भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

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पृष्ठ 1984

‘विभीषण! हजार घोड़ोंसे जुते हुए विशाल रथपर बैठा हुआ वह पर्वताकार निशाचर कौन है? उसके हाथमें धनुष है और आँखें सिंहके समान तेजस्विनी दिखायी देती हैं॥ १२ ॥

‘यह भूतोंसे घिरे हुए भूतनाथ महादेवजीके समान तीखे शूल तथा अत्यन्त तेजधारवाले तेजस्वी प्रासों और तोमरोंसे घिरकर अद्भुत शोभा पा रहा है॥ १३ ॥

‘इतना ही नहीं, कालकी जिह्वाके समान प्रकाशित होनेवाली रथशक्तियोंसे घिरा हुआ यह वीर निशाचर विद्युन्मालाओंसे आवृत मेघके समान प्रकाशित हो रहा है॥ १४ ