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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

सूक्त—६६ देवता—मरुद्गण

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हे स्वर्ग पुत्री उषा! पुराने लोगों के समान हमारे लिए भी तुम अंधेरा दूर करो. हे धन- स्वामिनी उषाओ! भरद्वाज के समान सेवा एवं स्तुति करने वाले मुझको पुत्र-पौत्रों से युक्त धन दो. हमें बहुतों द्वारा अभिलषित-अन्न अधिक मात्रा में दो. (६) सूक्त—६६ देवता—मरुद्गण वपुर्नु तच्चिकितुषे चिदस्तु समानं नाम धेनु पत्यमानम्. मर्तेष्वन्यद्दोहसे पीपाय सकृच्छुक्रं दुदुहे पृश्निरूधः.. (१) विद्वान् स्तोता के सामने मरुतों का परस्पर समान, अतिशय-स्थिर, प्रसन्न करने वाला एवं सर्वदा गतिशीलरूप शीघ्र प्रकट हो. वह रूप मर्त्यलोक में वनस्पति के रूप में अभिलाषा पूरी करने को प्रकट होता है एवं वर्ष में एक बार आकाश से सफेद रंग का जल टपकाता है. (१) ये अग्नयो न शोशुचन्निधाना द्विर्य॑त्रिर्मरुतो वावृधन्त. अरेणवो हिरण्ययास एषां साकं नृम्णैः पौंस्येभिश्च भूवन्.. (२) जो मरुत् जलती हुई अग्नियों के समान प्रकाशित होते हैं एवं अपनी इच्छानुसार दूनेतिगुने बढ़ते हैं, उनके रथ धूलिरहित एवं सोने के अलंकारों वाले हैं. वे धनों एवं बलों के साथ प्रकट होते हैं. (२) रुद्रस्य ये मीळ्हुषः सन्ति पुत्रा यांश्चो नु दाधृविर्भर्धयै. विदेहि माता महो मही षा सेत्पृश्निः सुभ्वे३ गर्भमाधात्.. (३) जो मरुत् कामवर्षी रुद्र के पुत्र हैं एवं धारण करने वाला अंतरिक्ष जिन्हें भरण करने में समर्थ है, उन मरुतों की परमप्रसिद्ध एवं महती माता पृश्नि मानवों के शोभनजन्म के लिए गर्भ धारण करती है. (३) न य ईषन्ते जनुषोऽया न्व१न्तः सन्तोऽवद्यानि पुनानाः. निर्यद दुहे शुचयोऽनु जोषमनु श्रिया तन्वमुक्षमाणाः.. (४) मरुद्गण अपने स्तुतिकर्त्ताओं के पास सवारी से नहीं जाते, अपितु सबके अंतःकरण में रहकर पापों को नष्ट करते हैं. दीप्तिशाली मरुद्गण जब स्तोताओं की इच्छानुसार जल दुहते हैं, तब शोभा से युक्त होकर अपने शरीर को प्रकट करते एवं धरती को सींचते हैं. (४) मक्षू न येषु दोहसे चिदया आ नाम धृष्णु मारुतं दधानाः. न ये स्तौना अयासो मह्ना नू चित्सुदानुरव यासदुग्रान्.. (५) मरुतों के प्रति प्रभावशाली मारुतस्तोत्र का उच्चारण करके स्तोता शीघ्र ही अभिलाषाएं ebook converter DEMO Watermarks*

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पूरी कर लेते हैं. जो तिरोहित, गतिशील एवं महान् हैं, उन्हीं उग्र-मरुत को शोभनहवि धारण करने वाला यजमान क्रोधरहित करता है. (५) त इदुग्राः शवसा धृष्णुषेणा उभे युजन्त रोदसी सुमेके. अध स्मैषु रोदसी स्वशोचिरामवत्सु तस्थौ न रोकः.. (६) उग्र एवं शक्तिशाली मरुद्गण शक्तिशाली-सेवा को शोभनरूप वाले धरती-आकाश से मिलाते हैं. रुद्रपत्नी मध्यमा वाक् मरुतों में अपनी दीप्ति के साथ रहती है. शक्तिशाली मरुतों का कोई भी बाधक नहीं है. (६) अनेनो वो मरुतो यामो अस्तवश्वश्चिद्धामजत्यरथीः. अनवसो अनभीशू रजस्तूर्वि रोदसी पथ्या याति साधन्.. (७) हे मरुतो! तुम्हारा रथ पापरहित हो. स्तोता सारथि न होने पर भी जिस रथ को चलाता है, वह बिना घोड़ों वाला, भोजनशून्य एवं पाशरहित होकर भी जल का प्रेरक एवं स्तोताओं की अभिलाषा पूर्ण करने वाला बनकर स्वर्ग, धरती एवं आकाश में चलता है. (७) नास्य वर्ता न तरुता न्वस्ति मरुतो यमवथ वाजसातौ. तोके वा गोषु तनये यमप्सु स व्रजं दर्ता पार्ये अध द्योः.. (८) हे मरुतो! युद्ध में तुम जिसकी रक्षा करते हो, उसका न कोई प्रेरक होता है और न कोई हिंसक. तुम जिसके पुत्रों, पौत्रों, गायों एवं जल की रक्षा करते हो, वह युद्ध में तेजस्वी शत्रु की भी गायों को नष्ट करता है. (८) प्र चित्रमर्कं गृणते तुराय मारुताय स्वतवसे भरध्वम्. य सहांसि सहसा सहन्ते रेजते अग्ने पृथिवी मखेभ्यः.. (९) हे अग्नि! शब्द करने वाले, शीघ्रगति वाले एवं अपनी शक्ति वाले मरुतों को दर्शनीय हवि दो. वे अपने बल से शत्रुओं का बल पराजित करते हैं. आदरणीय मरुतों से पृथ्वी कांपती है. (९) त्विषीमन्तो अध्वरस्येव दिद्युत्तृषुच्यवसो जुह्वो३ नाग्नेः. अर्चत्रयो धुनयो न वीरा भ्राजज्जन्मानो मरुतो अधृष्टाः.. (१०) यज्ञ के समान प्रकाश वाले, शीघ्रगामी, आग की लपटों के समान दीप्तिशाली एवं शत्रुओं को कंपाने वाले वीरों के समान आदरणीय मरुद्गण तेजस्वी शरीर वाले तथा अपराजेय हैं. (१०) तं वृधन्तं मारुतं भ्राजदृष्टिं रुद्रस्य सूनुं हवसा विवासे. दिवः शर्धाय शुचयो मनीषा गिरयो नाप उग्रा अस्पृध्रन्.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

