भारतकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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पृष्ठ 238

202 शार्ङ्गधरसंहिता [मध्यमखण्डे उदयादित्य रस शुद्धं सूतं द्विधा गन्धं मर्द्यं कन्याद्रवैर्दिनम्। तद्गोलं पिठरीमध्ये ताम्रपात्रेण रोधयेत्।।184।। सूतकाद् द्विगुणेनैव शुद्धेनाधोमुखेन च। पार्श्वे भस्म निधायाथ पात्रोर्ध्वं गोमयं जलम् ।। 185 ।। किञ्चित्किञ्चित्प्रदातव्यं चुल्ल्यां यामद्वयं पचेत्। चण्डाग्निना तदुद्धृत्य स्वाङ्गशीतं विचूर्णयेत् ।। 186 ।। काष्ठोदुम्बरिकावह्नित्रिफलाराजवृक्षकम् । विडङ्गं बाकुचीबीजं क्वाथयेत् तेन भावयेत् ।। 187 ।। दिनैकमुदयादित्यो रसो देयो द्विगुञ्जकः। विचर्चिकां दद्रुकुष्ठं वातरक्तं च नाशयेत् ।। 188 ।। अनुपानं च कर्तव्यं बाकुचीफलचूर्णकम्। खदिरस्य कषायेण समेन परिपाचितम् ।। 189 ।। त्रिशाणं तद् गवां क्षीरैः क्वाथैर्वा त्रैफलैः पिबेत्। त्रिदिनान्ते भवेत् स्फोटः सप्ताहाद्वा किलासके ।। 190 ।। नीलीं गुञ्जां च कासीसं धत्तूरं हंसपादिकाम्। सूर्यभक्तां च चाङ्गेरी पिष्ट्वा मूलानि लेपयेत् ।। 191 ।। स्फोटस्थानप्रशान्त्यर्थं सप्तरात्रं पुनः पुनः। श्वेतकुष्ठं निहन्त्याशु साध्यासाध्यं न संशयः ।। 192 ।। अपरः श्वित्रलेपोऽपि कथ्यतेऽत्र भिषग्वरैः। गुञ्जाफलाग्निचूर्णं च लेपितं श्वेतकुष्ठनुत् ।। 193 ।। शिलापामार्गभस्मापि लिप्तं श्वित्रं विनाशयेत्। शुद्धपारद एक भाग तथा शुद्धगन्धक दो भाग लेकर एक दिन तक घीकुआर के रस से मर्दन करें, तत्पश्चात् उसका गोला बनाकर मिट्टी की हाँडी में रख दें और पारद से दुगुने शुद्ध ताम्र से निर्मित पात्र (ताँबे की कटोरी) से ढँक दें तथा ऊपर से सामान्य भस्म भर दें (इनकी तह दो-तीन अंगुल मोटी होनी चाहिये)। उसके ऊपर बार-बार थोड़ा-थोड़ा गोबर मिला जल देते जाना चाहिये। इस प्रकार एक चूल्हा पर रखकर दो पहर पर्यन्त तीव्र अग्नि से पाक करना चाहिये। तदनन्तर सर्वांगशीतल हो जाने पर धीरे से उसे निकालकर पीस लें और कठगूलर, चीता, त्रिफला, अमलतास, वायविडंग एवं बकुची के क्वाथ की एक दिनतक भावना दें। इस रस का नाम 'उदयादित्य' है। इसकी मात्रा दो रत्ती है। यह विचर्चिका, दद्रु एवं वातरक्त को नष्ट करता है। अनुपान में बाकुची का चूर्ण, खैरसार के क्वाथ के साथ पकाकर तीन शाण (।।। भर) लेकर गोदुग्ध के साथ अथवा त्रिफला के क्वाथ के साथ पीना चाहिये। इससे तीन दिन के पश्चात् किलास (श्वेतदाग) के स्थान पर फफोला उठ जाता है। इसके चारों ओर निम्नलिखित द्रव्यों का गाढ़ा लेप करना चाहिये-नील की पत्ती, गुञ्जाफल, हीराकासीस, धतूरा की पत्ती, हंसराज (परसौसा), हुलहुल की पत्ती और चाङ्गेरी। उक्त द्रव्यों का लेप फफोलों के स्थान की शान्ति के लिए सात दिन तक बार-बार करना चाहिये। यह प्रयोग साध्य एवं असाध्य श्वेतकुष्ठ को शीघ्र ही नष्ट कर देता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। विद्वान् वैद्य श्वेतकुष्ठ का एक और भी लेप इस प्रकार बतलाते हैं-गुञ्जाफल एवं चीता की जड़ का लेप श्वेतकुष्ठ को नष्ट करता है और मैनसिल एवं अपामार्ग की भस्म भी लेप करने पर श्वेतकुष्ठ को नष्ट करती है। वक्तव्य-श्वित्र रोग एक दुःसाध्य रोग है। इसकी चिकित्सा समय-साध्य होती है। अतः चिकित्सक तथा रोगी को धैर्य रखकर चिकित्सा करनी चाहिये। सर्वेश्वर रस शुद्धं सूतं चतुर्गन्धं पलं यामं विचूर्णयेत् ।। 194 ।। मृतताम्राभ्रलोहानां दरदस्य पलं पलम्। सुवर्णं रजतं चैव प्रत्येकं दशनिष्ककम् ।। 195 ।। माषकै मृतवज्रं च तालं शुद्धं पलद्वयम्। जम्बीरोन्मत्तवासाभिः स्नुह्यर्कविषमुष्टिभिः ।। 196 ।। मर्द्यं ह्यारिर्जैर्द्रवैः प्रत्येकेन दिनं दिनम्। एवं सप्तदिनं मर्द्यं तद्गोलं वस्त्रवेष्टितम् ।। 197 ।। बालुकायन्त्रगं स्वेद्यं त्रिदिनं लघुवह्निना। आदाय चूर्णयेच्छ्लक्ष्णं पलैकं योजयेद् विषम् ।। 198 ।। द्विपलं पिप्पलीचूर्णं मिश्रं सर्वेश्वरो रसः। द्विगुञ्जो लिह्यते क्षौद्रैः सुप्तिमण्डलकुष्ठनुत् ।। 199 ।। बाकुची देवकाष्ठं च कर्षमात्रं सुचूर्णयेत्। लिहेदैरण्डतैलाक्तमनुपानं सुखावहम् ।। 200 ।। शुद्धपारद एक पल (4 तोला) और शुद्धगन्धक चार पल (16 तोला) दोनों को एक पहर तक पीसकर कज्जली बनानी चाहिये। ताम्रभस्म, अभ्रकभस्म, लोहभस्म तथा शुद्ध शिंगरफ प्रत्येक एक-एक पल (4-4 तोला), सुवर्णभस्म तथा रजतभस्म प्रत्येक दस-दस निष्क (2½-2½ तोला), वज्र (हीरा), भस्म एक माशा तथा शुद्ध हरिताल दो पल (आठ तोला) लेकर खरल में डाल दें और जम्बीरी नींबू, धतूरा, अडूसा, सेहुण्ड, आक, बकायन तथा कनेर के पत्तों के रस से एक दिन तक मर्दन करना चाहिये। इस प्रकार सात दिन तक मर्दन करके गोला बना लें और उसे कपड़े में लपेट