संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
| ७० | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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इनमें संसारका भ्रम होता है। यह अविद्यारूपिणी नदी ही है, जिसका कहीं अन्त नहीं है। यह विभिन्न धाराओंके रूपमें फैलती हुई शोभा पाती है। मूढ़ पुरुषोंके लिये यह इतनी विशाल है कि वे इसे पार नहीं कर सकते। सृष्टिरूपी चञ्चल तरङ्गोंसे ही यह तरङ्गवती जान पड़ती है।
श्रीराम ! परमार्थ सत्य (परमात्मा) रूपी विशाल महासागरमें बारंबार वे पुरानी और नयी सृष्टिरूप असंख्य तरङ्गों उठती और विलीन होती रहती हैं। इस समय ब्रह्मकल्पका अवयवभूत बहत्तरवाँ त्रेतायुग चल रहा है। यह पहले भी अनेक बार हो चुका है और आगे भी होता रहेगा। यह वही पहलेवाला त्रेतायुग है और उससे विलक्षण भी। ये जितने लोक हैं, वे भी पूर्ववत् हुए हैं और उनकी अपेक्षा नवीन भी हैं। इसी प्रकार तुम श्रीराम भी अनेक वार त्रेतायुगमें अवतार ले चुके हो और भविष्यमें भी लोगे। मैं भी कितनी ही बार वसिष्ठ-रूपमें उत्पन्न हो चुका हूँ और आगे भी होऊँगा। हमारे ये सभी रूप पूर्वके तुल्य होंगे और उनसे भिन्न भी। इस बातको मै अच्छी तरह जानता हूँ। सभी प्राणी कभी धन-वैभव, बन्धु-बान्धव, अवस्था, कर्म, विद्या, विज्ञान और चेष्टाओंमें पूर्वकल्पोंके समान होते हैं और कभी नहीं भी होते। जो अविद्यारूपी आवरणसे रहित है, जिसका अन्तःकरण एकाग्र हो चुका है, जिसके सभी संकल्प-विकल्प शान्त हो चुके हैं तथा जो स्वरूपभूत सारतत्त्व (सच्चिदानन्दघन)—मय हो गया है, वह विद्वान् पुरुष परम शान्तिरूपी अमृतसे तृप्त रहता है।
सौम्य श्रीराम ! समुद्रकी जलराशि शान्त हो या उत्ताल तरङ्गोंसे युक्त, दोनों दशाओंमें उसकी जलरूपता समान ही है—उसमें किसी प्रकारका अन्तर नहीं है। उसी तरह देहके रहते हुए और उसके न रहनेपर भी मुक्त महात्मा मुनिकी स्थिति एक-सी ही होती है, उसमें कोई भेद नहीं होता है। सदेह मुक्ति हो या विदेहमुक्ति, उसका विषयोंसे कोई सम्बन्ध नहीं है। जिसने सत्य मानकर भोगोंका आस्वादन ही नहीं किया, उस पुरुषमें भोगोंकी अनुभूति कहाँसे होगी? जीवन्मुक्त और विदेहमुक्त दोनों ही प्रकारके महात्मा बोधस्वरूप हैं। उनमें क्या भेद है? (इन दोनोंमें भेद करानेवाला है अज्ञान। उसके नष्ट हो जानेपर जब केवल ज्ञान ही अवशिष्ट रह जाता है, तब उन दोनोंमें भेद कौन हो सकता है !) जैसे समुद्रकी तरङ्गावस्थामें जो जल है, वही उसकी प्रशान्तावस्थामें भी है—उसमें कोई अन्तर नहीं है। सदेह और विदेहमुक्तमें थोड़ा-सा भी भेद नहीं हैं। पवन सस्पन्द (वेगवान्) हो या निष्पन्द (शान्त अथवा वेगहीन), दोनों ही दशाओंमें वह है वायु ही।
अतः अब मैं जिसका प्रकरण चल रहा है, उस उत्तम ज्ञानका ही उपदेश कर रहा हूँ, तुम इसका निरूपण सुनो। यह ज्ञान कानोंका आभूषण है और अज्ञानरूपी अन्धकारका नाश करनेवाला है। रघुनन्दन ! इस संसारमें सदा अच्छी तरह पुरुषार्थ (प्रयत्न) करनेसे सबको सब कुछ मिल जाता है। (जहाँ कहीं किसीको असफल देखा जाता है, वहाँ उसके सम्यक् प्रयत्नका अभाव ही कारण है।) साधनके परिपक्व होनेपर हृदयमें, जैसे चन्द्रमासे शीतलतायुक्त आह्लाद प्राप्त होता है, उसी प्रकार सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप अतिशय शीतल आनन्दका उदय होता है। यह आत्यन्तिक आनन्द पुरुषके प्रयत्नसे ही प्राप्त हो सकता है, अन्य हेतु (प्रारब्ध) से नहीं। (इसलिये पुरुषको प्रयत्नपर ही निर्भर रहना चाहिये।) शास्त्रज्ञ सत्पुरुषोंके बताये हुए मार्गसे चलकर अपने कल्याणके लिये जो मानसिक, वाचिक और कायिक चेष्टा की जाती है, वही पुरुषार्थ है और वही सफल चेष्टा है। उससे भिन्न जो शास्त्र-विपरीत मनमाना आचरण है, वह पागलोंकी-सी चेष्टा है। जो मनुष्य जिस पदार्थको पाना चाहता है, उसकी
५—ऐहिक पुरुषार्थकी श्रेष्ठता और दैववादका निराकरण
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * शास्त्रके अनुसार सत्कर्म करनेकी प्रेरणा तथा पौरुषकी प्रधानताका प्रतिपादन * ७१
प्राप्तिके लिये यदि वह क्रमशः यत्न करता है और बीचमें ही उससे मुँह नहीं मोड़ लेता तो अवश्य उसे प्राप्त कर लेता है। कोई एक विशेष प्राणी ही पुरुषोचित प्रयत्नके द्वारा तीनों लोकोंके ऐश्वर्यसे युक्त होनेके कारण परम सुन्दर प्रतीत होनेवाली इन्द्रपदवीको प्राप्त हो गया है। निरन्तर यत्नमें लगे रहकर सुदृढ़ अभ्यासमें तत्पर हुए बुद्धिमान् और साहसी पुरुष मेरुपर्वतको भी निगल जानेकी शक्ति प्राप्त कर लेते हैं। श्रुति-स्मृति आदि शास्त्रसे नियन्त्रित पुरुषार्थके सम्पादनमें तत्पर जो पुरुषका पौरुष (उद्योग) है, वही मनोवाञ्छित फलकी सिद्धिका कारण होता है। शास्त्रके विपरीत किया हुआ प्रयत्न अनर्थकी ही प्राप्ति करानेवाला होता है। कोई पुरुष जब शास्त्रीय प्रयत्नको शिथिल कर देता है, तब स्वयं दरिद्रता, रोग और बन्धन आदि अपनी दुर्दशाके कारण वह ऐसी अवस्थामें पहुँच जाता है, जहाँ उसके लिये पानीकी एक बूँद भी बहुत समझी जाती है। (दुर्लभ हो जाती है); परंतु किसीको शास्त्रानुसार आचरणके प्रभावसे ऐसी उत्तम अवस्था प्राप्त होती है, जहाँ समुद्र, पर्वत, नगर और द्वीपोंसे व्याप्त विशाल भूमण्डलका साम्राज्य भी अधिक नहीं समझा जाता (वह अनायास सुलभ हो जाता है)।
(सर्ग ३-४)
शास्त्रके अनुसार सत्कर्म करनेकी प्रेरणा, पुरुषार्थसे भिन्न प्रारब्धवादका खण्डन तथा पौरुषकी प्रधानताका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जैसे नीले, पीले आदि भिन्न-भिन्न रंगोंकी अभिव्यक्तिमें प्रकाश ही मुख्य कारण है, उसी प्रकार शास्त्रके अनुसार मन, वाणी और शरीरद्वारा व्यवहार करनेवाले अधिकारी पुरुषोंके समस्त पुरुषार्थोंकी सिद्धिमें उत्साहपूर्वक प्रवृत्ति ही प्रधान साधन है। मनुष्य केवल मनसे किसी वस्तुकी इच्छा करता है, शास्त्रानुसार कर्मसे नहीं, वह पागलोंकी-सी चेष्टा करता है। उसकी वह चेष्टा केवल मोहमें डालनेवाली है, पुरुषार्थको सिद्ध करनेवाली नहीं। जो मनुष्य जैसा प्रयत्न (कर्म) करता है, वह वैसा ही फल भोगता है, (जो यह कहते हैं कि दैववश फलमें विपरीतता भी आ जाती है तो उनका कथन ठीक नहीं; क्योंकि) अपना पूर्वकृत कर्म ही फल देनेके लिये उन्मुख होनेपर दैव कहलाता है। उससे अतिरिक्त दैव नामकी कोई वस्तु नहीं दिखायी देती। पुरुषार्थ दो प्रकारका है—एक शास्त्रानुमोदित (पुण्य-कर्म) और दूसरा शास्त्रविरुद्ध (पाप-कर्म)। इन दोनोंमें जो शास्त्रविरुद्ध पुरुषार्थ है, वह अनर्थका कारण होता है और शास्त्रानुमोदित पौरुष परमार्थ वस्तुकी प्राप्तिमें कारण है। इसलिये पुरुषको शास्त्रीय प्रयत्नसे तथा साधु पुरुषोंके सङ्गसे ऐसा उद्योग करना चाहिये कि इस जन्मका पौरुष पूर्वजन्मके पौरुष (प्रारब्ध) को शीघ्र जीत ले। अपने उत्तम पुरुषार्थका आश्रय लेकर दाँतोंसे दाँतोंको पीसते हुए (तत्परतापूर्वक प्रयत्नमें लगे हुए) पुरुषको अपने शुभ पौरुषके द्वारा विघ्न करनेके लिये उद्यत पूर्वजन्मके अशुभ पौरुषको जीत लेना चाहिये। 'यह पूर्व जन्मका पुरुषार्थ (प्रारब्ध) मुझे प्रेरित करके विशेष परिस्थितिमें डाल देता है, इस प्रकारकी बुद्धिको बलपूर्वक कुचल डालना चाहिये; क्योंकि वह प्रत्यक्ष प्रयत्नसे अधिक प्रबल नहीं है। तबतक प्रयत्नपूर्वक उत्तम पुरुषार्थके लिये सचेष्ट रहना चाहिये, जबतक कि पूर्वजन्मका अशुभ पौरुष स्वयं पूर्णतः शान्त न हो जाय। अर्थात् जबतक पहले जन्मोंका किया हुआ अशुभ कर्म समूल नष्ट न हो जाय, तबतक तत्परतासे उत्साहपूर्वक साधन करते रहना चाहिये।
जैसे अपने द्वारा कल घटित हुए दोषका आज
६—विविध युक्तियोंद्वारा दैवकी दुर्बलता और पुरुषार्थकी प्रधानताका समर्थन
७२ | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
प्रायश्चित्त कर लेनेपर नाश हो जाता है, उसी प्रकार इस जन्मके गुणोंसे ( शुभ पौरुषसे ) पूर्व-जन्मका दोष ( अशुभ पौरुष ) अवश्य नष्ट हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। पूर्वजन्मके अशुभ या दुःखदायक प्रारब्धको इस जन्मके शुभ कर्मोंसे विशुद्ध एवं पुष्ट हुई बुद्धिके द्वारा तिरस्कृत करके संसार-सागरसे पार होनेके उद्देश्यकी सिद्धिके लिये अपने भीतर दैवी सम्पत्तिके संग्रहके निमित्त सदा यत्न करना चाहिये। उद्योगशून्य आलसी मनुष्य गदहोंके समान गये-बीते हैं। अतः स्वयं भी उद्योग छोड़कर उन्हींकी श्रेणी या तुलनामें नहीं जाना चाहिये। शास्त्रके अनुसार किया हुआ उद्योग इहलोक और परलोक दोनोंकी सिद्धिमें कारण है। मनुष्यको पुरुषार्थरूपी प्रयत्नका आश्रय लेकर इस संसाररूपी गड्ढेसे स्वयं बलपूर्वक निकल जाना चाहिये। अपने शरीरको प्रतिदिन नाश होता हुआ समझे। पशुओं-के समान आचरणका त्याग करे और सत्पुरुषोंके योग्य आचार-व्यवहारका आश्रय ले। जैसे कीड़ा घावमें पीब आदिका आस्वादन करके ही अपना जीवन समाप्त कर देता है, उसी तरह मनुष्यको घरमें स्त्री, अन्न, पान आदि द्रव्ययुक्त एवं कोमल तुच्छ पदार्थोंका किंचित् आस्वाद लेकर सम्पूर्ण पुरुषार्थोंके साधनभूत आयुको भस्म नहीं कर देना चाहिये (मानव-जीवनको व्यर्थ नहीं गवाँ देना चाहिये)। शुभ पुरुषार्थसे शीघ्र ही शुभ फलकी प्राप्ति होती है और अशुभ पुरुषार्थसे सदा अशुभ फल ही मिलता है। इन शुभ-अशुभ पुरुषार्थोंके सिवा दैव नामकी दूसरी कोई वस्तु नहीं है (इन्हींका नाम दैव या प्रारब्ध है)। इसलिये पहले पुरुषार्थके द्वारा विवेकका आश्रय लेकर आत्मज्ञानरूपी महान् प्रयोजनवाले शास्त्रोंका विचार करना चाहिये। जो शास्त्रके अनुसार अपनी श्रवण, मनन आदि