भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 356 में से

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106 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे केसर से पकाया गया दूध, गुरु, उष्ण तथा स्निग्ध भोजन, मद्य, मांस, अग्नि, रूई से भरा लिहाफ और बिस्तरा का सेवन करना चाहिये। यवागू आदि की निर्माण-विधि अथान्नप्रक्रियात्रैव प्रोच्यते नातिविस्तराद् ।। 164 ।। यवागूः षड्गुणजले सिद्धा स्यात् कृशरा घना। तण्डुलैर्मुद्गमाषैश्च तिलैर्वा साधिता हिता ।। 165 ।। यवागूर्ग्राहिणी बल्या तर्पणी वातनाशिनी। इसके पश्चात् संक्षेप से 'आहार' बनाने की विधि का वर्णन किया जाता है। आहार द्रव्य (चावल आदि) की अपेक्षा छः गुने जल में 'यवागू' बनायी जाती है और इससे कुछ गाढ़ी चौगुने या पचगुने जल में बनायी हुई 'कृशरा या पतली खिचड़ी' कहलाती है। चावल तथा मूँग अथवा उड़द की दाल तथा तिलों को (मिलाकर) बनायी हुई 'यवागू' (खीर जैसी पतली खिचड़ी) हितकर होती है। यह ग्राहिणी (मल के बाँधने वाली) है, बल्या (बल या शक्ति को बढ़ाने वाली) है, तर्पणी (तृप्ति करने वाली) है और वायु को नष्ट करती है। वक्तव्य-उक्त विधान में चावल, दाल तथा तिलों की मात्रा निश्चित करने का भार चिकित्सक अथवा पाचक (रसोइया) पर छोड़ दिया जाता है। अतः उसी को इसकी व्यवस्था करनी चाहिये। खिचड़ी में चावल तीन भाग और दाल दो भाग डालना चाहिये। इस यवागू तथा पेया आदि में जो पानी डाला जाता है, वह पहले आवश्यकतानुसार औषधियों से पकाया भी जा सकता है। विलेपी-विधि विलेपी घनसिकथा स्यात् सिद्धा नीरे चतुर्गुणे ।। 166 ।। तर्पणी बृंहणी हृद्या मधुरा पित्तनाशिनी। आहार-द्रव्यों से चौगुने पानी में तैयार की हुई घनसिकथा (गाढ़ी सीठी युक्त) विलेपी (लपसी) कही जाती है। यह तर्पणी (तृप्तिकारक) होती है, बृंहणी (धातुवर्द्धिनी) है, हृद्या (हृदय को शक्ति देने वाली) है, मधुरा (स्वादिष्ट) है तथा पित्त को नष्ट करती है। पेया तथा यूष द्रवाधिका स्वल्पसिकथा चतुर्दशगुणे जले ।। 167 ।। सिद्धा पेया बुधैर्ज्ञेया यूषः किञ्चिद् घनस्ततः। पेया लघुतरा ज्ञेया ग्राहिणी धातुपुष्टिदा ।। 168 ।। यूषो बल्यस्ततः कण्ठ्यो लघुपाकः कफामहन्। आहार-द्रव्य से चौदह गुने जल में बनाई हुई अत्यन्त पतली बहुत थोड़ी-सी सीठी से युक्त वस्तु के विद्वान् लोग 'पेया' (पीने योग्य) कहते हैं और इसकी अपेक्षा कुछ गाढ़ा 'यूष' होता है। 'पेया' अत्यन्त हल्की (शीघ्र पचने वाली) होती है, मल को बाँधती है और धातुओं को पुष्ट करती है तथा 'यूष' बल को बढ़ाता है, गले के विकारों को हरता है, शीघ्र पचता है तथा कफ को नष्ट करता है। वक्तव्य-इस यूष-प्रकरण में 'खडयूष' तथा 'काम्बलिक' का ग्रहण नहीं किया गया, अतः प्रकरणोचित समझ कर इसे 'चक्रदत्त' अतिसार चिकित्सा श्लोक 28-29 से उद्धृत किया जा रहा है। देखें-'तक्रं कपित्थचाङ्गेरी- मरिचाजाजिचित्रकैः। सुपक्वः खडयूषोऽयमयं काम्बलि- कोऽपरः। दध्यम्लो लवणस्नेहतिलमाषसमन्वितः।। खडयूष-मठा में कैथ का फल, अमलोनियाँ, कालीमिर्च, जीरा, चीता की जड़ के साथ खड़े मूँग भी डालकर खडयूष बनायें। तीक्ष्ण द्रव्यों के 6-6 माशे एवं साधारण द्रव्यों को 1-1 पल लें। एक प्रस्थ मठा में पकाकर छान लें। इसे खडयूष कहते हैं। काम्बलिक-दही, नमक, स्नेह, तिल एवं उड़द का चूर्ण मिलाकर जो तैयार किया जाता है, उसे 'काम्बलिक' कहते हैं। भक्त-निर्माण-विधि जले चतुर्दशगुणे तण्डुलानां चतुष्पलम् ।। 169 ।। विपचेत् स्रावयेन्मण्डं स भक्तो मधुरो लघुः। चार पल (16 तोला) चावलों को चौदह गुने जल में पकाये और (भली-भाँति चावल गल जाने पर) माँड को छान या निकाल दें, इसे 'भक्त' या भात कहा जाता है। यह स्वादिष्ट तथा हल्का (सुपाच्य) होता है। वक्तव्य-इसमें जल इतना अधिक इसलिये दिया गया है कि चावलों की पिच्छिलता भली प्रकार निकल जाये। वैसे तो जिसका माँड नहीं निकाला जाता ऐसा भात भी बनाया जाता है, किन्तु यह गुरु होने के कारण रोगी के लिए उपयोगी नहीं होता। मण्ड-निर्माण-विधि नीरे चतुर्दशगुणे सिद्धो मण्डस्त्वसिक्थकः ।। 170 ।। सशुण्ठीसैन्धवसंयुक्तः पाचनो दीपनः परः।