BharatKosha
Back to the archive

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished511 pages
Page 494Permalink

४६४ ] [ श्रीशारदा तिलक पाश्चात्त्योत्तरयाम्यप्रागूर्ध्ववक्त्रेषु साधकः । पदानि दश विन्यस्येदेषु स्थानेषु मन्त्रवित् ॥१२ शिरोभ्रू मध्यदृग्वक्त्रे कण्ठहृन्नाभि गुह्यके । जाननोः पादयोर्युग्मे तच्छिरः शिरसि न्यसेत् ॥१३ हृदयं ब्रह्मणे प्रोक्तं विष्णवे शिर ईरितम् । शिखा रुद्राय कवचमीश्वराय समीरिनम् ॥१४ गायत्री के मुनि विश्वामित्र, जो महतीद्युति वाले थे, बताये गये हैं। इसका गायत्री छन्द है और इसका देवता सविता कहा गया है ।८। इसके शिर का मुनि ब्रह्मा है-देव्यादिका छन्द कहा गया है । बुधों के द्वारा इसका परमात्मा गायत्री देवता कहा गया है ।६। भू आद्य सात व्याहृतियों का हृदय, मुख, अंस और अरु दोनों जठर में न्यास करके मन्त्र ज्ञाता को गायत्री के वर्णों का स्तनों में न्यास करना चाहिए ।१०। पदों की सन्धियों से, ध्वज में नाभी में, हृदय में, कण्ठ में और भुजाओं की सन्धियो में-मुख, नासिका, कपोल, नेत्र, भ्रू, मस्तक में में साधक पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, पूर्व और ऊर्ध्व वस्त्र में दश पदों का विन्यास करके मन्त्र के वेत्ताओं को इन स्थानों में न्यास करना चाहिये ।११।१२। शिर, भ्रूओं कामध्य भाग, लोचन, मुखमें तथा कण्ठ हृदय, नाभि और गुह्य भाग में, जानुओंमें, एवं दोनोंमें पादों में उसके शिर का न्यास करना चाहिए ।१३। हृदय ब्रह्माजी के लिए कहा गया है और भगवान् विष्णु के लिए शिर बताया गया है। शिखा रुद्रदेव के लिए और कवच ईश्वर के लिए समुदीरित किया गया है ।१४। नेत्रं सदाशिवायोक्तमस्त्रं सर्वात्मने स्मृतम् । षडङ्गान्‍तेवमुक्तानि यथा स्थानं प्र॒विन्यसेत् ॥१५

Page 495Permalink

एकविंश पटल ] [ ४६५ मुक्ताविद्रुमहेमनीलधवलच्छायैर्मुखैस्त्रीक्षणै- र्यक्तामिन्दुनिबद्धरत्नमुकुट तत्त्वात्मवर्णात्मिकाम् । गायत्रीं वरदाभयाङ्कुशकशाः शूलं कपाल गुणं शंखचक्रमथारविन्दगलं हस्तेवहन्ती भजे ॥१६ प्राणायामान्पुरा कृत्वा गायत्री सन्ध्योर्जपेत् । सप्तव्याहृतिसंयुक्तां गायत्री शिरसान्विताम् ॥१७ तिरुच्चरन्धिया प्राणान्धारयेद्यतमानसः । प्राणायामोऽयमाख्यातः समस्तदुरितापहः ॥१८ व्याहृतित्रयसंयुक्ता गायत्री दीक्षितो जपेत् । तत्त्वलक्षं विधानेन भिक्षाशी विजितेन्द्रियः ।१६ क्षीरौदनंतिलांन्दूर्वाक्षोरद्रुमसमद्भिदरान् । पृथक् सहस्रत्रितयं जुहुयान्मन्त्रसिद्धये ।२० विधाय मण्डलं विद्वान् त्रिकोणोज्ज्वलकर्णिकाम् । सौरं पीठं यजेत्तत्र दीप्तादिनवशक्तभिः ।६१ नेत्र सदाशिव भगवान् के लिए बताया गया है तथा अस्त्र सर्वात्मा के लिए कहा है । इसी प्रकार से छं अङ्गों को कहा गया है, अतएव छै अङ्गों को ठीक स्थान पर ही विन्यस्त करना चाहिए ।१५। अब ध्यान बताया जाता है—मुक्ता (मोती), विद्रुम हेम, नील और धवल छाया वाले मुखों और तीन नेत्रों से समन्वित, चन्द्र जिसमें निबद्ध है ऐसे रत्नों के निर्मित मुकुट (शिरोभूषण) से युक्त, तत्त्व स्वरूप वर्णों के आत्मा वाली करों में वरदान, अभयदान, अंकुश, कशा, शूल, कपाल गुण, शंख चक्र और छै अरविन्दो को धारण करने वाली गायत्री देवी का मैं भजन करता हूँ ।१६। सबसे पूर्व प्राणायामों को

