शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें264 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
करें। यह भी पित्तजनित तथा रक्तपित्तजनित शिरोरोग को नष्ट करता है। कफज शिरोरोगहर लेप हरेणुनतशैलेयमुस्तैलागरुदारुभिः । मांसीरास्नारुबूकैश्च कोष्णो लेपः कफार्तिनुत् ।। ६७ ।। सम्भालू के बीज, तगर, छड़ीला, मोथा, इलायची, अगुरु, देवदारु, जटामांसी, रास्ना तथा एरण्ड की जड़-इनको पीसकर और गर्म करके लेप करें। इससे कफजनित शिरोरोग नष्ट हो जाता है। दूसरा लेप शुण्ठीकुष्ठप्रपुन्नाटदेवकाष्ठैः सरोहिषैः । मूत्रपिष्टैः सुखोष्णैश्च लेपः श्लेष्मशिरोऽर्तिनुत् ।। ६८ ।। सोंठ, कूठ, चक्रमर्द, देवदारु तथा रोहिषतृण-इस सबको गोमूत्र में पीसकर और गर्म करके लेप करें। यह लेप कफजनित शिरोरोग को नष्ट करता है। आधा-शीशी पर लेप सारिवाकुष्ठमधुकवचाकृष्णोत्पलैस्तथा । लेपः सकाञ्जिकस्नेहः सूर्यावर्त्तार्धभेदयोः ।। ६९ ।। सारिवा, कूठ, मुलेठी, वच, पीपल तथा कमल इन सबको काँजी में पीसकर तथा स्नेह (एरण्ड तैल) में पकाकर इसका 'सूर्यावर्त्त' एवं अर्द्धावभेदक नामक शिरोरोगों में लेप करना चाहिये। सभी शिरोरोगों पर लेप वरी नीलोत्पलं दूर्वा तिलाः कृष्णाः पुनर्नवा । शङ्खकेऽनन्तवाते च लेपः सर्वशिरोऽर्तिजित् ।। ७० ।। शतावर, नीलकमल, दूब, तिल, पीपल तथा पुनर्नवा का लेप 'शंखक' तथा 'अनन्तवात' नामक शिरोरोगों में करना चाहिये। यह सब प्रकार के शिरोरोगों को जीतता है। दूसरी लेप-विधि अथ लेपविधिश्चान्यः प्रोच्यते सुज्ञसम्मतः । द्वौ तस्य कथितौ भेदौ प्रलेपाख्यप्रदेहकौ ।। ७१ ।। चर्माईं माहिषं यद्वत् प्रोन्नतं सा मितिस्तयोः । शीतस्तनुर्विशोषी च प्रलेपः परिकीर्तितः ।। ७२ ।। आर्द्रो घनस्तथोष्णः स्यात् प्रदेहः श्लेष्मवातहा । रोमाभिमुखमादेयौ प्रलेपाख्यप्रदेहकौ ।। ७३ ।। वीर्यं सम्यग् विशत्याशु रोमकूपैः शिरामुखैः । न रात्रौ लेपनं कुर्याच्छुष्यमाणं न धारयेत् ।। ७४ ।।
शुष्यमाणमुपेक्षेत प्रदेहं पीड़नं प्रति । (तमसा पिहितो ह्युष्मा रोमकूपमुखे स्थितः ।। ७५ ।। विना लेपेन निर्याति रात्रौ नो लेपयेदतः ।) रात्रावपि प्रलेपादिविधिः कार्यों विचक्षणैः ।। ७६ ।। अपक्वशोथे गम्भीरे रक्तश्लेष्मसमुद्भवे । इसके पश्चात् अब एक और लेपविधि कही जाती है जो विद्वान् चिकित्सकों को सम्मत है। उसके दो भेद हैं-1. प्रलेप (साधारण लेप) और 2. प्रदेह (जो गर्म करके बनाया जाता है, जिसको 'पुल्टिस' भी कहते हैं)। इन दोनों की मोटाई भैंस के गीले चमड़े के समान होनी चाहिये। इनमें शीत (जो गर्म नहीं किया गया), तनु (पतला यथा चन्दनलेप), विशोषी (सूखने वाला अर्थात् व्रणशोथ को पीड़न करने वाला, यथा-गन्धाविरोजा आदि का लेप) अथवा अविशोषी (विशोषी के विपरीत गुण वाला) प्रलेप कहलाता है। आर्द्र (गीला), घन (मोटा) तथा उष्ण (गर्म किया हुआ) 'प्रदेह' कहा जाता है। यह प्रदेह कफ-वातनाशक और प्रलेप पित्तनाशक होता है। प्रलेप तथा प्रदेह का प्रयोग रोमाभिमुख (रोमों की ओर) करना चाहिये। इससे औषधि का वीर्य (सार) रोमकूपों में लगी हुई सिराओं द्वारा शरीर में प्रविष्ट हो जाता है। रात्रि में लेप न करें और सूखने से पहले ही उसे उतार दें, किन्तु पीड़न के लिये प्रयुक्त किये गये प्रदेह को सूखने देना चाहिये। अन्धकार से रुकी हुई व्रणशोथ की ऊष्मा रोमकूपों के मुख में स्थित रहती है (अर्थात् रात्रि के स्वाभाविक शीत के कारण वह नहीं निकल पाती, लेप करने से तो और भी रुक जाता है), लेप न करने से कुछ-कुछ निकल जाती है, इसलिये रात्रि में लेप नहीं करना चाहिये। विद्वान् चिकित्सक रात्रि में भी लेप का प्रयोग किया करते हैं। यथा-कच्चे फोड़ों पर, गम्भीर नामक फोड़े पर और रक्त तथा कफ के फोड़ों पर। वक्तव्य-उक्त पाठ को सु० सू० अ० 18 में विस्तारपूर्वक देखें। व्रणशोथ-चिकित्सा-क्रम आदौ शोथहरो लेपो द्वितीयो रक्तसेचनः ।। ७७ ।। तृतीयश्चोपनाहः स्याच्चतुर्थः पाटनक्रमः । पञ्चमः शोधनो भूयात् षष्ठो रोपण इष्यते ।। ७८ ।। सप्तमो वर्णकरणो व्रणस्यैते क्रमा मताः । पहले (जब फोड़ा उठ रहा हो) शोथहर लेप लगायें, यदि इससे लाभ न हो तो दूसरा रक्तसेचन (जोंक अथवा