भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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७०* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

इनमें संसारका भ्रम होता है। यह अविद्यारूपिणी नदी ही है, जिसका कहीं अन्त नहीं है। यह विभिन्न धाराओंके रूपमें फैलती हुई शोभा पाती है। मूढ़ पुरुषोंके लिये यह इतनी विशाल है कि वे इसे पार नहीं कर सकते। सृष्टिरूपी चञ्चल तरङ्गोंसे ही यह तरङ्गवती जान पड़ती है।

श्रीराम ! परमार्थ सत्य (परमात्मा) रूपी विशाल महासागरमें बारंबार वे पुरानी और नयी सृष्टिरूप असंख्य तरङ्गों उठती और विलीन होती रहती हैं। इस समय ब्रह्मकल्पका अवयवभूत बहत्तरवाँ त्रेतायुग चल रहा है। यह पहले भी अनेक बार हो चुका है और आगे भी होता रहेगा। यह वही पहलेवाला त्रेतायुग है और उससे विलक्षण भी। ये जितने लोक हैं, वे भी पूर्ववत् हुए हैं और उनकी अपेक्षा नवीन भी हैं। इसी प्रकार तुम श्रीराम भी अनेक वार त्रेतायुगमें अवतार ले चुके हो और भविष्यमें भी लोगे। मैं भी कितनी ही बार वसिष्ठ-रूपमें उत्पन्न हो चुका हूँ और आगे भी होऊँगा। हमारे ये सभी रूप पूर्वके तुल्य होंगे और उनसे भिन्न भी। इस बातको मै अच्छी तरह जानता हूँ। सभी प्राणी कभी धन-वैभव, बन्धु-बान्धव, अवस्था, कर्म, विद्या, विज्ञान और चेष्टाओंमें पूर्वकल्पोंके समान होते हैं और कभी नहीं भी होते। जो अविद्यारूपी आवरणसे रहित है, जिसका अन्तःकरण एकाग्र हो चुका है, जिसके सभी संकल्प-विकल्प शान्त हो चुके हैं तथा जो स्वरूपभूत सारतत्त्व (सच्चिदानन्दघन)—मय हो गया है, वह विद्वान् पुरुष परम शान्तिरूपी अमृतसे तृप्त रहता है।

सौम्य श्रीराम ! समुद्रकी जलराशि शान्त हो या उत्ताल तरङ्गोंसे युक्त, दोनों दशाओंमें उसकी जलरूपता समान ही है—उसमें किसी प्रकारका अन्तर नहीं है। उसी तरह देहके रहते हुए और उसके न रहनेपर भी मुक्त महात्मा मुनिकी स्थिति एक-सी ही होती है, उसमें कोई भेद नहीं होता है। सदेह मुक्ति हो या विदेहमुक्ति, उसका विषयोंसे कोई सम्बन्ध नहीं है। जिसने सत्य मानकर भोगोंका आस्वादन ही नहीं किया, उस पुरुषमें भोगोंकी अनुभूति कहाँसे होगी? जीवन्मुक्त और विदेहमुक्त दोनों ही प्रकारके महात्मा बोधस्वरूप हैं। उनमें क्या भेद है? (इन दोनोंमें भेद करानेवाला है अज्ञान। उसके नष्ट हो जानेपर जब केवल ज्ञान ही अवशिष्ट रह जाता है, तब उन दोनोंमें भेद कौन हो सकता है !) जैसे समुद्रकी तरङ्गावस्थामें जो जल है, वही उसकी प्रशान्तावस्थामें भी है—उसमें कोई अन्तर नहीं है। सदेह और विदेहमुक्तमें थोड़ा-सा भी भेद नहीं हैं। पवन सस्पन्द (वेगवान्) हो या निष्पन्द (शान्त अथवा वेगहीन), दोनों ही दशाओंमें वह है वायु ही।

अतः अब मैं जिसका प्रकरण चल रहा है, उस उत्तम ज्ञानका ही उपदेश कर रहा हूँ, तुम इसका निरूपण सुनो। यह ज्ञान कानोंका आभूषण है और अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश करनेवाला है। रघुनन्दन ! इस संसारमें सदा अच्छी तरह पुरुषार्थ (प्रयत्न) करनेसे सबको सब कुछ मिल जाता है। (जहाँ कहीं किसीको असफल देखा जाता है, वहाँ उसके सम्यक् प्रयत्नका अभाव ही कारण है।) साधनके परिपक्व होनेपर हृदयमें, जैसे चन्द्रमासे शीतलतायुक्त आह्लाद प्राप्त होता है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप अतिशय शीतल आनन्दका उदय होता है। यह आत्यन्तिक आनन्द पुरुषके प्रयत्नसे ही प्राप्त हो सकता है, अन्य हेतु (प्रारब्ध) से नहीं। (इसलिये पुरुषको प्रयत्नपर ही निर्भर रहना चाहिये।) शास्त्रज्ञ सत्पुरुषोंके बताये हुए मार्गसे चलकर अपने कल्याणके लिये जो मानसिक, वाचिक और कायिक चेष्टा की जाती है, वही पुरुषार्थ है और वही सफल चेष्टा है। उससे भिन्न जो शास्त्र-विपरीत मनमाना आचरण है, वह पागलोंकी-सी चेष्टा है। जो मनुष्य जिस पदार्थको पाना चाहता है, उसकी