Page 496Permalink

४६६ ] [ श्रीशारदा तिलक करके (यहाँ पर जो प्राणायाम में बहुवचन दिया गया है इससे तीन बार ही प्राणायाम करनेका तात्पर्य है) फिर दोनों सन्ध्याओं में गायत्री का जप करना चाहिये । गायत्री सातों व्याहृतियों से युक्त और शिर समन्वित होनी चाहिये । ऐसी ही गायत्री का जप करें । उसका स्वरूप यह है-'ओ३म् भूः, ओ३म् भुवः, ओ३म् स्वः, ओ३म् महः, ॐ जनः, ॐ तपः, ॐ सत्य, ओ३म् तत्सवितुर्वरेण्य भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्, ओ३म् आपोज्योतीरसोऽमृत भूर्भुवः स्वरोऽम् ।" प्राणों को तीन बार उच्चारण करते हुये धी से यतमानस होकर ही धारण करना चाहिये । यही प्राणायाम कहा है जो समस्त दुरितों (पापों) का अपहरण करने वाला है ।१७-१८। जोदीक्षित है उसको (भूःभुवःस्वः) इन तीनों व्याहृतियाँ से युक्त हो गायत्री मन्त्र का जप करना चाहिये । चौबीस लाख जप के विधान से ही जप करे और भिक्षा के द्वारा अपनी अशन क्रिया का सम्पादन करे एवं इन्द्रियों का जीत लेने वाला ही रहे। ।१६। गायत्री मन्त्र की सिद्धि के लिये साधक की क्षीर, ओदन, तिल, दूर्वा, क्षीर द्रुमों की समिधाओं का पृथक् तीन सहस्र हवन करना चाहिये ।१६-२०। विद्वान् पुरुष मण्डल अर्थात् सर्वतोभद्र की रचना करे । उसकी कर्णिका में त्रिगुणित मन्त्र का लेखन करना चाहिये । उसमें सौर पीठ का अभ्यर्चन करे जो कि दीप्ताआदि नौ शक्तियों के सहित होवे ।२१। मूलमन्त्रेण क्लृप्तायां मूर्तीं देबी प्रपूजयेत् । कोणेषु त्रिषु सम्पूज्या ब्रह्माद्याः शक्तयोबहिः ।२२ आदित्याद्यास्ततः पूज्या उषादिसहिताः क्रमात् । ततः षडङ्गान्यभ्यर्चेत्केसरेषु यथाविधि ।२३ प्रह्लादिनीं प्रभां पश्चान्नित्यां विश्वम्भरां पुनः। विलासिनीप्रभावत्यौ जयां शान्ति यजेत्पुनः ।२४

