भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 750 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 423
३८२* अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् *[ संक्षिप्त योगवासिष्ठ

'तुम्हारी कितनी आयु है और तुम किन-किन वृत्तान्तोंका स्मरण करते हो ?' वसिष्ठजीद्वारा पूछे हुए इन प्रश्नोंका भुशुण्डद्वारा समाधान

भुशुण्डने कहा—मुने ! मैं जो निर्विघ्नतापूर्वक आपका दर्शन कर रहा हूँ, इससे प्रतीत होता है कि चिरकालसे संचित किये गये मेरे पुण्योंका फल आज ही प्रकट हुआ है। मुनिराज ! आज आपके दर्शनसे यह घोंसला, यह शाखा, यह मैं और यह कल्पतरु—ये सब-के-सब पवित्र हो गये।

श्रीवसिष्ठजीने पूछा—पक्षिराज ! उस प्रकार बलवान् एवं अगाध बुद्धिसम्पन्न तुम्हारे भाई यहाँ दिखायी क्यों नहीं देते ? अकेले तुम्हीं क्यों दृष्टिगोचर हो रहे हो ?

भुशुण्डने कहा—निष्पाप महर्षे ! हमलोगोंको यहाँ रहते बहुत लम्बा समय व्यतीत हो गया, यहाँतक कि दिनकी भाँति युगोंकी पङ्क्तियाँ समाप्त हो गयीं। अतः इतना लंबा समय बीत जानेके कारण मेरे सभी छोटे भाई तृणकी तरह अपने शरीरोंका त्याग करके कल्याण-मय शिवपदमें लीन हो गये; क्योंकि चाहे कोई दीर्घायु हो, महान् हों, सज्जन हों, बलवान् हों—कैसे भी क्यों न हों, अलक्षितस्वरूपवाला काल सभीको निगल जाता है।

श्रीवसिष्ठजीने पूछा—प्यारे वायसराज ! जिस समय प्रलयवायु अनवरत वेगपूर्वक बहने लगती है, उस समय क्या तुम्हें खेद नहीं होता ? उदयाचल और अस्ताचलके अरण्यसमूहोंको भस्म करनेवाली सूर्यकी किरणोंसे क्या तुम्हें कष्ट नहीं होता ? यह कल्पवृक्ष जो स्वयं ही अत्यन्त ऊँचा है तथा ऊँचे-से-ऊँचे स्थानपर स्थित है, जागतिक विषम क्षोभोंसे क्षुब्ध क्यों नहीं होता ?

भुशुण्डने कहा—भगवन् ! हम सदा परमात्मामें ही संतोष मानकर स्थित रहते हैं, इसलिये भ्रमके अवसर आनेपर भी हमें कभी इस जगत्में भ्रम नहीं होता। ब्रह्मन् ! हम अपने स्वभावमात्रसे संतुष्ट रहते हैं और कष्ट-दायक विचारोंसे मुक्त होकर अपने इस घोंसलेमें रहकर केवल काल्यापन करते हैं। हमें न तो इस देहके जीवित रहनेसे किसी फलकी अभिलाषा है और न हम मरणद्वारा इसका विनाश ही चाहते हैं; क्योंकि हमलोग वर्तमान समयमें जिस प्रकार स्थित हैं, वैसे ही आगे भी स्थित रहेंगे। हमने प्राणियोंकी जन्म-मरण आदि दशाओंका अवलोकन कर लिया और हमारे मनने अपने चञ्चल स्वरूपका सर्वथा त्याग कर दिया है। निरन्तर शान्ति प्रदान करनेवाले अपने अविनाशी सच्चिदानन्दघनस्वरूप ज्ञानमें स्थित होकर मैं इस कल्पवृक्षके ऊपर बैठा हुआ सदा कालकी कलापूर्ण गतिको जानता रहता हूँ। ब्रह्मन् ! मैं रत्न-सदृश चमकीले पुष्प-गुच्छोंके प्रकाशसे युक्त इस कल्प लतागृहमें बैठकर प्राणायामके द्वारा योगबलसे सम्पूर्ण कल्पकी बात जान लेता हूँ। मैं इस ऊँचे शिखरपर बैठा हुआ अपनी बुद्धिसे लोकोंके कालक्रमकी स्थितिको जानता रहता हूँ। मुनिवर ! मेरा मन सार और असार वस्तुओंका विभाग करनेवाले ज्ञानकी प्राप्तिसे उत्तम शान्तिको प्राप्त हो गया है, अतः इसकी चञ्चलता नष्ट हो गयी है और अब यह शान्त होकर भलीभाँति स्थिर हो गया है। अगाध-बुद्धिसम्पन्न महर्षे ! सांसारिक व्यवहारोंसे उत्पन्न मिथ्या आशारूपी पाशोंसे बँधा हुआ भूलोकवासी साधारण कौआ जिस प्रकार सिसकारियोंसे भयभीत हो जाता है, उस प्रकार मैं भयभीत नहीं होता; क्योंकि उत्कृष्ट शान्तिरूप धर्मवाली तथा आत्मप्रकाशसे शीतल हुई बुद्धिद्वारा जागतिक मायाको देखते हुए हमलोग धैर्यसम्पन्न हो गये हैं, इसलिये भयंकर दशाओंमें भी हमारी बुद्धि पर्वतके समान स्थिर रहती है। परम ऐश्वर्यशाली मुने ! समस्त भूतसमुदाय व्यवहारदृष्टिसे आते और जाते हैं, परंतु परमार्थदृष्टिसे न कोई आता