संक्षिप्त योगवासिष्ठ
Sankshipt Yoga Vasistha
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
वैराग्य-प्रकरण ] * विश्वामित्रकी प्रेरणासे राजा दशरथका श्रीरामको सभामें बुलाकर मस्तक सूंघना * ३५
गया है। तुम विविध कल्याणमय गुणोंके भाजन हो। तुम्हारे-जैसे पुरुष बड़े-बूढ़े लोगों, ब्राह्मणों तथा गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करते हुए ही पवित्र परमपद प्राप्त कर लेते हैं। जो लोग मोहका अनुसरण करते हैं, उन्हें वह पद नहीं प्राप्त होता। वत्स ! तभीतक आपत्तियाँ दुर्बल एवं तुच्छ होकर दूर ही रहती हैं (पास नहीं फटकने पातीं) जबतक कि मोहको फैलनेका अवसर नहीं दिया जाता।
इसके बाद श्रीवसिष्ठजीने कहा--महाबाहु राजकुमार ! तुम बड़े शूरवीर हो। तुमने उन विषयरूपी शत्रुओंपर भी विजय पा ली है, जो दुःखकी परम्पराके उत्पादक तथा बड़ी कठिनाईसे नष्ट होनेवाले हैं ऐसे प्रभावशाली होनेपर भी तुम अज्ञानी मनुष्योंके योग्य विक्षेपरूपी अगणित तरङ्गमालाओंसे युक्त तथा आवरणरूपी जडता (जलरूपता) से सुशोभित होनेवाले व्यामोहके समुद्रमें आत्मज्ञानशून्य पुरुषकी भाँति क्यों डूबे जा रहे हो ?
श्रीविश्वामित्रजीने कहा--राजकुमार ! हिलते हुए नील कमलोंके समूहकी भाँति जो तुम्हारे नेत्र चञ्चल हो रहे हैं, इसमें तुम्हारे चित्तकी व्यग्रता ही कारण है। इस व्यग्रताजनित नेत्रोंकी चञ्चलताको त्यागकर बताओ, क्यों मोहित हो रहे हो ? तुम्हारे इस मोह अथवा भ्रमका क्या कारण है ? निष्पाप श्रीराम ! तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसे शीघ्र बताओ। तुम्हें वह सब मनोरथ प्राप्त होगा, जिससे मानसिक व्यथाएँ फिर तुम्हें कष्ट नहीं पहुँचायेंगी।
उत्तम बुद्धिवाले विश्वामित्रजीका यह वचन, जिसके भीतर अपनी अभिलाषाके अनुरूप अर्थका प्रकाश निहित था, सुनकर रघुकुलकेतु श्रीरामने खेद त्याग दिया।
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं--भरद्वाज ! मुनीश्वर विश्वामित्रके इस प्रकार पूछनेपर श्रीरामचन्द्रजीने धैर्य धारण करके परिपूर्ण अर्थके गौरवसे दबी हुई-सी मन्द-मन्द मनोहर वाणीमें कहा—
श्रीराम बोले-मुनीश्वर ! मैं अपने पिताजीके इस महलमें उत्पन्न हुआ, क्रमशः बढ़ा और फिर मैंने विद्या भी प्राप्त की। तत्पश्चात् सदाचारके पालनमें तत्पर रहकर तीर्थयात्राके उद्देश्यसे समुद्रोंद्वारा घिरी हुई सारी पृथ्वीपर भ्रमण किया। इतने समयमें मेरे मनमें जो विचार उत्पन्न हुआ, वह इस संसारविषयक आस्थाको उठा देनेवाला है। तीर्थयात्रा करनेके अनन्तर मेरा मन विवेकसे पूर्ण हो गया, जिससे मेरी बुद्धि भोगोंकी ओरसे नीरस (विरक्त) हो गयी और उसके द्वारा मैंने इस प्रकार विचारना आरम्भ किया—
'यह जो संसारका विस्तार है, इसमें क्या सुख है ? (कुछ भी तो नहीं है।) चर और अचर प्राणियोंकी चेष्टाओंके विषय तथा केवल वैभवकालमें ही रहनेवाले ये जितने भोगके साधनभूत पदार्थ हैं, सब-के-सब अस्थिर (क्षणभङ्गुर), आपत्तियोंके स्वामी (अर्थात् केवल विपत्तिमें ही डालनेवाले) तथा पापङ्करूप हैं। जैसे मरीचिकामें जल न होनेपर भी भ्रमसे उसे जल समझकर उसके द्वारा मोहित हुए मृग वनमें बड़ी दूरतक खिंचे चले जाते हैं, उसी प्रकार मूढ़बुद्धि हुए लोग संसारके पदार्थोंमें सुख न होनेपर भी उनमें सुख मानते हैं और उसीके लोभसे आकृष्ट होकर इधर-उधर भटकते रहते हैं। यद्यपि यहाँ लोग किसीके द्वारा बेंचे नहीं गये हैं तथापि बिके हुएके समान परवश हो रहे हैं। इस बातको जानते हुए भी कि यह सब कुछ मायाका खेल है, हम सब लोग मूढ बने बैठे हैं (इस मायासे मुक्त होनेका प्रयत्न नहीं करते), यह कितने खेदकी बात है !
संसारके इस प्रपञ्चमें जो अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण भोग दिखायी देते हैं, ये क्या हैं—इसपर विचार करना चाहिये। सब लोग व्यर्थ ही उनके मोहमें पड़कर भ्रान्तिवश अपनेको बद्ध मानकर बैठे हुए हैं। जैसे वनमें किसी गड्ढेके भीतर गिरे हुए मूढ़ मृग दीर्घकालके पश्चात् यह जान पाते हैं कि हम गड्ढेमें पड़े हैं, उसी प्रकार लोगोंने
**८—धन-सम्पत्ति तथा आयुकी निस्सारता एवं दुःखरूपताका वर्णन**
| ३६ | * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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बहुत समयके बाद यह जाना है कि हम मूढ़ जीव व्यर्थ ही मोहमें पड़े हुए हैं। मुझे राज्यसे क्या लेना है और भोगोंसे भी क्या प्रयोजन है ? मैं कौन हूँ ? यह दृश्य-प्रपञ्च क्या है और किस लिये सामने आया है ? जो मिथ्या है, वह मिथ्या ही रहे। उसके मिथ्या होनेसे किसकी क्या हानि होनेवाली है। ब्रह्मन् ! जैसे यत्र-तत्र भ्रमण करनेवाले पथिकको मरुभूमिसे विरक्ति हो जाती है, वैसे ही इस प्रकार विचार करते-करते सभी भोग्य पदार्थोंसे मेरी अरुचि हो गयी है।
मुनीश्वर ! देखिये, भिन्न-भिन्न रूपोंमें उपलब्ध होनेवाले उन तुच्छ भोगोंने हमको उसी प्रकार जर्जर बना दिया है, जैसे प्रचण्ड वायु पर्वतीय वृक्षोंको जर्जर कर देती है। सब लोग अचेतन-से होकर प्राणनामधारी पवनसे प्रेरित हो व्यर्थ ही शब्दोच्चारण कर रहे हैं, जैसे कीचक नामक बाँस अपने छेदोंमें हवा भर जानेसे बाँसुरीकी-सी ध्वनि करने लगते हैं। संसारकी सम्पदाएँ सदा सबकी वञ्चना करती रहती हैं। ये मनुष्योंकी मनोवृत्तिको मोह लेती हैं, उनकी सद्गुण-राशिका नाश कर देती हैं और तरह-तरहके दुःख दिया करती हैं। दुःखोंका जाल-सा बिछाती रहती हैं। ये धन-वैभव चिन्ताओंके चक्करमें डालनेवाले हैं, इसलिये मुझे आनन्द नहीं देते तथा बच्चोंवाली स्त्रियोंसे भरे हुए घर भी भयानक विपत्तियोंके आवास-स्थानकी भाँति मुझे दुःख ही प्रदान करते हैं, सुख नहीं। मुने ! जैसे बाँस और तिनकोंसे आच्छादित गर्तमें गिरनेके कारण प्राप्त होनेवाले क्षुधा, पिपासा आदि दोषोंका तथा बन्धन आदि दुर्दशाओंका विचार करते रहनेसे बँधे हुए हाथीको कभी सुख नहीं मिलता, उसी प्रकार देह आदि पदार्थोंकी क्षणभङ्गुरताके कारण उनमें अनेक प्रकारके दोषों और दुर्दशाओंका स्मरण करके मेरे मनको भी शान्ति नहीं मिल रही है। अज्ञानरूपी रात्रिमें तीव्र मोहरूपी कुहरेसे लोगोंकी ज्ञानरूपी ज्योतिके नष्ट हो जानेपर दूसरोंको दुःख देनेमें परम चतुर विषयरूपी सैकड़ों चोर हर समय और प्रत्येक दिशामें विवेकरूपी श्रेष्ठ रत्नका अपहरण करनेके लिये जी-जानसे लगे हुए हैं। युद्धमें उन्हें मार भगानेके लिये तत्त्वज्ञानी पुरुषोंको छोड़कर दूसरे कौन-से सुभट समर्थ हो सकते हैं (तत्त्वज्ञानी ही उनको नष्ट करनेमें समर्थ हैं, दूसरे नहीं)। (सर्ग ११-१२)
धन-सम्पत्ति तथा आयुकी निस्सारता एवं दुःखरूपताका वर्णन
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुने ! यह लक्ष्मी, यह धन-सम्पत्ति संसारमें यदि स्थिर होकर रहे तो बहुत-से सुखोंकी साधनभूत होनेके कारण वह सबसे उत्कृष्ट वस्तु है—यह मूढ़ मनुष्योंकी ही कल्पना है। वास्तवमें न तो वह कभी स्थिर रहती है और न उत्कृष्ट ही कहलाने योग्य है; क्योंकि वह सबको व्यामोहमें ही डालती रहती है। अतः (विषयोंकी भाँति) वह भी निश्चय ही अनर्थकी प्राप्ति करानेवाली है। जैसे नदीसे असंख्य चञ्चल तरङ्गें प्रकट होती और वायुकी सहायतासे बढ़ती रहती हैं,–उसी प्रकार इस श्री अथवा सम्पत्तिसे बहुत-सी चिन्तारूपिणी पुत्रियाँ उत्पन्न होती हैं और विविध दुश्चेष्टाओंद्वारा वृद्धिको प्राप्त होती रहती हैं। यह सम्पत्ति शास्त्रोक्त सदाचारसे रहित पुरुषको पाकर इधर-उधर दौड़ती रहती है, कहीं एक जगह पैर जमाकर स्थिर नहीं रहती। यह मूढ़ सम्पत्ति किसी गुणवान् पुरुषके द्वारा बड़े दुःखसे उपार्जित होनेपर भी प्रायः उसके उपभोगमें नहीं आती और राजाओंकी प्रकृतिके समान (श्रेष्ठ पुरुषकी उपेक्षा करके भी) गुण-अवगुणका विचार किये बिना ही जो कोई भी अपने पास रहता है, उसीका अवलम्बन कर लेती है। लोग तभीतक अपने और पराये जनोंके प्रति शीतल-मृदुल (दया, उदारता और स्नेह आदिसे सम्पन्न) बने रहते हैं जबतक कि वे प्रबल
वैराग्य-प्रकरण ] * धन-सम्पत्ति तथा आयुकी निस्सारता एवं दुःखरूपताका वर्णन * ३७
वायुके वेगसे बर्फकी भाँति धन-सम्पत्तिके द्वारा कठोर एवं दुःसह नहीं बना दिये जाते। जैसे मुट्ठीभर धूल मणियोंको मलिन कर देती है, उसी प्रकार धन-सम्पत्तिने बड़े-बड़े विद्वान्, शूरवीर, कृतज्ञ, सुन्दर और कोमल-स्वभाववाले पुरुषोंको भी मलिन ( कलङ्कित ) कर दिया है। भगवन् ! धन-सम्पत्ति सुख देनेके लिये नहीं, दुःख देनेके लिये ही बढ़ती है; जैसे विषकी बेल सुरक्षित रक्खी जाय तो वह मौत ही देती है, उसी प्रकार धन-सम्पत्तिकी रक्षा करनेपर भी वह विनाशका ही कारण होती है।
जो धन-सम्पत्तिसे युक्त होकर भी जनताकी निन्दाका पात्र न हो, शूरवीर होकर भी अपने ही मुँहसे अपनी बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा न करता हो तथा स्वामी होकर भी समस्त सेवकों अथवा प्रजा-जनोंपर समान दृष्टि रखना हो—ये तीन तरहके पुरुष संसारमें दुर्लभ हैं। यह धन-सम्पत्ति दुःखरूपी सर्पोंके रहनेके लिये विषम ( भयंकर ) और गहन ( दुर्गम ) गुफा है तथा महान् मोहरूपी गजराजोंके निवासके लिये विन्ध्याचलकी विशाल तटभूमि है। अर्थात् यह महान् दुःख देनेवाली और महान् मोहसे आवृत करनेवाली है। सत्कर्मरूपी कमलोंको संकुचित करनेके लिये यह रात्रिके समान है। दुःखरूपी कुमुदोंके विकासके लिये चाँदनीका काम करनेवाली है तथा उत्तम दृष्टि ( श्रेष्ठ बुद्धि ) रूपी दीपकको बुझानेके लिये वायुके तुल्य है। धन-सम्पत्ति भय और भ्रान्तिरूपी बादलोंकी उत्पत्ति तथा वृद्धि करनेवाली है, विषादरूपी विषको बढ़ानेवाली है, विकल्प ( संशय ) रूपी खेतीकी उपजके लिये क्यारीके समान है तथा खेद या कष्ट प्रदान करनेके लिये भयंकर सर्पिणीके तुल्य है। वैराग्यरूपी लताओंको नष्ट करनेके लिये ओलेके समान है। काम आदि मनोविकाररूपी उल्लुओंको सबल बनानेके लिये अँधेरी रात्रिके तुल्य है। विवेकरूपी चन्द्रमाको ग्रस लेनेके लिये राहुकी दाढ़^१ है और सौजन्यरूपी कमलको संकुचित कर देनेके लिये चन्द्रमाकी चाँदनी है। इतना ही नहीं, यह इन्द्र-धनुषके समान क्षणस्थायी विविध रंगों ( रागों ) के कारण मनोहर जान पड़ती है तथा बिजलीके समान चपल तथा उत्पन्न होते ही नष्ट हो जानेवाली है। प्रायः जड़ ही इसके आश्रय हैं। यह एक रूपसे कहीं क्षणभर भी नहीं ठहरती। पानीकी लहर और दीपककी लौके समान चञ्चल है तथा जिन्हें जानना अत्यन्त कठिन है, ऐसी असङ्ख्य दुर्दशाओंकी प्राप्ति करानेवाली है। यह धन-सम्पत्ति मनोरम होनेके कारण चित्त-वृत्तिको अपनी ओर खींच लेती है। प्रायः अनर्थकारी कर्मोंसे इसकी प्राप्ति होती है और प्राप्त होकर भी यह क्षणभरमें नष्ट हो जानेवाली है।
मुने ! जीवकी आयु पत्तेके सिरेपर लटकते हुए जल-बिन्दुके समान अस्थिर है। वह उन्मत्तके समान असमयमें ही इस कुत्सित शरीरको छोड़कर चल देती है। जिनका चित्त विषयरूपी विषधर सर्पोंके संसर्गसे सर्वथा जर्जर हो गया है और जिनमें प्रौढ़ आत्म-विवेकका अभाव है, उन लोगोंकी आयु उन्हें क्लेश देनेवाली ही है। जो जानने योग्य वस्तु ( परब्रह्म परमात्मा ) को जान चुके हैं और उस अपरिच्छिन्न ब्रह्मपदमें प्रतिष्ठित हैं, ऐसे महापुरुषोंकी आयु लाभ-हानि एवं सुख-दुःखमें चित्तको समानभावसे सुस्थिर रखनेवाली होनेके कारण सुखदायिनी है। महर्षे ! हमलोग नपे-तुले आकारवाले शरीरमें ही 'यह आत्मा है' ऐसा निश्चय किये बैठे हैं। अतः संसाररूपी मेघमें बिजलीके समान चमककर विलुप्त हो जानेवाली इस क्षणभङ्गुर आयुमें हम सुखी नहीं हैं। शरद्ऋतुके छिटफुट बादल, तैलरहित दीपक तथा जलकी तरङ्गके समान चञ्चल आयु गयी हुई ही देखी जाती है। तरङ्गको, जल आदिमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाको, विद्युत्-पुञ्जको और आकाशकमलको हाथसे पकड़नेका तो मैं विश्वास रख सकता हूँ; परंतु इस अस्थिर आयुपर मेरा कोई भरोसा
१. यहाँ जड़के दो अर्थ हैं—जल और मूर्ख। बिजलीका आश्रय जल होता है और धन-सम्पत्तिका आश्रय मूर्ख।
**९—अहंकार और चित्तके दोष**
३८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
नहीं है (असम्भव बातें भी भले ही सम्भव हो जायें, पर आयुको पकड़े रखना असम्भव है)। जैसे खच्चरी दुःख भोगनेके लिये ही गर्भ-धारणकी इच्छा करती है, उसी प्रकार जिसका मन विश्रान्त (तृष्णाओंसे अत्यन्त उपरत) नहीं है, ऐसा मूर्ख मनुष्य कष्ट उठानेके लिये ही व्यर्थ आयुका विस्तार (अधिक कालतक जीना) चाहता है। ब्रह्मन् ! इस संसार-चक्रमें जो देहरूपी लता है, यह सृष्टिरूपी समुद्रके जलका विकारभूत फेन ही है (क्योंकि उसीके समान अत्यन्त अस्थिर है)। अतः इसमें अधिक कालतक जीवित रहना मुझे अच्छा नहीं लगता। वास्तवमें वही जीवन उत्तम जीवन कहलाता है, जिससे अवश्य पाने योग्य वस्तु (परमात्म-ज्ञान) की प्राप्ति होती है, जिससे फिर शोक नहीं करना पड़ता तथा जो परम निर्वाणरूप सुखका स्थान है। यों तो वृक्ष भी जीते हैं, पशु और पक्षी भी जीवित रहते हैं; परंतु वास्तवमें उसी पुरुषका जीवन सफल है, जिसका मन मननके द्वारा जीवित न रहे—अमनीभावको प्राप्त हो जाय। संसारमें उन्हीं जीवोंका जन्म लेना सफल है और उन्हींका जीवन श्रेष्ठ है, जो फिर यहाँ जन्म नहीं लेते। शेष प्राणी तो बूढ़े गदहोंके समान हैं (जैसे गदहे अधिक कालतक जीनेपर भी उत्तम जीवन नहीं बिताते, उसी प्रकार उन प्राणियोंका भी जीवन है, जो इस अपवित्र देहको ही आत्मा माने बैठे हैं)।
अविवेकी मनुष्यके लिये शास्त्रोंका अध्ययन भाररूप है। रागी (विषयासक्त) पुरुषके लिये तत्त्वज्ञान भार है। अशान्त मनुष्यके लिये मन भार है तथा जो आत्मज्ञानसे शून्य है, उसके लिये शरीर भार है। जिसकी बुद्धि दूषित है, उस पुरुषके लिये रूप, आयु, मन, बुद्धि, अहंकार तथा चेष्टा,—ये सब-के-सब उसी प्रकार दुःखदायक हैं, जैसे बोझ ढोनेवाले मनुष्यके लिये उसके सिरका बोझ कष्टदायक होता है। आयु कठोर परिश्रम एवं सुदृढ़ कष्टको ही देनेवाली है। इसमें श्रमकी निवृत्ति कभी नहीं होती, कामनाओंकी पूर्तिका भी अभाव ही रहता है। यह आपत्तियोंका परम आश्रय और रोगरूपी पक्षियोंका घोंसला है। जैसे बिलमें विश्राम करनेवाले तथा विषके द्वारा संताप देनेवाले भयंकर सर्प वनकी वायुका पान करते हैं, उसी प्रकार शरीररूपी बिलमें रहकर विषतुल्य दाह पैदा करनेवाले भीषण रोगरूपी सर्प जीवकी आयुका पान करते हैं। जैसे काठके छोटे-छोटे कीड़े उसके भीतर रहकर पुराने पेड़को सदा काटते और उससे धूल-सी गिराते रहते हैं, उसी प्रकार सदा पीब, रक्त और मल बहानेवाले तथा देहके भीतर निवास करनेवाले दुष्ट रोग आदि दुःख निरन्तर आयुका उच्छेद करते रहते हैं। जैसे बिल्ली चूहेको शीघ्र निगल जानेके लिये उत्कट अभिलाषाके साथ निरन्तर उसकी ओर ताकती रहती है, उसी प्रकार मृत्यु भी आयुको अपना ग्रास बनानेके लिये ही सदा उसकी ताकमें बैठी रहती है। इस संसारमे यह आयु जिस प्रकार स्थिरता और सुखके द्वारा सदाके लिये परित्यक्त, अत्यन्त तुच्छ, गुणहीन तथा मृत्युकी भाजन है, वैसी दूसरी कोई वस्तु नहीं है। (सर्ग १३-१४)
अहंकार और चित्तके दोष
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनिश्रेष्ठ ! यह अनेक रूपवाला संसार दीनोंसे भी दीन विषयलम्पट लोगोंको अहंकारके वशीभूत होनेके कारण ही निरन्तर राग-द्वेष आदि दोषोंके कोशरूप अनर्थकी प्राप्ति कराता रहता है। अहंकारके वशमें होनेसे ही मनुष्यपर आपत्ति आती है—उसे शारीरिक कष्ट भोगने पड़ते हैं। अहंकारसे ही अनेक दुःखद मानसिक व्यथाएँ होती हैं तथा अहंकारसे ही राग अथवा दुश्चेष्टाएँ होती हैं। जैसे बहेलियेके द्वारा मृगोंको पकड़नेके लिये बहुत बड़ा जाल बिछाया जाता है, उसी प्रकार अहंकाररूपी टोपके कारण
वैराग्य-प्रकरण ] * अहंकार और चित्तके दोष * ३९
संसाररूपी अँधेरी रातमें जीवोंके मनको मोहित करनेवाली विशाल माया बिछी हुई है। अहंकार शान्तिरूपी चन्द्रमाको निगलनेके लिये राहुका मुख है, पुण्यरूपी कमलोंका विनाश करनेके लिये हिमरूप वज्र है। और सब भूतोंमें समदर्शितारूपी मेघका विध्वंस करनेके लिये शरद् ऋतु है। ऐसे अहंकारका मैं त्याग करता हूँ*। न मैं अमुक नामवाला हूँ, न विषयोंमें मेरी रुचि है और न मन ही मेरा है। मैं शान्त होकर मनको जीतनेवाले महात्मा पुरुषकी भाँति अपने-आपमें ही स्थित रहना चाहता हूँ। ब्रह्मन् ! यदि अहंकार रहता है तो आपत्तिकालमें मुझे दुःख होता है और यदि नहीं रहता तो मैं निरन्तर सुखका अनुभव करता हूँ। इसलिये अहंकाररहित होना ही श्रेष्ठ है।
मुने ! मैं अहंकारका त्याग करके शान्तचित्त हो उद्वेगशून्य होकर बैठा रहता हूँ; क्योंकि भोगोंके समूहका आधार ही क्षणभङ्गुर है। इस देहरूपी विशाल वनमें जो घनीभूत अहंकाररूपी मोटा-ताजा सिंह है, उसीने इस जगत्का विस्तार किया है (इसे अपनी क्रीडास्थली बनाया है)। मुने ! जैसे शत्रु किसीको मारनेके लिये मन्त्र-तन्त्रके द्वारा मारण-उच्चाटन आदिका जाल फैलाता है, उसी प्रकार इस अहंकाररूपी महान् शत्रुने संसारमें जीवका पतन करनेके लिये बिना मन्त्र-तन्त्रके ही स्त्री, पुत्र, मित्र आदिके जाल फैला रक्खे हैं। इस अहंकारका मूलोच्छेदपूर्वक निराकरण कर देनेपर ये सभी मानसिक दुश्चिन्ताएँ तुरत अपने-आप विलीन हो जाती हैं। अहंकाररूपी बादलके फट जानेपर शान्तिका विनाश करनेवाला एवं हृदयाकाशमें छाया हुआ महान् मोहरूपी कुहासा धीरे-धीरे न जाने कहाँ विलीन हो जाता है। महानुभाव मुनीश्वर ! जो सम्पूर्ण आपत्तियोंका घर, शान्ति आदि उत्तम गुणोंसे रहित तथा हृदयके भीतर निवास करनेवाला है, उस अनित्य अहंकारका मैं आश्रय लेना नहीं चाहता (उसके अधीन होना नहीं चाहता)। अपने सुदृढ़ विवेकके द्वारा मैं अच्छी तरह समझ गया हूँ कि यह अहंकार नामक वस्तु सब ओरसे अतिशय दुःखरूप ही है। अतः अब मेरे लिये जो कुछ भी कर्त्तव्य शेष रह गया हो, उसे बताते हुए आप मुझे अध्यात्मविषयक उपदेश दीजिये।
मुनीश्वर ! जैसे वायुके प्रवाहमें पड़कर मोर-पंखका अग्रभाग वेगसे हिलता रहता है, उसी प्रकार यह चञ्चल चित्त भी अत्यन्त व्यग्र होकर व्यर्थ ही इधर-उधर दौड़ता रहता है। जैसे कुत्ता अपना पेट भरनेके लिये व्याकुल हो गाँवमें दूर-से-दूरतकके घरों या स्थानोंका चक्कर लगाया करता है, वही दशा इस चञ्चल मनकी है। इसे कहीं भी कोई अनुकूल वस्तु नहीं प्राप्त होती। इसलिये यह दीन बना रहता है। यदि इसे कभी विशाल धनका भंडार प्राप्त हो जाय, तो भी यह भीतरसे तृप्त नहीं होता। जैसे बाँस या बेंतकी बनी हुई पिटारी कभी जलसे नहीं भरती, उसी प्रकार धनसे मनुष्यका जी नहीं भरता। मुने ! जैसे अपने झुंडसे बिछुड़कर जालमें जकड़े हुए मृगको कभी सुख नहीं मिलता, उसी प्रकार समस्त साधनोंसे शून्य (एवं सत्सङ्गरहित) मन सदा दुर्वासनाओंके जालमें जकड़ा रहता है। इसलिये उसे कभी सुख और संतोष नहीं प्राप्त होता। मुने ! तरङ्गोंके समान चञ्चल वृत्तिको धारण करनेवाला यह मन अपने स्थूल-सूक्ष्म अवयव-विभागको छोड़कर एक क्षणके लिये भी हृदयमें स्थिर नहीं रहता। विषयोंके चिन्तनसे क्षोभको प्राप्त हुआ यह मन मन्दराचलके आघातसे उछलती हुई क्षीरसागर-की दुग्धराशिके समान दसों दिशाओंमें दौड़ता वा
* जैसे चन्द्रमाको राहु निगल जाता है, कमलोंको हिम या ओलोंकी वर्षा नष्ट कर देती है और शरद् ऋतु मेघोंका विध्वंस कर डालती है, उसी प्रकार अहंकार शान्ति, क्षमा, दया तथा प्राणिमात्रमें समभावको नष्ट कर देता है।
**१०—तृष्णाकी निन्दा**
४० * अविवेकविशाखार्त्तः पुमानस्मीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
अत्यन्त विकल है, किन्तु कहीं भी शान्तिको नहीं पाता।
भगवन् ! जैसे मृग गड्ढेमें गिरनेकी कोई चिन्ता न करके दूर-ही-दूर जानेकी इच्छासे प्रेरित हो बहुत दूरतक दौड़ लगाता रहता है, उसी प्रकार यह मन नरकके गर्तमें गिरनेकी परवा न करके भोग-रूपी आशासे बड़ी दूरतक चक्कर लगाता रहता है (भाँति-भाँतिके मनसूबे बाँधता रहता है)। जैसे पिंजरेमें बंद किया हुआ सिंह चिन्ताके कारण एक जगह स्थिर होकर नहीं रहता, उसी तरह नाना प्रकारकी चिन्ताओंमें अत्यन्त चञ्चल हुआ मन अपनी चञ्चल वृत्तिके कारण कहीं स्थिर नहीं रह पाता। जैसे हंस जलमें दूधको निकाल लेता है, वैसे ही स्नेहरूपी रसपर आरूढ हुआ यह मन भी इस शरीरसे उद्वेगशून्य समताके सुखका अपहरण कर लेता है। भगवन् ! मनरूपी ग्रह अग्निसे भी अधिक उष्ण है। इसके ऊपर चढ़ना पर्वतपर चढ़नेसे भी अधिक कठिन है तथा यह वज्रसे भी बढ़कर कठोर है। उसको वशमें लाना बहुत ही कठिन है। जैसे मांसभक्षी पक्षी मांसपर टूट पड़ता है, उसी प्रकार मन भी इन्द्रियोंद्वारा उपलब्ध होनेवाले विषयोंकी ओर दौड़ पड़ता है। परंतु जैसे बालक पहले तो खिलौनेकी ओर झपटता है, फिर उसे पाकर थोड़ी ही देरमें उससे मुँह मोड़ लेता है, उसी तरह यह मन प्राप्त हुए विषयमें क्षणभरमें ही विरक्त हो जाता है (और नये-नये विषयकी खोज करने लगता है)।
समुद्रको पी जाना, सुमेरु पर्वतको जड़से उखाड़ फेंकना तथा अग्निका ही आहार करना—ये महान् एवं दुःसाध्य कार्य हैं। परंतु चञ्चल चित्तको वशमें कर लेना इनसे भी महान् एवं कठिन कार्य है। सम्पूर्ण पदार्थोंका कारण चित्त ही है। जबतक चित्त है, तभीतक तीनों लोकोंकी सत्ता है, उसके क्षीण होते ही जगत् क्षीण हो जाता है। इसलिये इस चित्तरूपी रोगकी यत्नपूर्वक चिकित्सा करनी चाहिये। मुने ! जैसे महान् पर्वतसे अनेकानेक वनों एवं काननोंकी उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार मनसे ये सैकड़ों सुख-दुःख पैदा हुए हैं—इसमें संशय नहीं है। अध्यात्मविषयक विवेकसे जब यह मन दुर्बल हो जाता है, तब ये सारे सुख-दुःख निश्चय ही पूर्णरूपसे गल जाते हैं—ऐसा मेरा विश्वास है। महान् मुमुक्षु पुरुष जिसके जीते जानेपर शम, दम, क्षमा, दया, समता, शान्ति, संतोष, सरलता आदि समस्त सद्गुणोंके स्वाधीन होनेकी आशा करते रहते हैं, उस शत्रुरूप चित्तको जीतनेके लिये मैं सब प्रकारसे उद्यत हुआ हूँ। अतएव जैसे चन्द्रमा मेघमालाका अभिनन्दन नहीं करता, उसी प्रकार मैं तीव्र वैराग्य-सम्पत्तिसे युक्त होनेके कारण जड़ और मलिन विलासवाली लक्ष्मीका अभिनन्दन नहीं करता। (सर्ग १५-१६)
तृष्णाकी निन्दा
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! चेतन जीवरूपी उद्यानमें हृदयरूपी अज्ञानान्धकारसे परिपूर्ण दुस्तर गुहामयी गर्तिका तड़ाग बनकर नाना प्रकारके दोषरूपी उल्लुओंकी उसमें निकासी हो उठती है। जैसे शरद् ऋतुके दिनोंमें अभिषिक्त तथा ओस-वायुके टकरानेसे गिरे हुए कादल पुञ्ज (चनेके वृन्द) की उज्ज्वल शोभासे सुशोभित चनेकी फलियाँ निश्चय ही अधिक विकासको प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार अनेक तरहके दुःखमय सन्तापोंसे प्रकट हुए अश्रुबिन्दुओंसे आर्द्र तथा निकटवर्ती सुवर्ण आदिकी अभिलाषाद्वारा उच्चण्ड हुई चिन्ता या तृष्णा अवश्य अधिकाधिक बढ़ने लगती है। जैसे समुद्रके भीतर
वैराग्य-प्रकरण ] * तृष्णाकी निन्दा * ४१
भँवर एवं हलचल उत्पन्न करनेके लिये ही तरङ्गें उठा करती हैं, उसी तरह हृदयको चञ्चल बना देनेवाली तृष्णा अन्तःकरणमें भ्रम एवं आकुलता पैदा करनेके लिये ही उस सीमातक आ पहुँचती है, जहाँ वह धनादिकी प्राप्तिके लिये कष्टप्रद उत्साहको बढ़ावा देती है। यद्यपि तृष्णाके वेगको रोकनेके लिये यह चित्तरूपी चातक नाना प्रकारकी चेष्टाएँ करता है, तथापि जैसे आँधी सड़े-गले तिनकेको न जाने कहाँ-से-कहाँ उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार कलङ्किनी तृष्णाने इसे न जाने कहाँ-किस अयोग्य अवस्थामें पहुँचा दिया। जैसे जालमें फँसे हुए पक्षी अपने घोंसलेमें जानेकी शक्तिसे वञ्चित हो वहीं शोक-दुःखसे मोहित हो जाते हैं, वैसे ही हमलोग चिन्ता या तृष्णाके जालमें फँसकर अपने पारमार्थिक स्वरूपको प्राप्त करनेमें असमर्थ हो मोहमें डूबे रहते हैं।
तृष्णा एक पागल घोड़ीके समान है, जो यहाँसे दूर-दूर जाकर बारंबार लौट आती और फिर तुरंत ही सम्पूर्ण दिशाओंमें चक्कर काटने लगती है। जैसे घटीयन्त्र (रहट) के ऊपर लगी हुई रस्सी घटके साथ सदा ऊपर-नीचे आती रहती है, जड़ या जलसे सम्बन्ध रखती है, अपने भीतर गाँठें रखती है और चञ्चल बनी रहती है, उसी तरह यह तृष्णा धर्म और अधर्मके अनुसार सदा स्वर्ग और नरकमें गमनागमन कराती, चेतन और जड़की ग्रन्थिसे जुड़ी रहती, जड़ पदार्थोंसे सम्बन्ध रखती और सदा विक्षुब्ध बनी रहती है। जो देहके भीतर मनमें गुँथी हुई है, जिसका छेदन करना प्रायः सभीके लिये अत्यन्त कठिन है, उस तृष्णाके द्वारा मनुष्य उसी प्रकार शीघ्र भारवाही बना लिया जाता है, जैसे रासकी रस्सी बैलको तत्काल भार ढोनेके लिये विवश कर देती है। जैसे बहेलियेकी स्त्री पक्षियोंको फँसानेके लिये जाल बनाती है, उसी प्रकार सदा आकर्षणशील स्वभाववाली तृष्णा लोगोंको फँसानेके लिये स्त्री, पुत्र और मित्र आदिकी
परम्परा रचती रहती है। यद्यपि मैं धीर हूँ, तथापि भयानक काली रातके समान तृष्णा मुझे भयभीत-सा कर देती है। विवेकरूपी नेत्रसे सम्पन्न हूँ, तो भी वह मुझे अंधा-सा बना देती है और सच्चिदानन्दघनरूप होनेपर भी मुझे वह मानो खेदमें डाल देती है।
तृष्णाको काली नागिनके समान समझना चाहिये। वह सहस्रों कुटिलताओंसे भरी हुई है। विषयभोग-सुख ही उसका कोमल स्पर्श है। वह विषमतारूपी विषको ही उगलती है और तनिक-सा स्पर्श हो जानेपर भी डँस लेती है (अपने सम्पर्कमें आये हुए प्राणीका नाश कर देती है*)। इतना ही नहीं, तृष्णा काली-कलूट्टी राक्षसीके समान भी बतायी गयी है। वह पुरुषोंके हृदयका भेदन करनेवाली तथा मायामय जगत्को रचनेवाली है। दुर्भाग्य प्रदान करनेवाली तथा दीनताकी प्रतिमूर्ति है। पर्वतकी गुफामें एक प्रकारकी लता होती है, जो सूर्य-किरणोंके न मिलनेसे सदा अत्यन्त मलिन रहती है। वह खानेमें कडवी और परिणाममें उन्मादका रोग पैदा करनेवाली है। उसकी बेल बहुत लंबी होती है और उसमें रसकी मात्रा अधिक रहती है। यह तृष्णा भी उसी लताके समान निरन्तर अत्यन्त मलिन, परिणाममें दुःखसे पागल बना देनेवाली, वासनारूपी विशाल ताँतोंसे युक्त तथा विषयोंमें गहरा स्नेह पैदा करनेवाली है। जैसे ऊँचे वृक्षोंकी शाखाके अग्रभागमें स्थित सूखी हुई मञ्जरी पुष्पशून्य, निष्फल तथा कण्टकाकीर्ण होनेके कारण आनन्ददायिनी नहीं होती, उसी प्रकार तृष्णा सर्वथा सूनी, निष्फल, व्यर्थ विस्तारको प्राप्त होनेवाली, अमङ्गलकारिणी और क्रूर है। यह कभी सुखदायिनी नहीं होती। संसाररूपी विशाल वनमें तृणारूपिणी विषकी बेल फैली हुई है। जरा-मृत्यु आदि ही इसके फूल तथा