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मैं उन वृद्धिशाली व तेजस्वी खड्ग-वाले रुद्रपुत्रों की सेवा स्तोत्रों द्वारा करता हूं. स्तोता की पवित्र स्तुतियां उग्र बनकर मरुतों के बल की उसी प्रकार समानता करती हैं, जिस प्रकार बादल करते हैं. (११) सूक्त—६७ देवता—मित्र व वरुण विश्वेषां वः सतां ज्येष्ठतमा गीर्भिर्मित्रावरुणा वावृधध्ये. सं या रश्मेव यमतुर्यमिष्ठा द्वा जनाँ असमा बाहुभिः स्वैः.. (१) हे सकल विश्व में श्रेष्ठ मित्र एवं वरुण! मैं स्तुतियों द्वारा तुम्हें बढ़ाता हूं. परस्पर असमान एवं उत्तम-नियंता तुम दोनों रस्सी के समान मनुष्यों को बांध लेते हो. (१) इयं मद्वां प्र स्तृणीते मनीशोप प्रिया नमसा बर्हिरच्छ. यन्तं नो मित्रावरुणावधृष्टं छर्दैर्यद्वां वरूथ्यं सुदानू.. (२) हे प्रिय मित्र एवं वरुण! मेरी यह स्तुति तुम्हें ढक लेती है, हव्य के साथ तुम्हारे पास जाती है एवं तुम्हारे यज्ञ में पहुंचती है. हे शोभनदान वाले मित्र और वरुण! हमें ठंड और हवा रोकने वाला तथा शत्रुओं द्वारा अविजित घर दो. (२) आ यातं मित्रावरुणा सुशस्त्युप प्रिया नमसा हूयमाना. सं यावप्रः स्थो अपसेव चनाञ्छुधीयतश्चिद्यतथो महित्वा.. (३) हे मित्र और वरुण! शोभनवचन वाले स्तोत्रों एवं हव्यान्न द्वारा बुलाए हुए तुम दोनों आओ. कर्म का अधिकारी जिस प्रकार कर्म द्वारा अन्न चाहने वाले लोगों को वश में करता है, उसी प्रकार तुम अपने महत्त्व से ऐसे लोगों को वश में करो. (३) अश्वा न या वाजिना पूतबन्धू ऋता यद् गर्भमदितिर्भरध्यै. प्र या महि महान्ता जायमाना घोरा मर्ताय रिपवे नि दीधः.. (४) अश्वों के समान बलशाली, पवित्र स्तुतियों वाले एवं सत्ययुक्त मित्र एवं वरुण को अदिति ने गर्भ के रूप में धारण किया. अदिति ने महान् लोगों से भी बड़े एवं हिंसकों की भी हिंसा करने वाले मित्र और वरुण को धारण किया. (४) विश्वे यद्वां मंहना मन्दमानाः क्षत्रं देवासो अदधुः सजोषाः. परि यद्भूथो रोदसी चिदुर्वी सन्ति स्पशो अदब्धासो अमूराः.. (५) सब देवों ने परस्पर प्रेमपूर्वक तुम्हारे महत्त्व की स्तुति करते हुए बल धारण किया था. तुमने विस्तृत धरती-आकाश को पराजित किया है एवं तुम्हारी किरणें अपराजित तथा शक्तिशालिनी हैं. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

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ता हि क्षत्रं धारयेथे अनु द्यून् दृंहेथे सानुमुपमादिव द्योः. दृळ्हो नक्षत्र उत विश्वदेवो भूमिमातान्द्यां धासिनायोः.. (६) हे मित्र और वरुण! तुम प्रतिदिन बल धारण करते हो. तुम अंतरिक्ष के उन्नत प्रदेश को खंभे के समान दृढ़ करते हो. तुम्हारे द्वारा दृढ़ किए गए नक्षत्र एवं संपूर्ण देव मानवों के हव्य से तृप्त होकर धरती और आकाश को व्याप्त करते हैं. (६) ता विग्रं धैथे जठरं पृणध्या आ यत्सद्म सभृतयः पृणन्ति. न मृष्यन्ते युवतयोऽवाता वि यत्पयो विश्वजिन्वा भरन्ते.. (७) हे मित्र एवं वरुण! तुम अपना पेट सोमरस से भरने के लिए यजमान की रक्षा करते हो. हे विश्वजिन्वा! जब ऋत्विज् यज्ञशाला को भर देते हैं एवं तुम जल बरसाते हो. उस समय युवतियां—सरिताएं धूल से पराजित नहीं होतीं, अपितु सूखी, नदियां भी जल से भर जाती हैं. (७) ता जिह्वया सदमेदं सुमेधा आ यद्वां सत्यो अरतिर्ऋते भूत्. तद्वां महित्वं घृतान्नावस्तु युवं दाशुषे वि चयिष्टमंहः.. (८) हे घृत एवं अन्न धारण करने वाले मित्र और वरुण! शोभनबुद्धि वाले लोग स्तुतिवचनों द्वारा तुमसे सदा जल की याचना करते हैं. जिस प्रकार तुम्हारा भक्त यज्ञ में मायारहित होता है, उसी प्रकार तुम्हारा महत्त्व हो. तुम हव्यदाता का पाप नष्ट करो. (८) प्र यद्वां मित्रावरुणा स्पूर्धन्प्रिया धाम युवधिता मिनन्ति. न ये देवास ओहसा न मर्ता अयज्ञसाचो अप्यो न पुत्राः.. (९) हे मित्र एवं वरुण! तुम्हारे प्रिय एवं तुम्हारे द्वारा किए जाते हुए यज्ञकर्मों को जो अयाजक लोग तुमसे स्पर्धा करते हुए नष्ट करते हैं, जो देव एवं मानव स्तोत्र नहीं बोलते, जो कर्म करते हुए भी यज्ञहीन हैं एवं जो पुत्रयुक्त नहीं हैं, उन सबको नष्ट करो. (९) वि यद्वाचं कीस्तासो भरन्ते शंसन्ति के चिन्निविदो मनानाः. आद्वां ब्रवाम सत्यान्युक्था नकिर्देवेभिर्यथथो महित्वा.. (१०) हे मित्र एवं वरुण! मेधावी उद्गाता जब अलग-अलग स्तुतियां बोलते हैं, कुछ अग्नि आदि देवों की स्तुति करते हुए स्तोत्र बोलते हैं एवं तुम्हारे उद्देश्य से हम सच्चे मंत्र बोलते हैं, तब तुम अन्य देवों के साथ मत चले जाना. (१०) अवोरित्था वां छर्दिषो अभिष्टौ युवौर्मित्रावरुणावस्कृधोयु. अनु यद् गावः स्फुरानृजिष्यं धृष्णुं यद्रणे वृषणं युनजन्.. (११) हे रक्षक मित्र और वरुण! जिस समय स्तुतियां बोली जाती हैं एवं यजमान यज्ञ में ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—६८ देवता—इंद्र व वरुण

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सरल-गति, शत्रु-पराभवकारी तथा कामवर्षी सोमरस को प्रस्तुत करते हैं, उस समय तुम घर देने के लिए आते हो और तुम्हारा दिया हुआ घर नष्ट नहीं होता. (११) सूक्त—६८ देवता—इंद्र व वरुण श्रुष्टी वां यज्ञ उद्यतः सजोषा मनुष्वद् वृक्तबर्हिषो यजध्यै. आ य इन्द्रावरुणाविषे अद्य महे सुम्नाय मह आववर्तत्.. (१) हे महान् इंद्र व वरुण! आज यज्ञ में ऋत्विजों द्वारा तुम्हारे निमित्त वही सोमरस तैयार किया गया है, जो मनु के समान यजमान द्वारा कुश बिछाने के पश्चात् महान् एवं सुख के लिए किया जाता है. (१) ता हि श्रेष्ठा देवताता तुजा शूराणां शविष्ठा ता हि भूतम्. मघोनां मंहिष्ठा तुविशुष्म ऋतेन वृत्रतुरा सर्वसेना.. (२) हे इंद्र व वरुण! तुम श्रेष्ठ, यज्ञ में धन देने वाले एवं शूरों में अतिशय शक्तिशाली हो. तुम दानकर्त्ताओं में अति महान्, अतिशय बलयुक्त, सत्य द्वारा शत्रुओं की हिंसा करने वाले एवं सभी सेनाओं के स्वामी हो. (२) ता गृणीहि नमस्येभिः शूषैः सुम्नेभिरिन्द्रावरुणा चकाना. वज्रेणान्यः शवसा हन्ति वृत्रं सिषक्त्यन्यो वृजनेषु विप्रः.. (३) हे भरद्वाज! स्तुतियोग्य, शक्तिशालीयों व सुखी लोगों द्वारा प्रशंसित इंद्र एवं वरुण की स्तुति करो. इन में एक वज्र द्वारा वृत्र को मारता है और दूसरा बुद्धिमान् शक्ति द्वारा स्तोताओं के उपद्रवों में रक्षक बनता है. (३) ग्नाश्च यन्नरश्च वावृधन्त विश्वे देवासो नरां स्वगूर्ताः. प्रैभ्य इन्द्रावरुणा महित्वा द्यौश्च पृथिवि भूतमूर्वी.. (४) हे इंद्र एवं वरुण! मनुष्यों में स्त्रियां और पुरुष एवं सब देव स्वयं तत्पर होकर जब स्तुतियों द्वारा तुम्हारी वृद्धि करते हैं, तब तुम इन स्तोताओं के स्वामी बनो. हे द्यावा-पृथ्वी! तुम भी इनके स्वामी बनो. (४) स इत्सुदानुः स्ववाँ ऋतावेन्द्रा यो वां वरुण दाशति त्मन्. इषा स द्विषस्तरेद्दास्वान्वंसद रयिं रयिवतश्च जनान्.. (५) हे इंद्र एवं वरुण! जो यजमान अपने आप तुम्हें हव्य देता है, वह शोभनदान वाला, धनवान् एवं यज्ञकर्त्ता बने. ऐसा दाता जयशील शत्रु से जीतता है एवं धन के साथ संपत्तिशाली-पुत्र प्राप्त करता है. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

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यं युवं दाश्वधराय देवा रयिं धत्थो वसुमन्तं पुरुक्षुम्. अस्मे स इन्द्रावरुणावापि ष्यात्प्र यो भनक्ति वनुषामशस्तीः.. (६) हे इंद्र एवं वरुण देवो! तुम हव्य देने वाले यजमान को संपत्ति एवं बहुविध अन्न वाला जो धन देते हो, शत्रुओं संबंधी अपयश को मिटाने वाला वही धन हमें दो. (६) उत नः सुत्रात्रो देवगोपाः सुरिभ्य इन्द्रावरुणा रयिः ष्यात्. येषां शुष्मः पृतनासु साह्वान्प्र सद्यो द्युम्ना तिरते ततुरिः.. (७) हे इंद्र एवं वरुण! हम स्तोताओं को सुरक्षित व देवों द्वारा रक्षित धन दो. हमारा बल युद्धों में शत्रुओं को पराजित एवं हिंसित करके उनके यशों का शीघ्र तिरस्कार करे. (७) नू न इन्द्रावरुणा गृणाना पृङ्क्तं रयिं सौश्रवसाय देवा. इत्था गृणन्तो महिनस्य शर्धोऽपो न नावा दुरिता तरेम.. (८) हे इंद्र एवं वरुण देवो! तुम हमारी स्तुति सुनकर हमें शोभन अन्न के लिए धन दो. हम महान् कहकर तुम्हारे बल की स्तुति करते हैं. जैसे लोग नाव के सहारे जल को पार करते हैं, उसी प्रकार हम पापों से पार हों. (८) प्र सम्राजे बृहते मन्म नु प्रियमर्च देवाय वरुणाय सप्रथः. अयं य उर्वी महिना महिव्रतः क्रत्वा विभात्यजरो न शोचिषा.. (९) हे स्तोता! राजाओं के शासक एवं विराट वरुण देव के निमित्त प्रिय एवं सभी प्रकार विशाल स्तोत्र पढ़ो. वे महत्त्वयुक्त, महान् कर्मों वाले, बुद्धिमान्, तेजस्वी एवं जरारहित होने के साथ-साथ धरती-आकाश को प्रकाशित करते हैं. (९) इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतं सोमं पिबतं मद्यं धृतव्रता. युवो रथो अध्वरं देववीतये प्रति स्वरसरमुप याति पीतये.. (१०) हे सोमकर्त्ता इंद्र एवं वरुण! इस नशीले एवं निचोड़े हुए सोमरस को पिओ. हे व्रतधारको! तुम्हारा रथ देवों के साथ सोमपान के निमित्त यज्ञ के मार्ग पर बढ़ता है. (१०) इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम्. इदं वामन्धः परिषिक्तमस्मे आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयेथाम्.. (११) हे कामवर्षी इंद्र व वरुण! तुम अतिशय मधुर, अभिलाषापूरक एवं वृद्धिकर्त्ता सोम का पान करो. हमने यह सोमरूप अन्न तुम्हारे लिए ही पात्रों में रखा. इन कुशों पर बैठकर सोमपान से प्रसन्न बनो. (११) सूक्त—६९ देवता—इंद्र व विष्णु ebook converter DEMO Watermarks*

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सं वां कर्मणा समिषा हिनोमीन्द्राविष्णू अपसस्पारे अस्य. जुषेथां यज्ञं द्रविणं च धत्तमरिष्टैर्नः पथिभिः पारयन्ता.. (१) हे इंद्र एवं विष्णु! मैं तुम्हारे निमित्त स्तोत्र एवं हवि प्रदान करता हूं. इस उक्थ की समाप्ति पर तुम यज्ञ का सेवन करना. हमें उपद्रवरहित मार्ग पर पार ले जाने वाले तुम दोनों धन दो. (१) या विश्वासां जनितारा मतीनामिन्द्राविष्णू कलशा सोमधाना. प्र वां गिरः शस्यमाना अवन्तु प्र स्तोमासो गीयमानासो अर्कैः.. (२) हे समस्त स्तुतियों के जनक एवं कलशरूप में सोमरस के आधार इंद्र एवं विष्णु! बोली जाती हुई स्तुतियां तुम्हें प्राप्त हों. स्तोताओं द्वारा गाए जाते हुए स्तोत्र तुम्हारे पास पहुंचें. (२) इन्द्राविष्णू मदपती मदानामा सोमं यातं द्रविणो दधाना. सं वामञ्जन्वक्तुभिर्मतीनां सं स्तोमासः शस्यमानास उक्थैः.. (३) हे मदकारक-सोम के स्वामी इंद्र एवं विष्णु! तुम धन देते हुए सोमरस के सामने आओ. स्तोताओं के स्तोत्र एवं बोले जाते हुए उक्थ तुम्हें तेज के साथ प्राप्त हों. (३) आ वामश्वासो अभिमातिषाह इन्द्राविष्णू सधमादो वहन्तु. जुषेथां विश्वा हवना मतीनामुप ब्रह्माणि शृणुतं गिरो मे.. (४) हे इंद्र एवं विष्णु! हिंसकों को हराने वाले एवं परस्पर प्रसन्न होने वाले घोड़े तुम्हें वहन करें. तुम स्तोताओं के समस्त स्तोत्रों के साथ-साथ मेरे स्तुतिवचनों को भी सुनो. (४) इन्द्राविष्णू तत्पनयाय्यं वां सोमस्य मद उरु चक्रमाथे. अकृणुतमन्तरिक्षं वरीयोऽप्रथतं जीवसे नो रजांसि.. (५) हे इंद्र एवं विष्णु! तुम सोम के नशे में महान् कर्म करते हो, अंतरिक्ष को विस्तृत बनाते हो एवं लोगों को हमारे जीवन में उपयोगी बनाते हो. ये सब कर्म प्रशंसा के योग्य हैं. (५) इन्द्राविष्णू हविषा वावृधानाग्रा मद्द्वाना नमसा रातहव्या. घृतासुती द्रविणं धत्तमस्मे समुद्रः स्थः कलशः सोमधानः.. (६) हे सोम द्वारा बढ़े हुए इंद्र एवं विष्णु! तुम घी एवं अन्न से युक्त हो. तुम सोम के उत्तम भाग का सेवन करने वाले यजमानों द्वारा नमस्कार के साथ हव्य प्रदान करने वाले हो. तुम सागर एवं कलश के रूप में सोम के आधार हो. तुम हमें धन दो. (६) इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वो अस्य सोमस्य दस्रा जठरं पृणेथाम्. आ वामन्धांसि मदिराण्यूग्मन्नुप ब्रह्माणि शृणुतं हवं मे.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे दर्शनीय इंद्र एवं विष्णु! तुम इस नशीले सोमरस को पीकर अपना पेट भरो. नशीला सोम अन्न के रूप में तुम्हें प्राप्त हो. तुम मेरी स्तुतियां और पुकार सुनो. (७) उभा जिग्यथुर्न परा जयेथे न परा जिग्ये कतरश्चनैनोः. इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधां सहस्रं वि तदैरयेथाम्.. (८) हे विजयी इंद्र एवं विष्णु! तुम कभी हारते नहीं हो. इन दोनों में कोई भी हारने वाला नहीं है. तुमने जिसे तीन स्थानों पर स्थित किया एवं असंख्य वस्तुओं के लिए असुरों के साथ स्पर्धा की, उसे अपने पराक्रम से पा लिया. (८) सूक्त—७० देवता—द्यावा-पृथ्वी घृतवती भुवनानामभिश्रियोर्वी पृथ्वी मधुदुघे सुपेशसा. द्यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अजरे भूरिरेतसा.. (१) हे द्यावा-पृथ्वी! तुम जलयुक्त, प्राणियों के आश्रय-स्थल, विस्तीर्ण, अनेक कार्य के रूप में प्रसिद्ध, जल-दोहन करने वाली, सुंदररूप वाली, सबके नियामक वरुण द्वारा अलग-अलग धारित, नित्य एवं बहुत शक्ति वाली हो. (१) असश्चन्ती भूरिधारे पयस्वती घृतं दुहाते सुकृते शुचिव्रते. राजन्ती अस्य भुवनस्य रोदसी अस्मे रेतः सिञ्चतं यन्मनुर्हितम्.. (२) हे परस्पर पृथक्, अनेक धाराओं वाली, जलयुक्त एवं पवित्र कर्म वाली द्यावा-पृथ्वी! तुम उत्तमकर्म करने वाले व्यक्ति को जल देती हो. इस संसार की स्वामिनी द्यावा-पृथ्वी! तुम मानव हितकारी शक्ति हमें दो. (२) यो वामृजवे क्रमणाय रोदसी मर्तो ददाश धिष्णे स साधति. प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि युवोः सिक्ता विषुरूपाणि सव्रता.. (३) हे सकल भुवन की निवास द्यावा-पृथ्वी! जो मनुष्य तुम्हारे सरल गमन के लिए हव्य देता है, वह अपनी कामनाएं पूर्ण करता है एवं पुत्र-पौत्रादि के द्वारा उन्नति करता है. कर्मों के ऊपर वर्तमान तुम्हारा वीर्य नानारूप धारण करता है. (३) घृतेन द्यावापृथिवी अभीवृते घृतश्रिया घृतपृचा घृतावूधा. उर्वी पृथ्वी होतूर्वूर्ये पुरोहिते ते इद्विप्रा ईळते सुम्नमिष्टये.. (४) द्यावा-पृथ्वी जल से ढकी हुई, जल को सहारा देती हुई, जल से व्याप्त, जल की वृद्धि करने वाली, विस्तृत, प्रसिद्ध व यज्ञ में यजमानों द्वारा पुरस्कृत हैं. विद्वान् यज्ञ करने के निमित्त इनसे सुख की याचना करते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

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मधु नो द्यावापृथिवी मिमिक्षतां मधुश्चुता मधुदुघे मधुव्रते. दधाने यज्ञं द्रविणं च देवता महि श्रवो वाजमस्मे सुवीर्यम्.. (५) जल क्षरण करने वाली, जल टपकाने वाली, जल के निमित्त कर्म करने वाली, देवतारूप, हम लोगों को यज्ञ, धन, विशाल-यश, अन्न एवं शोभनवीरता देती हुई द्यावा-पृथ्वी हमें मधु से सींचें. (५) ऊर्जं नो द्यौश्च पृथिवी च पिन्वतां पिता माता विश्वविदा सुदंससा. संरराणे रोदसी विश्वशम्भुवा सनिं वाजं रयिमस्मे समिन्वताम्.. (६) हे पिता द्यौ एवं माता पृथ्वी! हमें अन्न दो. सबको जानने वाली, शोभनकर्म वाली, परस्पर रमण करती हुई एवं सबको सुख देने वाली द्यावा-पृथ्वी हमें संतान, बल एवं धन दें. (६) सूक्त—७१ देवता—सविता उदु ष्य देवः सविता हिरण्यया बाहू अयंस्त सवनाय सुक्रतुः. घृतेन पाणी अभि प्रुष्णुते मखो युवा सुदक्षो रजसो विधर्मणि.. (१) शोभनकर्म वाले सविता देव अपनी स्वर्णमय भुजाओं को दान के लिए उठाते हैं. महान्, नित्ययुवा व शोभनबुद्धि सविता लोक को धारण करने के लिए अपने जलपूर्ण हाथों को बढ़ाते हैं. (१) देवस्य वयं सवितुः सवीमनि श्रेष्ठे स्याम वसुनश्च दावने. यो विश्वस्य द्विपदो यश्चतुष्पदो निवेशने प्रसवे चासि भूमनः.. (२) हम उन्हीं सविता देव के अनुज्ञात एवं प्रशंसनीय दान पाने में समर्थ हों, जो सभी द्विपद एवं चतुष्पद और प्राणियों की स्थिति और जन्म में स्वतंत्र हैं. (२) अदब्धेभिः सवितः पायुभिष्ट्वं शिवेभिरद्य परि पाहि नो गयम्. हिरण्यजिह्वः सुविताय नव्यसे रक्षा माकिर्नो अघशंस ईशत.. (३) हे सविता! तुम अपने अहिंसित एवं सुखकारक तेजों द्वारा हमारे घर की रक्षा करो. हे हिरण्यवाक्! तुम नवीन सुख एवं रक्षा के कारण बनो. हमारा अहित चाहने वाला हमारा स्वामी न हो. (३) उदु ष्य देवः सविता दमूना हिरण्यपाणिः प्रतिदोषमस्थात्. अयोहनुर्यजतो मन्द्रजिह्व आ दाशुषे सुवति भूरि वामम्.. (४) दानयुक्त मन वाले, स्वर्णमय हाथों वाले, सोने की ठोड़ी वाले, यज्ञ के पात्र व प्रसन्नवचन ebook converter DEMO Watermarks*

