भारतकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 459

४०० सात्वतसंहिता क्रम से वृद्धि होने लगती है । देह के धातुओं पर आश्रित मांस भोजी जन्तुओं की बलि के लिये सातों दिन क्रमशः महिष, अज, गुड, हरिण, शशक, मयूर और चक्रवाक का सम्पादन करे । कुङ्कुम से रँगे हुए विष्ट आदि द्वारा पशु प्रतिनिधि के रूप में करे । जीव हिंसा कदापि न करे क्योंकि स्वार्थ के लिये एवं पदार्थ के लिये अपना कल्याण चाहने वाले पुरुष को प्राणिहिंसा कदापि नही करनी चाहिये । विशेष कर जीवित रहने की इच्छा रखने वाला पुरुष प्राणिहिंसा वर्जित करे । प्राणिहिंसा से आयु का क्षय होता है और प्राणियों को अभयदान देने से आयु की अभिवृद्धि होती है ॥ ३२९ ॥ आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, अपमृत्यु पर विजय महान्, बल, ओज, धृति, धैर्य, मन्त्र के जप से प्राप्त होता है, दूसरे के आयुष्य के हरण से नहीं ॥ ३३० ॥ सत्त्वगुण में स्थित पुरुष की मन्त्र, पूजा, जप, होम, सुवर्ण एवं गवादिक का दान करने से इस लोक की तथा परलोक की वृद्धि होती है ॥ ३३१ ॥ इस प्रकार सात दिन बीत जाने पर मण्डलादि स्थित देवताओं से क्षमा माँग कर मण्डलीय रजःकण तथा बलि आदि की समस्त वस्तुयें दूर जलादि में प्रक्षिप्त कर देवे । यहाँ तक आतुरों के रक्षा विधान की विधि कही गई ॥ ३३२-३३३ ॥ अनातुराणामपि रक्षाविधानम् नीरुजानां विशेषेण रक्षणं भोगसेविनाम् ॥ ३३३ ॥ क्रियारतानां भक्तानामास्तिकानां हितैषिणाम् । कार्यं क्रियापरेणैव मन्त्रज्ञेन सदैव हि ॥ ३३४ ॥ यत्रानेन विधानेन शरीरमपि रक्ष्यते । तत्र भूताः प्रयच्छन्ति कल्याणं सर्वलौकिकम् ॥ ३३५ ॥ अथ सन्धारणीं रक्षां वक्ष्ये विग्रहभूषणम् । या सम्पन्ने क्रियामात्रे धारणादेव रक्षति ॥ ३३६ ॥ प्रणवाद्यन्तसंरुद्धं प्राग्वत् संज्ञापदं लिखेत् । संज्ञाधारं हि तद्बीजं विन्यसेत् प्रणवोदरे ॥ ३३७ ॥ तेनावर्तं त्रिधा कुर्यात् सर्वं तत् सिंहकुक्षिगम् । नेमेर्दशमबीजेन बीजराट् परिवेष्ट्यते ॥ ३३८ ॥ औकाररहितं बीजं नाभिसप्तमसंस्थितम् । भिन्नं सर्वारसंसंस्थैस्तु कृत्वा तेन प्रपूर्य तम् ॥ ३३९ ॥ कमलं तद्बहिः कुर्यात् षड्दलं व्योमभूषितम् । हृदाद्यं नेत्रपर्यन्तं पत्रषट्के तु विन्यसेत् ॥ ३४० ॥