भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

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षष्ठोऽध्यायः ] चूर्णकल्पना 123 इस चूर्ण का नाम 'जातीफलादि चूर्ण' है। इस चूर्ण की एक कर्ष (1 तोला) की मात्रा मधु के साथ मिलाकर खानी चाहिये। इसके प्रभाव से ग्रहणी रोग, कास, श्वास, अरुचि (खाने की इच्छा न होना), क्षय (यक्ष्मा) तथा वातकफजनित प्रतिश्याय (बिगड़े हुये जुकाम) शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं। महाखाण्डव चूर्ण मरिचं नागपुष्पाणि तालीसं लवणानि च। प्रत्येकमेकभागाः स्युः पिप्पलीमूलचित्रकैः ।। 77 ।। त्वक्कणा तिन्तिडीकं च जीरकं च द्विभागिकम्। धान्याम्लवेतसौ विश्वं भद्रैला बदराणि च ।। 78 ।। अजमोदा जलधरः प्रत्येकं स्युस्त्रिभागिकाः । सर्वौषधिचतुर्थांशं दाडिमस्य फलं भवेत् ।। 79 ।। द्रव्येभ्यो निखिलेभ्यश्च सिता देयार्धमात्रया। महाखाण्डवसंज्ञं स्याच्चूर्णमेतत् सुरोचनम् ।। 80 ।। अग्निदीप्तिकरं हृद्यं कासातीसारनाशनम्। हृद्रोगकण्ठजठरमुखरोगप्रणाशनम् ।। 81 ।। विसूचीकां तथाध्मानमर्शोगुल्मकृमीनपि । छर्दिं पञ्चविधां श्वासं चूर्णमेतद् व्यपोहति ।। 82 ।। मरिच, नागकेसर, तालीसपत्र तथा लवणपञ्चक (सेंधा, सोंचर, विरिया, सामुद्र तथा साँभर नमक) प्रत्येक एक-एक भाग (एक-एक तोला); पीपलामूल, चीता की जड़, दालचीनी, पीपल, जिरिष्क तथा सफेद जीरा, प्रत्येक दो-दो भाग (2-2 तोला); धनियाँ, अम्लवेत, सोंठ, बड़ी इलायची, बेर (खट्टे बेरों का चूर्ण), अजमोदा (इसमें देशी अजवायन डाली जाये तो अच्छा है) तथा नागरमोथा प्रत्येक तीन-तीन भाग (3-3 तोला), उक्त सब औषधियों के चूर्ण की अपेक्षा चौथाई भाग अनारदाना लेना चाहिये और इस समस्त चूर्ण से आधी चीनी डालनी चाहिये। इस चूर्ण का नाम 'महाखाण्डव' है। यह अत्यन्त स्वादिष्ट चूर्ण है। अग्नि को दीप्त करता है, हृदय को शक्ति देता है, कास और अतिसार को नष्ट करता है, हृदय, कण्ठ, उदर एवं मुख के रोगों का नाश करता है, विसूची (हैजा), अफारा, बवासीर, गुल्म, कृमि, पाँच प्रकार की कै और श्वास रोग को नष्ट करता है। नारायण चूर्ण चित्रकं त्रिफलां व्योषं जीरकं हपुषा वचा। यवानी पिप्पलीमूलं शतपुष्पाऽजन्धिका ।। 83 ।। अजमोदा शठी धान्यं विडङ्गं स्थूलजीरकम् । हेमाह्वा पौष्करं मूलं क्षारौ लवणपञ्चकम् ।। 84 ।। कुष्ठं चेति समांशानि विशालां स्याद् द्विभागिका। त्रिवृत् त्रिभागा विज्ञेया दन्त्या भागत्रयं भवेत् ।। 85 ।। चतुर्भागा शीतला स्यात् सर्वाण्येकत्र चूर्णयेत्। पाचनस्नेहनाद्यैश्च स्निग्धकोष्ठस्य रोगिणः ।। 86 ।। दद्याच्चूर्ण विरेकाय सर्वरोगप्रणाशनम्। हृद्रोगे पाण्डुरोगे च कासे श्वासे भगन्दरे ।। 87 ।। मन्देऽग्नौ च ज्वरे कुष्ठे ग्रहण्यां च गलग्रहे। दद्याद् युक्तानुपानेन तथाध्माने सुरादिभिः ।। 88 ।। गुल्मे बदरनीरेण विड्भेदे दधिमस्तुना । उष्णाम्बुभिरजीर्णे च वृक्षाम्लैः परिकर्तिषु ।। 89 ।। उष्ट्रीदुग्धेनोदरेषु तथा तक्रेण वा गवाम्। प्रसन्नया वातरोगे दाडिमाम्भोभिरर्शसि ।। 90 ।। द्विविधे च विषे दद्याद् घृतेन विषनाशनम् । चूर्णं नारायणं नाम दुष्टरोगगणापहम् ।। 91 ।। चीता की जड़, त्रिफला (हरड़, बहेड़ा, आँवला), व्योष (सोंठ, मरिच, पीपल), जीरा सफेद (भुना हुआ), हाऊबेर, वच, अजवायन, पीपलामूल, सौंफ, वनतुलसी (पत्र अथवा बीज), अजमोदा, कचूर, धनियाँ, वायविडंग, कलौंजी, चोक (सत्यनाशी की जड़), पोहकरमूल, जौखार, सज्जीखार, सेंधा नमक, सोंचर नमक, साँभर नमक, विड़ नमक, समुद्र नमक एवं कूठ ये सब द्रव्य समान भाग (1-1 तोला), इन्द्रायण (जड़ अथवा फल) दो भाग (2 तोला), निसोत सफेद तीन भाग (3 तोला), दन्ती (जमालगोटा की जड़) तीन भाग (3 तोला) एवं सातला (सतवन नामक सेहुण्ड भेद) चार भाग (4 तोला), इन सबका चूर्ण बनाकर एक में मिला दें। पाचन, स्नेहन एवं स्वेदन कर्म द्वारा स्निग्ध किया गया है उदर जिसका, ऐसे रोगी को इस विरेचन चूर्ण का (दस्त होने के लिए) प्रयोग करें। यह सभी रोगों का विनाश करता है, हृदय रोग में, पाण्डुरोग में, कास में, श्वास में, भगन्दर में, मन्दाग्नि में, ज्वर में, कुष्ठ में, ग्रहणीरोग में एवं गलग्रह (गले की रुकावट) में यथायोग्य अनुपान के साथ प्रयुक्त करना चाहिये। अफारा में मद्य (आसव, अरिष्ट) के साथ, वायुगोला में बेरी की छाल के क्वाथ के साथ, मलभेद (दस्तौं) में दही के पानी के साथ, अजीर्ण (अपच) में उष्ण जल के साथ, परिकर्तिका (गुद-वलियों में कैंची से काटने की-सी पीड़ा) में विषांविल के क्वाथ से, उदर रोगों में ऊँटनी के दूध से अथवा गाय के मट्ठा के साथ, वातव्याधियों में प्रसन्ना (उच्च श्रेणी की शराब) के साथ, बादी बवासीर (खूनी में बहुत हानि करता है) में