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वाले सविता देव रात्रि की समाप्ति पर उठें. वे हव्यदाता यजमान के लिए बहुत सा अन्न दें. (४) उद् अयाँ उपवक्तेव बाहू हिरण्यया सविता सुप्रतीका. दिवो रोहांस्यरुहत्पृथिव्या अरीरमतपतयत् कच्चिदध्वम्.. (५) सविता व्याख्यानदाता के समान अपने स्वर्णमय एवं शोभन अवयवों वाले हाथों को उठावें. वे धरती से आकाश के स्थानों में पहुंचें एवं सभी गतिशील वस्तुओं को आनंद दें. (५) वाममद्य सवितर्वाममु श्वो दिवेदिवे वाममस्मभ्यं सावीः. वामस्य हि क्षयस्य देव भूरेरया धिया वामभाजः स्याम.. (६) हे सविता! हमें आज धन दो एवं कल भी धन देना. हमें प्रतिदिन धन दो. हे देव! तुम निवास के कारणरूप विशाल धन के दाता हो. हम इस स्तुति द्वारा धन के भागी बनेंगे. (६) सूक्त—७२ देवता—इंद्र व सोम इन्द्रासोमा महि तद्वां महित्वं युवं महानि प्रथमानि चक्रथुः. युवं सूर्यं विविदुथुर्युवं स्व१र्विश्वा तमांस्यहतं निदश्च.. (१) हे इंद्र एवं सोम! तुम्हारा महत्त्व बड़ा है. तुमने महान् भूतों को बनाया था. तुमने सूर्य और जल की खोज की है एवं सभी निंदकों व अंधकारों का नाश किया है. (१) इन्द्रासोमा वासयथ उषामुत्सूर्यं नयथो ज्योतिषा सह. उप द्यां स्कम्भथुः स्कम्भनेनाप्रथतं पृथिवीं मातरं वि.. (२) हे इंद्र एवं सोम! तुम उषा को प्रकाशित करो एवं सूर्य को उसकी ज्योति के साथ ऊपर उठाओ. तुम अंतरिक्ष के द्वारा स्वर्ग को स्थिर करो एवं पृथ्वी माता को प्रसिद्ध बनाओ. (२) इन्द्रासोमावहिमपः परिष्ठां हथो वृत्रमनु वां द्यौरमन्यत. प्रार्णांस्यैरयतं नदीनामा समुद्राणि पप्रथुः पुरूणि.. (३) हे इंद्र एवं सोम! तुम जल को रोकने वाले वृत्र नामक राक्षस का वध करो. स्वर्ग ने तुम्हें माना है. तुम नदियों के जल को प्रेरित करो व समुद्र को जल से भर दो. (३) इन्द्रासोमा पक्वमामास्वन्तर्नि गवामिद्दधथुर्वक्षणासु. जगृभतुरनपिनद्धमासु रुशच्चित्रासु जगतीष्वन्तः.. (४) हे इंद्र एवं सोम! तुमने गायों के कोमल थनों में पुष्टिकारक दूध धारण किया है. तुमने भिन्न-भिन्न रंग वाली गायों में किसी के द्वारा न रुकने वाला तथा श्वेतवर्ण का दूध धारण किया ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—७३ देवता—बृहस्पति

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है. (४) इन्द्रासोमा युवमङ्ग तरुत्रमपत्यसाचं श्रुत्यं रराथे. युवं शुष्मं नर्यं चर्षणिभ्यः सं विव्यथुः पृतनाषाहमुग्रा.. (५) हे इंद्र एवं सोम! तुम हमें उद्धार करने वाला, संतानयुक्त एवं प्रशंसनीय धन शीघ्र दो. हे अति शूरो! तुम मानवों में कल्याणकारी एवं शत्रुसेनाओं को हराने वाला बल बढ़ाओ. (५) सूक्त—७३ देवता—बृहस्पति यो अद्रिभित्प्रथमजा ऋतावा बृहस्पतिराङ्गिरसो हविष्मान्. द्विबर्हज्मा प्राघर्मसत्पिता न आ रोदसी वृषभो रोरवीति.. (१) पर्वत का भेदन करने वाले, सबसे पहले उत्पन्न, सत्ययुक्त, अंगिरा के पुत्र, यज्ञ के भागी, दोनों लोकों में गतिशील, अतिशय दीप्त स्थान में रहने वाले एवं हमारे पालनकर्त्ता बृहस्पति कामपूरक बनकर धरती-आकाश में गर्जन करते हैं. (१) जनाय चिद्य ईवत उ लोकं बृहस्पतिर्देवहूतौ चकार. घ्नन्वॄत्राणि वि पुरो दर्दरीति जयञ्छत्रूँरमित्रान्पृत्सु साहन्.. (२) जो बृहस्पति स्तुति करने वाले को यज्ञ में स्थान देते हैं, वे ही ढकने वाले अंधकार को दूर करते हुए युद्धों में शत्रुओं को जीतते हैं एवं अमित्रों को हराते हैं. वे राक्षसों के नगरों को बार-बार जलाते हैं. (२) बृहस्पतिः समजयदद्वसूनि महो व्रजान् गोमतो देव एषः. अपः सिषासन्तत्स्व१ रप्रतीतो बृहस्पतिर्हन्त्यमित्रमर्कैः.. (३) इन बृहस्पति देव ने असुरों के धनों के साथ-साथ उनकी गायों से पूर्ण गोचर भूमि को जीता था. बृहस्पति किसी के द्वारा न रोके जाते हुए यज्ञकर्म द्वारा स्वर्ग को भोगने की इच्छा करते हैं एवं मंत्रों द्वारा शत्रु का नाश करते हैं. (३) सूक्त—७४ देवता—सोम व रुद्र सोमारुद्रा धारयेथामसुर्यं१ प्र वामिष्टयोऽरमश्रुवन्तु. दमेदमे सप्त रत्ना दधाना शं नो भूतं द्विपदे शं चतुष्पदे.. (१) हे सोम एवं रुद्र! तुम हमें असुरों के समान शक्ति दो. हमारे यज्ञ प्रत्येक घर में तुम्हें पूरी तरह व्याप्त करें. हे सात रत्न धारण करने वालो! तुम हमारे अतिरिक्त दो पैर वाले मानवों एवं चार पैर वाले पशुओं के लिए कल्याणकारी बनो. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

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सोमारुद्रा वि वृहतं विषूचीममीवा या नो गयमाविवेश. आरे बाधेथां निर्ऋतिं पराचैरस्मे भद्रा सौश्रवसानि सन्तु.. (२) हे सोम एवं रुद्र! हमारे घर में जो रोग समाया हुआ है, उसे दूर भगाओ एवं दरिद्रता को बाधा पहुंचाकर हमसे दूर भगाओ. हमारे पास कल्याणकारी अन्न हो. (२) सोमारुद्रा युवमेतान्यस्मे विश्वा तनूषु भेषजानि धत्तम्. अव स्यतं मुञ्चतं यन्नो अस्ति तनूषु बद्धं कृतमेनो अस्मत्.. (३) हे सोम एवं रुद्र! तुम हमारे शरीर को लाभ पहुंचाने वाली सभी ओषधियां धारण करो. हमारे द्वारा किया हुआ जो पाप हमारे शरीर में बंधा है, उसे शिथिल करके दूर भगाओ. (३) तिग्मायुधौ तिग्महेती सुशेवौ सोमारुद्राविह सु मृळतं नः. प्र नो मुञ्चतं वरुणस्य पाशाद् गोपायतं नः सुमनस्यमाना.. (४) हे सोम एवं रुद्र! तुम दीप्त धनुष वाले, तेज बाणों वाले एवं शोभनसुख देने वाले हो. शोभनस्तोत्रों की इच्छा करते हुए तुम दोनों इस संसार में हमें सुखी बनाओ, वरुण के पाशों से छुड़ाओ एवं हमारी रक्षा करो. (४) सूक्त—७५ देवता—वर्म आदि जीमूतस्येव भवति प्रतीकं यद्वर्मी याति समदामुपस्थे. अनाविद्धया तन्वा जय त्वं स त्वा वर्मणो महिमा पिपर्तु.. (१) युद्धों के आरंभ होने पर यह राजा जब कवच पहन कर जाता है, तब इसका रूप बादल के समान जान पड़ता है. हे राजा! तुम शत्रुओं द्वारा बिना बिंधे शरीर से जय प्राप्त करो. कवच की यह महिमा तुम्हारी रक्षा करे. (१) धन्वना गा धन्वनाजिं जयेम धन्वना तीव्राः समदो जयेम. धनुः शत्रोरपकामं कृणोति धन्वना सर्वाः प्रदिशो जयेम.. (२) हम धनुष के द्वारा गायों एवं युद्ध को जीतेंगे. हम धनुष की सहायता से शत्रुओं की उद्धत एवं मदवाली सेनाओं को जीतेंगे. हमारा धनुष शत्रुओं की अभिलाषाएं नष्ट करे. हम धनुष द्वारा सब दिशाओं को जीतें. (२) वक्ष्यन्तीवेदा गनीगन्ति कर्णं प्रियं सखायं परिषस्वजाना. योषेव शिङ्क्ते वितताधि धन्वञ्ज्या इयं समने पारयन्ती.. (३) युद्धभूमि में पार लगाने वाली यह धनुष की डोरी धनुष पर विस्तृत होकर प्रिय वचन बोलने की अभिलाषा सी करती हुई प्यारी बातें कहने के लिए धनुर्धारी के कान के समीप

