भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 458

सप्तदशः परिच्छेदः ३९९ और उस पर पूर्वदिन के पूजा के अर्घ्य पुष्प माल्यादि का अपसारण करे । उस कुम्भ के जल के सूख जाने पर शीतल जल की धारा से पुनः उसे पूर्ववत् पूर्ण करे । कुम्भ का जल जैसे-जैसे सूखता जायेगा, वैसे-वैसे रोगी के धातु की वृद्धि होगी । इसके बाद नवीन माला, वस्त्र, गन्धादि से मन्त्रनाथ को अलङ्कृत कर पूर्ववत् यजन करे । रक्त धातु की वृद्धि करने वाले मन्त्र पूत सुगन्धित पुष्प, नैवेद्यादि से देवाधिदेव को सन्तृप्त करे । पूजा के बाद अर्घ्य, पुष्प, रज, धूप, दीपादि सब एकत्रित कर नित्य कहीं अगाध जल में फेंक देवे । उससे शेष बचे का प्राक् उक्त रीति से विनियोग करे ॥ ३०३-३११ ॥ इसके बाद तीसरे दिन चौकोर मण्डल लिखकर उसमें षट्कोण एवं पुर लिखे । फिर उसके मध्य में कमल लिखकर वहाँ पूर्ववत् कलश समूह स्थापित कर उसके बीच-बीच में दीपक स्थापित करे । फिर पूर्व की भाँति अर्चना कर भगवन्निवेदित हविरादि से ब्राह्मणों को सन्तृप्त करे ॥ ३११-३१२ ॥ चौथे दिन वृत्तमण्डल लिखे । उस वृत्त पर नाभि नेमि समन्वित पञ्चार चक्र लिखकर उसके मध्य स्थित महाकुम्भ के चारों ओर दिक्कलश रक्खे । दोनों के मध्य में दीपक रखकर विविध नैवेद्य तथा विविध पुष्पों से देवाधिदेव की अभ्यर्चना कर उनके द्वारा उपयुक्त हविरादि सब अग्नि में प्रक्षिप्त करे । शेष सभी कार्य पूर्ववत् सम्पादन करे ॥ ३१३-३१५ ॥ इसके बाद पाँचवे दिन अष्टकोण मण्डल बनावे और उसमें शङ्ख लिखकर शङ्ख के भीतर कमल लिखे । उसके भीतर नाभि वेदी सहित पञ्च अरों वाला भूतों का आवास हेतिराट् (चक्र) लिखे । इसी प्रकार पूर्व की भाँति कुम्भ सहित दीपक स्थापित कर विविध प्रकार के नैवेद्यों तथा कुसुमादिकों से भगवत् पूजन सम्पादन करे । तदनन्तर देवोपयुक्त अन्नादि जल में प्रक्षिप्त कर शेष कार्य पूर्ववत् करे ॥ ३१६-३१८ ॥ इसके बाद छठे दिन त्रिकोण मण्डल लिखकर, उसके मध्य में सात अरों से युक्त महाचक्र लिखकर, उसके बीच में चारों ओर चार गदा लिखकर, उसके मध्य में स्थित महाकुम्भ पर देवाधिदेव को यथाविधि पधरा कर अर्चना करे । फिर तन्निवेदित अन्नादि का काक आदि आकाशचारी पक्षियों के खाने के लिये किसी ऊँचे स्थान पर रख देवे ॥ ३१८-३२० ॥ इसके बाद पुनः सातवें दिन चतुःकोण मण्डल निर्माण करे । फिर कोण चतुष्क पर चार शङ्ख लिखें । उसके मध्य में असंख्य दल भूषित पद्म लिखे । उस कमल की कर्णिका में द्वादश अरों वाला चक्र लिखे और उसके आठों दिशाओं में दीपयुक्त आठ कलश स्थापित करे । उस कलश पर सातवें दिन के पूजन का दक्षिणा सहित समस्त नैवेद्य का विनियोग छठें दिन के समान ही करे । ऐसा करने से रोगी के रस, असृक, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र इन धातुओं की