शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 302, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें266 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
[स्तम्भ १]
शुद्ध हो जाता है। शुद्ध व्रण के लक्षण इस प्रकार हैं- 'जिह्वातलाभोऽतिमृदुः श्लक्ष्णः स्निग्धोऽल्पवेदनः। सुव्यवस्थो निरास्रावः शुद्धो व्रण इति स्मृतः'।। शोधन-रोपण लेप निम्बपत्रघृतक्षौद्रदार्वीमधुकसंयुतः । तिलैश्च सह संयुक्तो लेपः शोधनरोपणः।।89।। नीम के पत्ते, घी, मधु, दारुहल्दी, मुलेठी तथा तिल-इन सबको भली-भाँति पीसकर लेप करने से व्रण (घाव) का शोधन और रोपण (भरना) भी हो जाता है। कृमिनाशक लेप करञ्जारिष्टनिर्गुण्डी लेपो हन्याद् व्रणक्रिमीन्। लशुनस्याथवा लेपो हिङ्गुनिम्बभवोऽथवा।।90।। करञ्ज, नीम तथा सम्भालू का लेप व्रण के कृमियों को नष्ट करता है। उसी प्रकार लहसुन का लेप अथवा हींग और नीम के पत्तों का लेप भी व्रण के कृमियों को नष्ट करता है। **वक्तव्य-**कभी-कभी असावधानी के कारण व्रण में कृमि पड़ जाते हैं। ऐसी दशा में लेप उपयोगी होते हैं। शोधन-रोपण-लेप निम्बपत्रं तिला दन्ती त्रिवृत्सैन्धवमाक्षिकम्। दुष्टव्रणप्रशमनो लेपः शोधनरोपणः।।91।। नीम के पत्ते, तिल, दन्ती, निसोत, सेंधा नमक तथा मधु का लेप दूषित व्रण को शान्त करता है। यह शोधन तथा रोपण है। उदरशूलहर लेप मदनस्य फलं तिक्तां पिष्ट्वा काञ्जिकावारिणा। कोष्णं कुर्यान्नाभिलेपं शूलशान्तिर्भवेत् ततः।।92।। मैनफल तथा कुटकी को काँजी में पीसकर तथा गर्म कर नाभि के आस-पास अर्थात् समस्त उदर पर लेप करें। इससे शूल की शान्ति हो जाती है। वातविद्रधिहर लेप शिग्रुशेफालिकैरण्डयवगोधूममुद्गकैः । सुखोष्णो बहलो लेपः प्रयोज्यो वातविद्रधौ।।93।। सहजन की छाल, सम्भालू, एरण्ड की जरु अथवा बीज, जौ, गेहूँ तथा मूँग-इनको पीसकर तथा गर्म कर मोटा लेप वातजनित विद्रधि में करना चाहिये। पित्तविद्रधिहर लेप पैत्तिके सर्पिषा लाजामधुकैः शर्करान्वितैः। प्रलिम्पेत् क्षीरपिष्टैर्वा पयस्योशीरचन्दनैः।।94।।
[स्तम्भ २]
पित्तजनित विद्रधि में लावा मुलेठी तथा चीनी को घी में मिलाकर अथवा विदारीकन्द, खस तथा श्वेतरन्दन को दूध में पीसकर लेप करना चाहिये। कफविद्रधिहर लेप इष्टिका सिकता लोहकिट्टं गोशकृता सह। सुखोष्णः स्यात् प्रदेहोऽयं मूत्रैः स्याच्छ्लेष्मविद्रधौ।।95।। ईंट का चूर्ण, बालू, मण्डूर, तथा गाय के गोबर को गोमूत्र में पीसकर तथा गर्म कर कफजनित विद्रधि में प्रदेह (मोटा लेप) करें। आगन्तुज विद्रधिहर लेप रक्तचन्दनमञ्जिष्ठानिशामधुकगैरिकैः । क्षीरेण विद्रधौ लेपो रक्तागन्तुनिमित्तजे।।96।। लालचन्दन, मजीठ, हल्दी, मुलेठी तथा गेरू को दूध में पीसकर रक्तजनित तथा आगन्तुज विद्रधि में लेप करें। गलगण्ड लेप (1) निचुलः शिग्रुबीजानि दशमूलमथापि वा। प्रदेहो वातगण्डेषु सुखोष्णः सम्प्रदीयते।।97।। जलवेत, सहजन के बीज तथा दशमूल (देखें-शा० सं०, म० खं० अ० 2, श्लोक 28)-इन सबको जल के साथ पीसकर और गर्म कर वातजनित गलगण्ड में प्रदेह किया जाता है। गलगण्डलेप (2) देवदारु विशाला च कफगण्डे प्रदेहकः। देवदारु तथा इन्द्रायण की जड़ का लेप कफजनित गलगण्ड में किया जाता है। अपचीनाशक लेप (1) सर्षपारिष्टपत्राणि दग्ध्वा भल्लातकैः सह।।98।। छागमूत्रेण सम्पिष्टमपचीघ्नं प्रलेपनम्। सरसों, नीम के पत्र एवं भिलावे को (मिट्टी के पात्र में बन्द करके) जलाकर और बकरे के मूत्र में पीसकर लेप करने से अपची (पकने वाली गण्डमाला) का नाश होता है। अपचीनाशक लेप (2) सर्षपाः शिग्रुबीजानि शणबीजातसीयवाः।।99।। मूलकस्य च बीजानि तक्रेणाम्लेन पेषयेत्। गण्डमालाम्बुदं गण्डं लेपेनानेन शाम्यति।।100।। सरसों, सहजन के बीज, शण के बीज अलसी, जौ तथा मूली के बीज को खट्टे तक्र (मट्ठा) के साथ पीस लें। इस