साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
पृष्ठ 142, कुल 424 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ | श्रीसाम्बपुराणम्
देवता तथा ब्राह्मण के उद्देश्य से उत्सर्गीकृत वस्तु तथा द्रव्य से जो व्यक्ति लोभवशात् जीविका का निर्वाह करता है, वह पापात्मा परलोक में गृद्धों द्वारा छोड़ी गई जूठन से जीवन धारण करता है॥२४॥
विधिज्ञो ज्ञानवन्तश्च परिचर्याक्षमं तथा।
समाख्यास्यति ते देवस्तस्मात्तं शरणं व्रज॥२५॥
अतएव अन्य कोई ब्राह्मण परिचर्या करे, जो अधिक ज्ञानी तथा सेवा के उपयुक्त हों। इसे देव (सूर्य) तुमसे बतलायेंगे; अतः उनकी शरण में जाओ॥२५॥
नारदेनैवमुक्तस्तु प्रणम्य शिरसा रविम्।
संशयं परिपप्रच्छ कस्ते पूजां करिष्यति॥२६॥
नारद से यह जानकर साम्ब ने रविदेव को मस्तक से प्रणाम करके अपने संशय को व्यक्त किया कि आपकी पूजा कौन करेगा?॥२६॥
विज्ञप्ते त्वथ साम्बेन प्रतिमा तमुवाच ह।
न योग्यः परिचर्यायां जम्बूद्वीपे ममानघ॥२७॥
मम पूजापरा कृत्वा शाकद्वीपादिहानय।
लवणोदात् परे पारे क्षीरोदेन समावृतम्॥२८॥
जम्बूद्वीपात् परं तस्माच्छाकद्वीप इति श्रुतः।
तत्र पुण्या जनपदाश्चातुर्वर्ण्यसमाश्रिताः॥२९॥
साम्ब के ऐसा पूछने पर प्रतिमा (सूर्यप्रतिमा) ने कहा—हे निःष्पाप! जम्बू द्वीप में मेरी परिचर्या करने वाला कोई नहीं है। शाकद्वीप से मेरी पूजा में परायण ब्राह्मण को ले आओ। वह शाकद्वीप लवण समुद्र के पार क्षीरोदक से घिरा है। जम्बूद्वीप के पार शाकद्वीप है, यह सर्वविदित है। वह पवित्र जनपद चातुर्वण्य मनुष्यों द्वारा समावृत है॥२७-२९॥
मगाश्च मामगाश्चैव मानसा मन्दगास्तथा।
मगा ब्राह्मणभूयिष्ठा मामगाः क्षत्रियास्तथा॥३०॥
वैश्यास्तु मानसा ज्ञेयाः शूद्रास्तेषां तु मन्दगाः।
न तेषां संकरः कश्चित् वर्णाश्रमकृतः क्वचित्॥३१॥
वहाँ चार प्रकार के लोग हैं—मग, मामग, मानस तथा मन्दग। मगगण प्रायः ब्राह्मण हैं। मानग क्षत्रिय होते हैं। मानस वैश्य हैं तथा शूद्रगण मन्दग हैं। उनमें वर्णाश्रम-कृत कोई साङ्कर्य नहीं है॥३०-३१॥
धर्मस्याव्यभिचारित्वादेकान्ते सुखिताः प्रजाः।
तेजसश्चास्मदीयस्य निर्मिता वै पुरा मया॥३२॥