* नागिनकी भी चाल टेढ़ी और स्पर्श कोमल होता है तथा वह थोड़ा-सा छू जाय तो भी छूनेवालेको डँसकर मार डालती है।
४२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
विनिपात और उत्पात ( अधःपतन और उपद्रव ) ही फल हैं ।
मुने ! चिन्ता ( तृष्णा ) चञ्चल मोरनीके समान है। मोरनी वर्षाकी बूँदें पड़नेपर बारंबार नृत्य करती है, शरद्-ऋतुका प्रकाश आ जानेपर शान्त हो जाती है और दुर्गम-स्थानोंमें भी पैर रखती है, इसी तरह तृष्णा भी कुहरेके समान मोहके आवरणमें स्फुरित होती है—नाच उठती है, विवेकका प्रकाश छा जानेपर शान्त हो जाती है और असाध्य वस्तुओंमें भी पाँव रख देती है। केवल वर्षा कालमें इतराकर बहनेवाली छोटी नदी और तृष्णामें बहुत कुछ समानता है। वह नदी वर्षाके अतिरिक्त समयमें चिरकालतक जलशून्य पड़ी रहती है। वर्षा-ऋतुमें भी बीच-बीचमें जब वृष्टि रुक जाती है, वह जलसे खाली हो जाती है; परंतु पानी बरसनेपर उसमें क्षणभरमें बाढ़ आ जाती है और जलकी बहुत-सी उत्ताल तरङ्गों उठने लगती हैं। इसी प्रकार तृष्णा भी चिरकालतक फलशून्य ही रहती है, कभी-कभी सफल होनेपर भी बीच-बीचमें फलशून्य हो जाती है। जड पदार्थोंमें ही इसे अधिक आनन्द मिलता है और क्षणभरमें ही यह उल्लसित हो उठती है। चारेके लोभसे चञ्चल हुई चिड़िया जैसे फलशून्य खड़े हुए वृक्षको छोड़कर दूसरे-दूसरे फलयुक्त वृक्षपर चली जाती है, उसी प्रकार तृष्णा भी विवेकी एवं विरक्त पुरुषको छोड़कर विषयासक्त पुरुषके पास चली जाती है।
तृष्णा और चञ्चल बँदरिया दोनोंका स्वभाव एक-जैसा है। वे अलङ्घ्यस्थानमें भी पैर रख देती हैं, तृप्त हो जानेपर भी नये-नये फलकी इच्छा करती हैं और विषयरूप एक स्थानपर अधिक कालतक नहीं ठहरतीं। तृष्णा हृदयरूपी कमलमें निवास करनेवाली भ्रमरी है। यह क्षणभरमें पातालको चली जाती है, फिर दूसरे ही क्षण आकाशकी सैर करने लगती है और क्षण-भरमें ही दिगन्तरूपी निकुञ्जमें मँडराती दिखायी देती है। संसारमें जितने दोष हैं, उन सबमें एकमात्र तृष्णा ही ऐसी है, जो दीर्घकालतक दुःख देती रहती है। वह अन्तःपुरमें रहनेवाले मनुष्यको भी भीषण संकटमें डाल देती है। तृष्णारूपिणी मेघमाला मोहरूपी नीहार-पुञ्जसे घनीभूत होकर परम ज्ञानरूपी सूर्यके प्रकाशको ढँक देती है और जगत्को केवल जडता ( जल अथवा अज्ञान ) ही प्रदान करती है। तृष्णा सांसारिक व्यवहारमें फँसे हुए समस्त प्राणियोंको बाँधनेके लिये एक मजबूत रस्सीके समान है। उसने सबके मनको बाँध रक्खा है। इन्द्र-धनुष जिन लक्षणों अथवा धर्मोंसे युक्त दिखायी देता है; वे ही तृष्णाके भी लक्षण अथवा धर्म हैं। वह इन्द्र-धनुषकी ही भाँति बहुरंगी, गुणहीन, विशाल, मलिन ( मेघ अथवा अशुद्ध अन्तःकरणवाले प्राणीके ) आधारपर स्थित, शून्यरूप और शून्यमें ही पैर रखनेवाली है। तृष्णा गुणरूपी हरी-भरी खेतीको नष्ट करनेके लिये वज्रपातके समान है। आपत्तियोंको बढ़ानेके लिये उस शरद्-ऋतुके तुल्य है, जिसके आनेपर धान आदिकी खेती पकी हुई बालोंसे सम्पन्न हो जाती है। तत्त्व-ज्ञानरूपी कमलोंका विध्वंस करनेके लिये ओलेके सदृश और अज्ञानरूपी अन्धकारकी वृद्धिके लिये वह हेमन्तकी लंबी रातके समान है।
तृष्णा इस संसाररूपी नाटककी नटी है, प्रवृत्तिरूप नीडमें निवास करनेवाली पक्षिणी है, मनोरथ-रूपी महान् वनमें विचरनेवाली हरिणी है और कामरूपी संगीतको उद्बुद्ध करनेवाली वीणा है। वह व्यवहाररूपी समुद्रकी लहर है। मोहरूपी मतवाले गजराजको बाँधे रखनेके लिये साँकल है, सृष्टिरूपी वटवृक्षकी सुन्दर वरोह है और दुःखरूपी कुमुदोंको विकसित करनेवाली चाँदनी है। इतना ही नहीं, तृष्णा जरा-मृत्युरूप दुःखमय रत्नोंका संग्रह करनेके लिये एकमात्र रत्न-पेटिका है तथा आधि-व्याधिरूप विलासोंका नित्य विस्तार करनेवाली मदमत्त विलासिनी है। तृष्णाको व्योमवीथी ( आकाश )
१. इन्द्र-धनुषके पक्षमें गुणका अर्थ प्रत्यञ्चा है।
**११—शरीर-निन्दा**
वैराग्य-प्रकरण ] * शरीर-निन्दा * ४३
के समान समझना चाहिये । जैसे आकाश कभी सूर्यके प्रकाशसे निर्मल हो जाता है, कभी मेघोंकी घटा घिर आनेसे वहाँ कुछ क्षणोंके लिये कुछ-कुछ अँधेरा छा जाता है और कभी वह कुहरेसे ढक जाता है, उसी प्रकार तृष्णा भी कभी किंचित् विवेकका प्रकाश पाकर निर्मल हो जाती है, विवेक न होनेपर अज्ञानसे मलिन रहती है और कभी कुहरेके समान मोहसे आवृत हो जाती है। जबतक विष-विशेषके उद्भवसे प्रकट होनेवाले विसूचिका (हैजा) नामक रोगके समान मृत्युकी हेतुभूता तृष्णा पीछे लगी रहती है, तभीतक यह चञ्चल-चित्त मूढ़ जन-समुदाय मोहको प्राप्त होता रहता है।
लोग विषयोंका चिन्तन त्याग देनेसे ही अपने सम्पूर्ण दुःखको दूर कर सकते हैं। विषय-चिन्तनका त्याग ही तृणारूपिणी विसूचिकाके निवारणका मन्त्र कहा गया है। तृष्णा वेणुलता (बाँस) बतायी जाती है। जैसे बाँस भीतरसे खोखला, बीच-बीचमें गाँठोंसे युक्त और कोंपलरूपी बड़े-बड़े काँटोंसे भरा होता है तथा उसमें सबको प्रिय लगनेवाले मोती उपलब्ध होते हैं, उसी प्रकार तृष्णा भी भीतरसे खोखली, कपट-दुराग्रह आदि गाँठोंसे भरी, चिन्ता और दुःखरूपी कण्टकोंसे परिपूर्ण तथा मोती-मणि आदि धन-सम्पत्तिमें अधिक प्रेम रखनेवाली है। फिर भी यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि परम बुद्धिमान् ज्ञानीजन विवेककी चमचमाती हुई तलवारसे उस दुश्छेद्य चिन्ताको भी काट डालते हैं। ब्रह्मन् ! जीवोंके हृदयमें रहनेवाली यह तृष्णा जैसी तीखी है, वैसी तीखी न तो तलवारकी धार है न वज्राग्निकी लपटें हैं और न आगमें तपाये हुए लोहकणोंकी चिनगारियाँ ही हैं। तृष्णा दीप-शिखाके समान कही गयी है। जैसे दीपककी शिखा बीचमें उज्ज्वल, अन्तमें काली होती है, उसका अग्रभाग तीखा होता है, उसमें तेल और लंबी-सी बत्ती रहती है, वह प्रकाशमान होती है, और दाहके कारण उसका स्पर्श दुःसह होता है, उसी प्रकार तृष्णा भी बीचमें भोग-वैभवसे उज्ज्वल और अन्तमें दुःख एव मृत्यु देनेवाली होनेके कारण काली होती है, उसका अग्रभाग या आरम्भ भी असह्य होता है। वह स्त्री-पुत्र आदिके स्नेहसे पूर्ण तथा बाल्य, यौवन, बुढ़ापा नामक अवस्था-विशेषरूपी बत्तियोंसे युक्त होती है, इसका सबको प्रत्यक्ष अनुभव होता है तथा इष्ट वस्तुके वियोग-जनित अन्तर्दाह उत्पन्न करनेके कारण यह सबके लिये असह्य हो उठती है। महर्षे ! मेरुपर्वतके समान परम उन्नत, विद्वान्, शूरवीर, सुस्थिर और श्रेष्ठ मनुष्यको भी यह एकमात्र तृष्णा ही पलभरमें याचक बनाकर तिनकेके समान हल्का कर देती है। (सर्ग १७)
शरीर-निन्दा
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—महामुने ! गीली आँतों (मल-मूत्र आदिकी थैलियों) और नाड़ियोंसे भरा हुआ, नाना प्रकारके विकारोंसे युक्त तथा अन्तमें पतनशील (मरणधर्मा) जो शरीर संसारमें सबके सामने प्रकाशित हो रहा है, वह भी केवल दुःख भोगनेके लिये ही है। यह थोड़े-से खान-पान आदिके द्वारा ही आनन्दित हो उठता है और थोड़े-से ही शीत, घाम आदिसे खिन्न हो जाता है; अतः इस शरीरके समान गुणहीन, शोचनीय और अधम दूसरा कोई नहीं है। यह शरीर वृक्षके तुल्य है। दोनों भुजाएँ इसकी दो शाखाएँ हैं, परिपुष्ट कन्धा तना है। दो नेत्र इसके बिल या खोडर हैं। मस्तकका स्थान इसका बड़ा भारी फल है। यह दाँतरूपी श्रेणीबद्ध पक्षियोंके बैठनेके लिये स्तम्भके समान सुन्दर आधार है। दोनों कान शब्दरूपी कठफोरवा पक्षियोंके प्रवेश करनेके लिये खोखले हैं। हाथ और पैरोंकी अंगुलियों
४४ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
इसके सुन्दर पल्लव हैं। गुल्म नामक (पेटका) रोग ही इसपर फैली हुई लताएँ अथवा झाड़ियाँ हैं। यह कर्म करनेके लिये पञ्चभूतोंके समूहसे संगठित हुआ है। जीव तथा ईश्वररूप पक्षियोंने इसपर अपने घोंसले बना रक्खे हैं। दाँतरूपी केसरोंसे सुशोभित, उत्पत्ति-विनाश-शील तथा मन्द हासमय विकाससे युक्त हर्षरूपी फूलों-द्वारा यह शरीर-वृक्ष सदा अलंकृत होता रहता है। सुन्दर कान्ति ही इसकी छाया है। यह देहरूपी वृक्ष जीवरूपी पथिकोंका विश्राम-स्थान है। इसे किसका आत्मीय कहा जाय और किसका पराया? इसके ऊपर आस्था और अनास्था ही क्या हो सकती है? तात! भवसागर तथा नदी आदिको पार करनेके लिये बारंबार अपनायी गयी देहलता एवं नौकामें कौन आत्मीयताकी भावना कर सकता है? जहाँ रोमरूपी असंख्य वृक्ष उगे हुए हैं, जो इन्द्रियरूपी बहुसंख्यक गड्डोंसे भरा हुआ है, उस देहरूपी निर्जन वनमें कौन विश्वस्त (निर्भय) होकर रह सकता है?
जो संसाररूपी वनमें उगा और बढ़ा है, जिसपर चित्तरूपी चञ्चल वानर उछलता-कूदता रहता है, जिसका प्रत्येक अवयव विषय-चिन्तनरूपी मञ्जरीसे अलंकृत है, महान् दुःखरूपी घुनोंके लग जानेसे जिसमें सब ओर छेद या घाव हो गये हैं, जो तृणारूपिणी सर्पिणीका घर है, जिसपर कोपरूपी कौएने घोंसला बना रक्खा है, जिसमें मन्द मुसकानरूपी पुष्प प्रकट होते और खिलते हैं, इसीलिये जिसकी बड़ी शोभा होती है, शुभ और अशुभ (सुख और दुःख) जिसके महान् फल हैं, सुन्दर कंधे और बाँहें जिसकी शाखाएँ हैं, अङ्गुलियोंसे युक्त हाथरूपी पुष्प-गुच्छोंके कारण जो बड़ा सुन्दर जान पड़ता है, प्राणवायुरूपी पवनके स्पन्दनसे जिसके सम्पूर्ण अवयवरूपी पल्लव हिलते रहते हैं, जो समस्त इन्द्रियरूपी पक्षियोंका आधार है, सुन्दर घुटनोंसे युक्त शरीरका निचला भाग जिसका तना है, जो बहुत ऊँचा है, यौवनकी कान्तिरूपी छायासे युक्त होनेके कारण जो सरस प्रतीत होता है, कामरूपी पथिक जिसका सेवन करता है, मस्तकपर उगे हुए बड़े-बड़े केश-कलाप जिसपर जमे हुए तिनकोंके समुदाय हैं, अहंकाररूपी गीध जिसपर घोंसला बनाकर रहता है, जो भीतरसे खोखला (छिद्रयुक्त) है, नाना प्रकारकी वासनारूपिणी जटाओंके जालका उद्गम-स्थान होनेके कारण जिसे काटना अत्यन्त कठिन है तथा परिश्रमरूपी शाखा-विस्तारके कारण जो विरस (रूखा) दिखायी देता है, वह शरीररूपी वृक्ष मुझे सुखद नहीं प्रतीत होता।
मुने! शरीर अहंकाररूपी गृहस्थका विशाल गृह है। यह गिरकर सदाके लिये धरतीपर लोट जाय अथवा चिरकालतक स्थिर बना रहे, इससे मेरा क्या प्रयोजन है? जहाँ इन्द्रियरूपी पशु कतार बाँधकर खड़े रहते हैं, तृणारूपिणी गृहस्वामिनी बारंबार (घर-आँगनमें) डोलती-फिरती है तथा जिसके समस्त अवयवोंको आसक्तिरूपी गेरू आदिके रंगसे रँगा गया है, वह शरीररूपी गृह मुझे अभीष्ट नहीं है। पीठकी हड्डी (रीढ़) रूपी शहतीरोंके परस्पर मिलनेसे जिसके भीतर खाली स्थान बहुत थोड़ा रह गया है तथा जो आँतकी रस्सियोंसे बाँधकर खड़ा किया गया है, वह देहरूपी घर मुझे प्रिय नहीं है। जिसमें सब ओर नस नाड़ी और आँतोंकी रस्सियाँ फैली हुई हैं, जिसे रक्तरूपी जलसे बनाये गये गारेके द्वारा लीपा गया है तथा बुढ़ापा-रूपी चूनेसे जिसपर सफेदी की गयी है, वह देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं है। चित्तरूपी भृत्यने नाना प्रकारकी अनन्त चेष्टाओंद्वारा जिसकी स्थिति अत्यन्त सुदृढ कर दी है तथा मिथ्या और मोह (असत्य और अज्ञान)—ये दो जिसके बड़े-बड़े खंभे हैं, वह देहरूपी गृह मुझे प्रिय नहीं है। दुःखरूपी छोटे-छोटे बच्चोंने जहाँ रो-रोकर कोलाहल मचा रक्खा है,
वैराग्य-प्रकरण ] * शरीर-निन्दा * ५५
गाढ़ निद्रारूपी सुख-शय्याके कारण जो मनोरम प्रतीत होता है तथा जिसमें दुश्चेष्टारूपिणी दग्धै दासी निवास करती है, वह देहरूपी घर मुझे प्रिय नहीं है । मुनीश्वर ! जो मल आदि दोषोंसे युक्त विषय-समूहरूपी बर्तनों तथा अन्यान्य उपकरणोंसे ठसाठस भरा हुआ है तथा जिसमें अज्ञानरूपी नोनछा लगा हुआ है, वह देहरूपी गेह मुझे अभीष्ट नहीं है । गुल्फरूपी आधार-काष्ठपर स्थित जो पिंडलियाँ हैं, वे मानो खंभे हैं । घुटना उनका मस्तक है, वह भी जिसके ऊरुस्तम्भका आधार है तथा दोनों बड़ी-बड़ी भुजाएँ दो आड़ी लकड़ियोंके समान जिसे दृढ़तापूर्वक धारण करती हैं, वह देहरूपी घर मुझे इष्ट नहीं है ।
ब्रह्मन् ! जहाँ ज्ञानेन्द्रियरूपी झरोखोंके भीतर प्रज्ञारूपिणी गृहस्वामिनी क्रीडा कर रही है तथा चिन्ता-रूपिणी पुत्रियाँ खेल रही हैं, वह देह-गेह मुझे प्रिय नहीं है । जो सिरके केशारूपी छाजनसे छाया हुआ है, कानरूपी शोभाशाली चन्द्रशालाओंसे सुशोभित है तथा कुछ लम्बी अङ्गुलिरूप काष्ठचित्रोंसे सुसज्जित है, वह शरीररूपी गृह मुझे प्रिय नहीं है । जिसके समस्त अङ्गरूपी भित्तियोंके समूहमें रोमरूपी घने जौके अङ्कुर उगे हैं और जहाँ पेटका गड्ढा कभी भरता नहीं, ऐसा देहरूपी गेह मुझे नहीं चाहिये । जिसमें नखरूपी मकड़ियोंका निवास है, जहाँ भूखरूपी कुतिया निरन्तर शोर मचाये रहती है तथा जिसमें भयानक शब्द करनेवाली प्राणवायु सदा चलती रहती है, ऐसे देह-गेहकी प्राप्ति मुझे प्रिय नहीं है । जहाँ श्वास-प्रश्वासके रूपमें वायुके वेगका निरन्तर भीतर-बाहर आना-जाना लगा रहता है और जिसकी इन्द्रियरूपी खिड़कियाँ सदा खुली रहती हैं, वह देहरूपी घर मुझे कभी इष्ट नहीं है । जिसके मुखरूपी दरवाजेपर जिह्वारूपिणी वानरी सदा डटी रहती है, अतएव जो भयङ्कर दिखायी देता है तथा जिसके दाँतरूपी हड्डियोंके टुकड़े स्पष्टतः दृष्टिगोचर होते हैं, वह शरीररूपी घर मुझे नहीं चाहिये । यह देह गेह त्वचारूपी चूनेके लेप (या पलस्तर) से चिकना किया हुआ है । नाड़ीरूप यन्त्रोंके संचारसे यह चञ्चल बना रहता है और मनरूपी सुन्दर चूहेने इसमें सब ओर बिल खोद रक्खे हैं; इसलिये यह मुझे प्रिय नहीं है । जो मन्द मुसकानरूपी दीपककी प्रभासे क्षणभरके लिये उद्भासित हो उठता है, एक ही क्षणमें आनन्दोल्लाससे सुन्दर दिखायी देता है और फिर क्षणमात्रमें ही अज्ञाना-न्धकारसे व्याप्त हो जाता है, वह शरीररूपी घर मुझे प्रिय नहीं है । जो समस्त रोगोंका घर है, झुर्रियों तथा पके बालोंका नगर है और समस्त मानसिक चिन्ताओंका दुर्गम वन है, वह देह-गेह मुझे प्रिय नहीं है ।
यह शरीर एक भयानक वन है । इन्द्रियाँ ही इस जंगलके भालू हैं, जो अपने रोषके कारण इसे दुर्गम बनाये हुए हैं । यह भीतरसे सूना है तथा अनेकानेक निस्सार खोडरोंसे युक्त है । इसकी दिशारूपी कुंजें घोर अज्ञानान्धकारसे व्याप्त होनेके कारण गहन जान पड़ती हैं; अतः यह मुझे कदापि प्रिय नहीं है । यहाँ धन-सम्पत्ति, राज्य, शरीर, नाना प्रकारकी चेष्टाओं और मनोरथोंसे क्या लेना-देना है; क्योंकि काल कुछ ही दिनोंमें इन सबको अपना ग्रास बना लेता है । मुने ! यह शरीर केवल रक्त और मांसका ही बना हुआ है । इसका एक ही धर्म है—विनाश । फिर इसके बाहरी और भीतरी स्वरूपपर विचार करके बताइये, इसमें कौन-सी रमणीयता है ?
तात ! जो शरीर मरनेके समय जीवका अनुसरण नहीं करते—उसका साथ छोड़ देते हैं, वे कितने बड़े कृतघ्न हैं। फिर आप ही कहिये, उनपर बुद्धिमान् पुरुषोंकी क्या आस्था हो सकती है ? यह शरीर उस कोमल पल्लवके समान है, जो तनिक-सी वायुका संचार
१. दाह और घावसे पीड़ित ।
२. एड़ीके ऊपरकी गाँठ ।
सं० यो० व० अं० ३—
**१२—बाल्यावस्थाके दोष**
| ४६ | * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * | [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ |
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होते ही जोर-जोरसे हिलने लगता है, यह आधिव्याधिरूपी सैकड़ों कण्टकोंसे क्षत-विक्षत होनेके कारण जर्जर हो जाता है। इसका स्वभाव क्षुद्र है तथा यह कड़वा और नीरस है; अतएव मुझे प्रिय नहीं है। चिरकालतक यत्नपूर्वक खा-पी लेनेके बाद भी नूतन पल्लवोंके समान कोमल कृशताको प्राप्त हो यह बारंबार विनाशकी ओर ही दौड़ता है। दीर्घकालतक लोगोंपर अपना प्रभुत्व स्थापित करके धन-सम्पत्तिका सेवन करनेके बाद भी न तो यह ऊँचे उठता है और न स्थिरताको ही प्राप्त होता है, फिर इस शरीरका किसलिये पालन किया जाता है ? कोई भोग-वैभवसे सम्पन्न हो या दरिद्र—दोनोंका शरीर समान ही होता है, बुढ़ापेके समय बूढ़ा होता और मृत्युकालमें मर जाता है। उसे अपनेमें किसी विशेषताका अनुभव नहीं होता। जो लोग इन नाशवान् शरीरोंमें आस्था रखते हैं—इन्हें नित्य स्थिर रहनेवाला मानते हैं तथा जो संसारकी स्थिरतापर भी विश्वास करते हैं, वे मोहरूपी मदिराका पान करके उन्मत्त हो गये हैं। उन्हें बारंबार धिक्कार है।
मुने ! 'मैं न तो इस शरीरका कोई सम्बन्धी हूँ और न शरीर हूँ। न यह शरीर मेरा है और न मैं ही यह शरीर हूँ।' ऐसा विचार करके जिनका चित्त परमात्मामें विश्राम ले रहा है, वे ही लोग पुरुषोंमें उत्तम हैं। जो मान और अपमानसे वृद्धिको प्राप्त हुई हैं और प्रचुर लाभसे मनोरम प्रतीत होती हैं, वे दोषपूर्ण दृष्टियाँ केवल शरीरमें नित्यत्वका विश्वास रखनेवाले मनुष्यको नष्ट कर देती हैं। जो शरीररूपी गड्ढेमें सोती है और अहंकारका चमत्कारपूर्ण कार्य है, उस मनोहर अङ्गवाली (भोगतृष्णा-मयी दोषदृष्टिरूपिणी) पिशाचीने छलसे हमारा सर्वस्व हर लिया है। शरीरमें ही नित्यताका विश्वास रखनेवाली इस मिथ्या-ज्ञानरूपिणी दुष्ट राक्षसीने अकेली (असहाय) दीन-हीन प्रज्ञा (सुबुद्धि) को पूर्णरूपसे ठग लिया, यह कितने दुःखकी बात है !
कुछ ही दिनोंमें जीर्णताको प्राप्त होकर यह शरीररूपी पल्लव झरनेके जलकी बूँदोंके समान बिना किसी यत्नके अपने आप गिर पड़ता है। समुद्रमें उत्पन्न हुए पानीके बुलबुलोंकी तरह इस शरीरका बहुत शीघ्र विनाश हो जाता है। ब्रह्मन् ! यह शरीर मिथ्याभूत अज्ञानका विकार है और स्वप्नरूपी भ्रान्तियोंका भंडार है। इसका विनाश बहुत स्पष्ट दिखायी देता है। इसलिये इसमें मेरा क्षण-भरके लिये भी विश्वास नहीं है। जिस पुरुषने बिजली, शरद् ऋतुके बादल और गन्धर्व-नगरके चिरस्थायी होनेका निर्णय कर लिया है, वही इस शरीरकी नित्यतापर विश्वास करे (मैं तो नहीं कर सकता)। शीघ्रतापूर्वक नष्ट हो जानेमें हठपूर्वक अपना उत्कर्ष जतानेके लिये जो होड़ लगाकर प्रवृत्त हुए हैं, उन सतत विनाशशील पदार्थोंकी अपेक्षा भी जो अधिक क्षणभङ्गुर है, उस प्रबल दोषयुक्त शरीरकी तिनकेके समान उपेक्षा करके मैं सुखी हो गया हूँ।
(सर्ग १८)
बाल्यावस्थाके दोष
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! असमर्थता, आपत्तियाँ, तृष्णा, मूकता (बोल न सकना), मूढ़-बुद्धिता (बुद्धिके द्वारा कुछ जान न पाना), खिलौने आदिकी अभिलाषा, चञ्चलता और दीनता आदि सारे दोष बाल्यावस्थामें ही प्रकट होते हैं। बाल्यावस्थामें पशु-पक्षियोंकी-सी चेष्टाएँ होती हैं। बालक सभी लोगोंके द्वारा तिरस्कृत होता है। बालकोंकी चपल चेष्टा मृत्युसे भी बढ़कर दुःख देनेवाली होती है। बाल्यावस्थामें अज्ञानवश जल, अग्नि और वायुसे निरन्तर उत्पन्न होनेवाले भयके कारण पग-पगपर जो दुःख प्राप्त होता है, वह आपत्तिकालमें भी किसको होता होगा ? बालक भाँति-भाँतिकी लीलाओं, दुर्विलासों, दुश्चेष्टाओं तथा दूषित
**१३—युवावस्थाके दोष**
वैराग्य-प्रकरण ] * युवावस्थाके दोष * ४७
अभिप्रायमें हठात् प्रवृत्त होकर बड़े भारी मोहमें पड़ जाता है। बाल्यावस्थामें बालक जिस किसीके भी कहनेसे निष्फल कार्यमें प्रवृत्त हो जाते हैं, अनेक प्रकारकी दुश्चेष्टाएँ करते हैं तथा किसी प्रकार भी प्रतिष्ठाकी प्राप्ति उनके लिये दुर्लभ है । इस तरह मनुष्यका शैशवकाल केवल गुरुजनोंका शासन स्वीकार करनेके लिये ही है, सुख और शान्ति प्रदान करनेके लिये नहीं । जैसे उल्लू दिनमें अन्धकारसे भरे हुए दूषित गड्ढोंमें छिपे रहते हैं, उसी प्रकार जो-जो दोष, जितने दुराचार तथा जो-जो दुर्लङ्घ्य दुश्चिन्ताएँ हैं, वे सब-के-सब बाल्यावस्थामें ही जीवके हृदयमें छिपकर बैठे रहते हैं ।
ब्रह्मन् ! जो लोग 'बाल्यावस्था बड़ी रमणीय है' ऐसी कल्पना करते हैं, उन सबकी बुद्धि व्यर्थ है । उन हतचित्त मूढ़बुद्धि लोगोंको बारंवार धिक्कार है । जहाँ झूलेके समान चञ्चल मन विविध विषयोंके आकारको प्राप्त होता है तथा जो तीनों लोकोंमें अमङ्गलरूप है, वह बाल्यावस्था कैसे संतोषदायक हो सकती है ? मुने ! सभी प्राणियोंका मन अन्य सब अवस्थाओंकी अपेक्षा बाल्यावस्थामें ही दसगुना चञ्चल हो उठता है । मन स्वभावसे ही चञ्चल है और बाल्यावस्था सम्पूर्ण चञ्चल पदार्थोंमें सबसे बढ़कर है । जहाँ उन दोनोंका संयोग हो, वहाँ अन्तःकरणमें चपलताजनित अनर्थसे बचानेवाला कौन है ! बचपन और मन—ये दोनों सभी वृत्तियों ( व्यवहारों ) में सदा दो सहोदर भाइयोंके समान दृष्टिगोचर होते हैं । इन दोनोंकी ही स्थिति क्षणभङ्गुर है । बालक कुत्तेके समान थोड़ा-सा ही खाना देने या पुचकारनेसे वशमें हो जाता है और थोड़ा-सा ही घुड़कने या छड़ी आदि दिखानेसे बिगड़ जाता या डर जाता है । वह सदा अपवित्र स्थानमें ही रमता या खेलता है ।
बाल्यावस्थामें प्राणी केवल दूसरोंसे डरता और खाता-पीता रहता है । वह सदा दीन रहता है, देखी और बिना देखी सभी वस्तुओंकी इच्छा करता है । उसकी बुद्धि और शरीर दोनों चञ्चल होते हैं । ऐसी बाल्यावस्थाको मनुष्य केवल दुःख भोगनेके लिये ही धारण करता है । निर्बल बालक अपने मानसिक संकल्पसे जिन पदार्थोंको पानेकी इच्छा करता है, उन्हें न पाकर उसकी बुद्धि सदा संतप्त होती रहती है और उसे इतना दुःख होता है मानो किसीने उसके हृदयमें घाव कर दिया है, जबतक बाल्यावस्था रहती है, तबतक असत्य पदार्थोंमें ही सत्यताकी बुद्धि बनी रहती है, हृदयमें नाना प्रकारके मनोरथ उदित होते रहते हैं तथा अन्तःकरण बड़ा कोमल होता है । अतः बाल्यकाल अत्यन्त दीर्घ दुःख प्रदान करनेके लिये ही होता है, सुख देनेके लिये नहीं । परम बुद्धिमान् मुनीश्वर ! जिसके अन्तःकरणमें सर्दी, गरमीका अनुभव तो होता है, परंतु जो उनका निवारण करनेमें समर्थ नहीं होता, उस बालक और वृक्षमें क्या अन्तर है ! बाल्यकालमें गुरुसे, माता-पितासे, अन्य लोगोंसे तथा अपनी अपेक्षा बड़े बालकोंसे भी भय प्राप्त होता है । अतः बाल्यावस्था भयका मन्दिर ही है । महामुने ! बाल्यावस्थामें समस्त दोषपूर्ण दशाओंद्धारा अन्तःकरण दूषित होता है और बाल्यकाल अविवेक-नामधारी विलासीका विलासभवन है । इसलिये इस जगत्में यह बाल्यावस्था किसीके लिये भी पूर्ण संतोषदायक नहीं है ।
( सर्ग १९ )
युवावस्थाके दोष
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—महर्षे ! बचपनके बाद मनुष्य बाल्यावस्थाके अनर्थोंका त्याग कर भोग भोगनेके उत्साह, भ्रान्ति अथवा कामरूप पिशाचसे दूषित-चित्त होकर नरकमें गिरनेके लिये ही यौवनारूढ होता है । यौवनावस्थामें मूर्ख मनुष्य अनन्त विलास ( चेष्टा ) वाले अपने चञ्चल चित्तकी राग-द्वेषादि वृत्तियोंका अनुभव
४८ * अविच्छिन्नचिदात्मकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
