शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें152 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे
स्त्री अथवा पुरुष इस घृत का सेवन करना प्रारम्भ करें। इस घी को पीकर कुछ सप्ताहों तक मनुष्य प्रतिरात्रि स्त्रियों में वृष के समान मैथुन सामर्थ्य प्राप्त कर पुत्रों को उत्पन्न कर सकता है। इस घृत को पीकर बन्ध्या स्त्री भी पुत्र को जन्म दे सकती है। जो स्त्री अल्पायु (छोटी ही आयु में मर जाने वाली) सन्तान को उत्पन्न करती है अथवा जो स्त्री एक ही सन्तान पैदाकर पुनः गर्भवती नहीं होती है, वह भी बुद्धिमान् शतायु (सौ वर्ष जीने वाले) पुत्र को जनती है। इस घृत का नाम 'फल घृत' है। इसका उपदेश सर्वप्रथम महर्षि भारद्वाज ने किया। यद्यपि इसमें कहा नहीं है, तथापि चिकित्सक का कर्तव्य है कि इस घी में 'लक्ष्मणा' नामक औषधि की जड़ का प्रयोग अवश्य करें।
वक्तव्य-उक्त घृत पुरुषों के शुक्रदोषों को तथा स्त्रियों के योनिरोगों (गर्भाशय, आर्तव आदि) को दूर करता है। लक्ष्मणा को कल्क द्रव्यों के साथ ही पीस डालना चाहिये। खेद है कि लक्ष्मणा जैसी दिव्य औषधि आज सन्देह में पड़ गयी है। कुछ लोगों का कथन है कि 'पुत्रक या पुतली या गुड़िया के आकार वाले लाल-लाल तथा छोटे-छोटे बिन्दुओं से युक्त पत्रों तथा बकरे की-सी गन्ध वाली एक औषधि का नाम लक्ष्मणा है। श्रीभावमिश्र ने अपने भावप्रकाश, निघण्टु में दोनों का ही उल्लेख किया है।
दूसरा फल घृत त्रिफलां द्वे सहचरे गुडूचीं सपुनर्नवाम् ।। 87 ।। शुकनासां हरिद्रे द्वे रास्नां मेदां शतावरीम्। कल्कीकृत्य घृतप्रस्थं पचेत् क्षीरे चतुर्गुणे ।। 88 ।। तत्सिद्धं पाययेन्नारीं योनिशूलनिपीडिताम् । पीडिता चलिता या च निःसृता विवृता च या ।। 89 ।। पित्तयोनिश्च विभ्रान्ता षण्ढयोनिश्च या स्मृता। प्रपद्यन्ते हि ताः स्थानं गर्भं गृह्णन्ति चासकृत् ।। 90 ।। एतत्फलघृतं नाम योनिदोषहरं परम्।
हरड़, बहेड़ा, आँवला, कटसरैया (लाल पुष्प वाली), पियावांसा (पीतपुष्पका), गिलोय, पुनर्नवा, सोनापाठा, हल्दी, दारुहल्दी, रास्ना, मेदा एवं शतावर-इन सब द्रव्यों को (4 पल या 16 तोला) लेकर कल्क बना लें फिर एक प्रस्थ (64 तोला) घी तथा घी से चौगुना दूध लेकर और सबको एक साथ मिलाकर विधिपूर्वक पाक करें। जब पाक सिद्ध हो जाये तो यह घृत योनिशूल से पीड़ित स्त्री को पिलाना चाहिये। पीड़िता (विलुप्ता) अर्थात् जिस योनि में सर्वदा पीड़ा होती
रहती है, चलिता (प्रस्रंसिनी) अर्थात् जो अपने स्थान से खिसक जाती है, निःसृता अर्थात् भग-प्रदेश से बाहर निकल आयी हो, विवृता (महा्योनि) अर्थात् जिसके मुख में संकोचन शक्ति न रह जाये। पित्तदोष से होने वाले पाँच योनि-विकार, विभ्रान्ता (योनि के मुख का घूम जाना) तथा षण्ढयोनि, जिससे स्त्री को न आर्तव ही होता है और न स्तन-वृद्धि ही होती है इस प्रकार की जो योनियाँ (गर्भाशय) होती हैं, वे अपने स्थान को प्राप्त हो जाती हैं अर्थात् उक्त विकारों से रहित हो जाती हैं और बार-बार गर्भ को धारण करती हैं। इस घृत का नाम भी 'फल घृत' है और यह सभी प्रकार के योनिदोषों को हरता है।
वक्तव्य-इस योग में भी जीवित बछड़े तथा एकवर्ण वाली गाय का घी तथा दूध लेना चाहिये। इसे पकाने के लिए वनकण्डों का ही उपयोग करना चाहिये। यहाँ योनि का अभिप्राय गर्भाशय से है। इस योनि में कल्क के परिमाण का उल्लेख नहीं है, अतः परिभाषा के अनुसार स्नेह से चतुर्थांश कल्क लेना चाहिये।
पञ्चतिक्त घृत वृषनिम्बामृताव्याघ्रीपटोलानां शृतेन च ।। 91 ।। कल्केन पक्वं सर्पिस्तु निहन्याद् विषमज्वरान् । पाण्डुं कुष्ठं विसर्प च कृमीनशांसि नाशयेत् ।। 92 ।।
अडूसा, नीम की छाल, गिलोय, कण्टकारी तथा परवल की पत्ती के क्वाथ तथा कल्क के साथ मिलाकर पकाया हुआ घृत सेवन करने से विषमज्वरों को नष्ट करता है और पाण्डुरोग, कुष्ठ, विसर्प, कृमि तथा अर्श को नष्ट करता है।
वक्तव्य-परिभाषा में कही गयी विधि के अनुसार ही इस घृत को बनाना चाहिये। यहाँ तक घृतों के निर्माण का वर्णन किया गया है। इससे आगे तैलों का निर्माण बतलाया जायेगा। यदि आप तैलों को सुन्दर तथा रक्तवर्ण का बनाना चाहें तो तैयार हो जाने पर अथवा पकते समय थोड़ी 'रतनजोत' डाल दें।
लाक्षादि तैल लाक्षाढकं क्वाथयित्वा जलस्य चतुर्राढकैः। चतुर्थांशं शृतं नीत्वा तैलप्रस्थे विनिक्षिपेत् ।। 93 ।। मस्वाढकं च गोदध्नस्तत्रैव विनियोजयेत्। शतपुष्पामश्वगन्धां हरिद्रां देवदारु च ।। 94 ।। कटुकीं रेणुकां मूर्वा कुष्ठं च मधुपष्टिकाम्। चन्दनं मुस्तकं रास्नां पृथक् कर्षप्रमाणतः ।। 95 ।।