श्री गुरु गीता (स्कन्द पुराण - उमा-महेश्वर संवाद सान्वय सटीक)
Shri Guru Gita from Skanda Purana with Hindi Commentary
भगवान् शिव / महर्षि वेदव्यास / डॉ. मोतीलाल खद्दर शास्त्री द्वारा
४. गुरु-स्तवराज, गुरु-अष्टक एवं स्तोत्र संग्रह
पुष्पाञ्जलि एवं प्रदक्षिणादि हाथ में पुष्प लेकर निम्न मन्त्रों को पढ़ें- ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्म्माणिप्प्रथमान्यासन्। ते हनाकम्महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः। ॐ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने। नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे। स मे कामान् कामकामाय मह्यं। कामेश्वरी वैश्रवणो ददातु। कुबेराय वैश्रवणाय महाराजाय नमः। ॐ स्वस्ति साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठयं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं समन्त- पर्यायी स्यात्सार्वभौमः सार्वायुष आन्तादापरार्धात्। पृथिव्यै समुद्र- पर्यन्ताया एकराडिति तदप्येष श्लोकोऽभिगीतो मरुतःपरिवेष्टातारो मरुत्तभ्यावसन्गृहे, आविक्षितस्य कामप्रे विश्वेदेवाः सभासद इति। ॐ विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतो वाहुरुतविश्वतस्प्पात्। सम्बाहुभ्यांधमति सम्पतत्रैर्द्यावाभूमी जनयन्देवएकः। ॐकुलकुमार्यै विद्महे पीताम्बरायै धीमहि तन्नो बगला प्रचोदयात्। नानाविधानि पुष्पाणि यथाकालोद्भव्वानि च। पुष्पांजलिं मया दत्तं गृहाण बगलामुखि। ( 60 )
पीताम्बरा माँ की आरती का हिन्दी रूपान्तर हे पीत वस्त्र धारण करने वाली माँ आपकी जय हो। हे सुखदात्री माँ हे वरदात्री माँ आपकी जय हो। माँ अपने भक्तो का दुख सदा के लिए दूर कर दो। हे देवि आपकी जय हो, हे देवि आपकी जय हो।।१।। दैत्यों से पीड़ित देवतागण जब आपकी शरण स्वीकारे तो आपने ही कौर्मशरीर धारण कर उनका दुख दूर किया है। हे देवि आपकी जय हो, हे देवि आपकी जय हो ।।२।। हे विमलाभी हे बगला माँ हे मुनिगणवन्दत चरणों वाली वाली माँ संसारार्णव का भय कृपा कर शांत करो माँ। हे देवि आपकी जय हो, हे देवि आपकी जय हो ।।३।। हे माँ आपका चरण कमल सनकमुनी भी स्मरण योग्य तथा ब्रह्मा, विष्णु, महेश और इन्द्र द्वारा भी सेव्य है। हे देवि आपकी जय हो, हे देवि आपकी जय हो ।।४।। माँ आप स्वर्ण सिंहासन पर विराजती है और मुद्गर पाश धारण करती है। शत्रु जिव्हा वज्र से शोभायमान पीतां शुक मुक्ता। हे देवि आपकी जय हो, हे देवि आपकी जय हो ।।५।। बिन्दु त्रिकोण स्वरूपा षड़स्त्र द्वारा संरक्षित अष्टदल से घिरी हुई षोडषदल वाले पीठ पर सुशोभित बल से युक्त माँ आपकी जय हो हे देवि आपकी जय हो ।।६।। हे माँ आपके साधकों के द्वारा इसी स्वरूप का ही चिंतन किया जाता है माँ आप शत्रु विनाशकवीज हृदय कमल में धारण करती है हे देवि आपकी जय हो, हे देवि आपकी जय हो ।।७।। हे माँ आपकी ही कृपा से अणिमादिक अनेकों सिद्धि भी प्राप्त होती हैं और साथ में सुखशक्ति भी प्राप्त होती है और सारे सुख प्राप्त करके साधक विष्णुलोक प्राप्त करता है। अतः हे देवि आपकी जय हो, हे देवि आपकी जय हो ।।८।। हे माँ पूजा काल में कोई भी यदि आपकी आरती का पाठ करता है तो वो धन धान्यादि से युक्त हो आपका सान्निध्य प्राप्त करता है इसलिए माँ आपकी जय हो आपकी जय हो ।।९।।
अथ देवरूपराधक्षमापनस्तोत्रम् न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः। न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्॥१॥ विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्। तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति॥२॥ पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः। मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥ जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूवस्तव मवा। तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुपे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥ ( 62 )
परित्यक्ता देवा विविधविधमेवाकुलतया मया पञ्चाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि। इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं तमि शरणाम् ॥५॥ श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः। तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥ चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः। कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम् ॥७॥ न मोक्षस्याकाङ्क्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः। अतस्त्वां संयाचे जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः॥८॥
नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रूक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः। श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥ आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि। नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥ जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि। अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते सुतम् ॥११॥ मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि। एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥ इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितं देव्यधराज्यक्षमापनस्तोत्रं सम्पूर्णम्। ( 64 )
क्षमापन स्तोत्र का हिन्दी अनुवाद हे, माँ! मैं न मन्त्र जानता हूँ, न यन्त्र, अहो! मुझे स्तुतिका भी ज्ञान नहीं है। न आवाहन का पता है, न ध्यानका। स्तोत्र और कथा की भी जानकारी नहीं है। न तो तुम्हारी मुद्राएँ जानता हूँ और न मुझे व्याकुल होकर विलाप करना ही आता है, परंतु एक बात जानता हूँ, केवल तुम्हारा अनुसरण-तुम्हारे पीछे चलना। जो कि सब क्लेशों को-समस्त दुःख विपत्तियों को हर लेनेवाला है ॥१॥ सबका उद्धार करने वाली कल्याणमयी माता। मैं पूजाकी विधि नहीं जानता, मेरे पास धनका भी अभाव है, मैं स्वभाव से भी आलसी हूँ तथा मुझसे ठीक-ठीक पूजा का सम्पादन हो भी नहीं सकता, इन सब कारणों से तुम्हारे चरणों की सेवा में त्रुटि हो गयी हो, उसे क्षमा करना। क्योंकि कुपुत्र का होना सम्भव है, किंतु कहीं भी कुमाता नहीं होती॥२॥ माँ! इस पृथ्वीपर तुम्हारे सीधे-सादे पुत्र तो बहुत से हैं, किंतु उन सबमें मैं ही अत्यन्त चपल तुम्हारा बालक हूँ, मेरे-जैसा चंचल कोई विरला ही होगा। शिवो मेरा जो यह त्याग हुआ है, यह तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है, क्योंकि संसार में कुपुत्र का होना सम्भव है, किंतु कहीं भी कुमाता नहीं होती॥३॥ जगदम्बा ! मात: ! मैंने तुम्हारे चरणों की सेवा कभी नहीं की देवि। तुम्हें अधिक धन भी समर्पित नहीं किया, तथापि मुझ-जैसे अधारण को तुम अनुपम स्नेह करती हो, इसका कारण यही है कि संसार में कुपुत्र पैदा हो सकता है किन्तु कहीं भी कुमाता नहीं होती ॥४॥ ( 65 )
