने की ठोड़ी वाले, यज्ञ के पात्र व प्रसन्नवचन ebook converter DEMO Watermarks*

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वाले सविता देव रात्रि की समाप्ति पर उठें. वे हव्यदाता यजमान के लिए बहुत सा अन्न दें. (४) उद् अयाँ उपवक्तेव बाहू हिरण्यया सविता सुप्रतीका. दिवो रोहांस्यरुहत्पृथिव्या अरीरमतपतयत् कच्चिदध्वम्.. (५) सविता व्याख्यानदाता के समान अपने स्वर्णमय एवं शोभन अवयवों वाले हाथों को उठावें. वे धरती से आकाश के स्थानों में पहुंचें एवं सभी गतिशील वस्तुओं को आनंद दें. (५) वाममद्य सवितर्वाममु श्वो दिवेदिवे वाममस्मभ्यं सावीः. वामस्य हि क्षयस्य देव भूरेरया धिया वामभाजः स्याम.. (६) हे सविता! हमें आज धन दो एवं कल भी धन देना. हमें प्रतिदिन धन दो. हे देव! तुम निवास के कारणरूप विशाल धन के दाता हो. हम इस स्तुति द्वारा धन के भागी बनेंगे. (६) सूक्त—७२ देवता—इंद्र व सोम इन्द्रासोमा महि तद्वां महित्वं युवं महानि प्रथमानि चक्रथुः. युवं सूर्यं विविदुथुर्युवं स्व१र्विश्वा तमांस्यहतं निदश्च.. (१) हे इंद्र एवं सोम! तुम्हारा महत्त्व बड़ा है. तुमने महान् भूतों को बनाया था. तुमने सूर्य और जल की खोज की है एवं सभी निंदकों व अंधकारों का नाश किया है. (१) इन्द्रासोमा वासयथ उषामुत्सूर्यं नयथो ज्योतिषा सह. उप द्यां स्कम्भथुः स्कम्भनेनाप्रथतं पृथिवीं मातरं वि.. (२) हे इंद्र एवं सोम! तुम उषा को प्रकाशित करो एवं सूर्य को उसकी ज्योति के साथ ऊपर उठाओ. तुम अंतरिक्ष के द्वारा स्वर्ग को स्थिर करो एवं पृथ्वी माता को प्रसिद्ध बनाओ. (२) इन्द्रासोमावहिमपः परिष्ठां हथो वृत्रमनु वां द्यौरमन्यत. प्रार्णांस्यैरयतं नदीनामा समुद्राणि पप्रथुः पुरूणि.. (३) हे इंद्र एवं सोम! तुम जल को रोकने वाले वृत्र नामक राक्षस का वध करो. स्वर्ग ने तुम्हें माना है. तुम नदियों के जल को प्रेरित करो व समुद्र को जल से भर दो. (३) इन्द्रासोमा पक्वमामास्वन्तर्नि गवामिद्दधथुर्वक्षणासु. जगृभतुरनपिनद्धमासु रुशच्चित्रासु जगतीष्वन्तः.. (४) हे इंद्र एवं सोम! तुमने गायों के कोमल थनों में पुष्टिकारक दूध धारण किया है. तुमने भिन्न-भिन्न रंग वाली गायों में किसी के द्वारा न रुकने वाला तथा श्वेतवर्ण का दूध धारण किया ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—७३ देवता—बृहस्पति