चेष्टाओंके द्वारा साधन नहीं करते और चित्तमें विषयोंका ही चिन्तन करते रहते हैं, उन मूढ़ पुरुषोंकी अत्यन्त दूषित भोगेच्छाको धिक्कार है। पूर्वोक्त पुरुषप्रयत्न यदि सत्-शास्त्रके अनुकूल तथा सत्सङ्ग और सदाचारसे युक्त होता है तो वह परमात्मसाक्षात्काररूप अपने फलको देता है। यह उसका स्वभाव है। अन्यथा (सत्-शास्त्रके प्रतिकूल तथा सत्सङ्ग और सदाचारसे रहित होनेपर) उससे परमात्म-साक्षात्काररूप परम फलकी सिद्धि नहीं होती। यही पौरुषका स्वरूप है। इस प्रकार व्यवहार करनेवाले किसी भी पुरुषका प्रयत्न कभी विफल नहीं होता। बाल्यावस्था-से लेकर भलीभाँति अभ्यासमें लाये हुए सत्-शास्त्रानुशीलन और सत्पुरुषोंके सङ्ग आदि सद्गुणोंद्वारा पुरुषार्थ करनेसे परम स्वार्थरूप परमात्मसाक्षात्कार प्राप्त होता है। इस प्रकार प्रत्यक्ष देखी हुई, अनुभवमें आयी हुई, सुनी हुई और साधनोंद्वारा प्राप्त की हुई परमार्थ वस्तुको जो लोग दैवके अधीन मानते हैं, उनकी बुद्धि कुत्सित है और वे साधनसे नष्ट-भ्रष्ट हो गये हैं। निरन्तर कल्पित क्रीड़ाओं (खेल-कूद) के कारण अत्यन्त चञ्चलतापूर्ण बाल्यावस्थाके व्यतीत हो जानेपर जब (दुखी और गुरुजनोंकी सेवामें समर्थ) बाहुदण्डसे अलंकृत यौवन-अवस्थाका आरम्भ हो जाय, तभीसे मनुष्यको पद-पदार्थके ज्ञानसे विशुद्ध-बुद्धि होकर सत्पुरुषोंके सङ्गसे अपने गुणों और दोषोंका विचार करना चाहिये। तात्पर्य यह कि विचारपूर्वक दोषोंको त्याग करके गुणोंको ग्रहण करना चाहिये।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं—भरद्वाज! मुनिवर वसिष्ठजीके इस प्रकार प्रवचन करनेपर वह दिन व्यतीत हो गया। सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये तथा उस सभाके लोग वसिष्ठजीको नमस्कार करके सायंकालिक कृत्य (संध्योपासना और अग्निहोत्र आदि) करनेके लिये चले गये और रात्रि व्यतीत होनेपर पुनः सूर्यदेवकी किरणोंके साथ ही उस सभाभवनमें आ गये। (सर्ग ५)
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * ऐहिक पुरुषार्थकी श्रेष्ठता और दैववादका निराकरण * ७३
ऐहिक पुरुषार्थकी श्रेष्ठता और दैववादका निराकरण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! पूर्वजन्मके पौरुषसे भिन्न दैव कोई वस्तु नहीं है ( पूर्वजन्मोंका पुरुषार्थ ही दैव है ) । इसलिये 'मैं दैवके अधीन हूँ, कर्म करनेमें स्वतन्त्र नहीं हूँ' ऐसी बुद्धि या विचारधाराको सत्सङ्ग तथा सत्-शास्त्रके अभ्यासद्वारा मनसे दूर करके जीवात्माका इस संसार सागरसे बलपूर्वक उद्धार करे ( आलस्यवश सत्कर्म अथवा साधन कभी नहीं छोड़े ) । जैसे-जैसे प्रयत्न होगा, वैसे-ही-वैसे शीघ्रतापूर्वक फल प्राप्त होगा। इसीका नाम पौरुष है । पूर्वजन्मके उस पौरुषको ही कोई दैवकी संज्ञा देना चाहे तो दे सकता है । जो तुच्छ विषय-सुखोंके क्षणिक लोभमें फँसकर उस पूर्वकृत पौरुष या दैवको वर्तमान जन्मके पुरुषार्थद्वारा जीतनेका प्रयत्न नहीं करते और सदा दैवके भरोसे बैठे रहते हैं, वे दीन, पामर और मूढ़ हैं ( क्योंकि पुरुषार्थके बिना आत्म-कल्याण सिद्ध नहीं होता ) । पूर्वजन्मके तथा इस जन्मके पुरुषार्थ (कर्म) दो मेढ़ोंकी तरह आपसमें लड़ते हैं । उनमें जो भी बलवान् होता है, वही दूसरेको क्षणभरमें पछाड़ देता है* । इस जन्ममें किया गया प्रबल पुरुषार्थ अपने बलसे पूर्वजन्मके पौरुष या दैवको नष्ट कर देता है और पूर्वजन्मका प्रबल पौरुष इस जन्मके पुरुषार्थको अपने बलसे दबा देता है । पूर्वकृत कर्मोंके फलरूप प्रारब्ध
* जैसे पूर्वजन्मके किसी प्रतिबन्धक कर्मके कारण किसी मनुष्यको पुत्रकी प्राप्ति नहीं होनेवाली है; परन्तु यदि वह पुत्र-प्राप्तिके लिये शास्त्रीय विधानके साथ पुत्रेष्टि-यज्ञ अथवा उसी कोटिके दूसरे किसी सत्कर्मका अनुष्ठान करता है तो उसे पुत्रकी प्राप्ति हो जाती है । यहाँ पूर्वजन्मके प्रतिबन्धक कर्मसे इस जन्मका पुरुषार्थ अधिक बलवान् होनेके कारण नवीन प्रारब्धका निर्माण करके विजयी हो जाता है । इसी प्रकार पूर्वजन्मके कर्मानुसार यदि किसीकी मृत्यु अवश्यम्भावी है तो उसके प्रतीकारके लिये अनेक प्रकारके उपाय करनेपर भी मनुष्य उसे टाल नहीं पाता । अतः यहाँ पूर्वकृत कर्म ( दैव या प्रारब्ध ) ही प्रबल होनेके कारण विजयी होता है ।
और वर्तमान जन्मके पुरुषार्थ--इन दोनोंमें वर्तमान जन्मका पुरुषार्थ ही प्रत्यक्षतः बलवान् है, इसलिये अधिकारी मनुष्यको पुरुषार्थका सहारा लेकर सत्-शास्त्रोंके अभ्यास और सत्सङ्गद्वारा बुद्धिको निर्मल बनाकर संसार-सागरसे अपना उद्धार कर लेना चाहिये । इस जन्मके और पूर्व-जन्मके दोनों पुरुषार्थ पुरुषरूपी वनमें उत्पन्न हुए फल देनेवाले वृक्ष हैं । उन दोनोंमें जो अधिक बलवान् होता है, वही विजयी होता है (अर्थात् धर्माचरण और मुक्तिके विषयमें तो इस जन्मका पुरुषार्थ बलवान् है और अर्थ एवं कामके विषयमें पूर्वजन्मका फलदानोन्मुख कर्म या दैव प्रबल है । )
जो पुरुष उदार स्वभावसे युक्त एवं सत्कर्मके लिये प्रयत्न करनेमें कुशल है, सदाचार ही जिसका लीला-विहार है, वह जगत्के मोहरूपी फंदेसे उसी प्रकार निकल जाता है, जैसे सिंह पिंजड़ेसे । जो मनुष्य दृष्ट (पुरुषार्थ या परम कल्याणके लिये प्रयत्न) का त्याग करके 'मुझे तो कोई ऐसा करनेके लिये प्रेरित कर रहा है,' ऐसी अनर्थकारिणी कुत्सित कल्पनामें स्थित हैं, उसे दूरसे ही त्याग देना चाहिये; क्योंकि वह मनुष्योंमें अधम हैं । संसारमें सहस्रों व्यवहार हैं, जो आते-जाते रहते हैं । उनमें सुख और दुःख बुद्धि (अनुकूलता तथा प्रतिकूलताजनित राग-द्वेष) का त्याग करके शास्त्रके अनुसार आचरण करना चाहिये । शास्त्रके अनुकूल और कभी उच्छिन्न न होनेवाली अपनी मर्यादाका जो त्याग नहीं करता, उस पुरुषको सारी अभीष्ट वस्तुएँ उसी प्रकार प्राप्त होती हैं, जैसे सागरमें गोता लगानेवालेको रत्न । सुखकी प्राप्ति और दुःखकी निवृत्ति—यही मनुष्यका स्वार्थ है । उस स्वार्थकी प्राप्ति करानेवाले जो आवश्यक कर्तव्य या साधन हैं, एकमात्र उन्हींमें तत्पर रहनेको ही विद्वान् लोग पौरुष कहते हैं । वह तत्परता यदि शास्त्रसे नियन्त्रित हो तो परम पुरुषार्थकी
७—पुरुषार्थकी प्रबलता बताते हुए दैवके स्वरूपका विवेचन तथा शुभ वासनासे युक्त होकर सत्कर्म करनेकी प्रेरणा
७४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
प्राप्ति करानेवाली होती है। कर्तव्यपालनके लिये जो शरीर आदिका संचालन होता है, वही जिसका धर्म है, उस क्रिया (श्रवण-मनन आदि साधन) से, सत्सङ्गसे और सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायसे शुद्ध एवं तेज की हुई अपनी बुद्धिके द्वारा जो स्वयं ही आत्माका उद्धार किया जाता है, वही परम स्वार्थकी सिद्धि है। विद्वान्लोग अन्तरहित, समतारूप परमानन्दसे पूर्ण परमार्थ वस्तु (परब्रह्म) को जानते हैं। जिन साधनोंसे उसकी प्राप्ति होती है, उनका नित्य-निरन्तर सेवन करना चाहिये। वे साधन हैं शास्त्रोंका स्वाध्याय और सत्सङ्ग आदि। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक आत्म-कल्याणके साधनमें संलग्न होता है, उसे अपने पुरुषार्थसे ही हाथपर रखे हुए आँवलेकी भाँति वह अभीष्ट फल प्रत्यक्ष दिखायी देता है। जो इस प्रत्यक्ष पुरुषार्थको छोड़कर दैवरूपी मोहमें निमग्न होता है, वह मूढ़ है।
अतः शुभाशय श्रीराम ! अपनी कोरी कल्पनाके बलसे उत्पन्न, मिथ्याभूत तथा सम्पूर्ण कारण और कार्यसे रहित दैवकी अपेक्षा न रखकर आत्मकल्याणके लिये अपने उत्तम पुरुषार्थका आश्रय लो। शास्त्रोंद्वारा तथा महापुरुषोंके सदाचारसे विस्तारको प्राप्त हुए विविध देश धर्मोंद्वारा समर्थित जो परमात्माकी प्राप्तिरूप अतिशय प्रसिद्ध फल है, उसके लिये हृदयमें अत्यन्त उत्कट अभिलाषा होनेपर उसकी प्राप्तिके लिये चित्तमें स्पन्दन या चेष्टा होती है। तत्पश्चात् इन्द्रियों और हाथ-पैर आदि अङ्गोंमें क्रिया होती है—इनके द्वारा श्रवण-मनन आदि एवं यम-नियमादि साधनोंका आरम्भ होता है, इसीको उत्तम पुरुषार्थ कहते हैं। अधिकारी पुरुषका जन्म पुरुषार्थके सिद्ध होनेपर ही सफल होता है, अन्यथा नहीं—ऐसा जानकर सदा आत्मकल्याणके प्रयत्नमें ही संलग्न रहना चाहिये। तत्पश्चात् साधनविषयक उस तत्परताको सत्-शास्त्रोंके अभ्यास एवं संत-महात्माओं तथा ज्ञानी पुरुषोंके सेवनद्वारा आत्मज्ञानरूप फलकी प्राप्तिसे सफल बनाना चाहिये। आत्मकल्याणके विषयमें यदि परम पुरुषार्थका आश्रय लिया जाय तो वह अवश्य दैवको जीत लेता है, ऐसी धारणा रखकर दैव और पौरुषके बलाबलका विचार करनेके कारण जो परम सुन्दर प्रतीत होते हैं तथा जिनमें शम, दम आदि साधन भी विद्यमान हैं एवं श्रेष्ठ पुरुषोंकी सेवासे जिनका अन्त करण सदा भावित रहता है, ऐसे अधिकारी पुरुषोंको तत्त्वज्ञानकी प्राप्तिके लिये अवश्य उद्यम करना चाहिये। इस जन्ममें सम्पादन करनेयोग्य स्वाभाविक प्रयत्न ही परम पुरुषार्थकी सिद्धिका हेतु है, ऐसा निश्चितरूपसे जानकर यह अधिकारी जीव नित्य संतुष्ट एवं उत्तम ज्ञानीजनोंकी सेवारूप अमोघ, मधुर और उत्कृष्ट औषधसे जन्म मरणकी परम्परारूप भवरोगको शान्त करे। (सर्ग ६)
विविध युक्तियोंद्वारा दैवकी दुर्बलता और पुरुषार्थकी प्रधानताका समर्थन
