सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपुरो वाक् ९ जी के सहस्रनाम तो प्राप्त होते हैं किन्तु अष्टोत्तर शतनाम विरले ही हैं। एक बार हिन्दी विभाग के प्रो० रमाशङ्कर शुक्ल ने पाठभेदों के सहित इसे छपवाया था जो आधा-अधूरा ही है। बीकानेर से आए एक उत्तमकोटि के साधक श्रीगिरिधर रङ्गा जी से मेरी मुलाकात काशी में बटुकभैरव मन्दिर के सान्निध्य में हुई। वह सौन्दर्यलहरी की 'लक्ष्मीधरा' व्याख्या के लिए अत्यन्त लालायित थे। यह ग्रन्थ भी पराम्बा भगवती अन्नपूर्णा के आशीर्वाद से पूर्ण हो गया है। इन्होंने कुछ शक्ति से सम्बन्धित दुर्लभ ग्रन्थों की छाया प्रति भेजने का आश्वासन मुझे दिया है। एतदर्थ मैं इनका आभारी हूँ। तन्त्र एवं पाञ्चरात्र शास्त्र के इस अनुपम ग्रन्थ में जो कुछ भी मेरी गति हो सकी है अथवा मैं इस शास्त्र को जो कुछ समझ सका हूँ, इसमें मेरे पूज्य गुरुवर्य पं० हीरामणि मिश्र का ही कृपा प्रसाद है। उनकी अमोघ कृपा मेरे ऊपर बनी रहे और मुझे आशीर्वाद प्रदान करते रहें। मुझमें किसी भी प्रकार का अहङ्कार कदापि न आवे। इसी कामना के साथ उनके चरणों में शतशः प्रणाम है और ग्रन्थ भी उन्हीं को समर्पित है। पाञ्चरात्र आगम का यह अत्यन्त उपादेय ग्रन्थ जो आज इस रूप में विद्वानों के समक्ष प्रस्तुत हो सका है उसके लिए मैं 'चौखम्बा संस्कृत सीरीज' के पूर्व संचालक स्वर्गीय श्रीविठ्ठलदासजी गुप्त का हृदय से आभारी हूँ। उन्होंने ही इस ग्रन्थ के हिन्दी व्याख्या के लिए मुझे प्रेरित किया था। सम्प्रति चौखम्बा कृष्णदास अकादमी के संचालकद्वय श्री ब्रजमोहनदासजी गुप्त एवं श्री कमलेश कुमार गुप्त को अत्यन्त धन्यवाद है जो यह ग्रन्थ इस साज-सज्जा के साथ विद्वानों के समक्ष प्रस्तुत है। १९९२ ई० में सौ वर्ष पूर्ण करने वाली इस संस्था के भविष्य को सुरक्षित रखने वाली चौथी एवं पाँचवीं पीढ़ी में प्राप्त चि० सचिन कुमार गुप्त एवं श्री कौशिक गुप्त को आशीर्वाद है और भगवान् विश्वनाथ से प्रार्थना है कि अपने पूर्वजों के द्वारा प्रदर्शित मार्ग पर चलकर इसी प्रकार अनवरत सरस्वती की सेवा करते रहें। मैं अपने सहयोगी सम्पादक श्री चक्रपाणि भट्ट को उनके प्रूफ संशोधन के सहयोग के लिए धन्यवाद प्रकाश करना नहीं भूल सकता। मेरे चिरञ्जीव श्रीरामरञ्जन एवं श्रीचित्तरञ्जन ने कम्प्यूटर कार्य तथा सम्पादन में मेरी भरसक सहायता की है। उनकी स्नेहमयी माता का आध्यात्मिक एवं नैतिक सहयोग ही ग्रन्थ की पूर्णता में कारण है। विश्वात्मा भगवान् विष्णु एवं भगवती पराम्बा महालक्ष्मी इनका निरन्तर अभ्युदय करें तथा सदैव प्रसन्न रक्खें। अन्ततः भगवान् विष्णु एवं भगवती महालक्ष्मी से प्रार्थना है कि इस ग्रन्थ से मानवमात्र का अजस्र कल्याण करते रहें। श्रीगंगासप्तमी, २३.४.२००७ विद्वद्वशंवदः वैशाख शुक्ल, वि.सं. २०६४ सुधाकर मालवीयः