Page 497Permalink

एकविंश पटल ] - [ ४६७ कान्तिं दुर्गा सरस्वत्यौ विश्वरूपां ततःपरम् । विशालासंज्ञितामीशां व्यापिनीं विमलां यजेत् ॥२५ ततोऽपहारिणी सूक्ष्मां विश्वयोनि जयावहाम् । पद्मालयां परां शोभां पद्म ॱपां ततोऽर्चयेत् ॥२६ ब्राह्मयाद्याः सारुणा वाह्ये पूजयेत्प्रोक्तलक्षणाः । ततोऽर्चयेद्ग्रहान्बाह्ये शक्रादीनायुधैः सह ।२७ इत्थमावरणैर्देवीं दशभिः परिपूजयेत् । धर्मार्थकाममोक्षाणां भोक्ता स्याद्द्विजसत्तमः ।२८ मूल मन्त्र के द्वारा क्लृप्त अर्थात् कल्पना की हुई मूत्ति में देवी का प्रकृष्ट पूजन करना चाहिये । तीनों कोणों में ब्रह्मा आदि शक्तियों का अभ्यर्चन करे । २२। उसके बाहर फिर आदित्य आदि का जो उषा आदि के सहित ही होवें क्रम से पूजन करे । इसके उपरान्त केसरों में षट् अङ्गों का विधि के अनुसार ही अभ्यर्चन करना चाहिये ।२३। इसके पश्चात् प्रह्लादिनी, प्रभा का तथा नित्या और फिर विश्वम्भरा का यजन करे । फिर विलासिनी, प्रभावती जया और शान्ति का अर्चन करना चाहिये ।२४। फिर कान्ति, दुर्गा, सरस्वतो और इनके पीछे विश्वरूपा का अर्चन करे । फिर विशाल संज्ञा वाली, ईशा, व्यापिनी और विमला का यजन करना चाहिये ।२५। इसके अनन्तर अपहारिणी, सूक्ष्मा, विश्वयोनि, जयावहा, पद्मालया, परा, शोभा का और फिर पद्म रूपा का यजन करे ।२६। ब्राह्मी आदि सारुणा का जिनके लक्षण बता दिये गये हैं बाहर में पूजन करना चाहिये । इसके अनन्तर बाहर में शक्र आदि ग्रहों का आयुधों के साथ अभ्यर्चन करे ।२७। इस रीति से दश आवरणों के सहित ही देवी का यजन करना चाहिये । ऐसे पूजन करने वाला श्रेष्ठ द्विज चारों पदार्थों का अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का भोग करने वाला.हुआ करता है ।२८।

Page 498Permalink

४६८ ] [ श्रीशारदा तिलक तत्वसंख्यासहस्राणि मन्त्रविज्जुहुयात्तिलैः । सर्वपापविनिर्मुक्तो दीर्घमायुः स विन्दति ।२६ आयुषे साज्यहविषा केवलेनाथसर्पिषा । दुर्वात्रिकैस्तिलैर्मन्त्री जुहुयात्रिसहस्रकम् ॥३० अरुणाब्जैस्त्रिमध्वक्तैर्जुहुयादयुतं ततः । महालक्ष्मीर्भवेत्तस्य षण्मासान्नात्र संशयः ॥३१ ब्रह्मश्रियै प्रजुहुयात्प्रसूनैर्ब्राह्मवृक्षजैः । बहुना किमिहोक्तेन यथावत्साधु साधिता ॥३२ द्विजन्मनामियं विद्या सिद्धा कामदुधा मता ॥३३ ओं जातवेदसे सुनवास सोममरातीयतोनिदहाति वेदः । सनः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुन्दुरितात्यग्निः ॥३४ आग्नेयमभिधास्यामि मन्त्रं सर्वार्थसाधकम् । मारीचः काश्यपः प्रोक्तो मुनिरस्य महामनोः ॥३५ त्रिष्टुप् छन्दो देवताऽस्य जातवेदोऽग्निरीरितः । नवभिः सप्तभिः षडभिः सप्तभि पुनरष्टभिः ॥६५ मन्त्र के ज्ञान रखने वाले पुरुष को चाहिये कि चौबीस सहस्र तिलों के द्वारा आहुतियाँ देवे । वह फिर सभी पापों से विमुक्त (छूटा हुआ) होकर दीर्घ आयु की प्राप्ति किया करता है ।२६। आयु के लिये घृत के सहित हवि से होम करे अथवा केवल घृत से ही हवन करना चाहिये । दूर्वात्रिको से, तिलों के द्वारा मन्त्रधारी को तीन सहस्र आहु- तियाँ देनी चाहिये ।३०। इसके उपरान्त अरुण वर्ण के कमलों से जो मधु से अक्त होवे दश सहस्र आहुतियाँ देवें । इस प्रकार से होम करने वाले पुरुष के गृह में महालक्ष्मी हो जाया करती हैं-इसमें तनिक भी

