संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
पृष्ठ 435, कुल 750 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३९४ | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
|---|
अनासक्तिका परित्याग करके अनायास ही शास्त्रविहित कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये, शास्त्रनिषिद्ध कर्मोंका कभी नहीं। अर्थात् उनकी सर्वथा उपेक्षा कर देनी चाहिये। यह दृश्यमान प्रपञ्च केवल प्रतीतिमात्र है, वास्तवमे कुछ नहीं है—यों जिस मनुष्यको भलीभाँति अनुभव हो जाता है, वह अपने भीतर परम शान्तिको प्राप्त कर लेता है। अथवा 'मैं और यह सारा प्रपञ्च चैतन्यात्मक परब्रह्मस्वरूप ही है'—इस प्रकार अनुभव करनेपर अनर्थकारी यह व्यर्थ जगद्रूपी आडम्बर प्रतीत नहीं होता। श्रीराम ! जो कुछ भी आकाशमें या स्वर्गमें या इस संसारमें सर्वोत्तम परमात्म-वस्तु है, वह एकमात्र राग-द्वेष आदि-के विनाशसे ही प्राप्त हो जाती है। किंतु राग-द्वेष आदि दोषोंसे आक्रान्त हुई बुद्धिके द्वारा जैसा जो कुछ किया जाता है, वह सब कुछ मूढोंके लिये तत्काल ही विपरीत रूप (दुःखरूप) हो जाता है। जो पुरुष शास्त्रोंमें निपुण, चतुर एवं बुद्धिमान् होकर भी राग-द्वेष आदिसे परिपूर्ण हैं, वे संसारमें शृगालके तुल्य हैं। उन्हें धिक्कार है। धन, बन्धुवर्ग, मित्र—ये सब बार-बार आते और जाते रहते हैं; इसलिये उनमें बुद्धिमान् पुरुष क्या अनुराग करेगा। कभी नहीं, उत्पत्ति-विनाशशील भोग-पदार्थोंसे परिपूर्ण संसारकी रचनारूप यह परमेश्वरकी माया आसक्त पुरुषोंको ही अनर्थ गर्तोंमें ढकेल देती है। राघव ! वास्तवमें धन, जन और मन सत्य नहीं हैं, किंतु मिथ्या ही दीख पड़ते हैं। क्योंकि आदि और अन्तमें सभी पदार्थ असत् हैं और बीचमें भी क्षणिक एवं दुःखप्रद है; इसलिये बुद्धिमान् पुरुष आकाश-वृक्षके सदृश कल्पित इस संसारसे कैसे प्रेम करेगा। (सर्ग २८)
संसार-चक्रके अवरोधका उपाय, शरीरकी नश्वरता और आत्माकी अविनाशिता एवं अहंकाररूपी चित्तके त्यागका वर्णन तथा श्रीमहादेवजीके द्वारा श्रीवसिष्ठजीके प्रति निर्गुण-निराकार परमात्माकी पूजाका प्रतिपादन
श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—रघुनन्दन ! जब केवल संकल्परूपी नाभिका भली प्रकार अवरोध कर दिया जाता है, तभी यह संसाररूपी चक्र घूमनेसे रुक जाता है। किंतु संकल्पात्मक मनोरूप नाभिको राग-द्वेष आदिसे क्षोभित करनेपर यह संसाररूपी चक्र रोकनेकी चेष्टा करनेपर भी वेगके कारण चलता ही रहता है। इसलिये परम पुरुषार्थका आश्रय लेकर श्रवण, मनन, निदिध्यासनकी युक्तियोंके द्वारा ज्ञानरूपी बलसे चित्तरूपी संसार-चक्रकी नाभिका अवश्य अवरोध करना चाहिये। क्योंकि कहींपर ऐसी कोई वस्तु उपलब्ध है ही नहीं, जो उत्तम बुद्धि तथा सौजन्यसे परिपूर्ण शास्त्रसम्मत परम पुरुषार्थसे प्राप्त न की जा सके।* श्रीराम ! आधि और व्याधिसे निरन्तर दुःखित, अश्रु आदिसे क्लिन्न तथा स्वयं विनाशशील इस शरीरमें उस प्रकारकी भी स्थिरता नहीं रहती, जिस प्रकारकी चित्रलिखित पुरुषमे रहती है। चित्रित मनुष्यकी यदि भलीभाँति रक्षा की जाय तो वह दीर्घकालतक सुशोभित रहता है; किंतु उसका बिम्बरूप शरीर तो अनेक यत्नोंसे रक्षित होनेपर भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। स्वप्न आदिका शरीर स्वप्नकालीन संकल्पसे जनित होनेके कारण दीर्घकालीन सुख-दुःखोंसे आक्रान्त नहीं होता। यह शरीर तो दीर्घकालीन संकल्पसे उत्पन्न होनेके कारण दीर्घकालके दुःखोंसे आक्रान्त रहता है। संकल्पमय यह शरीर स्वयं भी नहीं है और न आत्माके साथ इसका सम्बन्ध ही है; अतः इस शरीरके लिये यह अज्ञानी जीव निरर्थक क्लेशका भाजन क्यों बनता है ? अर्थात् इसमें एकमात्र अज्ञान ही हेतु हैं। जिस प्रकार चित्रलिखित पुरुषका क्षय या विनाश हो जानेपर बिम्बरूप देहकी हानि नहीं होती, उसी प्रकार संकल्पजनित पुरुषका क्षय या विनाश हो जानेपर आत्माकी कुछ भी
* प्रज्ञामौजन्ययुक्तेन शास्त्रसवलितेन च।
पौरुषेण न यत्प्राप्तं न तत्क्वचन लभ्यते ॥
(नि० पू० २९ । ८)