गणेशजी को जन्म देने वाली माता पार्वती। (अन्य देवताओं को आराधना करते समय) मुझे नाना प्रकार की सेवाओं में लगा रहना पड़ता था, इसलिये पचासी वर्षों से अधिक अवस्था बीत जाने पर मैंने देवताओं को छोड़ दिया है। अब उनकी सेवा-पूजा मुझ से नहीं हो पाती, अतएव उनसे कुछ भी सहायता मिलने की आशा नहीं है। इस समय यदि तुम्हारी कृपा नहीं होगी तो मैं अवलम्बरहित होकर किसकी शरण में जाऊँगा ॥५॥ माता अपर्णा। तुम्हारे मन्त्र का एक अक्षर भी कान में पड़ जाये तो उसका फल यह होता है कि मूर्ख चाण्डाल भी मधुपाकं के समान्य मधुर वाणी का उच्चारण करने वाला उत्तम वक्ता हो जाता है, दीन मनुष्य भी करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं से सम्पन्न हो चिरकाल तक निर्भय विहार करता रहता है। जब मंत्र के अक्षर के श्रवण का ऐसा फल है तो जो लोग विधि पूर्वक जप में लगे रहते हैं उनके जप से प्राप्त होने वालां उत्तम फल कैसा होगा। इसको कौन मनुष्य जान सकता है ॥६॥ भवानी! जो अपने अंगों में चिता की राख-भभूत लपेटे रहते हैं, जिनका विष ही भोजन है, जो दिगम्बरधारी (नग्न रहने वाले) हैं, मस्तक पर जटा और कण्ठ में नागराज वासुकिको हारके रूप में धारण करते हैं तथा जिनके हाथ में कपाल (भिक्षापात्र) शोभा पाता है, ऐसे भूतनाथ पशुपति भी जो एकमात्र 'जगदीश' की पदवी धारण करते हैं, इसका क्या कारण है ? यह महत्त्व उन्हें कैसे मिला, यह केवल तुम्हारे पाणिग्रहण की परिपाटीका फल है, तुम्हारे साथ विवाह होने से ही उनका महत्त्व बढ़ गया ॥७॥ (66) Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
मुख में चन्द्रमा की शोभा धारण करने वाली माँ ! मुझे मोक्षकी इच्छा नहीं है, संसार के वैभव की अभिलाषा नहीं है, न विज्ञान की अपेक्षा है, न सुखकी आकांक्षा, अतः तुमसे मेरी यही याचना है कि मेरा जन्म ‘मृडानी, रुद्राणी, शिव, शिव, भवानी' - इन नामोंका जप करते हुए बीते ॥८॥ माँ श्यामा! नाना प्रकार की पूजन-सामग्रियों से कभी विधिपूर्वक तुम्हारी आराधना मुझसे न हो सकी। सदा कठोर भावका चिन्तन करने वाली मेरी वाणी ने कौन सा अपराध नहीं किया है। फिर भी तुम स्वयं ही प्रयत्न करके मुझ अनाथ पर जो किंचित् कृपादृष्टि रखती हो, माँ! यह तुम्हारे ही योग्य है। तुम्हारी-जैसी दयामयी माता ही मेरे जैसे कुपुत्र को भी आश्रय दे सकती है ॥९॥ माता दुर्गे ! करुणासिन्धु महेश्वरी। मैं विपत्तियों में फँसकर आज जो तुम्हारा स्मरण करता हूँ (पहले कभी नहीं करता रहा) इसे मेरी शठता न मान लेना, क्योंकि भूख प्यास से पीड़ित बालक माता का ही स्मरण करता है॥१०॥ जगदम्ब ! मुझ पर जो तुम्हारी पूर्ण कृपा बनी हुई है, इसमें आश्चर्य की कौन सी बात है, पुत्र अपराध पर अपराध क्यों न करता जाता हो, फिर भी माता उसकी उपेक्षा नहीं करती॥११॥ महादेवि ! मेरे समान कोई पातकी नहीं है और तुम्हारे समान दूसरी कोई पापहारिणी नहीं है, ऐसा जानकर जो उचित जान पड़े, वह करो माँ ॥१२॥ (67)
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Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
श्री पीताम्बरा पीठ ह्रीं दतिया (म.प्र.) मूल्य-₹15/-