Page 499Permalink

एकोविंश पटल ] । ५६६ संशय का अवसर नहीं है। और यह महालक्ष्मी की कृपा छै मासों के ही अन्दर हो जाती है ।३१। ब्रह्मत्व की श्री की प्राप्ति के लिये तो ब्रह्म वृक्ष अर्थात् पलाश के पुष्पों से हवन करना चाहिये। इस विषय में बहुत अधिक कथन करने से क्या लाभ है। केवल यही कहना पर्याप्त है कि ठीक रीति के अनुसार भलीभाँति साधित की हुई द्विजों के लिये यह विद्या सिद्ध होती है और सभी कामनाओं के दोहन करने वाली मानी गयी है। ३२-३३। अब त्रिष्टुप् मन्त्र को बताया जाता है। यह आग्नेय मन्त्र है। जैसा मैं कहता हूँ यह सभी अर्थों का साधक मन्त्र है। यह ऋग्वेद का मन्त्र है। मन्त्र-“ओ३म् जातवेद से सुनवाम सोम मरातीयतोनिदहाति वेदः । मनः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धु न्दुरितात्याग्निः ।" इस महामन्त्र का मारीच कश्यप ऋषि कहा गया है। इसका त्रिष्टुप् छन्द है और इसका देवता जातवेद अग्नि कहा गया है ।३४। नौ, सात, छै, सात और आठ तथा सप्त मूलमन्त्र के वर्णों के द्वारा इसकी षडङ्ग विधि अर्थात् छं अङ्ग न्यासों की विधि कही गयी है ।३५। सप्तभिर्मूलमन्त्रार्णैः षडङ्गविधिरीरितः । अगुष्ठगुल्फजंघासु जानुनोरुरुयुग्मके ।।३६ कट्यन्धुनाभिषु हृदि स्तनयोः पार्श्वयोर्द्वयोः । पृष्ठतः स्कन्धयोर्मध्ये बाहुमूलोपबाहुषु ।।३७ प्रकूर्परप्रकोष्ठेषु मणिबन्धतलेषु च । मुखनासाक्षिकर्णेषु मस्तमस्तिष्कमूर्द्धसु ।।३८ क्रमेणविन्यसेद्वर्णान्मन्त्री मन्त्रसमुद्भवान् । शिखाललाटनयनकर्णोष्ठरसनास्वथ ।।३६ सकण्ठबाहुहृत्कुक्षिकटिगुह्योरुजानुषु । जंघयोः पदयोर्न्यस्येतपदान्यस्त मनोः सुधीः ।।४०

Page 500Permalink

५०० ] [ श्रीशारदा तिलक विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां । कन्याभिः करवाळखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम् । हस्तैश्चक्रगदासिखेट विशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं । बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गा त्रिनेत्रां स्मरेत् ॥४१ मन्त्रवर्णसहस्राणि जपेन्मन्त्रं विशालधीः । तदन्ते तिलसिद्धार्थचित्रमूलैः समिद्वरैः ।४२ अङ्गुष्ठ, गुल्फ, जङ्घा में तथा दोनों जानु और ऊरुओंमें, कटि, अङ्गु, नाभि, हृदय, दोनों, स्तन और दोनों पार्श्वों में, पृष्ठभाग में तथा स्कन्धों के मध्य में, बाहुओं के मूल में और उपबाहुओं में, प्रकूर्पर, प्रकोष्ठ और मणिबन्धों के तलों में, मुख, नासिका, नेत्र और कानों में, मस्तक, मस्तिष्क और मूर्धा में मन्त्रधारी को मन्त्र में होने वाले वर्णों का क्रम से विन्यास करना चाहिये । शिखा, ललाट, नयन, कर्ण, ओष्ठ और रसना में, कण्ठ, बाहु, हृदय, कुक्षि, कटि गुह्य, अरु, जानु, में, दोनों जङ्घाओं में और दोनों पादों मे सुधी पुरुष को चाहिये कि मन्त्र के पदों का न्यास करे ।३६-४०। अब ध्यान बताया जाता है—विद्यु- ल्लता के समान प्रभा वाली, मृगपति (सिंह) स्कन्ध पर विराजमान, परमभीषण, कन्याओं के द्वारा सेवित जिनके करों में करवाल ओर खेट शोभित हैं, जो अपने करों में चक्र गदा, असि (तलवार), खेट, विशिख, चाप, गुण और तर्जनी को धारण करने वाली है, जिनका अनल के समान स्वरूप है और चन्द्रमाके धारण करने वाली है, जिनका नेत्रों से समन्वित हैं, ऐसी दुर्गादेवी का स्मरण करता हूँ ।४१। मन्त्र में जितने वर्ण है उतने ही सहस्र मन्त्र का जप विशाल बुद्धि वाले को करना चाहिये । इस जपके समाप्त हो जानेपर तिल, सिद्धार्थ, चित्रमुल एवं श्रेष्ठ समिधाओं से हवन करना चाहिये ।४२।

