भारतकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

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विंशोऽध्यायः

(सूर्यपरिक्रमणम्)

नारद उवाच
अथ हेममयस्यास्य मेरोः प्रतिदिशं स्थिताः।
चतुर्णां लोकपालानां पूर्वस्तान्नामभिः शृणु॥१॥

नारद कहते हैं—हेममय इस मेरु के प्रत्येक दिशा में स्थित चार लोकपालों की नगरी विद्यमान है। अब उनके नाम सुनो॥१॥

प्राच्यां दिशि सुमेरोस्तु महेन्द्रस्यामरावती।
दक्षिणे तु पुनर्मेरोर्यमस्य यमनीपुरी॥२॥
प्रतीच्यां तु पुनर्मेरोर्वरुणस्य सुखापुरी।
दिश्युत्तरस्यां मेरोस्तु सोमस्यापि विभापुरी॥३॥
मध्याह्नं मध्यरात्रं च उदयास्तमने तथा।
कुर्वंश्चतुर्षु पार्श्वेषु तपत्येष हि भास्करः॥४॥

सुमेरु के पूर्व की ओर महेन्द्र की अमरावती नगरी विद्यमान है। मेरु के दक्षिण में यमनी नामक यम की पुरी है। मेरु के पश्चिम में वरुण की सुखा नामक पुरी है और मेरु के उत्तर की ओर सोम की विभानामक पुरी स्थित है। उदय तथा अस्तगमन काल में मध्याह्न तथा मध्यरात्र (अर्थात् उदयकाल के दिवाभाग में मध्याह्न तथा अस्तगमनकाल में रात्रि में मध्यरात्र) का सम्पादन करके चारो ओर भास्कर ताप-दान करते हैं॥२-४॥

मध्यगश्चामरावत्यां यदा भवति भास्करः।
वैवस्वते संयमने चोत्तिष्ठन् दृश्यते तदा॥५॥

जब सूर्य अमरावती के मध्यगामी होता है, तब वैवस्वत (सूर्य) संयमनी पुरी से उठते हैं तथा दिखलाई पड़ते हैं॥५॥

सुखायामर्धरात्रं तु विभायामस्तमेति च।
वैवस्वते संयमने मध्यगस्तु रविर्यदा॥६॥
सुखायामथ वारुण्यामुत्तिष्ठन् दृश्यते तदा।
विभायामर्धरात्रं तु माहेन्द्रयामस्तमेति च॥७॥