शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें236 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे
(परहेज) सब स्नेहपान के समान ही कहे गये हैं। इसमें सन्देह करने की कोई आवश्यकता नहीं है। वक्तव्य-गुद का दूसरा नाम 'पायु' है जिसका अर्थ है 'पिबति तैलं बस्त्यौषधं वा इति वायुः।' जो तैल अथवा वस्ति द्वारा दी हुई औषध को पी जाये, इससे प्रमाणित हो जाता है कि जिस प्रकार मुख से तैलादिक का सेवन (पान) करने पर हानि अथवा लाभ होता है, उसी प्रकार गुद या पायु से भी। इसीलिए पथ्यापथ्य भी उसी प्रकार का समझना चाहिये। वस्ति के विषय में अधिक परिज्ञान करने के लिए सु० चि० अ० 35 से 38 तक और चरकसंहिता का सिद्धिस्थान भी देखें।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या, विशेष वक्तव्यादि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का पाँचवाँ अध्याय समाप्त ।। ५ ।।
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