साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ेंषड्विंशोऽध्यायः
(मगानयनम्)
अथ लब्ध्वरः साम्बः प्राप्तं रूपं पुरातनम्।
मन्यमानस्तदाश्चर्यं प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥१॥
पूर्वाभ्यासेन तेनैव सार्धमन्यैस्तपस्विभिः।
स्नानार्थं नातिदूरस्थां चन्द्रभागां नदीं ययौ ॥२॥
तदनन्तर वर-लाभ करके साम्ब ने पुरातन रूप प्राप्त किया। इसे अत्यन्त आश्चर्य मानकर वे मन ही मन आनन्दित हो गये। पुरानी आदत के कारण वे अन्य तपस्वीगण के साथ स्नान के लिये पास की चन्द्रभागा नदी में गये।।१-२।।
स स्नात्वा सहसैवाथ पश्यतिस्म प्रभावतीम्।
ऊह्यमानां जलौघेन प्रतिमामुन्मुखीं रवेः ॥३॥
उन्होंने स्नान करके हठात् देखा कि जल के स्रोत में सूर्य की प्रभा से युक्त एक उज्ज्वल प्रतिमा प्रतिच्छवित हो रही है।।३।।
स तामुत्तीर्य सलिलादानयित्वा स्वमाश्रमम्।
तस्मिन्मित्रवनोद्देशे स्थापयित्वा विधानतः ॥४॥
वे उस प्रतिमा को जल से निकाल कर अपने आश्रम में लाये और मित्रवन के एक स्थान पर उसे विधानपूर्वक स्थापित किया।।४।।
ततस्तामेव पप्रच्छ प्रणम्य प्रतिमां रवेः।
केनेयं निर्मिता नाथ भवतो ह्याकृतिः शुभा ॥५॥
तदनन्तर उस सूर्यप्रतिमा को प्रणाम करके साम्ब ने पूछा—हे नाथ! आपकी इस शुभ आकृति का निर्माण किसने किया है?।।५।।
प्रतिमा तमुवाचाथ शृणु साम्ब यतस्त्वियम्।
निर्मिता येन चाप्येषा पुरुषेण ममाकृतिः ॥६॥
प्रतिमा ने उत्तर किया—साम्ब! सुनो, जैसे उस प्रतिमा का निर्माण हुआ है और जिस पुरुष ने उसका निर्माण किया है।।६।।
ममातितेजसाविष्टं रूपमासीत् पुरातनम्।
असह्यं सर्वभूतानां ततोऽहं प्रार्थितः सुरैः ॥७॥