भारतकोश
संक्षिप्त योगवासिष्ठ

संक्षिप्त योगवासिष्ठ

Sankshipt Yoga Vasistha

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished750 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 750 में से

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वैराग्य-प्रकरण ] * विश्वामित्रकी प्रेरणासे राजा दशरथका श्रीरामको सभामें बुलाकर मस्तक सूंघना * ३५


गया है। तुम विविध कल्याणमय गुणोंके भाजन हो। तुम्हारे-जैसे पुरुष बड़े-बूढ़े लोगों, ब्राह्मणों तथा गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करते हुए ही पवित्र परमपद प्राप्त कर लेते हैं। जो लोग मोहका अनुसरण करते हैं, उन्हें वह पद नहीं प्राप्त होता। वत्स ! तभीतक आपत्तियाँ दुर्बल एवं तुच्छ होकर दूर ही रहती हैं (पास नहीं फटकने पातीं) जबतक कि मोहको फैलनेका अवसर नहीं दिया जाता।

इसके बाद श्रीवसिष्ठजीने कहा--महाबाहु राजकुमार ! तुम बड़े शूरवीर हो। तुमने उन विषयरूपी शत्रुओंपर भी विजय पा ली है, जो दुःखकी परम्पराके उत्पादक तथा बड़ी कठिनाईसे नष्ट होनेवाले हैं ऐसे प्रभावशाली होनेपर भी तुम अज्ञानी मनुष्योंके योग्य विक्षेपरूपी अगणित तरङ्गमालाओंसे युक्त तथा आवरणरूपी जडता (जलरूपता) से सुशोभित होनेवाले व्यामोहके समुद्रमें आत्मज्ञानशून्य पुरुषकी भाँति क्यों डूबे जा रहे हो ?

श्रीविश्वामित्रजीने कहा--राजकुमार ! हिलते हुए नील कमलोंके समूहकी भाँति जो तुम्हारे नेत्र चञ्चल हो रहे हैं, इसमें तुम्हारे चित्तकी व्यग्रता ही कारण है। इस व्यग्रताजनित नेत्रोंकी चञ्चलताको त्यागकर बताओ, क्यों मोहित हो रहे हो ? तुम्हारे इस मोह अथवा भ्रमका क्या कारण है ? निष्पाप श्रीराम ! तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसे शीघ्र बताओ। तुम्हें वह सब मनोरथ प्राप्त होगा, जिससे मानसिक व्यथाएँ फिर तुम्हें कष्ट नहीं पहुँचायेंगी।

उत्तम बुद्धिवाले विश्वामित्रजीका यह वचन, जिसके भीतर अपनी अभिलाषाके अनुरूप अर्थका प्रकाश निहित था, सुनकर रघुकुलकेतु श्रीरामने खेद त्याग दिया।

श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं--भरद्वाज ! मुनीश्वर विश्वामित्रके इस प्रकार पूछनेपर श्रीरामचन्द्रजीने धैर्य धारण करके परिपूर्ण अर्थके गौरवसे दबी हुई-सी मन्द-मन्द मनोहर वाणीमें कहा—


श्रीराम बोले-मुनीश्वर ! मैं अपने पिताजीके इस महलमें उत्पन्न हुआ, क्रमशः बढ़ा और फिर मैंने विद्या भी प्राप्त की। तत्पश्चात् सदाचारके पालनमें तत्पर रहकर तीर्थयात्राके उद्देश्यसे समुद्रोंद्वारा घिरी हुई सारी पृथ्वीपर भ्रमण किया। इतने समयमें मेरे मनमें जो विचार उत्पन्न हुआ, वह इस संसारविषयक आस्थाको उठा देनेवाला है। तीर्थयात्रा करनेके अनन्तर मेरा मन विवेकसे पूर्ण हो गया, जिससे मेरी बुद्धि भोगोंकी ओरसे नीरस (विरक्त) हो गयी और उसके द्वारा मैंने इस प्रकार विचारना आरम्भ किया—

'यह जो संसारका विस्तार है, इसमें क्या सुख है ? (कुछ भी तो नहीं है।) चर और अचर प्राणियोंकी चेष्टाओंके विषय तथा केवल वैभवकालमें ही रहनेवाले ये जितने भोगके साधनभूत पदार्थ हैं, सब-के-सब अस्थिर (क्षणभङ्गुर), आपत्तियोंके स्वामी (अर्थात् केवल विपत्तिमें ही डालनेवाले) तथा पापङ्करूप हैं। जैसे मरीचिकामें जल न होनेपर भी भ्रमसे उसे जल समझकर उसके द्वारा मोहित हुए मृग वनमें बड़ी दूरतक खिंचे चले जाते हैं, उसी प्रकार मूढ़बुद्धि हुए लोग संसारके पदार्थोंमें सुख न होनेपर भी उनमें सुख मानते हैं और उसीके लोभसे आकृष्ट होकर इधर-उधर भटकते रहते हैं। यद्यपि यहाँ लोग किसीके द्वारा बेंचे नहीं गये हैं तथापि बिके हुएके समान परवश हो रहे हैं। इस बातको जानते हुए भी कि यह सब कुछ मायाका खेल है, हम सब लोग मूढ बने बैठे हैं (इस मायासे मुक्त होनेका प्रयत्न नहीं करते), यह कितने खेदकी बात है !

संसारके इस प्रपञ्चमें जो अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण भोग दिखायी देते हैं, ये क्या हैं—इसपर विचार करना चाहिये। सब लोग व्यर्थ ही उनके मोहमें पड़कर भ्रान्तिवश अपनेको बद्ध मानकर बैठे हुए हैं। जैसे वनमें किसी गड्ढेके भीतर गिरे हुए मूढ़ मृग दीर्घकालके पश्चात् यह जान पाते हैं कि हम गड्ढेमें पड़े हैं, उसी प्रकार लोगोंने

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