भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

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निर्वाण-प्रकरण पू० ] * परब्रह्म परमात्माके सत्ता-सामान्य स्वरूपका प्रतिपादन * ४२७

आदिरूप संसार-चक्रकी परम्परा कहते हैं । जैसे सुवर्णमें कड़ा-कुण्डल आदि सुवर्णसे पृथक् नहीं हैं, वैसे ही परमात्माका संकल्प यह संसार भी परमात्मासे पृथक् नहीं है । परमात्माके यथार्थ ज्ञानसे ही भोग-वासना क्षीण हो जाती है और भोग-वासनाका अभाव ही ज्ञानीका उत्तम लक्षण है । ज्ञान और वैराग्यके कारण तत्त्वज्ञ पुरुषको संसारके भोग स्वभावसे ही रुचिकर नहीं होते । यह संसार सर्वात्मस्वरूप परमात्मा ही है—इस प्रकारका जिसके हृदयमें दृढ अनुभव है, वही जीवन्मुक्त कहा गया है । किंतु यह जीवात्मा जबतक अज्ञानसे आवृत रहता है, तबतक दृश्य विषयभोगोंमें स्थित हुआ संसार-का संकल्प करता रहता है । जब अन्तःकरणमें उत्तम तत्त्वज्ञानका उदय हो जाता है, तब संकल्प-विकल्पका यह क्रम बुझे हुए दीपककी भाँति शान्त हो जाता है । स्वयंप्रकाश, चैतन्यरूप, सम्पूर्ण पदार्थोंका आश्रय और विषयोन्मुखतासे रहित शुद्ध चेतनका जो स्वरूप है, उसे ही तुम परमपद जानो । यह संसार संकल्पमय ही है; इसलिये संकल्प नष्ट हो जानेपर संसार भी नष्ट हो जाता है और फिर सच्चिदानन्द परमात्मा ही रह जाता है । ( सर्ग ५९ )

परब्रह्म परमात्माके सत्ता-सामान्य स्वरूपका प्रतिपादन

श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! इस प्रकार सबका आदि परमतत्त्व सच्चिदानन्दघन ही परमपद है । उस सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माको यथार्थ ज्ञानसे प्राप्त कर यह जीव अज्ञानियोंकी तरह मृत्युको नहीं प्राप्त होता ( अर्थात् वह जन्म-मरणसे छूट जाता है ) । उसे प्राप्तकर वह शोचनीय नहीं रह जाता । उसे पा लेनेपर वह अज्ञानियोंकी तरह जीवन धारण नहीं करता ( अर्थात् वह कुछ विलक्षण ही बन जाता है ) और उसे प्राप्तकर वह सर्वव्यापी होनेके कारण सीमाओंमें नहीं बँधता । आकाशके समान अनन्त परमात्माके सत्ता-सामान्य स्वरूपका यदि जीव थोड़ी देर और थोड़ा-सा भी चिन्तन करता है तो वह मुक्तचित्त मुनि बन जाता है और उस अवस्थामें संसारके समस्त कार्योंको करते हुए भी कभी संतप्त नहीं होता ।

श्रीरामचन्द्रजीने पूछा—महर्षे ! ‘सत्ता-सामान्य’ शब्दसे आप किसे ग्रहण करते हैं—मन, बुद्धि, अहंकार और चित्तका जहाँ लय हो गया है, उस ( निर्विशेष ) तत्त्वको या मन आदि विशेषताओंसे युक्त ( सविशेष ) तत्त्वको ?

श्रीवसिष्ठजीने कहा—श्रीराम ! जो सर्वव्यापक, आदि और अन्तसे रहित तथा सदा समभावसे स्थित है, वह ज्ञानसे प्राप्तव्य तथा सम्पूर्ण वस्तुओंका तत्त्वभूत ब्रह्म ही यहाँपर ‘सत्ता-सामान्य’ शब्दसे कहा गया है । वह ब्रह्म आकाशमें आकाशरूपसे, शब्दमें शब्दरूपसे, स्पर्शमें स्पर्शरूपसे तथा त्वचा में त्वग्रूपसे हैं । रसमें रसरूपसे, रसनेन्द्रियमें रसनेन्द्रियरूपसे विद्यमान है । रूपमें रूपस्वरूपसे, नेत्रमें नेत्ररूपसे, घ्राणेन्द्रियमें घ्राणरूपसे और गन्धमें गन्धरूपसे है । शरीरमें शरीररूप-से, पृथ्वीमें पृथ्वीरूपसे है । दूधमें दुग्धरूपसे, वायुमें वायुरूपसे, तेजमें तेजोरूपसे, बुद्धिमें बुद्धिरूपसे, मनमें मनरूपसे और अहंकारमें अहंकाररूपसे विद्यमान है । वृक्षमें वृक्ष रूपसे, पटमें पटरूपसे, घटमें घटरूपसे और वटमें वटरूपसे विद्यमान है । स्थावरमें स्थावररूपसे, जंगममें जंगमरूपसे, जडमें जडरूपसे और चेतनमें चेतनरूपसे विद्यमान है । देवोंमें देवरूपसे, मनुष्योंमें मनुष्यरूपसे, तिर्यक्-योनियोंमें तिर्यग्रूपसे और कृमियोनियोंमें कृमिरूपसे विद्यमान है । कालके क्रममें कालरूपसे, ऋतुओंमें ऋतुरूपसे एवं त्रुटि, क्षण, निमेष आदिमें भी वह सर्वव्यापी ब्रह्म ही उस-उस रूपसे विद्यमान है । इस प्रकार सभी पदार्थोंमें तत्-तत् रूपसे रहता

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