भारतकोश
रोगों की पहचान

रोगों की पहचान

Rogon Ki Pehchaan

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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रोगों को दबाएँ मत

दूषित पदार्थ को शरीर स्वयं ही बाहर निकालने का प्रयास करता है। यदि पाचन-शक्ति अच्छी है तो दूषित पदार्थ बड़े आराम से बाहर हो जाता है। जब दूषित पदार्थ का जमाव अधिक हो जाता है तो रक्त-पित्त, फोड़ा, घाव, पाँव-पसीजना, खूनी बवासीर आदि की परेशानी हो जाती है। यह सब इसलिए होता है कि शरीर को उस दोषयुक्त पदार्थ को बाहर निकालने का रास्ता नहीं मिल रहा होता है। ऐसे में यह सब हो जाता है। शरीर इनके माध्यम से दूषित पदार्थ को निकालने की कोशिश करता है। पर हम डाक्टर की दवा से इन्हें दबा देते हैं, जिसका परिणाम कभी तो तुरंत बाद और कभी आगे चलकर हानिकारक होता है। यह पदार्थ कहीं ओर चलकर नयी मुसीबत खड़ी कर देता है और हम सोचते हैं कि आसमान से गिरे और खजूर में अटके। वास्तविकता यह थी कि हमने सही इलाज नहीं किया और प्राकृतिक चिकित्सा भी रोक दी।

कफ का होना इस बात का संकेत है कि शरीर में मौजूद दूषित पदार्थ को शरीर बाहर करने का प्रयास कर रहा है। यदि दवा द्वारा उसे दबा देंगे तो टी. बी. जैसे भयंकर रोग का भी जन्म हो सकता है। फेफड़ों के लिए यह काम बड़ा हानिकारक सिद्ध हो सकता है। क्योंकि ऐसे में दूषित पदार्थ सीधा रक्त में मिल सकता है।

दूषित पदार्थ को बाहर करने में जीवनी-शक्ति का बहुत योगदान होता है। फिर ऊपर से उम्र भी इस पर अपना वजन रखती है यानी बूढ़े शरीर से दोष को बाहर करना कठिन हो जाता है। पर यदि जीवनी-शक्ति हो तो बड़ी उम्र भी आड़े नहीं आती, समय जरूर ज्यादा लग सकता है। कभी भी रोग को दबाने का प्रयास न करें, हमेशा उसे बाहर करने के सरल और प्राकृतिक उपाय समझें।

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