जो लोग उद्योगका त्याग करके केवल दैवके भरोसे बैठे रहते हैं, वे आलसी मनुष्य स्वयं ही अपने शत्रु हैं। वे अपने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थोंका नाश कर डालते हैं।* बुद्धि, मन और कर्मेन्द्रियोंके द्वारा की जानेवाली चेष्टाएँ पौरुषके रूप हैं। इन्हींसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है। साक्षी चेतनमें पहले जैसी विषयकी अनुभूति होती है, मन वैसी ही चेष्टा करता है। मनके व्यापारके अनुसार शरीर चलता है—शारीरिक क्रिया होती है और उसके अनुसार ही फलकी सिद्धि होती है। लोकमें जहाँ-जहाँ जैसे-जैसे पुरुषार्थकी आवश्यकता होती है, वहाँ-वहाँ वैसे-ही-वैसे पौरुषके उपयोगसे तदनुरूप लौकिक या वैदिक फलकी सिद्धि होती है। पुरुषार्थसे ही बृहस्पति देवताओंके गुरु बने हुए हैं और पुरुषार्थसे शुक्राचार्यने दैत्यराजोंके गुरुका पद प्राप्त किया
* ये समुद्योगमुत्सृज्य स्थिता दैवपरायणाः।
ते धर्ममर्थं कामं च नाशयन्त्यात्मविद्विषः॥
(मुमुक्षु० ७। ३)
८—श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन, ज्ञानप्राप्तिका विस्तार, श्रीरामजीके वैराग्यकी प्रशंसा, वक्ता और प्रश्नकर्ताके लक्षण आदिका विशेषरूपसे वर्णन
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * विविध युक्तियोंद्वारा दैवकी दुर्बलता और पुरुषार्थकी प्रधानताका समर्थन * ७५
है । जो नाना प्रकारके आश्चर्यजनक वैभवके आश्रय ( अधिपति ) थे और वैभवभोगकी दृष्टिसे महान् समझे जाते थे, ऐसे पुरुष भी अपने दोषयुक्त पौरुष (पापाचरण) से ही नरकोंके अतिथि हुए हैं—उच्च पदवीसे भ्रष्ट हो गये हैं । सहस्रों सम्पदाओं और हजारों विपत्तियोंसे पूर्ण नाना प्रकारकी अनुकूल-प्रतिकूल दशाओंमें पड़े हुए विभिन्न जातियोंके प्राणी अपने पुरुषार्थसे ही उन्हें लाँघकर कल्याणके मार्गपर अग्रसर होते हैं । शास्त्रोंके अभ्यास, गुरुके उपदेश और अपने प्रयत्न—इन तीनोंसे ही सर्वत्र पुरुषार्थकी सिद्धि देखी जाती है । कल्याणकामी पुरुष अशुभ कर्मोंमें लगे हुए मनको वहाँसे हटाकर प्रयत्नपूर्वक शुभ कर्मोंमें ही लगाये । यही सम्पूर्ण शास्त्रोंके सारांशका संग्रह है । वत्स ! जो वस्तु कल्याणकारी है, जो तुच्छ नहीं ( सबसे उत्कृष्ट ) है तथा जिसका कभी विनाश नहीं होता, उसीका यत्नपूर्वक आचरण करो । यही सब गुरुजन उपदेश देते हैं । पौरुषसे ही अभीष्ट वस्तुकी सिद्धि होती देखी जाती है । पौरुषसे ही बुद्धिमानोंकी कल्याणमार्गमें प्रगति होती है । दैव तो दुःख-सागरमें डूबे हुए कोमल एवं दुर्बल चित्तवाले लोगोंके लिये आश्वासनमात्र है ।
लोकमें प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंद्वारा पुरुषका प्रयत्न सदा सफल होता देखा जाता है । पुरुष अपने पौरुषसे ही देशान्तरमें आता-जाता है । उत्तम बुद्धिवाले मनुष्य पौरुषसे ही उन भीषण संकटोंसे अनायास पार हो जाते हैं, जिनसे पार पाना अत्यन्त कठिन होता है । यह जो व्यर्थ दैवकी कल्पना की गयी है, उसके भरोसे वे संकटोंसे पार नहीं होते । जो मनुष्य जैसा प्रयत्न करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है । इस जगत्में चुपचाप बैठे रहनेवाले किसी भी मनुष्यको अभीष्ट फलकी प्राप्ति नहीं होती । श्रीराम ! शुभ पुरुषार्थसे शुभ फल प्राप्त होता है और अशुभ पुरुषार्थसे अशुभ । अतः तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसा करो । अपने परम अभीष्ट वस्तुको प्राप्त करानेवाले एकमात्र कार्यके प्रयत्नमें जो तत्पर हो जाना है, उसीको विद्वान् पुरुष पौरुष कहते हैं । उस तत्परतासे ही सब कुछ प्राप्त किया जाता है । अपने पैरोंद्वारा एक स्थानसे दूसरे स्थानमें जाना, हाथका किसी द्रव्यको धारण करना तथा दूसरे-दूसरे अङ्गोंका तदनुकूल व्यापारमें प्रवृत्त होना—यह सब पुरुषार्थसे ही सम्भव होता है, दैवसे नहीं । अनर्थकी प्राप्ति करानेवाले एकमात्र कार्यके प्रयत्नमें जो तत्पर होना है, उसे विद्वानोंने पागलोंकी-सी चेष्टा बतायी है । उससे कोई भी शुभ फल नहीं प्राप्त होता ( अशुभ फलकी ही प्राप्ति होती है )। कर्तव्य-पालनके लिये जो शरीर आदिका संचालन होता है, वही जिसका धर्म है, उस क्रियासे, सत्सङ्गसे और सत्-शास्त्रोंके स्वाध्यायसे शुद्ध एवं तेज की हुई अपनी बुद्धिके द्वारा जो स्वयं ही आत्माका उद्धार किया जाता है, वही परम स्वार्थकी सिद्धि है । विद्वान्लोग अनन्त, समतारूप परमानन्दसे पूर्ण अपने परम प्राप्य अर्थ (परब्रह्म परमात्मा) को जानते हैं । जिन साधनोंसे उसकी प्राप्ति होती है, उन्होंका नित्य-निरन्तर सेवन करना चाहिये । वे साधन हैं शास्त्रोंके स्वाध्याय और सत्सङ्ग आदि । जैसे शरत्कालमें सरोवर और कमल एक दूसरेकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार सद्बुद्धिसे सत्-शास्त्रोंका अभ्यास और सत्सङ्गरूपी गुण विकसित होता है तथा सत्-शास्त्रोंके स्वाध्याय और सत्सङ्गरूपी गुणसे सद्बुद्धिकी वृद्धि होती है । चिरकालके अभ्याससे ये दोनों एक दूसरेके वर्धक और पोषक होते हैं । बाल्यावस्थासे ही पूर्णतः अभ्यासमें लाये गये शास्त्र और सत्सङ्ग आदि गुणोंसे पौरुषद्वारा अपना हितकारी कार्य सिद्ध होता है । ( सर्ग ७ )
सं० यो० व० अं० ४-
७६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
पुरुषार्थकी प्रबलता बताते हुए दैवके स्वरूपका विवेचन तथा शुभ वासनासे युक्त होकर सत्कर्म करनेकी प्रेरणा
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! बताओ तो सही, इस लोकमें जो शूरवीर, पराक्रमी, बुद्धिमान् और पण्डित हैं, वे किस दैवकी प्रतीक्षा करते हैं ? इन महामुनि विश्वामित्रजीने दैवको दूरसे ही त्यागकर पौरुषसे ही ब्राह्मणत्व प्राप्त किया है, और किसी साधनसे नहीं। हमने तथा दूसरे-दूसरे पुरुषोंने, जो इस समय मुनि-पदवीको प्राप्त हैं, चिरकालतक किये गये पौरुषसे ही आकाशमें विचरण करनेकी शक्ति प्राप्त की है। हिरण्यकशिपु आदि दानवेन्द्रोंने पुरुषोचित प्रयत्नसे ही देवसमुदायको दूर भगाकर त्रिलोकीका साम्राज्य प्राप्त किया था। फिर इन्द्र आदि देवेश्वरोंने पुरुषोचित प्रयत्नसे ही शत्रुसेनाको छिन्न-भिन्न एवं जर्जर करके दानवोंसे बलपूर्वक इस विशाल जगत्का राज्य छीन लिया था।
श्रीरामने पूछा—भगवन् ! आप सब धर्मोंके ज्ञाता हैं। ब्रह्मन् ! लोकमें जो बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका है, वह दैव क्या है ? किसे दैव कहते हैं, यह बताइये।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—रघुनन्दन ! अवश्यम्भावी फलसे सुशोभित होनेवाले पुरुषार्थके द्वारा प्राप्त हुए फलका जो शुभ और अशुभ भोग है, उसीको 'दैव' शब्दसे कहा जाता है। अथवा पौरुषद्वारा इष्ट और अनिष्ट कर्मका जो प्रिय और अप्रियरूप फल प्राप्त होता है, उसीको 'दैव' नाम दिया गया है। एकमात्र पुरुषार्थसे सिद्ध होनेवाला जो अवश्यम्भावी फल है, वही इस जनसमुदायमें 'दैव' शब्दसे प्रतिपादित होता है। सिद्ध पुरुषार्थके शुभ और अशुभ फलका उदय होनेपर जो यह कहा जाता है कि 'यह इसी रूपमें मिलनेवाला था—यही होनहार थी,' इसीको 'दैव' कहते हैं। कर्मफलकी प्राप्ति होनेपर जो यह कहा जाता है कि 'ऐसी ही मेरी बुद्धि हुई थी, ऐसा ही मेरा निश्चय था,' इसीका नाम 'दैव' है। इष्ट और अनिष्ट फलके प्राप्त होनेपर जो आश्वासनमात्रके लिये यह कहा जाता है कि 'मेरा पूर्वजन्मका कर्म ही ऐसा था' इस तरहकी भावनाको व्यक्त करनेवाला वचन ही 'दैव' कहलाता है।
श्रीराम ! मनुष्योंके मनमें पहले जो अनेक प्रकारकी वासनाएँ थीं, वे ही इस समय कायिक, वाचिक, कर्म-रूपमें परिणत हुई हैं। जीवमें जिस प्रकारकी वासना होती है, वह शीघ्र वैसा ही कर्म करता है। मनमें वासना और हो और वह कर्म किसी और ही प्रकारका करे, यह सम्भव नहीं। जो गाँवमें जानेकी इच्छा रखता है, वह गाँवमें और जो नगरमें जाना चाहता है, वह नगरमें पहुँचता है। जो-जो मनुष्य जिस-जिस वासनासे युक्त होता है, वह-वह उसी-उसीके लिये सदा प्रयत्न करता है। पूर्वजन्ममें फलकी उत्कट अभिलाषा होनेसे जो कर्म प्रबल प्रयत्नके द्वारा किया जाता है, वही इस जन्ममें 'दैव' शब्दसे कहा जाता है। पूर्वजन्मके उस कर्मका पर्यायवाची शब्द 'दैव' है। कर्म करनेवालोंके सभी कर्म इसी रीतिसे होते हैं। अपनी प्रबल वासना ही कर्म है। वासना मनसे भिन्न नहीं है और मन ही पुरुष है, अर्थात् पुरुषका संकल्प होनेसे वह पुरुषरूप ही है। मन आदि भावको प्राप्त हुआ यह प्राणी ही अपने हितके लिये जो जो प्रयत्न करता है, 'दैव' नामसे प्रसिद्ध अपने उस कर्मसे ही वह तदनुरूप फल पाता है। श्रीराम ! मन, चित्त, वासना, कर्म, दैव और निश्चय—ये सब कठिनतासे समझमें आनेवाले मनकी (मनोरूपताको प्राप्त हुए पुरुषकी) संज्ञाएँ हैं, ऐसा सत्पुरुषोंका कथन है।
श्रीराम ! इस प्रकार पूर्वोक्त संज्ञाएँ धारण करनेवाला पुरुष अपनी सुदृढ़ वासनाके द्वारा प्रतिदिन जैसा प्रयत्न करता है, उसके अनुसार ही उसे पर्याप्त फल मिलता
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] ❖ श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन ❖ ७७
है । रघुनन्दन ! इस प्रकार पौरुषसे मनुष्य इस जगत्में सभी कुछ प्राप्त कर सकता है, दैवसे नहीं । अतः वह पुरुषार्थ तुम्हारे लिये शुभफल देनेवाला हो । तुम अपने प्रयत्नसे प्राप्त परम पुरुषार्थद्वारा ही सदा बने रहनेवाले परम कल्याणको प्राप्त होओगे, अन्यथा नहीं । श्रुतिमें जो चैतन्यमात्रस्वरूप प्राज्ञ पुरुष बताया गया है, वही तुम हो, जड शरीर नहीं हो । तुम स्वयंप्रकाशरूप चेतन हो । अन्य चेतनसे प्रकाशित होनेकी योग्यता तुममें कहाँ है ? यदि तुम्हें दूसरा कोई चेतन प्रकाशित करता है, ऐसा मान लिया जाय तो फिर उसे दूसरा कौन प्रकाशित करता है, यह प्रश्न खड़ा हो जायगा । यदि उसका भी कोई अन्य चेतन प्रकाशक हो तो फिर इसको कौन प्रकाशित करेगा ? इस प्रकार अनवस्था-दोष प्राप्त होता है, जो वस्तुका साधक नहीं है । इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह शुभ और अशुभ मार्गोंसे बहती हुई वासनारूपिणी नदीको पुरुषोचित प्रयत्नके द्वारा अशुभ मार्गसे हटाकर शुभ मार्गमें ही लगाये ।