Page 501Permalink

एकविंश पटल ] [ ५०१ क्षीरद्रुमाणामाज्येन विषान्नंघृतान्वितैः । चतुश्चत्वारिंशदाढ्यं चतुःशतसमन्वितम् ॥४३ चतुःसहस्रं जुहुयादर्चिते हव्यवाहने । मण्डले सर्वतोभद्रे षट्कोणाङ्घ्रियकर्णिके ॥४४ विधिना वक्ष्यमाणेन पीठं देव्याः प्रपूजयेत् । जयाख्यं विजयां भद्रां भद्रकालीमन्तरम् ॥४५ सुमुखीं दुर्मुखीं संज्ञां पश्चाद्व्याघ्रमुखी पुनः । अथ सिंहमुखीं दुर्गा, नव शक्ताः प्रपूजयेत् ॥४६ आसनं सिंहमन्त्रेण दद्यादुक्तेन देशिकः । मूर्ति सङ्कल्प्य मूलेन तस्यामावाह्य पूजयेत् ॥४७ षडङ्गानि यथापूर्वं केसरेष्वर्चयेत्सुधीः । अग्न्यादिपादाष्टकोत्पन्ना मर्तयोऽर्च्य बहिः पुनः ॥४८ जातवेदाः सप्त जिह्वो हव्यवाहनसंज्ञकः । अश्वोदरजसंज्ञोऽन्यः पुनर्वैश्वानराह्वयः ।४६ कौमारतेजाः स्याद्विश्वमुखो देवमुखं स्मृतः । ततो भूसलिलाग्नीरानात्मनेऽन्तान्नमोन्वितान् ।५० जिन वृक्षों में टहनी तोड़नेसे दूध निकला करता है वे क्षीर-द्रुम कहे जाते हैं। इनकी ही समिधाओं से, घृत से, हवि से, और घृत से अन्वित अन्नों से चार हजार चार सौ चौआलीस आहुतियाँ समचित अग्नि में देनी चाहिये। सर्वतोभद्र मण्डल में छै कोणों से समन्वित कर्णिका के मध्य में आगे कही जाने वाली विधि से देवी के पीठ की पूजा करनी चाहिये। फिर नौ शक्तियों का अर्चन करे। उन शक्तियों के ये नाम हैं—जया, विजया, भद्रा, भद्रकाली, सुमुखी, दुर्मुखी, व्याघ्र- मुखी, सिंहमुखी और दुर्गा ये नौ हैं ।४३-४६। फिर आचार्य सिंह मन्त्र के द्वारा जो कहा जा चुका है आसन देवे। फिर मूल मन्त्र के द्वारा भली भाँति कल्पना करके उसी मूर्त्तिमें देवी का आह्वान करके उसका

Page 502Permalink

५०२ ] [ श्रीशारदा तिलक अर्चन करे ।४७। सुधी पुरुष छ अङ्गों का केसरों में जैसा कि पूर्व में बताया जा चुका है अर्चन करे। अग्नि आदि पादाष्टक से समुत्पन्न मूर्त्तियां फिर बारह पूजनी चाहिये ।४८। अब उन मूर्तियों को बताया जाता है-जातवेदा, सप्तजिह्वा हव्यवाहन, अश्वोदरज, वैश्वानर, कौमार तेजा, विश्वमुख, देवमुख ये उनके नाम कहे गये हैं। फिर भू सलिल अग्नि रानात्मा के लिये जो अन्त में नमः—इस पद से समन्वित होवें ।४६-५०। चतुर्दिक्षु समभ्यर्चेत्कोणेषु तत्कलाः पुनः । पूर्वादिदिक्षु सम्पूज्या जार्णाद्या वर्णशक्तयः ।५१ जाग्रता तपनी वेदगर्भा दहनरूपिणी । सेन्दुखण्डा शुम्भहन्त्री नभश्चारिण्यनन्तरम् ।५२ वागीश्वरी मद्वहा सोमरूपा मनोजवा । मरुद्वेगा रात्रिसंख्या तोन्नकोया यशोवती ५३ तोयात्मिका पुनर्गन्तव्या दयावत्यपि हारिणी । तिरस्क्रिया वेदमाता तत्परा मदनप्रिया ।५४ समाराध्या नन्दिनी च परा रिपुविमर्दिनी । षष्ठी च दण्डिनी तिग्मा दुर्गा गायत्र्यनन्तरम् ।५५ निरवद्या विशालाक्षी श्वापोद्वाहा वनादिनी । वंदना वह्निगर्भाख्या सिंहवाहाह्वया तथा ।५६ धुर्या दुर्विषहा पश्चाद्गिरिसा तापहारिणी । त्यक्तदोषा निस्सरन्ता चत्वारिंशच्चतुर्युता ।५७ फिर चारों दिशाओंमें समभ्यर्चन करे और फिर उनके कोणोंमें उनकी कलाओं का यजन करना चाहिये । पूर्वं आदि दिशाओंमें जार्णाद्य वर्ण शक्तियों का पूजन करे ।५१। ये संख्या में चौवालीस हैं—उनके नामों को अब बताया जाता है—जाग्रता, तपनी, वेदगर्भा, दहन रूपिणी, सेन्दुखण्डा, शुम्भहन्त्री, नभच्चारिणी, वागीश्वरी, मद्वहा, सोम