करता हुआ एक दुःखसे दूसरे दुःखको प्राप्त होता है। अपने चित्तरूपी बिलमें स्थित हो नाना प्रकारकी भ्रान्ति पैदा करनेवाला कामरूपी पिशाच अपने वशमें हुए पुरुषका बलपूर्वक तिरस्कार करता है। मुने ! युवावस्था में स्त्री, द्यूत और कलह आदि दुर्व्यसनोंको उत्पन्न करनेवाले वे राग-लोभ आदि प्रसिद्ध एवं दुष्ट दोष वैसे (काम, चिन्ता आदिके वशीभूत) अन्तःकरणवाले पुरुषको, जो काम आदिमें तन्मय हो रहा है, यौवनके ही सहारे नष्ट कर डालते हैं। जो महान् नरकका बीज है और सदा भ्रान्ति पैदा करनेवाला है, उस यौवनके द्वारा जिनका नाश नहीं हुआ, वे मनुष्य दूसरे किसीसे नष्ट नहीं हो सकते। शृङ्गार आदि नाना प्रकारके रसोंसे पूर्ण और अनेक प्रकारके आश्चर्यजनक वृत्तान्तोंसे युक्त भीषण यौवनरूपा भूमिको जिसने पार कर लिया, वही पुरुष धीर कहलाता है । जो क्षणभरके लिये प्रकाशमान, चञ्चल मेघोंकी गम्भीर गर्जना (अभिमान-पूर्ण वचन) से व्याप्त और बिजलीकी तरह चमककर लुप्त हो जानेवाला है वह अमङ्गलमय यौवन मुझे अच्छा नहीं लगता । जो भोगके समय मधुर अतएव स्वादिष्ट (मनोरम) और अन्तमें दुःखदायी होनेके कारण तिक्त प्रतीत होता है, जिसमें दोष-ही-दोष भरे हैं, जो सब दोषोंका आभूषण तथा मदिराके मद-विलासके समान मोहक है, वह यौवन मुझे कदापि अच्छा नहीं लगता । जो असत्य होकर भी सत्य-सा प्रतीत होता है, शीघ्र ही धोखा देनेवाला है तथा स्वप्नावस्थामें किये गये स्त्री-सह-वासके समान है, वह यौवन मुझे अच्छा नहीं लगता । यह क्षणभरके लिये सुन्दर प्रतीत होनेवाली सम्पूर्ण वस्तुओंमें अग्रगण्य है। सारी आयु बीत जानेपर दिखायी देनेवाले गन्धर्वनगरके समान है। यह सब लोगोंको क्षणमात्रके लिये मनोहर प्रतीत होता है। अतः यह मुझे अच्छा नहीं लगता ।
यह यौवन ऊपरसे तो रमणीय प्रतीत होता है, किंतु भीतरसे सद्भावशून्य है । अतः वेश्या स्त्रीके समागमके समान घृणित होनेके कारण मुझे रुचिकर नहीं जान पड़ता । जैसे प्रलयकालमें सबको दुःख देनेवाले बड़े-बड़े उत्पात सब ओरसे उमड़ उठते हैं, उसी प्रकार युवावस्था में सबको कष्ट प्रदान करनेवाले जो कोई भी अयोजन हैं, वे सब निकट आ जाते हैं । युवावस्थाका मोह मङ्गलमय आचारको भुला देनेवाले और बुद्धिको कुण्ठित कर देनेवाले भ्रमका अतिशय मात्रामें उत्पादन करता है । जैसे दावाग्नि वृक्षको जला देती है, उसी प्रकार युवावस्थामें जीव प्रियतमाके वियोगजनित दुःसह शोकाग्निसे मन-ही-मन जलता रहता है । जैसे अत्यन्त निर्मल, विस्तृत एवं पवित्र नदी भी वर्षा ऋतुमें मलिन हो जाती है, उसी प्रकार परम निर्मल, विशाल एवं शुद्ध बुद्धि भी युवावस्थामें कलुषित हो जाती है । बहुत-सी उत्तालतरङ्गोंसे युक्त भयानक नदी लाँघी जा सकती है, परंतु भोगतृष्णाकी चपलतासे युक्त युवावस्था नहीं लाँघी जा सकती । वह प्राणवल्लभा, उसके वे मोटे-मोटे स्तन, वे मनोहर विलास और वह सुन्दर मुख कितना मनोरम है !' युवावस्थामें इसी तरह-की चिन्ताओंसे मनुष्य जर्जर हो जाता है । रजोगुण और तमोगुणसे पूर्ण यह विषम यौवनरूप आँधी सम्पूर्ण सद्गुणोंकी स्थिरताको नष्ट करनेमें दक्ष है । मनुष्योंके यौवनका उल्लास (विकास) दोष-समूहोंको जगाता और सद्गुण-समुदायका मूलोच्छेद करता है अतएव उसे पाप-वैभवका विलास कहा गया है । शरीररूपी उपवनमें उत्पन्न हुई यौवनकी बेल बड़ी रमणीय है । वह ज्यों-ज्यों बढ़ती या ऊँचे चढ़ती है, त्यों-ही-त्यों अपनेसे सटे हुए मनरूपी भ्रमरको उन्मत्त बना देती है । शरीररूपी मरुभूमिमें कामरूपी घामके तापसे प्रकट हो भ्रान्तिरूपमें प्रतीत होनेवाली जो यौवनरूपिणी मृगतृष्णा है, उसकी ओर दौड़ते हुए मनरूपी मृग विषयोंके गड्ढे में गिर जाते हैं । यह युवावस्था देहरूपी जंगलमें कुछ दिनोंके लिये प्रकाशित होनेवाली शरद्ऋतुके समान है ।
**१४—स्त्री-शरीरकी रमणीयताका निराकरण**
कल्याण
तीर्थयात्रासे लौटनेपर श्रीरामचन्द्रजीका स्वागत (वैराग्य-प्रकरण सर्ग ४)
**१५—वृद्धावस्थाकी दुःखरूपता**
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**१६—कालके स्वरूपका विवेचन**
वैराग्य-प्रकरण ] * स्त्री-शरीरकी रमणीयताका निराकरण * ४९
लोगों ! तुम इसपर विश्वास न करो । जब-जब यौवन अपनी चरम सीमापर आरूढ़ हो जाता है, तब-तब संतापयुक्त कामनाएँ केवल विनाशके लिये ही बढ़ने या नृत्य करने लगती हैं। ये राग-द्वेषरूपी पिशाच तभीतक विशेषरूपसे नाचते फिरते हैं, जबतक कि यह यौवनरूपिणी रात्रि पूर्णरूपसे नष्ट नहीं हो जाती । जो महामुग्ध पुरुष मोहवश क्षणभङ्गुर यौवनसे हर्षको प्राप्त होता है, वह मनुष्य होता हुआ भी निरा पशु ही माना गया है । जो मनुष्य अभिमान या अज्ञानके कारण मदोन्मत्त यौवनावस्थाकी अभिलाषा करता है, उस दुर्बुद्धिको शीघ्र ही पश्चात्तापका भागी होना पड़ता है । साधो !
इस भूतपर वे ही पुरुष पूजनीय और महात्मा हैं, जो यौवनरूपी संकटसे सुखपूर्वक पार हो गये हैं । बड़े-बड़े मकरोंसे भरे हुए महासागरको सुखपूर्वक पार किया जा सकता है, किंतु विषय-चिन्तन आदि महातरङ्गोंके कारण उमड़े हुए और दुर्गुण दुराचाररूप अनेक दोषोंसे भरे हुए इस निन्दनीय यौवनके पार जाना बहुत ही कठिन है। ब्रह्मन् ! विनयसे अलंकृत, श्रेष्ठ पुरुषोंको आश्रय देनेवाला, करुणासे प्रकाशित तथा शम, दम, क्षमा, दया, शान्ति, संतोष, सरलता आदि विविध गुणोंसे युक्त उत्तम यौवन इस संसारमें उसी तरह दुर्लभ है, जैसे आकाशमें वन । (सर्ग २०)
स्त्री-शरीरकी रमणीयताका निराकरण
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! इधर केश हैं, इधर रक्त और मांस है, यही तो युवती स्त्रीका शरीर है। जिसका हृदय विवेकसे विशाल हो गया है, उस ज्ञानी पुरुषको इस निन्दित नारी-शरीरसे क्या काम ? आदरणीय मुने ! बहुमूल्य वस्त्र और केसर-कस्तूरी आदिके लेपसे जिन्हें बारंबार सजाकर दुलराया गया था, समस्त देहधारियोंके उन्हीं अङ्गोंको किसी समय गीध और सियार आदि मांसाहारी जीव नोचते और घसीटते हैं । जिस स्तनमण्डलपर मेरु पर्वतके शिखरप्रान्तसे सोल्लास प्रवाहित होनेवाली गङ्गाजीके जलकी धाराके समान मोतियोंके हारकी शोभा देखी गयी थी, मृत्युके पश्चात् सम्पूर्ण दिशाओंकी श्मशान-भूमियोंमें नारीके उसी स्तनका कुत्ते अन्नके छोटे-से पिण्डकी भाँति आस्वादन करते हैं। जैसे वनमें चरनेवाले गदहे या ऊँटके अङ्ग रक्त-मांस और हड्डियोंसे सम्पन्न हैं, उसी प्रकार कामिनियोंके अङ्ग भी उन्हीं उपकरणोंसे युक्त हैं। फिर नारीके प्रति ही लोगोंका इतना आग्रह या आकर्षण क्यों है ?
मुने ! लोग केवल स्त्रीके शरीरमें जिस आपात-रमणीयताकी कल्पना करते हैं, मेरी मान्यताके अनुसार वह भी उसमें है नहीं । उसमें जो रमणीयताकी प्रतीति होती है, उसका एकमात्र कारण मोह ही है। मनमें विकार उत्पन्न करनेवाली मदिरामें और युवती स्त्रीमें क्या अन्तर है ? एक जहाँ मद (नशे) के द्वारा मनुष्यको प्रचुर उल्लास प्रदान करती है, वहाँ दूसरी कामका भाव जगाकर पुरुषके लिये आनन्ददायिनी बनती है (अतः अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषके लिये दोनों ही सामान्यरूपसे त्याज्य हैं) । जैसे धूमको ही केशके रूपमें धारण करनेवाली प्रज्वलित अग्निशिखा, जो देखनेमें सुन्दर किंतु छूनेमें दुःसह है, तिनकोंको जला डालती है, उसी प्रकार केश और काजल धारण करनेवाली तथा नेत्रोंको प्रिय लगनेवाली नारियाँ, जिनका स्पर्श परिणाममें दुःख देनेवाला है, पुरुषको वासनाकी आगसे जलाती रहती हैं।
जैसे विषकी लता सुन्दर फूलोंसे मनोहर लगती, नये-नये पल्लवोंसे सुशोभित होती, भ्रमरोंकी क्रीडास्थली
५० * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
बननी, पुष्प-गुच्छ धारण करती, फूलोंके केसरसे पीले रंगकी प्रतीत होती, अपना सेवन करनेवाले मनुष्यको मार डालती या पागल बना देती है, उसी प्रकार कमनीया कामिनी फूलोंका शृङ्गार धारण करनेके कारण मनोहारिणी लगती, करपल्लवोंसे सुशोभित होती, भ्रमरोंके समान चञ्चल नेत्रोंके कटाक्ष-विलासका प्रदर्शन करती, पुष्प-गुच्छोंके समान स्तनोंको वक्षपर धारण करती, फूलोंके केसरकी भाँति सुनहरी गौर-कान्तिसे प्रकाशित होती, मनुष्योंके विनाशके लिये तत्पर रहती और काम-भावसे अपना सेवन करनेवालोंको उन्माद एवं मृत्यु आदिके अधीन कर देती है। मुनिश्रेष्ठ ! कामरूपी किरात (बहेलिये) ने मूढ़-चित्त मानवरूपी पक्षियोंको फँसानेके लिये स्त्रीरूपी जालको फैला रखा है। जन्म-स्थान-रूपी छोटे-छोटे जलाशयोंमें उत्पन्न हो धनरूपी पङ्कमें विचरनेवाले पुरुषरूपी मत्स्योंको फँसानेके लिये नारी बंसीके काँटेमें लगी हुई आटेकी गोलीके समान है और दुर्वासना ही उस बंसीकी डोर है।
नारीके स्तनसे, नेत्रसे, नितम्बसे अथवा भौंहसे, जिसमें सार वस्तुके नामपर केवल मांस है, अतएव जो किसी कामकी वस्तु नहीं है, मेरा क्या प्रयोजन है ? मैं वह सब लेकर क्या करूँगा ? ब्रह्मन् ! इधर मांस, इधर रक्त और इधर हड्डियाँ हैं; यही नारीका शरीर है, जो कुछ ही दिनोंमें जीर्ण-शीर्ण हो जाता है। संसारके मनुष्यो ! नारीके अङ्गोंका थोड़े ही समयमें होनेवाला यह परिणाम मैंने तुम्हें बताया है, फिर तुम क्यों भ्रमके पीछे दौड़ रहे हो ? पाँच भूतोंके सम्मिश्रणसे बना हुआ अङ्गोंका संगठन ही नारी नामसे प्रसिद्ध हो रहा है; अतः विवेक-बुद्धिसे सम्पन्न कोई भी पुरुष आसक्तिसे प्रेरित होकर क्यों उसकी ओर टूट पड़ेगा ? जैसे हथिनीके लिये चञ्चल हुआ हाथी विन्ध्याचल पर्वतपर उसे फँसानेके लिये बनाये हुए गड्ढेमें गिरकर बँध जाता और परम शोचनीय अवस्थाको पहुँच जाता है, यही दशा तरुणी स्त्रीके मोहमें फँसे हुए तरुण पुरुषकी होती है। (सर्ग २१)