मनुष्यका चित्त शिशुके समान चञ्चल होता है, उसे अशुभ मार्ग ( पाप ) से हटा दिया जाय तो शुभ मार्ग ( पुण्य ) में जाता है और यदि शुभ मार्गसे हटाया जाय तो अशुभ मार्गमें चला जाता है । इसलिये उसे यत्नपूर्वक पापमार्गसे हटाकर पुण्यके मार्गमें लगाना चाहिये । इस प्रकार मनुष्यके लिये उचित है कि वह पूर्वोक्त क्रमसे चित्तरूपी बालकको शीघ्र ही समतारूप सान्त्वना देकर पुरुषोचित प्रयत्नके द्वारा धीरे-धीरे आत्मस्वरूपमें लगाये, हठपूर्वक एकाएक उसका निरोध न करे । यही उसका लालन-पालन है । लोकमें मनुष्य जिस-जिस विषयका अभ्यास करता है, निस्संदेह उसीमें तन्मय हो जाता है । यह बात बालकोंसे लेकर बड़े बड़े विद्वानोंतकमें देखी गयी है । अतः श्रीराम ! तुम परम कल्याणकी प्राप्तिके लिये उत्तम पुरुषार्थका आश्रय ले पाँचों इन्द्रियोंको जीतकर यहाँ शुभ वासनासे युक्त हो जाओ । तुम श्रेष्ठतम पुरुषोंद्वारा सेवित और अत्यन्त सुन्दर शुभ वासनाका अनुसरण करके मनोरम भावयुक्त बुद्धिसे परम पुरुषार्थद्वारा सदा शोकरहित पदको प्राप्त करो । तत्पश्चात् उस शुभ वासनाका भी परित्याग करके परब्रह्म परमात्मामें भलीभाँति स्थित हो जाओ ।
( सर्ग ८-९ )
श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन, ज्ञानप्राप्तिका विस्तार, श्रीरामजीके वैराग्यकी प्रशंसा, वक्ता और प्रश्नकर्ताके लक्षण आदिका विशेषरूपसे वर्णन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! जो सर्वत्र नित्य समतारूपसे स्थित सच्चिदानन्दमय ब्रह्मतत्त्व है, उससे सम्बन्ध रखनेवाली सत्ताको नियति कहते हैं । वही नियन्ताकी नियन्त्रण-शक्ति है तथा नियन्त्रणमें रहनेवाले पदार्थोंमें जो नियन्त्रित होनेकी योग्यता है, वह भी सत्ता ही है । अब मैं उस सारगर्भित संहिताका वर्णन करूँगा, जो इहलोक तथा परलोककी सिद्धिके लिये परमपुरुषार्थ-रूप फल प्रदान करनेवाली और मोक्षके उपायभूत साधनोंसे सम्पन्न है । उसे तुम सावधानतया श्रवण करो ।
प्राचीन कालकी बात है—सृष्टिके आदिमें परमेष्ठी ब्रह्माने इस मोक्षकथाका वर्णन किया था । यह सम्पूर्ण दुःखोंका विनाश करनेवाली है और बुद्धिको परम शान्ति प्रदान करती है । सारे विवेकशील पुरुषोंके साथ इस मोक्षकथाको सुनकर तुम उस दुःखरहित सच्चिदानन्दमय परमपदको प्राप्त कर लोगे, जहाँ पहुँच जानेपर पुनः विनाशका भय नहीं रह जाता ।
श्रीरामने पूछा—ब्रह्मन् ! पूर्वकालमें ब्रह्माजीने किस लिये इस कथाका वर्णन किया था ? और आपको इसकी प्राप्ति कैसे हुई ? प्रभो ! यह वृत्तान्त मुझे बताइये ।
श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! परब्रह्म परमात्मा
७८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
सर्वव्यापक, सबका आश्रय-स्थान, नित्य चेतन, अविनाशी, समस्त प्राणियोंमें प्रकाशकरूपसे वर्तमान और अनन्त विलासोंका एकमात्र अधिष्ठान है। प्रकृतिक़ी साम्यावस्था तथा विषमावस्थामें भी वह निर्विकाररूपसे स्थित रहता है। उसी परमात्मासे विष्णुका प्राकट्य हुआ, ठीक उसी तरह जैसे प्रवहणशील जलसे परिपूर्ण सागरसे तरङ्ग उत्पन्न होती है। उन विष्णुके हृदयकमलसे ब्रह्मा प्रकट हुए, जो वेद तथा वेदार्थके तत्त्वज्ञ हैं। उन्होंने देवताओं और मुनियोंके समुदायोंसे संयुक्त होकर अनेकविध विकल्पोंकी सृष्टि करनेवाले मनकी भाँति विभिन्न प्रकारकी सृष्टि-रचना की। जम्बूद्वीपके इस भागमें, जो भारतवर्ष नामसे प्रसिद्ध है, ब्रह्माजीद्वारा रचित सारा प्राणिसमुदाय आधि-व्याधिसे संयुक्त, लाभ-हानिसे पीड़ित और जन्म मरणशील था। प्राणियोंकी इस सृष्टिमें सारे जनसमुदायको नाना प्रकारके व्यसनजन्य कष्टोंसे पीड़ित देख सर्वलोकस्रष्टा भगवान् ब्रह्माका हृदय उसी प्रकार दयार्द्र हो गया, जैसे पुत्रको दुखी देखकर पिताको दया आ जाती है। फिर तो वे उनके कल्याणके लिये क्षणभर एकाग्रचित्त हो यों विचार करने लगे कि इन हताश तथा अल्पायु जीवोंके दुःखका अन्त किस प्रकार होगा ऐसा विचारकर सामर्थ्यशाली स्वयं भगवान् ब्रह्माने उनके कष्टपहरणके लिये तप, धर्म, दान, सत्य और तीर्थ-सेवन आदि साधनोंका निर्माण किया। इन्हें उत्पन्न करके सृष्टिकर्त्ता ब्रह्माने पुनः स्वयं विचार किया कि इन साधनोंसे लोगोंके सांसारिक दुःखका समूल विनाश नहीं हो सकता; बल्कि परम निर्वाणरूप मोक्ष ही परम सुख है, जिसकी प्राप्ति हो जानेपर जीव जन्म-मृत्युके चक्रसे छूट जाता है। उस मोक्षकी प्राप्ति ज्ञानसे ही होती है। इसलिये जीवके लिये संसार-सागरसे पार होनेका एकमात्र उपाय ज्ञान ही है। तप, दान और तीर्थसेवन आदि भव-तरणके लिये सीधे उपाय नहीं कहे गये हैं। अतः मैं इस हताश जनसमुदायके दुःखकी निवृत्तिके लिये संसारसे उद्धार पानेका एक नूतन उपाय शीघ्र ही प्रकट करूँगा।
यों विचारकर कमलपर विराजमान भगवान् ब्रह्माने अपने मानसिक संकल्पद्वारा तुम्हारे सामने बैठे हुए मुझको उत्पन्न किया। निष्पाप श्रीराम ! जैसे एक तरङ्गसे शीघ्र ही दूसरी तरङ्ग प्रकट हो जाती है, उसी प्रकार मैं भी अनिर्वचनीय मायासे उत्पन्न हुआ और फिर तुरंत ही अपने उन पितृदेवके समीप जा पहुँचा, जिनके हाथमें कमण्डलु और रुद्राक्षकी माला शोभा पा रही थी। मैंने नम्रतापूर्वक उनको प्रणाम किया। उस समय मैं भी कमण्डलु और रुद्राक्षकी मालासे संयुक्त था। तब 'बेटा! यहाँ आओ' मुझसे यों कहकर उन्होंने अपने आसनभूत कमलके ऊपरी पत्तेपर श्वेत बादलपर बैठे हुए चन्द्रमाकी भाँति मुझे अपने हाथसे पकड़कर बैठा लिया। फिर मृगचर्म ही जिसका परिधान था, ऐसे मुझसे मृगचर्मधारी मेरे पितृदेव ब्रह्माजीने कहा—'बेटा ! जैसे चन्द्रमामें कलङ्क प्रविष्ट होता है, उसी प्रकार वानरके समान
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन * ७९
चञ्चल अज्ञान दो घड़ीके लिये तुम्हारे चित्तमें प्रवेश करे।'
यों पिताद्वारा अभिशप्त हुआ मैं उनके संकल्पके अनन्तर अपने सम्पूर्ण शुद्ध स्वरूपको भूल गया। फिर तो मेरी बुद्धि तत्त्वज्ञानसे रहित हो गयी और मैं दुःख-शोकसे संतप्त हो दीनताको प्राप्त हो गया। उस समय मैं 'हाय ! बड़े कष्टकी बात हुई। यह संसार नामक दोष मुझे कहाँसे प्राप्त हो गया ?' यों हृदयमें विचार करके चुपचाप बैठा रहता था। मेरी यह दशा देखकर मेरे पिताजीने मुझसे कहा—'बेटा ! तुम क्यों दुखी हो रहे हो ? अपने इस दुःखके नाशका उपाय मुझसे पूछो। उसे जानकर तुम नित्य परमात्माको प्राप्त हो जाओगे।' तब मैंने उनसे पूछा—'नाथ ! यह महान् दुःखमय संसार मुझ प्राणीको कहाँसे प्राप्त हो गया ? और इसका विनाश किस प्रकार होता है ?' मेरे यों प्रश्न करनेपर उन्होंने मुझे ऐसे प्रचुर ज्ञानका उपदेश दिया, जिस परम पावन ज्ञानको प्राप्तकर मैं पिताजीके अभिप्रायके अनुरूप अधिक ज्ञानसम्पन्न हो गया। इस प्रकार जब मुझे ज्ञातव्य तत्त्वकी जानकारी हो गयी और मैं अपनी प्रकृतिमें स्थित हो गया, तब जगत्-स्रष्टा तथा सबकी उत्पत्तिके कारणस्वरूप और उपदेष्टा ब्रह्माजीने मुझसे कहा—'पुत्र ! मैंने प्रथमतः तुम्हें शापद्वारा ज्ञान-हीन करके पुनः समस्त अधिकारी जनोंकी ज्ञान-सिद्धिके लिये इस सारभूत ज्ञानका पिपासु बनाया है। अब तुम्हारा शाप शान्त हो गया है और तुम्हें परमोत्कृष्ट ज्ञानकी प्राप्ति हो गयी है, जिससे तुम मेरे ही सदृश अद्वितीय आत्मस्वरूप हो गये हो। साधो ! अब तुम प्राणियोंपर अनुग्रह करनेके लिये भूलोकमें जम्बूद्वीपके मध्यभागमें स्थित भारतवर्षमें जाओ। परोपकारनिष्ठ पुत्र ! तुम तो बड़े बुद्धिमान् हो; अतः वहाँ जो लोग कर्मकाण्ड-परायण हों, उन्हें कर्मकाण्डके क्रमसे शिक्षा देना और जो लोग विवेकशील, विरक्तचित्त तथा महाबुद्धिमान् हों, उन्हें परमानन्ददायक ज्ञानका उपदेश करना।'
रघुकुलभूषण राम ! इस प्रकार मैं अपने पिता ब्रह्माजीद्वारा नियुक्त होकर इस लोकमें निवास कर रहा हूँ और जबतक यह सृष्टिपरम्परा रहेगी, तबतक यहाँ रहूँगा। जिस प्रकार भगवान् ब्रह्माने मुझे यहाँ आनेका आदेश दिया, उसी प्रकार उन्होंने सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार तथा नारद आदि अन्यान्य बहुत-से महर्षियोंको भी यह कहकर प्रेरित किया कि तुमलोग भारतवर्षमें जाकर पवित्र कर्मकाण्ड तथा ज्ञानकाण्डके उपदेशद्वारा वहाँके निवासियोंका, जो अन्तःकरणके अज्ञानरूपी रोगके वशीभूत होकर महान् कष्ट भोग रहे हैं, उद्धार करो।
प्राचीन कालमें सत्ययुगके समाप्त होनेपर जब भूतलपर कालक्रमसे पवित्र कर्मकाण्डका ह्रास हो गया, तब उन महर्षियोंने कर्मकाण्डकी स्थापना तथा मर्यादाकी रक्षाके लिये पृथक्-पृथक् देशोंका विभाजन किया और उन देशोंपर भूपालोंकी स्थापना की। तदनन्तर उन्होंने भूतलपर धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धिके लिये उन-उन कर्मोंके
९—संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता, ज्ञानका उत्तम माहात्म्य, श्रीराममें प्रश्नकर्ताके गुणोंकी अधिकताका वर्णन, जीवन्मुक्तिरूप फलके हेतुभूत वैराग्य आदि गुणोंका तथा शमका विशेषरूपसे निरूपण
८० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