Page 503Permalink

एकविंश पटल ] { ५०३ रूपा, मनोजवा, मरुद्वेगा, रात्रिसंख्या, तीव्रकोपा, यशोवती ।५२-५३। तोयात्मिका, नित्या, दयावती, हारिणी, तिरस्कृता, वेदमाता, तत्परा, मदनप्रिया, समाराध्या, नन्दिनी, परा, रिपुविमर्दिनी, षष्ठी, दण्डिनी, तिग्मा, दुर्गा, गायत्री ।५४-५५। निरवद्या, विशालाक्षी, श्वासोद्ग्राहा, वनादिनी, वेदना, वह्निगर्भा, सिंहवाहा, धुर्या, दुर्विपहा, अङ्गिरसा, तापहारिणी, त्यक्तदोषा, निस्सपत्ना ये चोआलीस नाम वाली हूँ ।५६-५७। लोकपालांस्ततोऽभ्यर्चेद्वज्रराद्यायुधसंयुतान्। इत्थं जपादिभिः सिद्धे मन्त्रेऽस्मिन्साधकोत्तमः ।५८ आग्नेयास्त्राधिकारी स्यात्तद्विधानमुदीर्यते । आग्नेयास्त्रमिति प्रोक्त विलोमपठितो मनुः ।५६ पूर्वोक्ता एवमुत्पाद्या मन्त्रस्यास्य प्रकीर्तिताः । प्रतिलोमक्रम। दस्य षडङ्गानि प्रकल्पयेत् ।६० वर्णन्यासपदन्यासौ विदध्यात्प्रतिलोमतः । ध्यानभेदान्विजानीयाद् गूर्वादेशान्नचान्यथा ।६१ पूर्ववज्जपक्लृप्तिः स्याज्जहुयात्पूसंख्यया । पञ्चगव्यसुपक्वेन चरुणा तस्य सिद्धये ।६२ इसके अनन्तर वज्रादि आयुधों के सहित लोक पालों का अर्चन करना चाहिये । इस प्रकार से जप-अर्चन-हवन और न्यास आदि के द्वारा इस मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर साधना करने वालों में परम श्रेष्ठ पुरुष आग्नेय अस्त्र का अधिकारी हो जाया करता है । अब उसका विधान भी कहा जाता है। विलोम से पढ़ा हुआ मन्त्र ही आग्नेयास्त्र है—यह कहा गया है ।५८-५९। पूर्वमें कहे हुये ही इस प्रकारसे उत्पादन करने के योग्य हैं जो इस मन्त्र के विषयमें कहे गये हैं। इसके प्रतिलोम के क्रम से ही अङ्गों की कल्पना कर लेनी चाहिये ।३०। प्रतिलोम से ही वर्णों का न्यास और पदोंका न्यास करे । ध्यानके भेदों को गुरुदेव आदि

Page 504Permalink

५०४ ] [ श्रीशारदा तिलक के आदेश से ही जानना चाहिये अन्य किसी भी प्रकार से न करे।६१। पूर्व की ही भाँति जप की कल्पना करे और पूर्व की ही भाँति होम की भी संख्या की कल्पना कर लेवे । पञ्चगव्य से सुन्दर रीति से पकाये हुये चरु से ही उसकी सिद्धि के लिये होम करें ।६२। ओदाय सारमखिलं निखिलागमेभ्यः । श्रीशारदातिलकनाम चकार तन्त्रम् । प्राज्ञः स एव पटलैरिहतावसंख्यैः प्रीतिप्रदानविधये विदुषां चिराय ।६३ अनाद्यन्ता सम्भोर्वपुषि कलिताद्धेन वपुषा । जगद्रूपं शश्वत्सृजति महनीयामपि गिरम् ।६४ सदर्था शब्दार्थस्तमटनता शङ्करवधू- र्भवद्भूयाद्भवजनितदुःखौघशमनी ।६५ समस्त आगमों से सार वस्तु का ग्रहण करके ही इस शारदा तिलक नामक तन्त्र ग्रन्थ की रचना की गई है। यह तत्व संख्यक पटलों से युक्त विद्वान् पुरुष ने समस्त विद्वानों की प्रीति के विधान के लिये ही चिर काल तक जो रहेगी, इसकी रचना की है। ६३। भगवान् शम्भु के शरीर में अपने अर्ध वपु से कलित और आदि तथा अन्त से रहित निर- न्तर इस जगत् के रूप का तथा महा महनीय वाणी का सृजन किया करती है, वही शंकर-प्रिया भगवती सबका कल्याण और दुःखों का शमन करें । ६४।

Page 505Permalink

अ. भा. ओंकार परिवार की स्थापना ✦✦★✦✦ ॐ परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ व स्वाभाविक नाम है। इसे मन्त्र शिरोमणि, मन्त्र सम्राट, मन्त्र राज, बीजमन्त्र और मन्त्रों का सेतु आदि उपाधियों से विभूषित किया जाता है। इसे श्रेष्ठतम् महानतम् और पवित्रतम् मन्त्र की संज्ञा भी दी जाती है। सारे विश्व में इसकी तुलना का कोई मन्त्र नहीं है। ॐ सभी मन्त्रों को अपनी शक्ति से भावित करता हैं। सभी मन्त्रों की शक्ति ओंकार की ही शक्ति है। यह शक्ति और सिद्धिदाता है। भौतिक व आत्मिक उत्थान के लिये कोई भी दूसरी श्रेष्ठ व सरल साधना नहीं है। सभी ऋषिमुनि ॐ की शक्ति और साधना से ही अपना आत्मिक उत्थान करते रहे हैं। परन्तु आज आश्चर्य है कि ॐ का अन्य मन्त्रों की तरह व्यापक प्रचार नहीं है। इस कमी का अनुभव करते हुए अ० भा० ओंकार परिवार की स्थापना की गई है। आप भी अपने यहाँ इसका एक प्रचार केन्द्र स्थापित करें। शाखा स्थापना का सारा साहित्य निःशुल्क रूप से प्रधान कार्यालय, बरेली से मँगवा लें, आपको केवल इतना करना है कि स्वयं ओंकारोपासना आरम्भ करके ४ अन्य मित्रों व सम्बन्धियों को प्रेरित करें और सभी सङ्कल्प पत्र व शाखा स्थापना का प्रार्थना पत्र प्रधान कार्यालय को भिजवा दें। इस वर्ष २७००० साधकों द्वारा ६०० करोड़ मन्त्रों के जप का महापुरश्चरण पूर्ण किया जाना है। आशा है ओंकार को जन-जन का मन्त्र बनाने के इस श्रेष्ठतम् आध्यात्मिक महायज्ञ में सम्मिलित होकर महान् पुण्य के भागी बनेंगे। विनीत :— संस्कृति संस्थान चमनलाल गौतम ख्वाजाकुतुब, वेदनगर, बरेली-२४३००३ (.उ प्र.)

प्रकाशन और व्यापक साहित्य प्रचार का कार्य देश विदेश में करता रहा है ।

Page 506Permalink

एक मौन व्यक्तित्व का मौन समर्पण ❖✦✦❖ डा० चमनलाल गौतम-एक व्यक्ति का नहीं वरन् ऐसे विशाल धार्मिक सस्थान का नाम है जो सतत् २४ वर्षों से ऋषि प्रणीत आर्ष साहित्य के शोध, प्रकाशन और व्यापक साहित्य प्रचार का कार्य देश विदेश में करता रहा है । यह उनकी तप साधना का ही परिणाम है कि किसी भी आर्थिक सहयोग के बिना वेद, उपनिषद्, दर्शन, स्मृतियां, पुराण व मन्त्र-तन्त्र आदि साधनात्मक साहित्य की ३०० से अधिक पुस्तकों को प्रकाशित करके घर-घर में पहुँचाने की पवित्रतम साधना कर रहे हैं । मन्त्र-तन्त्र, योग, वेदान्त व अन्य धार्मिक विषयों पर १५० खोज पूर्ण ग्रन्थों का लेखन, सम्पादन एक ऐसा अविस्मरणीय व असाधारण कार्य है जिस पर उनके अथक श्रम, गम्भीर अध्ययन, तप, प्रतिभा और मौलिक सूझ-बूझ की स्पष्ट छाप दिखाई देती है । स्वस्थ साहित्य की रचना और प्रचार का उनकी जीवन योजना का यह पहला चरण पूरा हुआ । पिछले २४ वर्षों से लगातार चल रही अध्यात्मिक साधना के महापुरश्चरण का दूसरा चरण भी समाप्त हो रहा है । तीसरे चरण- आध्यात्मिक साधनाओं और अनुभूतियों के विश्वव्यापी विस्तार का शुभारम्भ अ० भा० ओंकार परिवार की स्थापना के साथ बसन्तपञ्चमी की परम पवित्र बेला के साथ हो गया है । अतः उनका शेष जीवन तीसरे चरण की सफलता, ओंकार परिवार की शाखाओं के व्यापक विस्तार के माध्यम से करोड़ों व्यक्तियों को ओंकार साधना में प्रविष्ट करके उच्च आध्यात्मिक भूमिका में प्रशस्त करना, ओंकार अथवा उच्च आध्यात्मिक साहित्य की रचना व प्रचार-प्रसार को समर्पित है । स्वामी सत्य भक्त

Page 507Permalink

[इस पृष्ठ पर कोई पाठ्य सामग्री (text) उपलब्ध नहीं है / यह पृष्ठ रिक्त (blank) है।]

Page 508Permalink

(यह पृष्ठ रिक्त है / This page is blank)

Page 509Permalink

(यह पृष्ठ रिक्त है / This page is blank / contains no readable text)

Page 510Permalink

[इस पृष्ठ पर कोई पाठ्य सामग्री उपलब्ध नहीं है / यह पृष्ठ रिक्त है।]

प्रकाशक :-संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतुब वेदनगर,

Page 511Permalink

भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठतम धर्म-ग्रन्थ १—ऋग्वेद ४ खण्ड ... ३८) २—अथर्व वेद २ खण्ड ... १६) ३—यजुर्वेद ... ६)५० ४—सामवेद ... ८)५० ५—वेद महाविज्ञान ... १२) ६—शतपथ ब्राह्मण ... १२) ७—१०८ उपनिषद् ३ खण्ड ... ३३) ८—उपनिषद् रहस्य ... ६)५० ९—बृहदारण्यकोपनिषद् ... ४)५० १०—छान्दोग्योपनिषद् ... ४)५० ११—वैशेषिक दर्शन ... ६)२५ १२—न्याय दर्शन ... ६)७५ १३—सांख्य दर्शन ... ६)२५ १४—योग दर्शन ... ६)७५ १५—वेदान्त दर्शन ... ७)५० १६—मीमांसा दर्शन ... ६) १७—२० स्मृतियां २ खण्ड ... २२) १८—मनुस्मृति ... ११) १९—योग वासिष्ठ २ खण्ड ... २७) २०—ब्रह्म सूत्र ... १२)५० २१—पञ्चदशी ... १४) २२—विचार सागर ... १४) २३—विचार चन्द्रोदय ... ३) २४—पञ्चीकरण ... ४) २५—उपदेश साहस्त्री ... ८)२५ २६—वृत्ति प्रभाकर ... १०) २७—सौन्दर्य लहरी ... ७) प्रकाशक :-संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतुब वेदनगर, बरेली-२४३००३ (उ०प्र०)