भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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इक्यावनवाँ सर्ग

हनुमान्जीके पूछनेपर वृद्धा तापसीका अपना तथा उस दिव्य स्थानका परिचय देकर सब वानरोंको भोजनके लिये कहना

इस तरह पूछकर हनुमान्जी चीर एवं कृष्ण मृगचर्म धारण करनेवाली उस धर्मपरायणा महाभागा तपस्विनीसे वहाँ फिर बोले—॥ १ ॥

‘देवि! हम सब लोग भूख-प्यास और थकावटसे कष्ट पा रहे थे। इसलिये सहसा इस अन्धकारपूर्ण गुफामें घुस आये। भूतलका यह विवर बहुत बड़ा है। हम प्याससे पीड़ित होनेके कारण यहाँ आये हैं, किंतु यहाँके इन ऐसे अद्भुत विविध पदार्थोंको देखकर हमारे मनमें बड़ी व्यथा हुई है—हम यह सोचकर चिन्तित हो उठे हैं कि यह असुरोंकी माया तो नहीं है, इसीलिये हमारे मनमें घबराहट हो रही है। हमारी विवेकशक्ति लुप्त-सी हो गयी है। हम जानना चाहते हैं कि ये बालसूर्यके समान कान्तिमान् सुवर्णमय वृक्ष किसके हैं?॥ २—४ ॥

‘ये भोजनकी पवित्र वस्तुएँ, फल-मूल, सोनेके विमान, चाँदीके घर, मणियोंकी जालीसे ढकी हुई सोनेकी खिड़कियाँ तथा पवित्र सुगन्धसे युक्त एवं फल-फूलोंसे लदे हुए ये सुवर्णमय पावन वृक्ष किसके तेजसे प्रकट हुए हैं?॥

‘यहाँके निर्मल जलमें सोनेके कमल कैसे उत्पन्न हुए? इन सरोवरोंके मत्स्य और कछुए सुवर्णमय कैसे दिखायी देते हैं? यह सब तुम्हारे अपने प्रभावसे हुआ है या और किसीके? यह किसके तपोबलका प्रभाव है? हम सब अनजान हैं; इसलिये पूछते हैं। तुम हमें सारी बातें बतानेकी कृपा करो’॥ ७-८ १/२ ॥

हनुमान्जीके इस प्रकार पूछनेपर समस्त प्राणियोंके हितमें तत्पर रहनेवाली उस धर्मपरायणा तापसीने उत्तर दिया—॥ ९ १/२ ॥

‘वानरश्रेष्ठ! मायाविशारद महातेजस्वी मयका नाम तुमने सुना होगा। उसीने अपनी मायाके प्रभावसे इस समूचे स्वर्णमय वनका निर्माण किया था॥ १० १/२ ॥

‘मयासुर पहले दानव-शिरोमणियोंका विश्वकर्मा था, जिसने इस दिव्य सुवर्णमय उत्तम भवनको बनाया है॥ ११ १/२ ॥