उपयुक्त बहुत-से स्मृति-ग्रन्थों तथा यज्ञविधायक शास्त्रोंका निर्माण किया। तत्पश्चात् इस कालचक्रके चलते रहनेपर जब उस क्रमका विनाश हो गया तथा लोग प्रतिदिन भोजनमात्रपरायण और खाद्य पदार्थोंके उपार्जनमें तत्पर हो गये, तब हमलोगों ने उनकी दीनताका विनाश करने तथा लोकमें आत्मतत्त्वज्ञानके प्रचारके लिये बड़े-बड़े ज्ञानोत्पादक शास्त्रोंका उपदेश किया। यह अध्यात्मविद्या प्रथमतः राजसमाजमें उपदिष्ट हुई। तदनन्तर इसका प्रसार लोकमें हुआ। इसी कारण इसे 'राजविद्या' कहा गया है। रघुनन्दन ! राजविद्या एवं राजगुह्य नामसे जिसकी प्रसिद्धि है, उस उत्तम अध्यात्मज्ञानको पाकर राजालोग दुःखरहित हो परमानन्दको प्राप्त हो गये। श्रीराम ! कालक्रमानुसार निर्मल कीर्तिवाले बहुसंख्यक राजाओंके स्वर्गवासी हो जानेपर इस समय तुम इस भूतलपर इन महाराज दशरथके यहाँ प्रकट हुए हो। शत्रुओंका मर्दन करनेवाले राम ! तुम्हारा मन अत्यन्त निर्मल है, इसीलिये किसी निमित्तके बिना स्वाभाविक ही तुम्हारे मनमें यह परम पावन तथा उत्तम वैराग्य जाग उठा है; क्योंकि समस्त विवेकशील पुरुषोंमें जिसकी ख्याति है, उस श्रेष्ठ पुरुषका भी वैराग्य किसी निमित्तको लेकर होता है, इसलिये वह राजस कहलाता है, परंतु तुम्हारे मनमें उत्पन्न हुआ यह वैराग्य अपूर्व है। यह किसी निमित्तकी अपेक्षा न रखकर स्वतः अपने विवेकसे उत्पन्न हुआ है और सत्पुरुषोंको आश्चर्यमें डालनेवाला है, अतः सात्त्विक है। जिन्हें निमित्तके बिना ही वैराग्य हो जाता है, वे ही महापुरुष तथा ज्ञानवान् हैं और उन्हींका अन्तःकरण शुद्ध है।* जो लोग ज्ञानद्वारा इस सृष्टिपरम्पराका विचार करके वैराग्यको प्राप्त होते हैं, वे ही उत्तम पुरुष हैं।
श्रीराम ! जो लोग इस संसारकी असारता एवं दुःखरूपताको देखकर अपनी सांसारिक बुद्धिका परित्याग कर देते हैं, वे साँकलसे छूटे हुए गजराजोंकी भाँति संसार-बन्धनसे मुक्त होकर परमपदको प्राप्त हो जाते हैं। यह जगत्-परम्परा विभ्रम और अनन्त है। इसमें पड़ा हुआ महान् जीव देहाध्याससे युक्त रहता है, अतएव ज्ञानके बिना उसे परमपदकी प्राप्तिका मार्ग नहीं सूझता। परंतु रघुनन्दन ! जिनकी बुद्धि अगाध है—ऐसे विवेकशील पुरुष इस दुस्तर भवसागरको ज्ञानरूपी नौकाद्वारा क्षणमात्रमें ही पार कर जाते हैं। संसार-सागरसे उबारनेवाले उस ज्ञानरूप उपायको तुम अपनी बुद्धिसे, जो नित्य विवेक-वैराग्य आदिसे समन्वित है, एकाग्रचित्त होकर श्रवण करो; क्योंकि इस निर्दोष ज्ञानयुक्तिके बिना अनन्त विक्षेपोंसे परिपूर्ण ये सांसारिक दुःख और भय चिरकालतक हृदयको संतप्त करते रहते हैं। राघव ! श्रेष्ठ पुरुषोंमें शीत, उष्ण, वात आदि द्वन्द्वजनित दुःखोंको सहन करनेकी क्षमता ज्ञानके बलपर ही आती है, अन्यथा ज्ञानयुक्तिके अतिरिक्त वे किसी प्रकार सह्य नहीं हो सकते। दुःखकी चिन्ताएँ अज्ञानी मनुष्यको पद-पदपर आ घेरती हैं और समयानुसार उसे उसी प्रकार संतप्त करती रहती हैं, जैसे अग्निकी लपटें तृणको जलाकर भस्म कर डालती हैं; परंतु जिस प्रकार वर्षाके जलसे अभिषिक्त हुए वनपर उन अग्नि-ज्वालाओंका प्रभाव नहीं पड़ता, उसी तरह जिसे जाननेयोग्य अध्यात्मशास्त्रका ज्ञान प्राप्त हो गया है तथा जिसने भलीभाँति ब्रह्मतत्त्वका साक्षात्कार कर लिया है, ऐसे ज्ञानी पुरुषको मानसिक व्यथाएँ संताप नहीं पहुँचा सकतीं। इस संसाररूपी मरुस्थलमें बहनेवाली वायु शारीरिक तथा मानसिक कष्टरूपी आवर्तोंसे परिपूर्ण है। यह क्षुब्ध होकर भी तत्त्वज्ञानीको वैसे ही पीड़ित नहीं कर सकती, जैसे प्रचण्ड आँधी कल्पवृक्षका कुछ नहीं बिगाड़ सकती।
इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह तत्त्वज्ञानकी
* ते महान्तो महाप्राज्ञा निमित्तेन विनैव हि।
वैराग्यं जायते येषां तेषां ह्यमलमानसस्॥
(मुमुक्षु० ११। २४)
[ मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * श्रीवसिष्ठजीद्वारा ब्रह्माजीके और अपने जन्मका वर्णन * ८१
प्राप्तिके लिये, जो श्रुति आदिका प्रमाण देनेमें कुशल और आत्मतत्त्वका यथार्थ ज्ञाता हो, ऐसे ज्ञानी पुरुषके पास जाकर प्रयत्नपूर्वक विनयभावसे प्रश्न करे। फिर जैसे केसरसे रँगा हुआ वस्त्र उसके रंगको पकड़ लेता है, उसी प्रकार जिससे प्रश्न किया गया है, उस प्रमाणकुशल तथा विशुद्ध चित्तवाले उपदेष्टाके वचनको प्रयत्नपूर्वक ग्रहण करना चाहिये। किंतु वाग्वक्ताओंमें श्रेष्ठ राम ! जो तत्त्वका ज्ञाता नहीं है, अतएव जिसके वचन अग्राह्य हैं, ऐसे पुरुषसे जो तत्त्वविषयक प्रश्न करता है, उससे बढ़कर मूर्ख दूसरा कोई नहीं है। इसी प्रकार जिससे पूछा गया है, उस प्रमाणकुशल तथा तत्त्वज्ञानी वक्ताके उपदेशका जो पुरुष यत्नपूर्वक अनुसरण नहीं करता, उससे बढ़कर दूसरा कोई नराधम नहीं है। अतः वक्ताके व्यवहार आदि कार्योंसे उसकी अज्ञता तथा तत्त्वज्ञताका पहले निर्णय करके जो पुरुष उससे प्रश्न करता है, वह प्रश्नकर्ता उत्कृष्ट बुद्धिवाला माना जाता है; परंतु जो मूर्ख जिज्ञासु उत्तम वक्ताका निर्णय किये बिना ही उससे प्रश्न करता है, वह अधम कहलाता है और उसे तत्त्वज्ञानरूप महान् अर्थकी प्राप्ति भी नहीं होती। ज्ञानीको भी चाहिये कि पूर्वापरका विवेचन करके उसका निश्चय करनेमें जिसकी बुद्धि समर्थ हो और जो निन्दनीय न हो, ऐसे पुरुषको उसके पूछे हुए तत्त्वका उपदेश दे; परंतु जो आहार-निद्रा-भय-मैथुन आदि पशुधर्मसे संयुक्त है, ऐसे अधमको तत्त्वका उपदेश न दे। क्योंकि प्रश्नकर्ताकी श्रुति आदि प्रमाणोंद्वारा निर्णीत पदार्थके ग्रहणकी योग्यताका विचार किये बिना ही जो वक्ता उसे उपदेश देता है, उस पुरुषको ज्ञानीजन इस लोकमें महान् मूर्ख बतलाते हैं। रघुनन्दन ! तुम प्रशंसनीय गुणोंसे युक्त अत्यन्त श्रेष्ठ प्रश्नकर्ता हो और मैं उपदेश देना जानता हूँ, अतः हम दोनोंका यह समागम उचित ही है। शब्दार्थके ज्ञाता राम ! जनसमाजमें तुम महापुरुष माने जाते हो। तुममें रागका लेशमात्र भी नहीं है। तुम तत्त्वके ज्ञाता हो। इसलिये तुम्हारे प्रति किया हुआ उपदेश तुम्हारे अन्तर्हृदयमें चिपक जाता है, ठीक उसी तरह जैसे घोला हुआ रंग वस्त्रमें लग जाता है। तुम्हारी तीक्ष्ण बुद्धि उक्त पदार्थके ग्रहण करनेमें निपुण और परमार्थका विवेचन करनेवाली है। वह परमार्थ-विषयमें उसी प्रकार प्रवेश करती है, जैसे सूर्यकी किरणें जलके भीतर घुस जाती हैं। इसलिये मैं जिस पदार्थका उपदेश करूँ, उसे तुम 'यह तत्त्व-वस्तु है' यों निश्चय करके यत्नपूर्वक अपने हृदयमें पूर्णतया धारण कर लो।
मनुष्यको चाहिये कि वह विवेकहीन, अज्ञानी और दुर्जनोंसे प्रेम करनेवाले मनुष्यका दूरसे ही परित्याग करके साधु-महात्माओंकी सेवा करे; क्योंकि सदा सज्जनोंके सम्पर्कमें रहनेसे विवेककी उत्पत्ति होती है। यह विवेक एक वृक्षके समान है और भोग तथा मोक्ष उसके फल कहे गये हैं। उस मोक्षके द्वारपर निवास करनेवाले चार द्वारपाल बतलाये जाते हैं जिनके नाम हैं—शम, विचार, संतोष और चौथा साधुसंगम। मनुष्यको इन चारोंका ही प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये; क्योंकि इनका भलीभाँति सेवन होनेपर ये मोक्षरूपी राजमहलके द्वारको खोल देते हैं। यदि चारोंका सेवन न हो सके तो तीनका या दोका सेवन अवश्य करना चाहिये। दोका भी सेवन न हो सके तो सभी उपायोंद्वारा प्राणोंकी बाजी लगाकर भी एकका आश्रय तो अवश्य ही ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि जब एक वशमें आ जाता है, तब शेष तीनों भी अधीन हो जाते हैं।* विवेकी पुरुष तप, दान और
* मोक्षद्वारे द्वारपालाश्चत्वारः परिकीर्तिताः ।
शमो विचारः सन्तोषश्चतुर्थः साधुसङ्गमः ॥
एते सेव्याः प्रयत्नेन चत्वारो द्वौ त्रयोऽथवा ।
द्वारमुद्घाटयन्त्येते मोक्षराजगृहे यथा ॥
८२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
शास्त्रके श्रवण-मनन आदिका उत्तम पात्र होता है। जैसे तेजस्वियोंमें सूर्य सर्वश्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार वह लोगोंमें आभूषणके समान आदरणीय होता है। जैसे शीतकी अधिकताके कारण जल जमकर पत्थरके सदृश हो जाता है, उसी प्रकार अविवेकियोंकी बुद्धि मन्दता—घनताको प्राप्त होकर अत्यन्त जड हो जाती है। रघुकुलभूषण राम ! तुम्हारा अन्तःकरण तो सूर्योदय होनेपर खिले हुए कमलकी भाँति सौजन्य आदि गुण एवं शास्त्रार्थकी दृष्टियोंसे विकसित हो गया है। मनुष्यको उचित है कि वह पहले आवागमनके चक्रसे छूटनेके लिये शास्त्राभ्यास और सत्संगतिपूर्वक तपस्या एवं इन्द्रियनिग्रहद्वारा अपनी बुद्धिका ही संवर्द्धन करे। यह संसार विषवृक्षके समान है। यह विपत्तियोंका एकमात्र स्थान है, जो अज्ञानी मनुष्यको सदा मोहित करता रहता है; इसलिये यत्नद्वारा अज्ञानका विनाश कर डालना ही उचित है। * जैसे मेघरहित आकाशमें निर्मल एवं पूर्ण मण्डलवाले चन्द्रमाको देखकर दृष्टि प्रसन्न होती है, उसी प्रकार यह पूर्वोक्त परमार्थ वस्तुदृष्टि ज्ञानीमें यथार्थ वस्तुके साथ एकरसताको प्राप्त होकर प्रसन्न हो जाती है। जिसकी बुद्धि पूर्वापरके विचारसे सूक्ष्मतम अर्थको ग्रहण करनेमें निपुण और चतुरतासे शोभित होकर पूर्ण विकसित हो गयी है, वही 'पुमान्' अर्थात् पुरुष कहा जाता है। श्रीराम ! तुम्हारा हृदय अज्ञानसे रहित अतएव विशुद्ध शान्ति आदि गुणोंसे विकसित एवं उत्तम विचारकी शीतल चाँदनीसे प्रकाशित है। उस हृदयसे युक्त होकर तुम उसी प्रकार सुशोभित हो रहे हो, जैसे निर्मल चन्द्रमासे आकाशकी शोभा होती है।
(सर्ग १०-११)
संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता, ज्ञानका उत्तम माहात्म्य, श्रीराममें प्रश्नकर्ताके गुणोंकी अधिकताका वर्णन, जीवन्मुक्तिरूप फलके हेतुभूत वैराग्य आदि गुणोंका तथा शमका विशेषरूपसे निरूपण