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आती है. पति का आलिंगन करके बात करने वाली नारी के समान यह डोरी बाण को छूकर शब्द करती है. (३) ते आचरन्ती समनेव योषा मातेव पुत्रं बिभृतामुपस्थे. अप शत्रून् विध्यतां संविदाने आर्ती इमे विष्फुँरन्ती अमित्रान्.. (४) धनुष की दोनों कोटियां परस्पर प्रिय आचरण करने वाली नारियों के समान कार्य करती हुई युद्ध में राजा की इस प्रकार रक्षा करें, जिस प्रकार माता पुत्र की रक्षा करती है. ये परस्पर विरोध छोड़कर जाती हुई इस राजा के अमित्रों को मारकर शत्रुओं को बेध दें. (४) बह्वीनां पिता बहुरस्य पुत्रश्चिश्चा कृणोति समनावगत्य. इषुधिः सङ्काः पृतनाश्च सर्वाः पृष्ठे निनद्धो जयति प्रसूतः.. (५) यह तरकस बहुत से बाणों का पिता है. बहुत से बाण इसके पुत्र हैं. बाण निकालने पर इससे त्रिश्चा शब्द होता है. तरकस योद्धा की पीठ पर बंधा हुआ है, युद्धों को जानकर बाणों को जन्म देता है एवं सब सेनाओं को जीतता है. (५) रथे तिष्ठन्नयति वाजिनः पुरो यत्रयत्र कामयते सुसारथिः. अभीशूनां महिमानं पनायत मनः पश्चादनु यच्छन्ति रश्मयः.. (६) उत्तम सारथि रथ पर बैठकर अपने सामने वाले घोड़ों को जहां चाहता है, वहां ले जाता है. हे मनुष्यो! उन लगामों की महिमा बखानो. घोड़े के मुंह से पीछे की ओर जाती हुई लगामें सारथि के मन के अनुसार घोड़ों को वश में करती हैं. (६) तीव्रान् घोषान् कृण्वते वृषपाणयोऽश्वा रथेभिः सह वाजयन्तः. अवक्रामन्तः प्रपदैरमित्रान् क्षिणन्ति शत्रूँरनपव्ययन्तः.. (७) धूल उड़ाते हुए एवं रथों के साथ तेज दौड़ते हुए घोड़े जोर से हिनहिनाते हैं. वे युद्ध से न भागते हुए हिंसक शत्रुओं को अपनी टापों से कुचलते हैं. (७) रथवाहनं हविरस्य नाम यत्रायुधं निहितमस्य वर्म. तत्रा रथमुप शग्मं सदेम विश्वाहा वयं सुमनस्यमानाः.. (८) हवि जिस प्रकार अग्नि को बढ़ाता है, उसी प्रकार रथ द्वारा ढोया गया शत्रुओं का धन इस राजा को बढ़ाता है. रथ पर राजा के आयुध और कवच रखे रहते हैं. प्रसन्नचित्त हम भरद्वाजवंशी सदा उस रथ के पास जावें. (८) स्वादुषद्सदः पितरो वयोधाः कृच्छ्रेश्रितः शक्तिवन्तो गभीराः. चित्रसेना इषुबला अमृध्राः सतोवीरा उरवो व्रातसाहाः.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*

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रथ की रक्षा करने वाले सैनिक शत्रु के स्वादिष्ट अन्न को नष्ट करके अपने योद्धाओं को अन्न देने वाले एवं विपत्ति में आश्रय लेने योग्य हैं. ये सैनिक शक्तिशाली, गंभीर, विचित्रसेना वाले, बाणरूपी शक्ति वाले, हिंसित न होने वाले, वीरतापूर्ण, विशाल एवं शत्रुसमूहों को हराने वाले हैं. (९) ब्राह्मणासः पितरः सोम्यासः शिवे नो द्यावापृथिवी अनेहसा. पूषा नः पातु दुरिताद् ऋतावृधो रक्षा माकिर्नो अघशंस ईशत.. (१०) हे ब्राह्मणो, पितरो और यज्ञ को बढ़ाने वाले सोम तैयार करने वालो! हमारी रक्षा करो. पापरहित द्यावा-पृथिवी हमारा कल्याण करें. पूषा पाप से हमारी रक्षा करें. शत्रु हमारा स्वामी न बने. (१०) सुपर्णं वस्ते मृगो अस्या दन्तो गोभिः संनद्धा पतति प्रसूता. यत्रा नरः सं च वि च द्रवन्ति तत्रास्मभ्यमिषवः शर्म यंसन्.. (११) बाण शोभनपंख धारण करता है. हिरण का सींग इसका दांत है. गाय से बनी तांत द्वारा बंधा हुआ बाण प्रेरणा के अनुसार लक्ष्य पर गिरता है. नेता जहां मिलकर या अलग-अलग घूमते हैं, वहां ये बाण हमें शरण दें. (११) ऋजीते परि वृङ्ग्धि नोऽश्मा भवतु नस्तनूः. सोमो अधि ब्रवीतु नोऽदितिः शर्म यच्छतु.. (१२) हे बाण! हमें सब प्रकार से बढ़ाओ. हमारा शरीर पत्थर के समान हो. सोम हमारा पक्षपात करता हुआ बोले. अदिति हमें सुख दें. (१२) आ जङ्घन्तिसान्वेषां जघनाँ उपजिघ्नते. अश्वाजनि प्रचेतसोऽश्वान्तसमत्सु चोदय.. (१३) हे कोड़े! उत्तम ज्ञान वाले सारथि तुम्हारे द्वारा घोड़ों को पीठ और जांघों पर चोट करते हैं. तुम युद्ध में घोड़ों को प्रेरणा दो. (१३) अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतं परिबाधमानः. हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान्पुमांसं परि पातु विश्वतः.. (१४) धनुषधारी के हाथ में बंधा हुआ चमड़ा धनुष की डोरी की चोट से हाथ की रक्षा करता हुआ सांप के समान लिपटा है एवं सब बातों को जानता हुआ पौरुष द्वारा धनुषधारी की रक्षा करता है. (१४) आलाक्ता या रुरुशीर्ष्ण्यथो यस्या अयो मुखम्. इदं पर्जन्यरेतस इष्वै देव्यै बृहन्नमः.. (१५) ebook converter DEMO Watermarks*