वृद्धावस्थाकी दुःखरूपता
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—महर्षे ! जैसे हिमरूपी वज्र कमलको, आँधी ओसकणको और नदी तटवर्ती वृक्षको नष्ट कर देती है, उसी प्रकार वृद्धावस्था शरीर-का नाश कर डालती है। जैसे लेशमात्र विषका भक्षण शरीरको शीघ्र ही कुरूप बना देता है, उसी प्रकार बुढ़िया जरावस्था मनुष्यके सारे अङ्गोंको जर्जर करके शीघ्र ही कुरूप कर देती है। जिनके सारे अङ्ग शिथिल होकर झुर्रियोंसे भर गये हैं और जरा-वस्थाने जिनके सारे अङ्गोंको जर्जर बना दिया है, उन समस्त पुरुषोंको कामिनियाँ ऊँटके समान समझती हैं। वृद्धावस्थाके कारण जिसके अङ्ग काँपते रहते हैं, ऐसे मनुष्यको नौकर-चाकर, स्त्री-पुत्र, बन्धु-बान्धव तथा सुहृद्गण भी उन्मत्तके समान समझकर उसकी हँसी उड़ाते हैं। जो दीनतारूपी दोषसे परिपूर्ण, हृदयमें
संताप पहुँचानेवाली तथा समस्त आपत्तियोंकी एकमात्र सहचरी है, वह विशाल तृष्णा वृद्धावस्थामें बढ़ती ही जाती है। 'हाय ! बड़े खेदकी बात है, मैं परलोकमें क्या करूँगा ?' इस प्रकारका अत्यन्त दारुण भय, जो प्रतीकारके योग्य नहीं है, वृद्धावस्थामें बढ़ता जाता है। बुढ़ापेमें 'मैं बेचारा कौन हूँ ! मेरी हस्ती ही क्या है ? मैं किस प्रकार क्या करूँ ? अच्छा, मैं चुप ही रहता हूँ।' इस प्रकारकी दीनताका उदय होता है। 'मुझे किसी स्वजनसे कब, क्या और किस प्रकारका स्वादिष्ट भोजन प्राप्त हो सकता है ?' इस प्रकार चिन्तारूपिणी दूसरी जरावस्था बुढ़ापेमें निरन्तर चित्तको जलाती रहती है। वृद्धावस्थामें मनुष्य अपनी शक्तिका संतुलन खो बैठता है—कभी खानेकी शक्ति होनेपर पचानेकी शक्ति नहीं रहती और कभी पचानेकी
**१७—कालका प्रभाव और मानव-जीवनकी अनित्यता**
वैराग्य प्रकरण ] * कालके स्वरूपका विवेचन * ५१
शक्ति होनेपर खानेकी ही शक्ति नहीं रहती। इस प्रकार शक्तिह्रासके कारण भोगकी इच्छा तो बड़ी प्रबल हो उठती है, परंतु उपभोग किया नहीं जा सकता। उस दशामें निश्चय ही हृदय जलता रहता है। मुने ! शरीररूपी वृक्षके सिरेपर बैठी हुई जरावस्थारूपिणी वृद्धा बगुली, जो नाना प्रकारके क्लेशोंसे शरीरका अपकार करनेवाली है, रोगरूपी सर्पोंसे आक्रान्त होकर ज्यों ही चें-वें करने लगती है, त्यों ही मूर्च्छारूपी गहरे अन्धकारकी इच्छा रखनेवाला मृत्युरूपी उल्लू कहींसे झटपट आया हुआ ही दिखायी देता है।
जैसे सायंकालकी संध्याके प्रकट होते ही अन्धकार दौड़ पड़ता है, उसी प्रकार शरीरमें जरावस्थाको देखते ही मृत्यु दौड़ी चली आती है। सूना नगर, जिसकी लताएँ कट गयी हों वह वृक्ष तथा जहाँ वर्षा न हुई हो, वह देश भी कुछ-कुछ शोभित होता है, किंतु जरासे जर्जर हुए शरीरकी तनिक भी शोभा नहीं होती। वृद्धावस्थाकी मार खाकर जर्जर हुआ शरीर हिमसमूहसे आक्रान्त हो मुरझाये हुए कमलकी-सी शोभाको धारण करता है।
मस्तकरूपी पर्वतके शिखरपर उगी हुई यह वृद्धावस्था-रूपिणी चाँदनी वातरोग और खाँसीरूपिणी कुमुदिनी-को यत्नपूर्वक विकसित कर देती है। यह बुढ़ापारूपिणी वेगवती गङ्गा आयुके समाप्त होनेपर शरीररूपी तटवर्ती वृक्षकी जड़ोंको तुरंत ही काट गिराती है। तात ! जैसे श्वेत पत्रवाली और फूलोंसे लदी हुई पतली लता कुछ टेढ़ी हो जाती है, उसी प्रकार जिसके सारे अवयव सफेद हो गये हैं, मनुष्योंका वह दुबला-पतला शरीर वृद्धावस्थासे टेढ़ा हो जाता है—कमानकी तरह झुक जाता है। मुने ! जैसे कपूरसे सफेद हुए केलेके पेड़को हाथी क्षणभरमें उखाड़ फेंकता है, उसी प्रकार मृत्युरूपी गजराज वृद्धावस्थासे कपूरकी भाँति सफेद हुई देहको निश्चय ही क्षणभरमें उखाड़ फेंकता है। तात ! जो वृद्धावस्थाको प्राप्त होकर भी जीता है, उस दुष्ट जीवनके लिये दुराग्रह रखनेसे क्या लाभ ? भूतलपर किसीसे पराजित न होनेवाली यह जरावस्था मनुष्योंकी समस्त एषणाओंका तिरस्कार कर देती है—उनकी किसी भी इच्छाको सफल नहीं होने देती। (सर्ग २२)
कालके स्वरूपका विवेचन
श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं—मुनीश्वर ! 'यह मेरी भोग्य वस्तु है। मैं इसका भोक्ता हूँ। ये भोगके साधन हैं। इस साधनसे इस तरह भोग्य वस्तुको प्राप्त करके मैं चिरकालतक इसका उपभोग करूँगा। आज यह वस्तु मैंने प्राप्त कर ली और अब इस मनोरथको प्राप्त करूँगा' इत्यादि असंख्य मानसिक संकल्प-विकल्पोंद्वारा जो अनन्त व्यावहारिक वचनोंका प्रयोग करते हैं तथा अन्र ( तुच्छ ) शरीरमें महत्त्व-बुद्धि ( आत्मभाव ) रखते हैं, उन मूढ़ जनोंने हेयोपादेय, शत्रु-मित्र तथा राग-द्वेषादि भेदोंद्वारा इस संसाररूपी गुफामें भ्रमको अत्यन्त गौरवपूर्ण ( दुश्छेद्य ) बना दिया है। जैसे बड़वाग्नि उमड़े हुए समुद्रको सोखती है, उसी प्रकार यह सर्वभक्षी काल भी उत्पन्न हुए जगत्को अपना ग्रास बना लेता है। भयंकर कालरूपी महेश्वर इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चको निगल जानेके लिये सदा उद्यत रहते हैं; क्योंकि सारी वस्तुएँ उनके लिये सामान्यरूपसे ग्रास बना लेनेके योग्य हैं। युग, वर्ष और कल्पके रूपमें काल ही प्रकट है। इसका वास्तविक रूप कोई देख नहीं सकता। वह सब संसारको अपने वशमें करके बैठा है। संसारमें जो रमणीय, शुभ कर्म करनेवाले तथा उच्चता या गौरवमें सुमेरु पर्वतके भी गुरु थे, उन सबको कालने उसी तरह
५२ * अविच्छिन्नचिदात्मैकः पुमानस्तीह नेतरत् * [ संक्षिप्त योगवासिष्ठ
निगल लिया है, जैसे गरुड़ सर्पोंको निगल जाते हैं। यह काल बड़ा निर्दय, कठोर, क्रूर, कर्कश, कृपण और अधम है। संसारमें अबतक ऐसी कोई वस्तु नहीं हुई, जिसे यह काल उदरस्थ न कर ले। इस कालका विचार सदा सबको निगल जानेका ही रहता है। यह एकको निगलता हुआ भी दूसरेको चबा जाता है। अबतक असंख्य लोग इसकी उदर-दरीमें प्रवेश कर चुके हैं, तो भी यह महाखाऊ काल तृप्त नहीं होता। यह रात्रिरूपी भौरोंसे भरी हुई और दिनरूपी मञ्जरियोंमें सुशोभित वर्ष, कल्प और कलारूपिणी लताओंको निरन्तर सृष्टि करता रहता है, किंतु कभी थकता नहीं।
मुने ! यह काल धूर्तोका शिरोमणि है। इसे कितना ही तोड़ा जाय, टूटता नहीं। जलानेपर भी जलता नहीं और दृश्य होनेपर भी दीखता नहीं। यह मनोराज्यकी भाँति फैला हुआ है। एक ही निमेषमें किसी वस्तुको उत्पन्न कर देता है और पलभरमें किसी भी वस्तुका पूर्णतः विनाश कर डालता है। काल केवल अपना ही पेट भरनेमें संलग्न रहनेके कारण तिनका, धूल, इन्द्र, सुमेरु, पत्ता और समुद्र—सबको अपने अधीन करने—निगल जानेके लिये उद्यत रहता है। केवल इस कालमें ही पर्याप्त क्रूरता भरी है, लोभ भी इसीके भीतर डेरा डाले हुए है। सारा-का-सारा दुर्भाग्य भी इसीमें निवास करता है तथा दुःसह चपलता भी इसीमें उपलब्ध होती है। यह काल महाकल्प नामक वृक्षोंसे देवता, मनुष्य और असुर आदि प्राणिसमूहरूपी फलोंके भारोंको गिराता हुआ-सा खड़ा है। सैकड़ों महाकल्प बीत जानेपर भी यह काल न तो खिन्न होता है, न किसीके द्वारा समादृत होता है, न कहीं आता है न जाता है, न अस्त होता है और न इसका उदय ही होता है। यौवनरूपी कमलिनीको संकुचित करनेके लिये यह चन्द्रमाके समान है, आयुरूपी गजराजका मस्तक विदीर्ण करनेके लिये सिंहके सदृश है। इस संसारमें तुच्छ या महान् कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे यह कालरूपी चोर चुरा न ले जाता हो; यह काल ही व्यावहारिक अवस्था में संसारका कर्ता, भोक्ता, संहार करनेवाला और स्मरणकर्ता आदि सभी पदोंपर प्रतिष्ठित होता है। किसीने भी बुद्धिकौशलद्वारा इस कालके रहस्यका निश्चय नहीं किया है। पुण्य और पापके फलभोगके अनुसार सुन्दर और कुरूप रूप धारण करनेवाले समस्त शरीरोंको काल ही उत्पन्न करता, काल ही उनकी रक्षा करता और काल ही सहसा उनका संहार कर देता है।
इस प्रकार इस जगत्में सर्वत्र कालका विलास देखा जाता है। मनुष्योंमें तो कालका बल प्रसिद्ध ही है।
इस कालकी पत्नी है—चण्डी (अत्यन्त कोपवती कालरात्रि), जो बड़ी चतुराईसे चलती है। इसे कालने संसाररूपी वनमें विहार करनेके लिये नियुक्त किया है, इसके साथ सारी मात्रिकाएँ (डाकिनी, शाकिनी आदि) रहती हैं। यह कालरात्रि बाघिनके समान प्राणिसमूहका विनाश करनेवाली है। कालके धनुषका नाम है—अभाव या संहार। वह निरन्तर टंकार करता रहता है, उससे दुःखरूपी बाणोंकी झड़ी लगी ही रहती है। वह धनुष सब ओर स्फुरित होता रहता है। ब्रह्मन्! यह कालरूपी राजकुमार संसारमें दौड़ते हुए प्राणियोंके पीछे दौड़ता है और उनको बाणोंसे विदीर्ण करता रहता है। इस कालसे बढ़कर शक्तिशाली दूसरा कोई नहीं है। यही सबसे अधिक विलास करनेमें प्रवीण है और समस्त लक्ष्यभेदियोंसे ऊपर उठकर अनुपम शोभा पाता है।
यह जो कुछ भी विस्तृत जगन्मण्डल दिखायी देता है, वह उस कालकी नाट्यशाला है। इसमें वह खुद