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है. (४) इन्द्रासोमा युवमङ्ग तरुत्रमपत्यसाचं श्रुत्यं रराथे. युवं शुष्मं नर्यं चर्षणिभ्यः सं विव्यथुः पृतनाषाहमुग्रा.. (५) हे इंद्र एवं सोम! तुम हमें उद्धार करने वाला, संतानयुक्त एवं प्रशंसनीय धन शीघ्र दो. हे अति शूरो! तुम मानवों में कल्याणकारी एवं शत्रुसेनाओं को हराने वाला बल बढ़ाओ. (५) सूक्त—७३ देवता—बृहस्पति यो अद्रिभित्प्रथमजा ऋतावा बृहस्पतिराङ्गिरसो हविष्मान्. द्विबर्हज्मा प्राघर्मसत्पिता न आ रोदसी वृषभो रोरवीति.. (१) पर्वत का भेदन करने वाले, सबसे पहले उत्पन्न, सत्ययुक्त, अंगिरा के पुत्र, यज्ञ के भागी, दोनों लोकों में गतिशील, अतिशय दीप्त स्थान में रहने वाले एवं हमारे पालनकर्त्ता बृहस्पति कामपूरक बनकर धरती-आकाश में गर्जन करते हैं. (१) जनाय चिद्य ईवत उ लोकं बृहस्पतिर्देवहूतौ चकार. घ्नन्वॄत्राणि वि पुरो दर्दरीति जयञ्छत्रूँरमित्रान्पृत्सु साहन्.. (२) जो बृहस्पति स्तुति करने वाले को यज्ञ में स्थान देते हैं, वे ही ढकने वाले अंधकार को दूर करते हुए युद्धों में शत्रुओं को जीतते हैं एवं अमित्रों को हराते हैं. वे राक्षसों के नगरों को बार-बार जलाते हैं. (२) बृहस्पतिः समजयदद्वसूनि महो व्रजान् गोमतो देव एषः. अपः सिषासन्तत्स्व१ रप्रतीतो बृहस्पतिर्हन्त्यमित्रमर्कैः.. (३) इन बृहस्पति देव ने असुरों के धनों के साथ-साथ उनकी गायों से पूर्ण गोचर भूमि को जीता था. बृहस्पति किसी के द्वारा न रोके जाते हुए यज्ञकर्म द्वारा स्वर्ग को भोगने की इच्छा करते हैं एवं मंत्रों द्वारा शत्रु का नाश करते हैं. (३) सूक्त—७४ देवता—सोम व रुद्र सोमारुद्रा धारयेथामसुर्यं१ प्र वामिष्टयोऽरमश्रुवन्तु. दमेदमे सप्त रत्ना दधाना शं नो भूतं द्विपदे शं चतुष्पदे.. (१) हे सोम एवं रुद्र! तुम हमें असुरों के समान शक्ति दो. हमारे यज्ञ प्रत्येक घर में तुम्हें पूरी तरह व्याप्त करें. हे सात रत्न धारण करने वालो! तुम हमारे अतिरिक्त दो पैर वाले मानवों एवं चार पैर वाले पशुओं के लिए कल्याणकारी बनो. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

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सोमारुद्रा वि वृहतं विषूचीममीवा या नो गयमाविवेश. आरे बाधेथां निर्ऋतिं पराचैरस्मे भद्रा सौश्रवसानि सन्तु.. (२) हे सोम एवं रुद्र! हमारे घर में जो रोग समाया हुआ है, उसे दूर भगाओ एवं दरिद्रता को बाधा पहुंचाकर हमसे दूर भगाओ. हमारे पास कल्याणकारी अन्न हो. (२) सोमारुद्रा युवमेतान्यस्मे विश्वा तनूषु भेषजानि धत्तम्. अव स्यतं मुञ्चतं यन्नो अस्ति तनूषु बद्धं कृतमेनो अस्मत्.. (३) हे सोम एवं रुद्र! तुम हमारे शरीर को लाभ पहुंचाने वाली सभी ओषधियां धारण करो. हमारे द्वारा किया हुआ जो पाप हमारे शरीर में बंधा है, उसे शिथिल करके दूर भगाओ. (३) तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृळतं नः. प्र नो मुञ्चतं वरुणस्य पाशाद् गोपायतं नः सुमनस्यमाना.. (४) हे सोम एवं रुद्र! तुम दीप्त धनुष वाले, तेज बाणों वाले एवं शोभनसुख देने वाले हो. शोभनस्तोत्रों की इच्छा करते हुए तुम दोनों इस संसार में हमें सुखी बनाओ, वरुण के पाशों से छुड़ाओ एवं हमारी रक्षा करो. (४) सूक्त—७५ देवता—वर्म आदि जीमूतस्येव भवति प्रतीकं यद्वर्मी याति समदामुपस्थे. अनाविद्धया तन्वा जय त्वं स त्वा वर्मणो महिमा पिपर्तु.. (१) युद्धों के आरंभ होने पर यह राजा जब कवच पहन कर जाता है, तब इसका रूप बादल के समान जान पड़ता है. हे राजा! तुम शत्रुओं द्वारा बिना बिंधे शरीर से जय प्राप्त करो. कवच की यह महिमा तुम्हारी रक्षा करे. (१) धन्वना गा धन्वनाजिं जयेम धन्वना तीव्राः समदो जयेम. धनुः शत्रोरपकामं कृणोति धन्वना सर्वाः प्रदिशो जयेम.. (२) हम धनुष के द्वारा गायों एवं युद्ध को जीतेंगे. हम धनुष की सहायता से शत्रुओं की उद्धत एवं मदवाली सेनाओं को जीतेंगे. हमारा धनुष शत्रुओं की अभिलाषाएं नष्ट करे. हम धनुष द्वारा सब दिशाओं को जीतें. (२) वक्ष्यन्तीवेदा गनीगन्ति कर्णं प्रियं सखायं परिषस्वजाना. योषेव शिङ्क्ते वितताधि धन्वञ्ज्या इयं समने पारयन्ती.. (३) युद्धभूमि में पार लगाने वाली यह धनुष की डोरी धनुष पर विस्तृत होकर प्रिय वचन बोलने की अभिलाषा सी करती हुई प्यारी बातें कहने के लिए धनुर्धारी के कान के समीप