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जहर में बुझे हुए, हिंसक नोक वाले, लोहे के अग्रभाग वाले एवं पर्जन्य से उत्पन्न विशाल बाण देव को नमस्कार है. (१५) अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसंशिते. गच्छामित्रान्प्र पद्यस्व मामीषां कं चनोच्छिषः.. (१६) हे मंत्र द्वारा तेज किए हुए एवं हिंसाकुशल बाण! तुम छोड़े जाने पर जाओ और शत्रुओं पर गिरो. उन में से किसी को भी मत छोड़ना. (१६) यत्र बाणाः सम्पतन्ति कुमारा विशिखा इव. तत्रा नो ब्रह्मणस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु.. (१७) जिस युद्ध में मुंडितशिर कुमारों के समान बाण गिरते हैं, वहां ब्रह्मणस्पति एवं अदिति हमें सदा सुख दें. (१७) मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानु वस्ताम्. उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मदन्तु.. (१८) हे राजन्! मैं तुम्हारे मर्मस्थलों को कवच से ढकता हूं. राजा सोम तुम्हें अमृत से ढकें. वरुण तुम्हें बड़े से बड़ा सुख दें. तुम्हारी विजय पाने के बाद देव प्रसन्न हों. (१८) यो नः स्वो अरणो यश्च निष्ट्यो जिघांसति. देवास्तं सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरम्.. (१९) हमारे जो परिवारी जन हमसे प्रसन्न नहीं हैं एवं जो दूर रहकर हमें मारना चाहते हैं, सभी देव उन्हें मारें. मंत्र ही हमारी रक्षा करने वाले कवच हैं. (१९)

सूक्त—१ देवता—अग्नि

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सप्तम मंडल सूक्त—१ देवता—अग्नि अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युती जनयन्त प्रशस्तम्. दूरेदृशं गृहपतिमथर्युम्.. (१) यज्ञ के नेता ऋत्विज् प्रशंसायोग्य, दूर से दिखाई देने वाले, गृहपति एवं गतिशील अग्नि को हाथों की गति एवं उंगलियों की सहायता से अरणि से उत्पन्न करते हैं. (१) तमग्निमस्ते वसवो नृण्वन्त्सुप्रतिचक्षमवसे कुतश्चित्. दक्षाय्यो यो दम आस नित्यः.. (२) जो अग्नि घर में पूजनीय एवं नित्य थे, उन्हीं शोभनदर्शन वाले अग्नि को सभी भयों से बचाने के लिए वसिष्ठ पुत्रों ने घर में रखा. (२) प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरो नोऽजस्रया सूर्त्या यविष्ठ. त्वां शश्वन्त उप यन्ति वाजाः.. (३) हे अतिशय युवा अग्नि! तुम भली प्रकार प्रज्वलित होकर अपनी गतिशील ज्वाला के साथ हमारे कल्याण के लिए यज्ञशाला में चमको. बहुत से अन्न तुम्हारे पास जाते हैं. (३) प्र ते अग्नयोऽग्निभ्यो वरं निः सुवीरासः शोशुचन्त द्युमन्तः. यत्रा नरः समासते सुजाताः.. (४) शोभनजन्म वाले ऋत्विज् जहां बैठते हैं, वहां अग्नि लौकिक अग्नियों की अपेक्षा कल्याणकारी, संतान देने वाले एवं अधिक दीप्तिशाली होकर चमकते हैं. (४) दा नो अग्ने धिया रयिं सुवीरं स्वपत्यं सहस्य प्रशस्तम्. न यं यावा तरति यातुमावान्.. (५) हे शत्रुओं को हराने में कुशल अग्नि! हमारी स्तुतियां सुनकर हमें ऐसा कल्याणकर, संतान वाला, शोभन पुत्र-पौत्र वाला एवं श्रेष्ठ धन दो, जिसे हिंसक शत्रु बाधित न कर सकें. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

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उप यमेति युवतिः सुदक्षं दोषा वस्तोर्हविष्मती घृताची. उप स्वैनमरमतिर्वस्यूः.. (६) अग्नि से नित्ययुक्त एवं हव्यसहित जुहू रात-दिन शोभनबल वाले अग्नि के पास आती है. स्तोताओं के धन की अभिलाषा करती हुई अग्नि की दीप्ति अग्नि के पास आती है. (६) विश्वा अग्नेऽप दहारातीर्येभिस्तपोभिर्दहदो जरूथम्. प्र निस्वरं चातयस्वामीवाम्.. (७) हे अग्नि! तुमने जिन तेजों से भयानक शब्द करने वाले राक्षसों को जलाया था, उन्हीं तेजों से समस्त शत्रुओं को जलाओ व ताप नष्ट करके रोग को मिटाओ. (७) आ यस्ते अग्न इधते अनीकं वसिष्ठ शुक्र दीदिवः पावक. उतो न एभिः स्तवथैरिह स्याः.. (८) हे श्रेष्ठ, शुभ, तेजस्वी एवं शोधक अग्नि! जो तुम्हारा तेज बढ़ाते हैं, उन पर तुम जिस प्रकार प्रसन्न होते हो, उसी प्रकार हमारे स्तोत्रों से प्रसन्न होकर इस यज्ञ में आओ. (८) वि ये ते अग्ने भेजिरे अनीकं मर्ता नरः पित्र्यासः पुरुत्रा. उतो न एभिः सुमना इह स्याः.. (९) हे अग्नि! जो पितरों के हितकारक एवं यज्ञकर्म के नेता लोग तुम्हारे तेज को अनेक स्थानों में बांटते हैं, तुम उन पर जिस प्रकार प्रसन्न होते हो, उसी प्रकार हमारे स्तोत्रों से प्रसन्न होकर इस यज्ञ में स्थित बनो. (९) इमे नरो वृत्रहत्येषु शूरा विश्वा अदेवीर्भि सन्तु मायाः. ये मे धियं पनयन्त प्रशस्ताम्.. (१०) जो लोग मेरे उत्तम यज्ञकर्म की स्तुति करते हैं, वे ही शूर नेता युद्धों में असुरों की माया को पराजित करें. (१०) मा शूने अग्ने नि षदाम नृणां माशेषसोऽवीरता परि त्वा. प्रजावतीषु दुर्यासु दुर्य.. (११) हे अग्नि! हम पुत्रादि से शून्य घर में न रहें, न हम दूसरों के घर में निवास करें. हे घर के हितैषी अग्नि देव! पुत्रों एवं वीरों से युक्त हम तुम्हारी सेवा करते हुए प्रजायुक्त घरों में रहें. (११) यमश्री नित्यमुपयाति यज्ञं प्रजावन्तं स्वपत्यं क्षयं नः. स्वजन्मना शेषसा वावृधानम्.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे घोड़ों के स्वामी अग्नि! हमें सगे पुत्र से वृद्धि पाता हुआ ऐसा शोभन संतानयुक्त घर दो, जिस यज्ञयुक्त घर में तुम नित्य आते हो. (१२) पाहि नो अग्ने रक्षसो अजुष्टात् पाहि धूर्तेरररुषो अघायोः. त्वा युजा पृतनायूँरभि ष्याम्.. (१३) हे अग्नि! हमें द्वेषयुक्त राक्षस से बचाओ. हमें दान न करने वाले, पापी और हिंसक से बचाओ. हम तुम्हारी सहायता से सेना के इच्छुक लोगों को पराजित करें. (१३) सेदग्नीरग्नीरत्यस्त्वन्यान्यत्र वाजी तनयो वीळुपाणिः. सहस्रपाथा अक्षरा समेति.. (१४) हमारा बलवान्, दृढ़ हाथों वाला एवं हजारों अन्नों वाला पुत्र नाशरहित स्तोत्रों द्वारा जिस अग्नि की सेवा करता है, वह अग्नि अन्य अग्नियों को पराजित करे. (१४) सेदग्निर्यो वनुष्यतो निपाति समेद्धारमंहस उरुष्यात्. सुजातासः परि चरन्ति वीराः.. (१५) वे अग्नि ही हैं, जो अपने प्रज्वलित करने वाले को हिंसक एवं विशाल पाप से बचाते हैं तथा शोभनजन्म वाले वीर जिनकी सेवा करते हैं. (१५) अयं सो अग्निराहुतः पुरुत्रा यमीशानः समिदिन्धे हविष्मान्. परि यमेत्यध्वरेषु होता.. (१६) वे ही अग्नि अनेक यज्ञों में बुलाए जाते हैं, जिन्हें ऐश्वर्य चाहने वाला एवं हव्ययुक्त यजमान भली प्रकार जलाता है एवं यज्ञों में होता जिनकी परिक्रमा करता है. (१६) त्वे अग्न आहवनानि भूरीशानास आ जुहुयाम नित्या. उभा कृण्वन्तो वहतू मियेधे.. (१७) हे अग्नि! हम धनों के स्वामी बनकर अग्निहोत्रादि नित्यकर्मों को धारण करने वाले स्तोत्र बोलते हुए यज्ञ में बहुत से हव्य देंगे. (१७) इमो अग्ने वीततमानि हव्याजस्रो वक्षि देवतातिमच्छ. प्रति न ईं सुरभीणि व्यन्तु.. (१८) हे अग्नि! तुम इन अति सुंदर हव्यों को देवों के समीप लेकर जाओ. प्रत्येक देव हमारे इस हव्य की कामना करें. (१८) मा नो अग्नेऽवीरते परा दा दुर्वाससेऽमतये मा नो अस्यै. मा नः क्षुधे मा रक्षस ऋतावो मा नो दमे मा वन आ जुहूर्थाः.. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे अग्नि! हमें संतानहीन मत बनाओ. हमें बुरे कपड़े और बुरी बुद्धि मत देना. हमें भूख और राक्षस को मत सौंपना. हे सत्ययुक्त अग्नि! हमें न घर में मारना और न वन में. (१९) नू मे ब्रह्माण्यग्न उच्छशाधि त्वं देव मघवद्भ्यः सुषदः. रातौ स्यामोभयास आ ते यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (२०) हे अग्नि! मेरे लिए अन्नों को विशेषरूप से शुद्ध करना. हे देव! हम हव्ययुक्तों को तुम अन्न दो. हम यजमान और स्तोता दोनों तुम्हारे दान के पात्र बनें. तुम सदा कल्याणों द्वारा हमारा पालन करो. (२०) त्वमग्ने सुहवो रण्वसन्दृक् सुदीती सूनो सहसो दीदिहि. मा त्वे सचा तनये नित्य आ धङ्मा वीरो अस्मन्नर्यो वि दासीत्.. (२१) हे शक्ति के पुत्र, शोभन आह्वान वाले एवं रमणीयदर्शन अग्नि! तुम उत्तम प्रकाश के साथ प्रदीप्त बनो! तुम मेरे पुत्र के सहायक बनो एवं उसे मत जलाओ. हमारा मानवहितकारी पुत्र नष्ट न हो. (२१) मा नो अग्ने दुर्भृतये सचैषु देवेद्धेष्वग्निषु प्र वोचः. मा ते अस्मान्दुर्मतयो भृमाच्छिद्देवस्य सूनो सहसो नशन्त.. (२२) हे सहायक अग्नि! ऋत्विजों द्वारा अग्नियों के प्रज्वलित होने पर उनसे हमें दुःखपूर्वक मरण के लिए मत कहो. हे प्रज्वलित एवं बलपुत्र अग्नि! तुम्हारी दुर्बुद्धि भ्रम से भी हमें न प्राप्त हो. (२२) स मर्तो अग्ने स्वनीक रेवानमर्त्ये य आजुहोति हव्यम्. स देवता वसुवनिं दधाति यं सूरिरर्थी पृच्छमान एति.. (२३) हे शोभनतेज वाले एवं देवतारूप अग्नि! तुम्हें हव्य देने वाला मनुष्य धनवान् होता है. वे अग्नि देव यजमान को धन देते हैं, जिनके पास धन चाहने वाला स्तोता पूछने के लिए जाता है. (२३) महो नो अग्ने सुवितस्य विद्वान् रयिं सूरिभ्य आ वहा बृहन्तम्. येन वयं सहसावन्मदेमाविक्षितास आयुषा सुवीराः.. (२४) हे अग्नि! तुम हमारे महान् कल्याणकारी कार्यों को जानते हो. हम स्तोताओं को तुम महान् धन दो. हे बलपुत्र अग्नि! उस धन से हम क्षयरहित, पूर्ण आयु वाले व शोभन पुत्र-पौत्रों वाले होकर प्रसन्न बनें. (२४) नू मे ब्रह्माण्यग्न उच्छशाधि त्वं देव मघवद्भ्यः सुषदः. रातौ स्यामोभयास आ ते यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त—२ देवता—आप्री

