शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 135, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः ] क्वाथादिकल्पना 99 वीरतरु (खस अथवा सरपत की जड़), वृक्षवन्दा (बन्द या बाँदा), काश, तीनों कटसरैया (पीले, लाल, नीले फूल वाली), दोनों प्रकार की कुशा (कुशा तथा दर्भ), की जड़, नल (नरकट या नरसल) की जड़, गुन्द्रा (पटेरक), बकपुष्प (अगस्त वृक्ष के फूल), अरणी, मरोड़फली, पाषाणभेद, सोनापाठा, गोखरू, अपामार्ग (चिरचिटा), कमल का फूल तथा ब्राह्मी-यह एक श्रेष्ठ गण (देखें-सु० सू० अ० 38) 'वीरतर्वादि' नाम से प्रसिद्ध है। इसका क्वाथ (अथवा चूर्ण, स्वरस, कल्क आदि प्रकार-भेद से प्रयोग करना चाहिये) शर्करा (मूत्र के साथ बालू की-सी कणिकाओं का निकलना), अश्मरी (पथरी), मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात तथा वात के सम्पूर्ण रोगों को नष्ट करता है।
एलादि क्वाथ एलामधुकगोकण्टरेणुकोरैण्डवासकाः ।। 105 ।। कृष्णाश्मभेदसहिताः क्वाथ एषां सुसाधितः । शिलाजतुयुतः पेयः शर्कराश्मरिकृच्छ्रहा ।। 106 ।। इलायची (छोटी अथवा बड़ी), मुलेठी, गोखरू, रेणुका (सम्भालू के बीज), एरण्ड का जड़, अडूसा की पत्ती, पीपल पथा पाषाणभेद का विधिपूर्वक बनाया हुआ काढ़ा शिलाजीत मिलाकर पीने से शर्करा, पथरी तथा मूत्रकृच्छ्र को नष्ट करता है।
गोक्षुरादि क्वाथ समूलगोक्षुरक्वाथः सितामाक्षिकसंयुतः । नाशयेन्मूत्रकृच्छ्राणि तथा चोष्णासमीररणम् ।। 107 ।। जड़ सहित गोखरू का काढ़ा चीनी तथा शहद मिलाकर पीने से सभी प्रकार के मूत्रकृच्छ्रों को और विशेष रूप से उष्णवात (मूत्र के साथ रक्त आना) को नष्ट करता है।
वरादि क्वाथ वरादार्व्यब्ददारूणां क्वाथः क्षौद्रेण मेहहा। वत्सकत्रिफला दार्वा मस्तको बीजकस्तथा ।। 108 ।। त्रिफला, दारुहल्दी, नागरमोथा तथा देवदारु का काढ़ा अथवा-कुरैया की छाल, त्रिफला, दारुहल्दी, नागरमोथा तथा विजयसार का काढ़ा शहद मिलाकर पीने से 'प्रमेह' को नष्ट करता है।
फलत्रिकादि क्वाथ फलत्रिकाब्ददार्वीणां विशालायाः शृतं पिबेत्। निशाकल्कयुतं सर्वप्रमेहविनिवृत्तये ।। 109 ।। त्रिफला, नागरमोथा, दारुहल्दी तथा इन्द्रायण की जड़ का काढ़ा, हल्दी का कल्क (चटनी) मिलाकर पीने से सभी प्रकार के प्रमेह नष्ट होते हैं।
दार्व्यादि क्वाथ दार्वा रसाञ्जनं मुस्तं भल्लातः श्रीफलं वृषः । कैरातश्च पिबेदेषां क्वाथं शीतं समाक्षिकम् ।। 110 ।। जयेत् सशूलं प्रदरं पीतश्वेतासितारुणम् । दारुहल्दी, रसवत, नागरमोथा, शुद्ध भिलावा, बेलगिरी, अडूसा की पत्ती तथा चिरायता का काढ़ा ठण्डा करके और शहद मिलाकर पीने से शूल युक्त पीले, सफेद, काले तथा लाल प्रदर को जीतता है। वक्तव्य- उक्त क्वाथ प्रदर की उत्तम औषध है। इसमें शुद्ध भिलावा डाला जाता है। भिलावा का शोधन इस प्रकार होता है-भिलावा की टोपी (वृन्त) को सरौता से काटकर गोबर (गाय अथवा भैंस का) और पानी में दो तीन बार पकाकर फिर उष्ण जल से धोकर सुखा लें। सावधानी-भिलावा इतनी कुशलता के साथ काटना चाहिये कि उसका रस शरीर के किसी अवयव पर न लगे और पकाते समय भाप (वाष्प) भी न लगे, अन्यथा इससे शरीर पर प्रायः सूजन हो जाती है।
न्यग्रोधादि क्वाथ न्यग्रोधप्लक्षकक्षाप्रवेतसा बदरी तृणिः ।। 111 ।। मधुपष्टी प्रियालश्च लोध्रद्वयमुदुम्बरः । पिप्पलश्च मधूकश्च तथा पारिसपिप्पलः ।। 112 ।। सल्लकी तिन्दुको जम्बूद्वयमाम्रतरुः शिवा । कदम्बककुभौ चैव भल्लातकफलानि च ।। 113 ।। न्यग्रोधादिगणक्वाथं यथालाभं च कारयेत् । अयं क्वाथो महाग्राही व्रण्यो भग्नं च साधयेत् ।। 114 ।। योनिदोषहरो दाहमेदोमेहविषापहः । बरगद की छाल, प्लक्ष (पाकड़ या पिलखन), कोशाग्र (आमड़ा), वेतस (वेत की जड़ या फल), बदरी (बेर वृक्ष का छाल), तृणि (तुन), मुलेठी, चिरौंजी के वृक्ष की छाल, लोध, पठानीलोध, गूलर की छाल, पारस पीपल, सलई, तेन्दू, जामुन, जमोया (कठजामुन), आम, हरड़, कदम्ब, अर्जुन (कौह या कौव) तथा भिलावा के फल। यह 'न्यग्रोधादिगण' है (देखें-सु० सू० 38)। इनमें से जितने द्रव्य मिल जायें (अधिक से अधिक द्रव्य प्राप्त करने चाहिये) उनका काढ़ा बनायें। यह काढ़ा अत्यन्त ग्राही (मल को रोकने वाला) है,