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! तुम्हारा मन उत्तम गुणोंसे परिपूर्ण है। तुम हमारे योग्य शिष्य हो और प्रश्न करनेका ढंग भी तुम्हें भलीभाँति ज्ञात है। तुम कही हुई बातको विशेषरूपसे समझ लेते हो, इसीलिये मैं आदरपूर्वक तुम्हें उपदेश देनेको उद्यत हुआ हूँ। अब तुम अपनी बुद्धिको, जो रजोगुण और तमोगुणसे रहित और शुद्ध सत्त्वगुणका अनुसरण करनेवाली है, आत्मामें स्थापित करके ज्ञानोपदेश श्रवण करनेके लिये तैयार हो जाओ। प्रश्नकर्तामें जितने गुण होने चाहिये, वे सभी गुण तुममें वर्तमान हैं और जैसे समुद्रमें रत्न आदि सम्पत्तियाँ भरी रहती हैं, उसी तरह वक्ताके सभी गुण मुझमें विद्यमान हैं। वत्स ! जैसे चन्द्रमाकी किरणोंके सम्पर्कसे चन्द्रकान्तमणिमें आर्द्रता आ जाती है, उसी तरह तुम भी ज्ञानके संसर्गसे उत्पन्न हुए वैराग्यको प्राप्त हुए हो। तुम तो सर्वथा शुद्ध हो। तुम्हारा बाल्यावस्थासे ही शुद्ध, विस्तृत तथा अविच्छिन्न सद्गुणोंके साथ सम्बन्ध चला आ रहा है—ठीक उसी तरह जैसे कमलका अपने विस्तारवाले, निर्मल एवं दीर्घ तन्तुओंसे लगाव रहता है। इसलिये तुम्हीं इस कथाको सुननेके योग्य अधिकारी हो। अब मैं इस मोक्षकथाका वर्णन करूँगा, तुम सावधान होकर इसे सुनो। यह कथा उस परमपदसे सम्बन्ध रखनेवाली है, जिसका साक्षात्कार हो जानेपर जितने लौकिक कार्य तथा जितनी लौकिक दृष्टियाँ हैं, वे सब-के-सब पूर्णतया शान्त हो जाते हैं।
एकं वा संप्रयत्नेन प्राणांस्त्यक्त्वा समाश्रयेत् । एकस्मिन् वशगे यान्ति चत्वारोऽपि वशं यतः ॥
(मुमुक्षु० ११। ५९-६१)
* संसारविषवृक्षोऽयमेकमास्पदमपदाम् । अज्ञं सम्मोहयेन्नित्यं मौर्य्ये यत्नेन नाशयेत् ॥
(मुमुक्षु० ११। ६९)
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] ४ संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता तथा ज्ञानका उत्तम माहात्म्य * ८३
श्रीराम ! संसाररूपी विषके आवेशसे उत्पन्न हुई विषूचिका बड़ी दुस्सह होती है। विषनिवारक गारुडमन्त्रसे ही उसका समूल नाश होता है। जीव और ब्रह्मका एकात्मबोध ही वह गारुडमन्त्र है। वही परमार्थज्ञानका भी मूलमन्त्र है। सत्पुरुषोंके साथ शास्त्रानुशीलन करनेसे निःसन्देह उस योगकी प्राप्ति होती है।
शास्त्रचिन्तन करनेपर इसी जन्ममें अवश्य ही सम्पूर्ण दुःखोंका समूल विनाश होता है—ऐसा मानना चाहिये; इसलिये उन विवेकशील सत्पुरुषोंको अवहेलनाकी दृष्टिसे नहीं देखना चाहिये। जिस विवेकी पुरुषको सम्यग्दृष्टिकी उपलब्धि हो चुकी है, वह पुरानी केंचुलका त्याग करके संतापरहित हुए सर्पकी भाँति मानसिक व्यथाओंसे परिपूर्ण इस संसारके अनुरागका परित्याग करके संतापरहित हो जाता है। उसका अन्तःकरण शीतल हो जाता है। वह सम्पूर्ण जगत्को विनोदपूर्वक इन्द्रजालकी तरह सुखरूप देखता है; परन्तु जो उस सम्यग्दृष्टिसे रहित है, उसके लिये यह संसार परम दुःखदायी ही है। यह संसारानुराग बड़ा ही कष्टदायक है। यह अनर्थकी आशङ्का किये बिना ही मोहवश विषयोंमें फँसे हुए पुरुषोंको सर्पकी तरह डँस लेता है, खड्गकी भाँति काट डालता है, भालेके समान बेध देता है, रस्सीकी तरह आवेष्टित कर लेता है, आगके सदृश जला देता है, रात्रिकी तरह अंधा बना देता है, सिरपर गिरे हुए पत्थरके समान मूर्च्छित कर देता है, विचार-शक्तिको हर लेता है, मर्यादाका विनाश कर देता है और मोहरूपी अन्धकूपमें गिरा देता है। तृष्णा तुम्हें जर्जर कर देती है। अधिक क्या, संसारमें ऐसा कोई दुःख नहीं है जो संसारी मनुष्यको तृष्णासे न प्राप्त होता हो। यह विषयमोहरूपिणी विषूचिका दुष्परिणामवाली है। यह नरक-नगररूप शरीर-समुदायके साथ अनुराग उत्पन्न करनेवाली है। यदि इसकी चिकित्सा न की जाय तो यह अवश्य ही उन-उन हजारों नारकीय दुर्गत्तियोंको प्राप्ति कराती है, जहाँ नरकोंमें पाषाणभक्षण, खड्गद्वारा अङ्गोंका छेदन, पर्वतशिखरसे निपातन, पत्थरद्वारा घट्टन और अग्निदाहको हिमाभिषेककी भाँति, अङ्गोंके झुलसनेको चन्दनके लेपकी तरह, असिपत्रवाले वृक्षोंके वनमें दौड़ने, कीड़ोंके द्वारा शरीरमें छिद्र किये जाने और लोहेकी गरम जंजीरोंद्वारा देहके लपेटनेको शरीर-रक्षाके समान, युद्धमें काम आनेवाले अग्नि-बुझे बाणोंकी धारावाहिक वृष्टिको ग्रीष्मऋतुमें विनोदके लिये किये गये जलयन्त्रोंके फुब्बारोंकी बूँद-वर्षाके सदृश, सिरके काटे जानेको सुखनिद्राके तुल्य, मुख बंद करके बलपूर्वक किये गये मूकीभावको स्वाभाविक मुखमुद्राके समान और अकिञ्चित्करताको महती सम्पद्वृद्धिकी तरह सहन करना पड़ता है। राघव ! इस प्रकार सहस्रों कष्टप्रद चेष्टाओंसे परिपूर्ण इस दारुण संसारचक्रमें उपर्युक्त उपदेशकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये; बल्कि ऐसा विचार और निश्चय अवश्य करना चाहिये कि शास्त्रानुशीलनसे निश्चय ही कल्याण होता है। सत्पुरुषोंके साथ शास्त्रचिन्तन करनेसे जिसका देहाभिमान नष्ट हो गया है, उसे तत्त्वका ज्ञान हो जानेसे सर्वव्यापक आत्माका स्वरूप विदित हो जाता है। वह शुद्ध बुद्धिद्वारा परब्रह्मका साक्षात्कार कर लेता है और अज्ञानरूपी घने बादलके विलीन हो जानेपर उसके मोहका विनाश हो जाता है। फिर तो उसके लिये यह जगत्में विचरण करना रमणीय हो जाता है।
श्रीराम ! जिन्हें आत्मस्वरूपका ज्ञान हो गया है, ऐसे उत्तम बुद्धिसम्पन्न महापुरुष इस पूर्वोक्त दृष्टिका अवलम्बन करके इस संसारमें विचरते हैं। उन्हें न शोक होता है, न कामना होती है और न वे शुभाशुभकी याचना ही करते हैं। वे इस संसारमें सब कुछ करते हुए भी अकर्त्ताके समान रहते हैं। वे हेय और उपादेयके पक्षपातसे रहित होकर अपने आत्मामें स्थित रहते हैं, पवित्रतासे रहते हैं और सत्-शास्त्रोंमें प्रतिपादित स्वच्छ कर्म करते हुए सन्मार्गपर चलते हैं। अन्य लोगोंकी दृष्टिसे वे सोते हैं,
८४ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
जाते हैं, कर्म करते हैं और बोलते हैं; परन्तु वास्तवमें वे न आते हैं न जाते हैं, न कर्म करते हैं और न बोलते ही हैं। क्योंकि परमानन्दस्वरूप परमात्माको प्राप्त हुआ पुरुष न तो इन्द्रजालरूप मायिक कार्य करता है और न सांसारिक वासनाओंके पीछे ही दौड़ता है। वह बालकोंकी-सी भ्रममूलक चपलताका परित्याग करके पूर्वकथित परमात्माके स्वरूपमें ही सदा विराजमान रहता है। इस प्रकारकी स्थितियाँ आत्मतत्त्वके साक्षात्कारके अतिरिक्त अन्य उपायसे नहीं उपलब्ध होतीं। इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह जीवनपर्यन्त आत्माकी ही खोज करे, उसीकी उपासना करे और उसीका यथार्थ ज्ञान प्राप्त करे। इसके अतिरिक्त उसके लिये और कोई कर्तव्य नहीं है।
जिस पुरुषको अपने अनुभव, शास्त्रवचन और गुरुके उपदेशकी एकवाक्यताका निश्चय हो गया है वह निरन्तर किये गये उपर्युक्त अभ्यासके द्वारा परमात्माका साक्षात्कार कर लेता है। चाहे भारी-से-भारी आपत्ति क्यों न आ पड़े, परन्तु जो शास्त्र और उसके अर्थकी अवहेलना करनेवाले तथा तत्त्वज्ञानी महापुरुषोंकी अवज्ञा करनेवाले हैं—ऐसे मूर्खोंका अनुकरण कभी नहीं करना चाहिये। क्योंकि भूतलपर मनुष्योंको जितना कष्ट अपने शरीरमें स्थित अकेली मूर्खतासे प्राप्त होता है, उतना दुःख शारीरिक क्लेश, विष, आपत्ति और मानसिक व्यथाएँ नहीं दे सकतीं। जिनकी बुद्धि कुछ भी उत्तम संस्कारोंसे संस्कृत हो चुकी है, उनकी मूर्खताका विनाश करनेमें जैसा यह शास्त्र समर्थ है, वैसा अन्य कोई शास्त्र नहीं है। जैसे खैरसे काँटे उत्पन्न होते हैं, उसी तरह जितनी दुस्तर आपत्तियाँ और अधम कुत्सित योनियाँ हैं, वे सभी मूर्खतासे पैदा होती हैं। जिस संसारी पुरुषको मोक्षके उपायभूत इस शास्त्ररूप प्रकाशकी प्राप्ति हो गयी है वह मोहान्धकारमें भी पुनः अन्धताको नहीं प्राप्त होता। तृष्णा मानवरूपी कमलको तभीतक संकुचित करती है, जबतक विवेकरूपी सूर्यकी निर्मल प्रभाका उदय नहीं होता। रघुनन्दन ! जैसे इस संसारमें भगवान् विष्णु एवं शंकर आदि तथा अन्यान्य महर्षिगण जीवन्मुक्त हो विचरते रहते हैं, उसी प्रकार तुम भी सांसारिक दुःखसे छुटकारा पानेके लिये मेरे-जैसे आत्मीयजनोंके साथ बैठकर गुरूपदेश एवं शास्त्रप्रमाणद्वारा अपने स्वरूप-को जानकर जगत्में विहार करो। इस जगत्में सुख तो तुच्छ-से-तुच्छ तिनकेके सदृश है, परंतु दुःखोंका तो अन्त ही नहीं है; इसलिये जो दुःखरूप परिणामसे परिपूर्ण है, उन लौकिक सुखोंमें आस्था नहीं करनी चाहिये।
ज्ञानी पुरुषको चाहिये कि वह परम पुरुषार्थकी सिद्धिके लिये जो अनन्त और आयासरहित है, उस परम पदको प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करे; क्योंकि जिनका मन संतापरहित होकर सर्वोत्कृष्ट परम पदरूप परमात्मामें लीन हो गया है, वे ही पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं और उन्हींको परम पुरुषार्थकी प्राप्ति होती है। जो दुरात्मा पुरुष राज्य आदि जागतिक सुखोंके उपलब्ध होनेपर उनके उत्तम भोगोंके आस्वादनमात्रसे ही तृप्त बने रहते हैं, उन्हें तो तुम अंधे मेढक समझो।* जिनकी बुद्धि अज्ञानके कारण मन्द पड़ गयी है, वे मूर्ख वञ्चकों, प्रबल दुराचारियों, लौकिक भोगोंमें रचे-पचे रहनेवालों और मित्रका-सा व्यवहार करनेवाले शत्रुओंमें आसक्ति करने लगते हैं, जिससे उन्हें एक संकटसे दूसरे संकटकी, एक दुःखसे दूसरे दुःखकी, एक भयसे दूसरे भयकी और एक नरकसे दूसरे नरककी प्राप्ति होती रहती है।† इसलिये उत्तम विवेकका आश्रय
* संभोगाशनमात्रेण राज्यादिषु सुखेषु च।
संतुष्टा दुष्टमनसो विद्धि तानन्धदर्दुरान् ॥
( मुमुक्षु० १३ । २६ )
† ये शठेषु दुरन्तेषु दुष्कृतारम्भशालिषु ।
द्विपत्सु मित्ररूपेषु भक्ता वै भोगभोगिषु ॥
ते यान्ति दुर्गमाद् दुर्गं दुःखाद् दुःखं भयाद्भयम् ।
नरकान्नरकं मूढा मोहमन्थरबुद्धयः ॥
( मुमुक्षु० १३ । २७-२८ )
१०—विचार, संतोष और सत्समागमका विशेष-रूपसे वर्णन तथा चारों गुणोंमेंसे एक ही गुणके सेवनसे सद्गतिका कथन