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हे अग्नि! मेरे लिए तुम अन्नों को विशेषरूप से शुद्ध करना. हे देव! हम हव्ययुक्तों को तुम अन्न दो. हम यजमान और स्तोता दोनों तुम्हारे दान के पात्र बनें. सदा कल्याणों द्वारा हमारा पालन करो. (२५) सूक्त—२ देवता—आप्री जुषस्व नः समिधमग्ने अद्य शोचा बृहद्यजतं धूममृण्वन्. उप स्पृश दिव्यं सानु स्तूपैः सं रश्मिभिस्ततनः सूर्यस्य.. (१) हे अग्नि! आज हमारी समिधा को स्वीकार करो. यज्ञ के योग्य एवं प्रशंसनीय धुआं उठाते हुए जलों एवं अपनी गर्म लपटों से ऊंचे आकाश को छुओ. तुम सूर्य से मिल जाओ. (१) नराशंसस्य महिमानमेषामुप स्तोषाम यजतस्य यज्ञैः. ये सुक्रतवः शुचयो धियंधाः स्वदन्ति देवा उभयानि हव्या.. (२) जो देव शोभनकर्म वाले, तेजस्वी, यज्ञकर्मों के धारक एवं दोनों प्रकार के हव्यों को स्वीकार करने वाले हैं, हम उन देवों के बीच में यज्ञयोग्य एवं मनुष्यों द्वारा प्रशंसनीय अग्नि की महिमा का वर्णन स्तुतियों द्वारा करते हैं. (२) ईळेन्यं वो असुरं सुदक्षमन्तर्दूतं रोदसी सत्यवाचम्. मनुष्वदग्निं मनुना समिद्धं समध्वराय सदमिन्महेम.. (३) हे अध्वर्युगण! तुम स्तुति के योग्य, शक्तिशाली, शोभनबुद्धि वाले, धरती-आकाश के बीच में देवों के दूतरूप में विचरण करने वाले, सत्यवचन, मनुष्य के समान और मन द्वारा प्रज्वलित अग्नि को यज्ञ के लिए पूजते हो. (३) सपर्यवो भरमाणा अभिज्ञु प्र वृञ्जते नमसा बर्हिरग्नौ. आजुह्वाना घृतपृष्ठं पृषद्वदध्वर्यवो हविषा मर्चयध्वम्.. (४) सेवा करने के अभिलाषी एवं घुटनों के सहारे बैठकर पात्रों में सोमरस भरते हुए अध्वर्यु हव्य के साथ अग्नि को बर्हि देते हैं. हे अध्वर्युगण! घी से भीगे हुए एवं बड़ी-बड़ी बूंदों वाले बर्हि को हव्य के साथ अग्नि में वहन करो. (४) स्वाध्यो३ वि दुरो देवयन्तोऽशिश्रयू रथयुर्देवताता. पूर्वी शिशुं न मातरा रिहाणे समग्रुवो न समनेष्वञ्जन्.. (५) शोभनकर्म वाले, देवों की अभिलाषा करने वाले एवं रथ चाहने वाले लोगों ने यज्ञ में द्वारों का सहारा लिया, अध्वर्युगण यज्ञ में प्राचीना जुहू एवं उपभृति को नदी के समान घी से ebook converter DEMO Watermarks*