भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 356 में से

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पृष्ठ 170

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134 | शार्ङ्गधरसंहिता | [मध्यमखण्डे विबन्धाऽऽनाहशूलानि मेहनं ग्रन्थमर्बुदम्। अन्त्रवृद्धिं कटीशूलं श्वासं कासं विचर्चिकाम् ।। 46 ।। अण्डवृद्धिं तथा पाण्डुं कामलां च हलीमकम्। कुष्ठान्यर्शांसि कण्डूं च प्लीहोदरभगन्दरम् ।। 47 ।। दन्तरोगं नेत्ररोगं स्त्रीणामार्तवजां रुजम्। पुंसां शुक्रगतान् दोषान् मन्दाग्निमरुचिं तथा ।। 48 ।। वायुं पित्तं कफं हन्याद् बल्या वृष्या रसायनी। चन्द्रप्रभायां कर्षस्तु चतुःशाणो विधीयते ।। 49 ।। चन्द्रप्रभा (कचूर), वच, नागरमोथा, चिरायता, देवदारु, हल्दी, अतीस, दारुहल्दी, पिप्पलामूल, चीता की जड़, धनियाँ, हरड़, बहेड़ा, आँवला, चव्य, वायविडंग, गजपीपल, सोंठ, मरिच, पीपल, सोनामाखी का भस्म, सज्जीखार, जौखार, सेंधा नमक, सोंचर नमक तथा विरिया नमक इन प्रत्येक द्रव्यों के चूर्णों को एक-एक शाण (चार-चार आना भर) लें; सफेद निसोत, दन्ती (जमालगोटा), तेजपत्ता, दालचीनी, बड़ी इलायची तथा वंशलोचन इन प्रत्येक द्रव्यों का चूर्ण एक-एक तोला, लोह भस्म दो तोला, चीनी चार तोला, शिलाजीत आठ तोला एवं शुद्ध गूगल आठ तोला, इन सबको भली-भाँति कूट-पीसकर सुरूप गोलियाँ बना लेना चाहिये। इस सुप्रसिद्ध योग का नाम 'चन्द्रप्रभा बटी' (या गुग्गुल) है। यह सर्वरोग विनाशक है। बीस प्रकार के प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, अश्मरी (पथरी), विबन्ध (मलबन्ध), आनाह (आमाशय एवं पक्वाशय का गति-निरोध), शूल, उपदंश आदि लिंगरोग, ग्रन्थि (लसीका ग्रन्थियों के विकार), अर्बुद (रसौली), अन्त्रवृद्धि (आँत उतरना), कमर का दर्द, श्वास, कास, विचर्चिका, अण्डवृद्धि, पाण्डुरोग, कामला, हलीमक, कुष्ठ, बवासीर, खुजली, प्लीहोदर, भगन्दर, दन्तरोग, नेत्ररोग, स्त्रियों के मासिकधर्म-सम्बन्धी रोग, पुरुषों के शुक्र-सम्बन्धी-रोग, मन्दाग्नि, अरुचि, वातरोग, पित्तरोग, तथा कफरोगों को नष्ट करती है। यह बलवर्द्धक, वीर्यवर्द्धक तथा रसायन (जरा-व्याधि-विनाशक) है। इस चन्द्रप्रभा बटी में कर्ष (तोला) चार शाण का माना जाता है। वक्तव्य-चन्द्रप्रभा बटी में 'चन्द्रप्रभा' नामक औषधि के सम्बन्ध में सदियों से मतभेद चल रहा है। शार्ङ्गधरसंहिता के सुप्रसिद्ध टीकाकार श्रीआढमल्ल अपनी 'दीपिका' नामक टीका में लिखते हैं-'चन्द्रप्रभां कर्पूरः एके, चन्द्रप्रभाशब्देन शटीं शतावरीं वा कथयन्ति संज्ञाशब्दत्वात्'। किन्तु यह भी सन्दिग्ध ही है और पं० काशीरामजी 'गूढार्थदीपिका' में 'कर्पूरः अथवा 'कर्पूरभेद' कहते हैं। 'वैद्यकशब्दसिन्धु' में बाकुची एवं कचूर नामक द्रव्यों का नाम चन्द्रप्रभा माना गया है। 'रसेन्द्रसारसंग्रह' के अर्शोधिकार में ठीक यही योग और इसी नाम से लिखा गया है। उसमें चन्द्रप्रभा नाम का कोई द्रव्य नहीं है किन्तु 'शटी' है और सम्प्रदायानुसार भी चन्द्रप्रभा का नाम शटी ही पढ़ा या पढ़ाया जाता है। अब विचारणीय यह है कि 'चन्द्रप्रभा' नाम से किस द्रव्य का ग्रहण किया जाये? हमारे विचार से तो कचूर ही लेना चाहिये, क्योंकि बहुमत इसी के पक्ष में है। फिर भी 'बाकुची' के गुण-धर्मों तथा उसके प्रशंसापरक वचनों पर इस अवसर पर अवश्य ध्यान दें। 'चन्द्रप्रभायां कर्षस्तु चतुःशाणो विधीयते'-इसमें दिया गया यह पाठ भी विचारणीय है। मागधमान में चार शाण का ही कर्ष माना जाता है और यही मान बहुसम्मत भी है। हाँ, 'कालिंगमान' में अढ़ाई शाण का कर्ष माना गया है, किन्तु तदनुसार कार्य प्रायः किया ही नहीं जाता और दीपिकाकार इसे प्रक्षिप्त भी मानते हैं। 'रसेन्द्रसारसंग्रह' में जहाँ यह पाठ उद्धृत है, वहाँ इस विषय की कुछ चर्चा ही नहीं की गयी है। इस योग में एक छटाँक घी देकर सवा लाख चोट देकर खूब कुटाई करनी चाहिये। इससे भी अधिक जितना ही कूट जायेगा, उतनी ही उत्तम गोलियाँ बनेंगी। कांसायन बटी यवानी जीरकं धान्यं मरिचं गिरिकर्णिका। अजमोदोपकुञ्ची च चतुःशाणाः पृथक् पृथक् ।। 50 ।। हिङ्गु षट्शाणिकं कार्यं क्षारौ लवणपञ्चकम्। त्रिवृच्चाष्टमितैः शाणैः प्रत्येकं कल्पयेत् सुधीः ।। 51 ।। दन्ती शठी पौष्करं च विडङ्गं दाडिमं शिवा। चित्रोऽम्लवेतसः शुण्ठी शाणैः षोडशभिः पृथक् ।। 52 ।। बीजपूररसेनेषां गुटिकां कारयेद् बुधः। घृतेन पयसा मद्यैरम्लैरूष्णोदकेन वा ।। 53 ।। पिबेत् काङ्कायनप्रोक्तां गुटिकां गुल्मनाशिनी। मद्येन वातिकं गुल्मं गोक्षीरेण च पैत्तिकम् ।। 54 ।। मूत्रेण कफगुल्मं च दशमूलैस्त्रिदोषजम्। उष्ट्रीदुग्धेन नारीणां रक्तगुल्मं निवारयेत् ।। 55 ।। हृद्रोगं ग्रहणीं शूलं कृमीनर्शांसि नाशयेत्। अजवायन, सफेद जीरा, धनियाँ, मरिच, गिरिकर्णिका, अजमोदा तथा काला जीरा प्रत्येक एक-एक तोला, घी में भुनी हुई हींग डेढ़ तोला, सज्जीखार, जौखार, सेंधा नमक,

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