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * संसारप्राप्तिकी अनर्थरूपता तथा ज्ञानका उत्तम माहात्म्य *
लेकर अभ्यास और वैराग्यके सहयोगसे दुःखरूपिणी इस भयंकर संसार-नदीको पार करना चाहिये। जिसे प्राप्त कर लेनेपर पुनर्जन्म नहीं होता और जहाँ पहुँच जानेपर शोकका अस्तित्व मिट जाता है, वह परम पद ज्ञानद्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है — इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। इस संसारमें जब पुरुषकी शीघ्र मोक्ष-प्राप्तिके उपायके चिन्तनमें प्रवृत्ति होती है, तब वह मोक्षप्राप्तिका पात्र कहा जाता है। उस प्रवृत्तिके प्राप्त हो जानेपर उत्तम कैवल्य-पदकी प्राप्तिमें कष्ट नहीं उठाना पड़ता। उस केवलरूप परमात्माकी प्राप्तिमें धन-सम्पत्ति, मित्र, भाई-बन्धु, हाथ-पैरका संचालन, देशान्तरगमन, शारीरिक कष्ट-सहन और तीर्थसेवन आदि उपकारी नहीं हो सकते। वह तो एक मात्र पुरुषार्थसे साध्य केवल परमात्माकी प्राप्तिकी वासनारूप कर्मसे एवं मनोजयसे प्राप्त किया जा सकता है। सुखपूर्वक सेवन करनेयोग्य आसनपर बैठकर उस परब्रह्मका चिन्तन करनेवाले पुरुषको उपर्युक्त परमपदकी प्राप्ति हो जाती है। फिर तो उसे न शोक करना पड़ता है और न संसारमें उसका पुनर्जन्म ही होता है। जैसे मृगतृष्णामें जलाभास दीखता है, वास्तवमें वहाँ जल नहीं रहता, उसी तरह स्वर्गलोक और मनुष्य-लोकके सम्पूर्ण भावोंके विनाशी होनेके कारण इन दोनों लोकोंमें वास्तविक सुख नहीं है।
इसलिये जो शम और संतोषका साधन है, उस मनोजयकी प्राप्तिके लिये उपाय सोचना चाहिये। उससे वह आनन्द उपलब्ध होता है, जो परमात्माके साथ ऐकात्म्य-सम्बन्धसे मिलता है। अतः देवता, दानव, राक्षस और मनुष्यको बैठते, चलते, गिरते-पड़ते अथवा घूमते हुए सदा ही मनोजय-जनित उस परम सुखको अवश्य प्राप्त करना चाहिये; क्योंकि वह शान्तिरूप विकसित पुष्पोंसे लदे हुए विवेकरूप महान् वृक्षका फल है। पूर्णरूपसे शान्त मन अत्यन्त निर्मल और भ्रमरहित हो जाता है। उस विश्रान्त मनमें किसी प्रकारकी स्पृहा नहीं रह जाती। उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते [हैं।] उस समय वह न तो किसी वस्तुकी अभिलाषा [करता] है और न किसीका त्याग ही करता है।
राघव ! अब मोक्षद्वारपर स्थित रहनेवाले [चार] द्वारपालोंको क्रमशः सुनो, जिनमेंसे एकके प्रति प्रीति हो जानेसे मोक्षद्वारमें प्रविष्ट होनेका अधिकार] प्राप्त हो जाता है। शम मङ्गलमय, शान्तिदायक [और] भ्रमका निराकरण करनेवाला है। शमसे परम कल्याण] की प्राप्ति होती है और शम ही परम पद है। [शमकी] प्राप्तिसे पूर्णतया तृप्त हुए जिस पुरुषका चित्त शमयुक्त] होनेके कारण शीतल एवं निर्मल हो गया है, [उसका] शत्रु भी मित्र बन जाता है। जैसे चन्द्रोदय [से] क्षीरसागरकी शुभ्रता बढ़ जाती है, उसी प्रकार [जिनका] चित्त शमरूपी चन्द्रमासे भलीभाँति शोभित हो [रहा] है, उनकी परम शुद्धताकी अभिवृद्धि होती है। [जिनके] कलङ्करहित मुखचन्द्रमें शमश्री शोभित होती [है, वे] अपने गुणरूप सौन्दर्यसे दूसरेकी इन्द्रियोंको वश [में कर] लेते हैं तथा वे ही कुलीनशिरोमणि एवं वन्दनीय [हैं।] त्रिलोकीकी राज्यलक्ष्मी भी वैसा आनन्द नहीं [प्रदान] कर सकती, जैसी आनन्ददायिनी साम्राज्य-स[म्पत्तिके] सदृश शम-विभूतियाँ होती हैं। लोकमें जितने [शोक,] जितनी दुःसह तृष्णाएँ और जितनी दुःख[प्रद] मानसिक व्यथाएँ हैं, वे सब शान्तचित्तवाले [पुरुषके] निकट जाकर वैसे ही विलीन हो जाती हैं, जैसे [सूर्यकी] किरणोंके सम्पर्कसे अन्धकारका विनाश हो जाता है।] शमपरायण पुरुषके दर्शनसे समस्त प्राणियोंका मन जैसा] आह्लादपूर्ण एवं प्रसन्न होता है, वैसा चन्द्रमाके [दर्शनसे भी] नहीं होता। इस जगत्में जैसे अपनी मातापर [प्राणियोंको] विश्वास रहता है, उसी प्रकार शमयुक्त पुरुषपर [—चाहे वह दुष्ट हो] अथवा धर्मात्मा—सभी प्राणी विश्वास करते [हैं।] इसलिये रघुकुलभूषण राम ! तुम भी अपने मन[को] समस्त शारीरिक क्लेशों तथा मानसिक [दुःखोंसे...]
८६ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [संक्षिप्त योगवासिष्ठ
कम्पित और तृष्णारूपी रस्सीसे आबद्ध है, शमरूपी अमृतके अभिषेकसे प्रकृतस्थ करो; क्योंकि जो शमनिष्ठ है, उस पुरुषसे पिशाच, राक्षस, दैत्य, शत्रु, व्याघ्र अथवा सर्प—कोई भी द्वेष नहीं करते ।
जिसके समस्त अङ्ग उत्कृष्ट शमरूपी अमृत-कवचसे भली-भाँति सुरक्षित हैं, उसे दुःख उसी प्रकार पीड़ा नहीं पहुँचा सकते, जैसे बाण हीरेको बेधनेमें असमर्थ होते हैं । निर्मल तथा शमविभूषित समबुद्धिसे पुरुषकी जैसी शोभा होती है, वह शोभा अन्तःपुरमें विराजमान राजाको भी नसीब नहीं होती । शमयुक्त अन्तःकरणवाले पुरुषका दर्शन करनेसे मनुष्यको जो शान्ति प्राप्त होती है, वह प्राणोंसे भी अधिक प्रिय स्वजनके मिलनेसे भी नहीं उपलब्ध होती । इस लोकमें जो शमसे सुशोभित तथा लोगोंद्वारा प्रशंसित समवृत्तिसे सबके साथ उत्तम बर्ताव करता है, उसीका जीवन सार्थक है; इसके विपरीतका जीवन तो निरर्थक ही है। जिसका मन उद्दण्डतारहित हो गया है, ऐसा शमपरायण श्रेष्ठ पुरुष जो कर्म करता है, उसके उस कर्मकी ये समस्त प्राणी प्रशंसा करते हैं ।
जो पुरुष प्रिय और अप्रियको सुनकर, स्पर्शकर, देखकर, खाकर और सूँघकर न तो हर्षित होता है और न खिन्न होता है, वह 'शान्त' कहा जाता है। जो प्रयत्नपूर्वक इन्द्रियोंको अपने वशमें करके समस्त प्राणियोंके साथ समतापूर्ण व्यवहार करता है तथा न तो भविष्यकी आकाङ्क्षा करता है और न प्राप्तका परित्याग करता है, वह 'शान्त' कहलाता है । जिसका मन मरण, उत्सव और युद्धके अवसरपर भी व्याकुल न होकर चन्द्रमण्डलके समान निर्मल आभासे युक्त रहता है, वह 'शान्त' कहा जाता है । हर्ष और कोपका अवसर उपस्थित होनेपर भी जो पुरुष वहाँ अनुपस्थितके समान न तो हर्षको प्राप्त होता है और न क्रोध ही करता है, बल्कि उसका मन गाढ़ निद्रामें सोये हुए पुरुषके मनके समान निर्विकार रहता है, वह 'शान्त' पदसे व्यवहृत होता है । जिसकी अमृत-प्रवाहके सदृश सुखदायिनी तथा प्रेमपूर्ण दृष्टि सभी प्राणियोंपर समानरूपसे पड़ती है, उसकी 'शान्त' संज्ञा होती है । जिसका अन्तःकरण शीतल हो गया है एवं जिसकी बुद्धि मोहाच्छन्न नहीं है तथा जो लौकिक विषयोंके साथ व्यवहार करता हुआ भी उनमें आसक्त नहीं होता, उसे लोग 'शान्त' कहते हैं । सम्यक् प्रकारसे व्यवहार करते हुए भी जिस पुरुषकी बुद्धि आकाशके सदृश निर्विकार रहती है, राग-द्वेषरूप कलङ्कसे लिप्त नहीं होती, उसे 'शान्त' कहा जाता है ।
तपस्वियों, विद्वानों, याजको, नरेशों, बलवानो और गुणियोंके समुदायमें शमयुक्त पुरुषकी ही विशेष शोभा होती है । जिन गुणशाली महापुरुषोंका मन शममें आसक्त हो गया है, उनके चित्तसे निवृत्तिका उदय होता है, ठीक उसी तरह जैसे चन्द्रमासे चाँदनी प्रकट होती है । जो गुणसमूहोंकी परमावधि है तथा जो पुरुषार्थका मुख्य भूषण है, वह श्रीसम्पन्न शम संकटों तथा सम्पूर्ण स्थानोंमें भी अपने प्रभावसे सुशोभित होता रहता है । रघुनन्दन ! जिसका अन्य पुरुष अपहरण नहीं कर सकते, जो पूज्य जनोंद्वारा सावधानी-के साथ सुरक्षित एवं अमृतस्वरूप है, उस शमरूप उत्कृष्ट साधनका आश्रय लेकर बहुत-से महानुभाव जिस क्रमसे परम पदको प्राप्त हो चुके हैं, तुम भी परम पुरुषार्थकी सिद्धिके लिये उसी क्रमका अनुसरण करो ।
(सर्ग १२-१३)
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * विचार, संतोष और सत्समागमका विशेषरूपसे वर्णन * ८७
विचार, संतोष और सत्समागमका विशेषरूपसे वर्णन तथा चारों गुणोंमेंसे एक ही गुणके सेवनसे सद्गतिका कथन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—राघव ! ( विषय, संदेह, पूर्वपक्ष, सिद्धान्त और प्रयोजनरूप ) कारणोंके ज्ञाता पुरुषको शास्त्रज्ञानसे निर्मल हुई अतएव परम पवित्र बुद्धिद्वारा निरन्तर आत्मचिन्तन करना चाहिये; क्योंकि आत्मविषयक विचार करनेसे बुद्धि तीव्र होकर परम पदका साक्षात्कार कर लेती है। संसाररूपी महारोगके लिये विचार ही महौषध है। जो अनन्त कामनारूपी पल्लवोंसे सुशोभित है, ऐसा आपत्तिरूपी वन विचाररूपी आरेसे काट दिये जानेपर पुनः अङ्कुरित नहीं होता। लौकिक दुःखसे पार होनेके लिये विद्वानोंके पास विचारके अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है। सत्पुरुषोंकी बुद्धि विचारसे अशुभका परित्याग करके शुभको प्राप्त होती है। बुद्धिमानोंके बल, बुद्धि, सामर्थ्य, कर्तव्यका ज्ञान, क्रिया और उसका फल—ये सभी विचारसे ही सफल होते हैं। अतः जो उचित-अनुचितके रहस्योद्घाटनके लिये महान् दीपकके समान है तथा अभीष्टकी सिद्धि करनेवाला है, उस उत्कृष्ट विचारका आश्रय लेकर संसार-सागरको पार करना चाहिये। क्योंकि विशुद्ध विचाररूपी सिंह हृदयस्थित विवेकरूपी कमलोंको उखाड़ फेंकनेवाले महामोहरूपी गजराजोंको विदीर्ण कर डालता है। जो लोग विचारका अभ्युदय करनेवाली बुद्धिद्वारा सबके साथ व्यवहार करते हैं, वे निश्चय ही अत्यन्त श्रेष्ठ फलोंके भागी होते हैं। सद्विचारपरायण मनुष्य अत्यन्त विस्तृत महान् आपत्तियोंसे युक्त मोहकी परिस्थितियोंमें उसी प्रकार निमग्न नहीं होता, जैसे सूर्य अन्धकारमें नहीं डूबते। जितने क्रूर कर्म, निषिद्धाचरण और कुत्सित मानसिक कष्ट हैं, वे सभी विचारहीनतासे ही आविर्भूत होते हैं। जिस अधिकारी पुरुषका मन आशाकी परवशतासे रहित और विचारयुक्त है, वह पूर्ण चन्द्रमाकी भाँति अपने आत्मामें परमानन्दका अनुभव करता है। जब मनमें विवेकशीलताका उदय होता है, तब वह सारे विश्वको शीतल एवं सुशोभित करनेवाली चन्द्रमाकी चाँदनीकी भाँति सबको अत्यन्त शीतल और अलंकृत कर देती है। जगत्के सारे पदार्थ तभीतक सत्यकी तरह रमणीय प्रतीत होते हैं, जबतक विचार नहीं किया जाता। वस्तुतः उनका कोई अस्तित्व नहीं है, अतः विचार करनेपर वे नष्ट हो जाते हैं। जो समस्वरूप, आनन्दमय, अक्षय, अनन्त और अनन्याधीन है, उस कैवल्य पदको तुम विचाररूप महान् वृक्षका फल समझो। जो चित्तमें स्थित होकर उत्तम अचल स्थिति प्रदान करनेवाली है, उस आत्म-विचाररूपी महौषधिसे युक्त श्रेष्ठ पुरुष न तो अप्राप्तकी आकाङ्क्षा करता है और न प्राप्तका परित्याग ही। विचारशील पुरुष गयी हुई वस्तुकी उपेक्षा कर देता है और प्राप्त वस्तुका शास्त्रानुसार उपयोग करता है। वह मनकी प्रतिकूलतामें न तो क्षुब्ध होता है और न अनुकूलतामें प्रसन्न ही। उस समय जलसे परिपूर्ण सागरकी तरह उसकी शोभा होती है। इस प्रकार जिन उदाराशय महात्मा योगियोंका मन पूर्णकाम हो गया है, वे जीवन्मुक्त होकर इस जगत्में विचरण करते हैं। बुद्धिमान् पुरुषको आपत्तिकालमें भी 'मैं कौन हूँ ! यह संसार किसका है ?' यों उसके प्रतीकारके लिये प्रयत्नपूर्वक विचार करना चाहिये। जैसे रात्रिमें भूतलपर पदार्थोंका ज्ञान दीपकसे होता है, उसी प्रकार परमात्मस्वरूपमें स्थिति प्राप्त करनेके लिये वेद-वेदान्तके सिद्धान्तोंकी स्थितियोंका निर्णय विचारद्वारा होता है। विचाररूपी सुन्दर नेत्र अन्धकारमें नष्ट नहीं होता, उग्र तेजस्वी सूर्य आदिकी ओर देखनेपर भी उसकी ज्योति प्रतिहत नहीं होती और वह व्यवधानयुक्त पदार्थोंको
११—प्रकरणोंके क्रमसे ग्रन्थ-संख्याका वर्णन, ग्रन्थकी प्रशंसा, शान्ति, ब्रह्म, द्रष्टा और दृश्यका विवेचन, परस्पर सहायक प्रज्ञा और सदाचारका वर्णन
८८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
भी देख लेता है। यह विचार-चमत्कृति परमात्ममयी, आदरणीया और परमानन्दकी एकमात्र साधिका है; अतः एक क्षणके लिये भी इसका परित्याग नहीं करना चाहिये। जैसे पक जानेके कारण मधुर रससे परिपूर्ण आमका फल सबके लिये रुचिकर होता है, उसी तरह उत्तम विचारसे युक्त पुरुष, सामान्य जनोंकी तो बात ही क्या, महापुरुषोंके लिये भी आदरणीय हो जाता है। विचारद्वारा जिनकी बुद्धि विशुद्ध हो गयी है और विचारसे ही जिन्हें ज्ञानमार्गमें जानेकी युक्ति ज्ञात है, वे मनुष्य नाना प्रकारके दुःखरूप गड्ढोंमें बार-बार नहीं गिरते अर्थात् आवागमनसे मुक्त हो जाते हैं। सैकड़ों अनर्थोंके संयोगसे जिसका शरीर जर्जर हो गया है तथा जो रोगग्रस्त है, वह वैसा रुदन नहीं करता, जैसा वह मूर्ख विलाप करता है, जिसने विचारहीनतासे अपने आत्माका हनन कर दिया है। विचारहीनता सारे अनर्थोंका निजी निवासस्थान है। सभी सत्पुरुष उसका तिरस्कार करते हैं और वह सारी दुर्गतियोंकी चरम सीमा है, अतः उसका परित्याग कर देना चाहिये। विचारपूर्वक स्वयं ही अपनी बुद्धिद्वारा अपने मनको वशमें करके मोहमय संसारसागरसे अपने मनरूपी मृगका उद्धार करना चाहिये। मैं कौन हूँ और यह संसारनामक दोष मेरे निकट कैसे आ गया—इस विषयमें न्यायपूर्वक किया गया अनुसंधान 'विचार' कहलाता है। रघुनन्दन ! इस जगत्में सत्यके ग्रहण और असत्यके त्यागकी बुद्धिसे सम्पन्न पुरुषोंको विचारके बिना उत्तम तत्त्वका कुछ भी ज्ञान नहीं होता। विचारसे ही तत्त्वका ज्ञान होता है, तत्त्वज्ञानसे मनकी निश्चलता प्राप्त होती है और मनके शान्त हो जानेसे सम्पूर्ण दुःखोंका सर्वथा विनाश हो जाता है। भूतलपर सभी लोग स्पष्ट विचारदृष्टिसे ही समस्त कर्मोंकी सफलता लाभ करते हैं तथा उत्तम परमात्मसाक्षात्कारतां भी विचारसे ही उपलब्ध होती है, इसलिये श्रीराम ! शमादि साधनसम्पन्न तुम्हें उपर्युक्त विचारशीलता रुचिकर होनी चाहिये।
परंतप राम ! संतोष ही परम श्रेय है और संतोष परम सुख भी कहा जाता है। संतोषयुक्त पुरुष परम विश्रामको प्राप्त होता है। जो संतोषरूपी ऐश्वर्यके सुखसे सम्पन्न हैं तथा जिनका चित्त निरन्तर विश्रामपूर्ण रहता है, ऐसे शान्त पुरुषोंको विशाल साम्राज्य भी पुराने घासके टुकड़ेके समान प्रतीत होता है। श्रीराम ! संतोषयुक्त बुद्धि संसारकी विषम परिस्थितियोंमें भी न तो उद्विग्न होती है और न कभी उसका विनाश ही होता है। जो शान्त पुरुष संतोषामृतके पानसे पूर्णतः तृप्त हो चुके हैं, उनके लिये यह अपरिमित भोगसम्पत्ति विष-सी जान पड़ती है। रागादि दोषोंका विनाशक तथा अत्यन्त मधुर आस्वादसे युक्त संतोष जैसा सुखद होता है, वैसा सुख ये अमृतरसकी लहरियाँ नहीं दे सकतीं। जो अप्राप्त वस्तुकी आकाङ्क्षाका परित्याग करके प्राप्त हुई वस्तुमें समभाव रखनेवाला है तथा जिसमें हर्ष-शोकके विकार परिलक्षित नहीं होते, वह मनुष्य इस लोकमें संतुष्ट कहा जाता है। जबतक मन आत्माके द्वारा आत्मामें संतुष्ट नहीं हो जाता, तबतक उस मनरूपी गड्ढेसे उसी प्रकार आपत्तियाँ उद्भूत होती रहती हैं, जैसे गड्ढेसे लताएँ। संतोषसे शीतल हुआ मन विशुद्ध विज्ञानकी दृष्टियोंसे अत्यन्त विकासको प्राप्त होता है—ठीक उसी तरह, जैसे सूर्यकी किरणोंके सम्पर्कसे कमल विकसित हो जाता है। जैसे मलिन दर्पणमें मुखकी छाया नहीं दीखती, उसी प्रकार आशाकी परवशतासे व्याकुल एवं संतोषरहित चित्तमें ज्ञानका प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता। जिसका मन शारीरिक तथा मानसिक क्लेशोंसे मुक्त एवं संतुष्ट है, वह प्राणी दरिद्र होते हुए भी सच्चे साम्राज्यसुखका उपभोग करता है। अपने आत्मामें आत्मासे ही स्वयं सम्यक् प्रकारसे निरतिशय पूर्णानन्दका आश्रय लेकर पुरुषार्थद्वारा प्रयत्नपूर्वक सभी विषयोंमें तृष्णा-
मुमुक्षुव्यवहार-प्रकरण ] * विचार, संतोष और सत्समागमका विशेषरूपसे वर्णन * ८९
का परित्याग कर देना चाहिये। चन्द्रमाकी भाँति संतोषामृतसे परिपूर्ण मनुष्यका मन शान्त एवं शीतल बुद्धिद्वारा स्वयं ही शाश्वती स्थिरताको प्राप्त हो जाता है। जब संतोषसे सम्पन्न पुरुष अपने आत्मामें आत्माद्वारा स्वस्वरूपसे स्थित हो जाता है, उस समय उसकी सारी मानसिक व्यथाएँ उसी प्रकार अपने-आप शीघ्र ही समूल विनष्ट हो जाती हैं, जैसे वर्षा-ऋतुमें धूल शान्त हो जाती है। श्रीराम ! जिसकी वृत्ति सदा शीतल और कलङ्कसे सर्वथा रहित है, वह पुरुष अपनी उस शुद्ध वृत्तिद्वारा चन्द्रमाकी भाँति पूर्णतया शोभित होता है। रघुनन्दन ! इस जगत्में जो पुरुषश्रेष्ठ गुणी पुरुषोंद्वारा अभिमत समतासे सुशोभित है, उस विशुद्ध पुरुषको आकाशचारी देवता और महामुनि भी प्रणाम करते हैं।
महाबुद्धिमान् राम ! इस संसारमें श्रेष्ठ संत-समागम मनुष्योंका संसार-सागरसे उबारनेमें सर्वत्र विशेषरूपसे उपकार करता है। जो महात्मा पुरुष सत्संगतिरूपी वृक्षसे उत्पन्न हुए विवेक नामक निर्मल पुष्पकी रक्षा करते हैं, वे मोक्ष-फलरूपी सम्पत्तिके अधिकारी होते हैं। जो आपत्तीरूपी कमलिनीके लिये हिम और मोहरूपी कुहरेके लिये वायुके समान है, वह उत्तम संत-समागम ही इस जगत्में सर्वोत्कृष्ट है। श्रीराम ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि संत-समागम विशेषरूपसे बुद्धिपूर्वक, अज्ञानरूपी वृक्षका उच्छेदक और मानसिक व्यथाओंको दूर भगानेवाला है। सत्सङ्गसे प्राप्त हुई दिव्य विभूतियाँ ऐसा परम उत्तम निर्वाण-सुख प्रदान करती हैं, जो सतत वर्धनशील, अविनाशी और बाधारहित होता है। अतएव अत्यन्त कष्टदायिनी दशामें पड़कर विवशताको प्राप्त हुए मनुष्योंको भी थोड़े समयके लिये भी सत्संगतिका परित्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि लोकमें सत्संगति सन्मार्गको प्रकाशित करनेवाली और हृदयान्धकारको दूर करनेके लिये ज्ञानरूपी सूर्यकी प्रभा है। जिसने सत्संगतिरूपी गङ्गामें, जो शीतल एवं निर्मल है, स्नान कर लिया, उसे दान, तीर्थ, तप और यज्ञोंसे क्या लेना है अर्थात् सत्संगति इन सबसे बढ़कर है। जो रागशून्य और संशयरहित हैं तथा जिनकी चिज्जड-ग्रन्थियाँ विनष्ट हो चुकी हैं, ऐसे सत पुरुष यदि लोकमें विद्यमान हैं तो तप एवं तीर्थोंके संग्रहसे क्या लाभ ! अर्थात् वह फल तो उन संतोंकी संगतिसे ही प्राप्त हो सकता है। इसलिये जिनकी चिज्जडग्रन्थियोंका विनाश हो गया है एवं जो ब्रह्मज्ञानी हैं, उन सर्वसम्मत संतोंकी सभी उपायोंद्वारा भलीभाँति सेवा करनी चाहिये, क्योंकि वे भवसागरसे पार होनेके लिये साधन हैं। किंतु जो लोग नरकाग्निको बुझानेके लिये मेघस्वरूप संतोंको अवहेलनाकी दृष्टिसे देखते हैं, वे स्वयं उस नरकाग्निकी सूखी लकड़ी बन जाते हैं।
संतोष, सत्संगति, विचार और शम—ये ही चारों मनुष्योंके लिये भवसागरसे तरनेके साधन हैं। इनमें संतोष परम लाभ है। सत्संगति परम गति है। विचार उत्तम ज्ञान है और शम परमोत्कृष्ट सुख है। ये चारों संसारका समूल विनाश करनेके लिये विशुद्ध उपाय हैं। जिन्होंने इनका भलीभाँति सेवन किया, वे मोहजलसे परिपूर्ण भवसागरसे पार हो गये। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राम ! इन चारों साधनोंमेंसे विशुद्ध प्रकाशवाले एक ही साधनका अभ्यास हो जानेपर शेष तीनों भी अवश्य अभ्यस्त हो जाते हैं; क्योंकि इनमेंसे एक-एक भी क्रमशः इन चारोंकी जन्मभूमि है। अतः सबकी सिद्धिके लिये यत्नपूर्वक एकका तो पूर्णरूपसे आश्रय लेना ही चाहिये। जैसे प्रशान्त सागरमें जलयान स्वच्छन्द गतिसे चलते हैं, उसी प्रकार शमद्वारा निर्मल हुए हृदयमें सत्समागम, संतोष और विचार उत्तम धारणापूर्वक प्रवृत्त होते हैं। जो प्राणी विचार, संतोष, शम और सत्समागमसे सम्पन्न है, उसे दिव्य ज्ञान-सम्पत्तियाँ उपलब्ध हो जाती हैं—ठीक उसी तरह, जैसे कल्पवृक्षका आश्रय लेनेवाले पुरुषको लौकिक