शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 298, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें262 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे श्वित्रहर लेप (२) वायस्येडगजाकुष्ठकृष्णाभिर्गुटिका कृता। बस्तमूत्रेण सम्पिष्टा प्रलेपाच्छ्वित्रनाशिनी ॥ ४१ ॥ मकोय, चकवड़ (पवाँर) के बीज, कूठ तथा पीपल को बकरे के मूत्र के साथ पीसकर गुटिका (लम्बी गोली) बना लें। उसका लेप श्वित्र को नष्ट करता है। श्वित्रहर लेप (३) तालकं शाणमात्रं स्याच्चतुःशाणा च बाकुची। गोमूत्रपिष्टं तच्चूर्णं लेपनाच्छ्वित्रनाशनम् ॥ ४२ ॥ हरिताल एक शाण (चौथाई भर) और बाकुची चार शाण (१ तोला) दोनों को गोमूत्र में पीसकर लेप करने से श्वित्र का नाश होता है। श्वित्रहर लेप (४) बाकुची वेतसो लाक्षा काकोदुम्बरिका कणा। रसाञ्जनमयश्चूर्णं तिलाः कृष्णास्तदेकतः ॥ ४३ ॥ चूर्णयित्वा गवां पित्तैः पिष्ट्वा च गुटिका कृता। अस्याः प्रलेपाच्छ्वित्राणि प्रणश्यन्त्यतिवेगतः ॥ ४४ ॥ बाकुची, वेत, लाही (लाख), कठगूलर, पीपल, रसवत, लोहचूर्ण और काला तिल-इन सबको एक साथ पीसकर और गाय के पित्त की भावना देकर गुटिका बना लें। इसके लेप से श्वित्र शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। सिध्महर लेप (१) धात्री सर्जरसश्चैव यवक्षारश्च चूर्णितः। सौवीरेण प्रलेपोऽयं प्रयोज्यः सिध्मनाशने ॥ ४५ ॥ आँवला, राल तथा जौखार को पीसकर चूर्ण बना लें और फिर काँजी के साथ मिलाकर लेप करें। इसे 'सिध्म' या सेहुँआ का विनाश करने के लिये प्रयुक्त करना चाहिये। सिध्महर लेप (२) दार्वी मूलकबीजानि तालकं सुरदारु च। ताम्बूलपत्रं सर्वाणि कार्षिकानि पृथक् पृथक् ॥ ४६ ॥ शङ्खचूर्णं शाणमात्रं सर्वाण्येकत कारयेत्। लेपोऽयं वारिणा पिष्टः सिध्मनां नाशनः परः ॥ ४७ ॥ दारुहल्दी, मूली के बीज, हरताल, देवदारु तथा पान के पत्ते, प्रत्येक द्रव्य एक-एक कर्ष (१ तोला) और शंखभस्म एक शाण (चौथाई भर)-सबको एक साथ मिलाकर और जल में पीसकर लेप करें। सिध्म का नाश करने के लिए यह भी उत्तम लेप है। नेत्ररोगहर लेप (१) हरीतकी सैन्धवं च गैरिकं च रसाञ्जनम्। बिडालको जले पिष्टः सर्वनेत्रामयापहः ॥ ४८ ॥ बड़ी हड़, सेंधा नमक, गेरू तथा रस्रवत इन सबको जल से पीसकर 'बिडालक' (आँख की बरौनियों पर जो लेप किया जाता है, उसको बिड़ालक कहते हैं) करने से सम्पूर्ण नेत्रों में होने वाले रोगों (अभिष्यन्द आदि) को नष्ट करता है। वक्तव्य-चिकित्सक इस लेप में कपूर, हल्दी, केसर तथा अफीम भी मिलाते हैं। नेत्ररोगहर लेप (२) रसाञ्जनं व्योषयुतं समिष्टं वटकीकृतम्। कण्डूं पाकान्वितां हन्ति लेपादञ्जननामिकाम् ॥ ४९ ॥ रस्रवत् तथा त्रिकटु को पीसकर गोली बना लें। इसका लेप खुजली तथा पाक से युक्त 'अञ्जननामिका' (बरौनी पर होने वाली फुन्सी) को नष्ट करता है। पामा-दद्रू-विचर्चिकाहर लेप (१) प्रपुन्नाटस्य बीजानि बाकुची सर्षपास्तिलाः। कुष्ठं निशाद्वयं मुस्तं पिष्ट्वा तक्रेण चैकतः ॥ ५० ॥ प्रलेपादस्य नश्यन्ति दद्रूकण्डूविचर्चिकाः। चक्रमर्द (पँवार) के बीज, बाकुची सरसों, तिल, कूठ, हल्दी, दारुहल्दी तथा नागरमोथा-इन सबको मट्ठा के साथ पीस लें। इस लेप से दाद पामा (खुजली) तथा विचर्चिका का विनाश हो जाता है। पामा-दद्रू-विचर्चिकाहर लेप (२) हेमक्षीरी विडङ्गानि दरदं गन्धकस्तथा ॥ ५१ ॥ दद्रुघ्नः कुष्ठसिन्दूरे सर्वाण्येकत मर्दयेत्। धत्तूरनिम्बताम्बूलीपत्राणां स्वरसैः पृथक् ॥ ५२ ॥ अस्य प्रलेपमात्रेण पामादद्रूविचर्चिकाः। कण्डूश्च रसकश्चैव प्रशमं यान्ति वेगतः ॥ ५३ ॥ सत्यानाशी के बीज, वायविडंग, शिंगरफ, गन्धक, चक्रमर्द (पँवार) के बीज, कूठ तथा सिन्दूर-सबको एक साथ पीसकर धतूरा, नीम तथा पान के पत्तों के स्वरस की पृथक्-पृथक् भावनायें देकर गोलियाँ बना लें। इसका लेप (जल में घिसकर) करने से पामा, दाद, विचर्चिका, सूखी खुजली तथा रसक (चर्मरोग-विशेष) शीघ्र ही शान्त हो जाती है।