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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

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द्वादशोऽध्यायः ] शोणितस्रावविधिः 277 जलौका प्रयोग-जौंक को पीड़ायुक्त स्थान में लगाया जाता है। वह रक्त को चूस लेती है। जिससे वेदना शान्त हो जाती है। देखें-सु० सू० अ० 13। सिरावेध-इसके विषय में स्मरणीय है, कि यदि मस्तक प्रदेश की पीड़ा को शान्त करने के लिए सिरावेध करना हो तो ग्रीवा में और कूर्पर सन्धि (कोहनी) में करना हो तो प्रगण्ड में बन्धन देकर यह कार्य किया जाता है, जिससे सिरा उठ जाये। उस उठी हुई सिरा का वेध कुठारिका नामक शस्त्र (नस्तर) से कर दिया जाता है, जिससे रक्त की धार निकलने लगती है। शल्यतन्त्र में सिरावेध को आधी चिकित्सा कहा गया है। इसी से इस चिकित्सा के महत्त्व का आकलन किया जा सकता है। खेद है, कि आज आयुर्वेद के पिछड़ने में आयुर्वेद के उपासकों का ही सबसे बड़ा हाथ है। आप ध्यान दें! जिस प्रकार शल्यतन्त्र में 'शिरावेध' को आधी चिकित्सा कहा गया है, अर्थात् अन्य चिकित्सा-विधियाँ एक ओर और 'शिरावेध' एक ओर। ऐसी ही एक चिकित्सा-विधि 'दाहकर्म' भी है। इसी प्रकार कायचिकित्सा-प्रधान चरकसंहिता ग्रन्थ के सिद्धस्थान में 'वस्तिचिकित्साविधि' को कुछ आचार्य सम्पूर्ण चिकित्सा तथा कुछ आधी चिकित्सा कहते हैं। किन्तु हम आयुर्वेद के पक्षधर आज इस प्रकार की महत्त्वपूर्ण चिकित्सा-विधियों की उपेक्षा कर अपना और अपने सर्वांगपूर्ण आयुर्वेद का उपहास करा रहे हैं। आशा है, अगली पीढ़ी इस ओर सक्रिय ध्यान देगी।

इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका-व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का बारहवाँ अध्याय समाप्त ।। 12 ।।