संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३० * अविच्छिन्नचिदात्मकैः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
कहते हैं। वही संसारका कारण है। वह चित्त सांख्य या योग दोनोंमेंसे किसी एक साधनके द्वारा विलीन होकर संसारकी निवृत्तिका कारण हो जाता है । यह संसार मनके संकल्पसे उत्पन्न हुआ है । उससे उत्पन्न ममता, अहंता, संसृति, उपदेश्य-उपदेशादि, बन्ध और मोक्षकी सत्ता ही कहाँ है अर्थात् सब संकल्पमात्र हैं। एक विज्ञानानन्दघन परमार्थ-तत्त्वका दृढ़ अभ्यास, प्राणोंका विलीन होना तथा मनोनाश—यही 'मोक्ष' शब्दके अर्थका संग्रह है यानी ये ही मोक्षके साधन हैं।
श्रीराम ! इन तीनो उपायोंमें मनोनाशको ही मुख्य साध्य जानो । मनोविनाश जितना ही शीघ्र होगा उतना ही शीघ्र कल्याण होगा। परमात्माके यथार्थज्ञानसे सभी पदार्थोंका अभाव हो जाता है, जिससे वासनाका विनाश होनेपर प्राण और चित्तका वियोग हो जाता है । फिर भलीभाँति शान्त हुआ मन देहरूपताको नहीं प्राप्त होता । मनके विनाशसे ही जीवात्माको परमपदकी प्राप्ति होती है, अतः मुनिगण वासनाको ही मन जानते हैं । चित्तका स्वरूप केवल वासना ही है । उस चित्तका अभाव होनेपर परमपद प्राप्त हो जाता है । रामभद्र ! रज्जुमें सर्पभ्रमके सदृश मिथ्यारूप इस संसारका स्वयं ही विवेकज्ञानसे अच्छी तरह विनाश हो जाता है । एक विज्ञानानन्दघन परमार्थ-तत्त्वका दृढ़ अभ्यास, प्राणनिरोध और मनोविनाश—ये जो तीन उपाय हैं, इनमेंसे किसी एककी सिद्धि हो जानेपर ही दूसरे भी परस्पर सिद्ध हो जाते हैं। ताड़के पत्तोंसे निर्मित पंखेको चलाना जब बंद कर दिया जाता है तब पवन जैसे अपने-आप शान्त हो जाता है, वैसे ही जब प्राणरूप वायुका स्पन्दन शान्त हो जाता है, तब मन भी अपने-आप शान्त हो जाता है। जैसे वायुका चलना रुक जानेपर गन्धका प्रसार भी रुक जाता है, वैसे ही मनका चलना रुक जानेपर प्राण-वायुओंका चलना भी रुक जाता है । सभी प्राणियोंके प्राण और चित्त दोनों उसी प्रकार एक दूसरेसे निरन्तर मिले-जुले रहते हैं, जिस प्रकार पुष्प और गन्ध एवं तिल और तेल एक दूसरेसे निरन्तर मिले-जुले रहते हैं । आधार और आधेयके समान अर्थात् अग्नि और उष्णताके समान दोनोंमेंसे किसी एकका विनाश हो जानेपर दोनों विनष्ट हो जाते हैं और अपने विनाशके द्वारा वे दोनों जीवात्माके लिये एक महान् मोक्षनामक कार्य सम्पन्न कर देते हैं । एक ब्रह्मतत्त्वके दृढ़ अभ्याससे द्वैत-वासनासे रहित होकर मन शान्त हो जाता है और इससे प्राण भी शान्त हो जाता है; क्योंकि प्राणका स्वभाव मनके साथ विलीन हो जाना ही है । मनुष्यको एक शुद्ध परमात्मतत्त्वमें तबतक तदाकारवृत्ति बनाये रखनी चाहिये, जबतक उस वृत्तिका ही अभ्यासके द्वारा अभाव न हो जाय । क्योंकि निग्रहवृत्तिसे युक्त पुरुषोंका चित्त स्वयं ही प्राणोंके साथ विलीन हो जाता है और परमतत्त्व अवशिष्ट रह जाता है । चित्त जिस किसी वस्तुमें तन्मय हो जाता है, वह शीघ्र तद्रूप ही बन जाता है; अतः दीर्घकालतक परमात्मतत्त्वके अभ्यासमे वह समस्त विशेषोंसे मुक्त होकर निर्विशेष ब्रह्मरूप ही हो जाता है । श्रीराम ! यदि परमपदमें चित्त मुहूर्तमात्र भी विश्रामको प्राप्त हो जाय तो उसे तुम ब्रह्मरूपमें ही परिणत हुआ समझो । जिसमे अविद्याका अभाव हो चुका है, ऐसा विशुद्ध चित्त 'सत्त्व'शब्दसे कहा जाता है। जिसमें संसारकी बीजरूपा वासना दग्ध हो गयी है, वह चित्त फिर कभी ब्रह्मरूपतासे अलग नहीं होता; क्योंकि वह ब्रह्ममें तद्रूप हो गया है । जिसकी अविद्या निवृत्त हो चुकी है, जो सत्त्वभावमें स्थित है, जो वासनारहित हो चुका है, ऐसा कोई विरला मनुष्य आकाशके समान निर्गुण-निराकार विज्ञानानन्दघन परमतत्त्वको देखता है और तत्काल मुक्त हो जाता है ।
(सर्ग ६९)