भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * भुशुण्डके द्वारा अपने जन्मवृत्तान्तके प्रसङ्गमें महादेवजी तथा मातृकाओंका वर्णन * ३७९


भुशुण्डका वसिष्ठजीसे अपने जन्मवृत्तान्तके प्रसङ्गमें महादेवजी तथा मातृकाओंका वर्णन करते हुए अपनी उत्पत्ति, ज्ञान-प्राप्ति और उस घोंसलेमें आनेका वृत्तान्त कहना

भुशुण्ड बोला—मुनिवर वसिष्ठजी ! इस जगत्‌में देवाधिदेव महादेव समस्त स्वर्गवासी देवताओंमें श्रेष्ठ हैं। ब्रह्मादि देवता भी उनकी अभिवन्दना करते हैं। उनके शरीरके वामार्धमें सौन्दर्यशालिनी भगवती पार्वती विराजमान रहती हैं। उन महादेवजीके मस्तकपर गङ्गारूपी पुष्पमाला सुशोभित है, जो हिमके हारकी भाँति धवल तथा लहरीरूपी पुष्प-गुच्छोंसे गुँथी हुई है। उस मालाने ही उनके जटा-जूटको आवेष्टित कर रखा है। क्षीरसागरसे जिसकी उत्पत्ति हुई है तथा जिससे अमृतके झरने झरते रहते हैं, वह शोभाशाली चन्द्रमा उनके ललाटमें स्थित है। उस चन्द्रमाके अनवरत अमृत-प्रवाहसे अभिषिक्त होनेके कारण जिसकी विषैली शक्ति शान्त होकर अमृत-स्वरूपिणी हो गयी है तथा जिसका वर्ण इन्द्रनीलमणिके समान श्याम है, वह कालकूट विष उनके कण्ठमें आभूषणके समान सुशोभित है। निर्मल अग्निसे जिसकी उत्पत्ति हुई है, वह अत्यन्त शुभ्र भस्म उन महादेवजीका भूषण है। आकाश ही उनका वस्त्र है, जो चन्द्रमाकी सुधाधारासे प्रक्षालित, नील मेघके समान सुशोभित और तारारूपी बिन्दुओंसे समन्वित है। हिलनेके कारण जिनके मस्तककी मणियाँ चमक रही हैं तथा जिनकी कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान है, ऐसे चिकने अङ्गवाले सर्प ही उनके हाथके कङ्कण हैं। उनका मुख तीन नेत्रोंसे देदीप्यमान है। जैसे प्रमथगण उनके परिवाररूप हैं, उसी प्रकार निर्मल कान्तिवाली मातृकाएँ भी उनके परिवारमें ही हैं। ये मातृकाएँ पर्वतशिखरोंपर, आकाशमें, विभिन्न लोकोंमें, गड्डोंमें, श्मशानोंमें तथा प्राणियोंके शरीरोंमें निवास करती हैं। उन सभी मातृकाओंमें जया, विजया, जयन्ती, अपराजिता, सिद्धा, रक्ता, अलम्बुषा और उत्पला—ये आठ मातृदेवियाँ प्रधान हैं। शेष माताएँ इन्हीं आठोंका अनुगमन करती हैं।

दूसरोंको मान देनेवाले मुनीश्वर ! उन महामहिमा-शालिनी मातृकाओंमें माता अलम्बुषा अत्यन्त निष्णात हैं। उनका वाहन कौआ है। उस कौएका नाम चण्ड है। वह इन्द्रनील-पर्वतके समान नीला है तथा उसके ठोरकी हड्डी वज्रके समान कठोर है। एक समयकी बात है, भयंकर चेष्टावाली तथा अष्ट सिद्धियोंसे सम्पन्न वे सभी मातृकाएँ किसी कारणवश आकाशमें इकट्ठी हुईं। वहाँ उन सबका एक महोत्सव हुआ, जो नाच-गान आदिसे अत्यन्त मनोहर था। उस उत्सवमें ब्राह्मी देवीके रथमें जुतनेवाली उनकी ज्ञानी हंसियों और अलम्बुषा देवीका वाहन चण्डनामक काक—ये सभी