शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः] | रसादिशोधनमारणकल्पना | 197 सूचिकाभरण रस विषं पलमितं सूतः शाणिकश्चूर्णयेद् द्वयम्। तच्चूर्णं संपुटे क्षिप्त्वा काचलिप्तशरावयोः ।। 121 ।। मुद्रां दत्त्वा च संशोष्य ततश्चुल्यां निवेशयेत्। वह्निं शनैः शनैः कुर्यात् प्रहरद्वयसङ्ख्यया ।। 122 ।। तत उद्घाटयेन्मुद्रामुपरिसंस्थां शरावकात्। संलग्नो यो भवेत् सूतस्तं गृह्णीयाच्छनैः शनैः ।। 123 ।। वायुस्पर्शो यथा न स्यात् तथा कुप्यां निवेशयेत्। यावत्सूच्या मुखे लग्नं कुप्या निर्याति भेषजम् ।। 124 ।। तावन्मात्रो रसो देयो मूर्च्छिते सन्निपातिनि। क्षुरेण प्रच्छिते मूर्ध्नि तत्राङ्गुल्या च घर्षयेत् ।। 125 ।। रक्तभेषजसम्पर्कान्मूर्च्छितोऽपि हि जीवति। तथैव सर्पदष्टस्तु मृतावस्थोऽपि जीवति ।। 126 ।। यदा तापो भवेत् तस्य मधुरं तत्र दीयते। विष (वत्सनाभ या मीठा तेलिया) एक पल (4 तोला) और शुद्ध पारद एक शाण (4 आना भर), इन दोनों को एक साथ भली-भाँति पीसना चाहिये। फिर इस चूर्ण को काँच- लिप्त (काँच के अत्यन्त सूक्ष्म चूर्ण को जल में पीसकर लेप करना चाहिये) दो सिकोरों के सम्पुट में रखकर कपड़मिट्टी से सन्धिरोध कर दें। फिर सुखा कर चूल्हे पर रख दें और दो पहर तक धीमी-धीमी आँच दें। स्वांगशीतल हो जाने पर सम्पुट को खोलकर ऊपर वाले शिकोरे में लगा हुआ जो पारद हो उसे धीरे-धीरे ले लें। जैसे वायु का स्पर्श न हो वैसे शीशी में डालकर रख दें। जितनी औषध शीशी में से सुई के अग्रभाग में लगकर निकले, उतनी ही मात्रा मूर्च्छित रोगी तथा सन्निपात रोगी में प्रयुक्त करनी चाहिये। प्रयोग-विधि-रोगी के शिर के तालु-प्रदेश के बालों को उस्तरा से छील कर पच्छ लगायें, जब रक्त निकले तो उस स्थान पर औषधि रखकर अंगुलि से घर्षण करें। इस प्रकार औषध तथा रक्त का संयोग होने से मूर्च्छित रोगी भी होश में आ जाता है। इसी प्रकार प्रयोग करने से साँप द्वारा डँसा हुआ पुरुष, मृत जैसी दशा वाला भी जीवित हो जाता है। जब रोगी को सन्ताप (गर्मी) का अनुभव हो तब मधुर पदार्थ मुनक्का, अंगूर, अनार तथा शर्बत आदि का सेवन कराना चाहिये। वक्तव्य-रक्त चल है, सर्वदा शरीर भर में चलता रहता है, अतः इस औषध को लेकर वह शरीर में चला जाता है। उसके साथ गयी हुई यह औषध शरीर पर अपना प्रभाव करती है, जिससे रोगी को आरोग्य लाभ होता है। खायी हुई औषध भी पचकर रस के साथ मिल जाती है और रक्त में पहुँचकर रोगी के शरीर पर प्रभाव करती है, दोनों प्रकार से एक ही कार्य होता है। जलबन्धु रस सूतभस्मसमं गन्धं गन्धात्पादं मनःशिला ।। 127 ।। माक्षिकं पिप्पली व्योषं प्रत्येकं शिलया समम्। चूर्णयेद् भावयेत् पित्तैर्मत्स्यमायूरसम्भवैः ।। 128 ।। सप्तधा भावयेच्छुष्कं देयं गुञ्जाद्वयं हितम्। तालपर्णीरसश्चानु पञ्चकोलभृतोऽथवा ।। 129 ।। जलयोगाश्च कर्तव्यस्तेन वीर्यं भवेद् रसे। जलबन्धुरसो नाम सन्निपातं नियच्छति ।। 130 ।। पारदभस्म (रससिन्दूर) के समान भाग शुद्ध गन्धक (दोनों 4-4 तोला), गन्धक से चतुर्थांश शुद्ध मैनसिल (1 तोला) और सोनामाखी भस्म, पीपल तथा त्रिकटु (सम्मिलित) प्रत्येक मैनसिल के समान भाग (1-1 तोला) लेकर चूर्ण बना लें और मछली तथा मोर के पित्त से सात-सात भावना दें और सुखाकर दो रत्ती की मात्रा से प्रयुक्त करें। अनुपान में मूली का रस अथवा पञ्चकोल (पीपल, पीपलामूल, चव्य, चित्ता तथा सोंठ) का क्वाथ देना चाहिये। इसका नाम 'जलबन्धुरस' है। यह सन्निपात को रोकता है। इस रस पर 'जलयोग' करना चाहिये, इससे रस की शक्ति बढ़ती है। पञ्चवक्त्र रस शुद्धं सूतं विषं गन्धं मरिचं टङ्कणं कणाम्। मर्दयेद् धूर्तजद्रावैर्दिनमेकं च शोषयेत् ।। 131 ।। पञ्चवक्त्रो रसो नाम द्विगुञ्जः सन्निपातजित्। अर्कमूलकषायं तु सव्युषमनुपाययेत् ।। 132 ।। युक्तं दध्योदनं पथ्यं जलयोगं च कारयेत्। रसेनानेन शाम्यन्ति सक्षौद्रेण कफादयः ।। 133 ।। मध्वार्द्रकरसं चानु पिबेदग्निविवृद्धये। यथेष्टं घृतमांसाशी शक्तो भवति पावकः ।। 134 ।। शुद्ध पारद, शुद्ध विष, शुद्ध गन्धक, मरिच, टंकण (सोहागा का लावा) तथा पीपल-इन सबको समान भाग में लेकर धत्तूरा के पत्र अथवा फलों के रस से एक दिन भली-भाँति मर्दन करे और सुखा कर रख लें। इसका नाम 'पञ्चवक्त्र' रस है। यह दो रत्ती की मात्रा से 'सन्निपात' को जीतता है। अनुपान में आक की जड़ का क्वाथ त्रिकटु मिलाकर CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA