भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 356 में से

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तृतीयोऽध्यायः] फाण्टादिकल्पना 109 [ बायाँ स्तम्भ ] तोला) ठण्डे जल में एक पल (4 तोला) द्रव्य (औषधि) को कूट-पीसकर मिट्टी के पात्र में डाल दें, तत्पश्चात् (जब औषधियाँ भीगकर मृदु हो जायें) उन्हें भली-भाँति मलकर छान ले और इसे दो पल (8 तोला) लेकर पीयें। वक्तव्य- फाण्ट एवं मन्थ में भेद-फाण्ट उष्ण जल में तैयार किया जाता है और मन्थ शीतल जल में मथकर तैयार किया जाता है। खर्जूरादि मन्थ खर्जूरदाडिमीद्राक्षातिन्तिडीकाम्लिकामलैः ।। 10 ।। सपरूषैः कृतो मन्थः सर्वमद्यविकारनुत्। खजूर के परिपक्व फल, अनारदाना, मुनक्का, तिन्तिडीक (जिरिष्क), इमली (पकी हुई), आँवला और फालसा के फल अथवा छाल का बनाया हुआ 'मन्थ' मद्य (मादक द्रव्यों) के सभी विकारों को दूर करता है। वक्तव्य- यह मन्थ इसके अतिरिक्त पित्तज्वर में भी अत्यन्त लाभदायक होता है। [ दायाँ स्तम्भ ] मसूरसक्तु मन्थ क्षौद्रयुक्ता मसूराणां सक्तवो दाडिमाम्भसा ।। 11 ।। मथिता वारयन्त्याशु छर्दिं दोषत्रयोद्भवम्। मसूरी के सत्तू अनार के रस में घुले हुये तथा मधु मिलाकर पीये हुये त्रिदोष से उत्पन्न होने वाली छर्दि (कै) को रोकती है। यवसक्तु मन्थ प्लावितैः शीतनीरेण सघृतैर्यवसक्तुभिः ।। 12 ।। नातिसान्द्रद्रवो मन्थस्तृष्णादाहास्रपित्तहा। इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां शार्ङ्गधरसंहितायां मध्यमखण्डे फाण्टादिकल्पना नाम तृतीयोऽध्यायः ।। 3 ।। जौ के सतुओं को थोड़े घी में मथकर शीतल जल से न बहुत गाढ़ा और न बहुत पतला बनाया हुआ मन्थ पीने से तृष्णा (प्यास), दाह तथा रक्त-पित्त को नष्ट करता है। वक्तव्य- मसूर, जौ, चना आदि को भूनकर पीस लिया जाता है, इस आटे को सत्तू कहा जाता है। इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता मध्यमखण्ड का तीसरा अध्याय समाप्त ।। 3 ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA