भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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६८ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

विश्वामित्रजीका वसिष्ठजीसे श्रीरामको उपदेश करनेके लिये अनुरोध करना और वसिष्ठजीका उसे स्वीकार कर लेना

श्रीविश्वामित्रजी कहते हैं—मुनीश्वरो ! श्रीरामचन्द्रजीने ज्ञातव्य वस्तुको पूर्णतः जान लिया है; क्योंकि इन शुद्ध-बुद्धिवाले श्रीरामको भोग अच्छे नहीं लगते। वे इन्हें रोगके समान प्रतीत होते हैं। जिसने ज्ञेय वस्तुको जान लिया है, उसके मनका अवश्य ही यही लक्षण है कि उसे सारे भोगसमूह फिर कभी रुचिकर नहीं जान पड़ते हैं। भोगोंके चिन्तनसे अज्ञान-जनित बन्धन दृढ़ होता है और भोग-वासनाके शान्त हो जानेपर संसार-बन्धन क्षीण हो जाता है।*

श्रीराम ! विद्वान् लोग भोगवासनाके क्षयको ही मोक्ष कहते हैं और विषयोंमें होनेवाली सुदृढ़ वासनाको ही बन्धन बताते हैं। जिसकी दृष्टि राग आदि दोषोंसे रहित है, वही तत्त्वज्ञ है। उसीने जाननेयोग्य वस्तुको जाना है और वही विद्वान् है। उस महात्मा पुरुषको भोग हठात् अच्छे नहीं लगते। जैसे मरुभूमिमें लता नहीं उगती, उसी प्रकार जबतक जाननेयोग्य तत्त्वका कुछ भी ज्ञान नहीं होता, तबतक मनुष्यके हृदयमें विषयोंकी ओरसे वैराग्य नहीं होता। अतः मुनिवृन्द ! आपलोग यह निश्चितरूपसे समझ लें कि रघुकुलतिलक श्रीरामको ज्ञेय तत्त्वका ज्ञान हो गया है; क्योंकि इन्हें ये भोगोंके रमणीय स्थान आनन्दित नहीं कर रहे हैं। मुनीश्वरो ! श्रीरामचन्द्रजी जिस तत्त्वको बुद्धिके द्वारा जानते हैं, उसके विषयमें जब सद्गुरुके मुखसे यह सुन लेंगे कि 'यही परमार्थ वस्तु है' तब इनके चित्तको अवश्य विश्राम प्राप्त होगा। जैसे शरत्कालकी शोभा मेघरहित निर्मल आकाशमात्रकी अपेक्षा रखती है, उसी तरह श्रीरामचन्द्रजीकी बुद्धिको केवल अद्वितीय सच्चिदानन्दघन परमात्माके तत्त्वमें विश्रामकी अपेक्षा है। अतः महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके चित्तके विश्रामके लिये ये पूज्यपाद श्रीवसिष्ठजी ही यहाँ युक्तिका प्रतिपादन करें; क्योंकि ये समस्त रघुवंशियोंके ही (नहीं, समूचे इक्ष्वाकुवंशियोंके) सदासे प्रभु (नियन्ता एवं शिक्षक) और कुलगुरु हैं। इसके सिवा ये सर्वज्ञ, सर्वसाक्षी तथा तीनों कालोंमें मोह आदिसे रहित निर्मल दृष्टिवाले हैं।

पूज्यपाद वसिष्ठजी ! क्या वह पहलेकी बात आपको स्मरण है, जब कि हम दोनोंके वैरकी शान्ति तथा परम बुद्धिमान् मुनियोंके कल्याणके लिये देवदारुके वृक्षोंसे आवृत्त निषद पर्वतके शिखरपर साक्षात् पद्मयोनि भगवान् ब्रह्माने महत्त्वपूर्ण ज्ञानका उपदेश दिया था ? ब्रह्मन् ! उस युक्तियुक्त ज्ञानसे यह सांसारिक वासना अवश्य उसी तरह नष्ट हो जाती है, जैसे भगवान् भास्करके उदयसे अँधेरी रात। विप्रवर ! आप उसी युक्तियुक्त ज्ञेय वस्तुका


* भोगभावनया याति बन्धो दार्ढ्यमवस्तुजः।
तयोपशान्त्या याति बन्धो जगति तानवम्॥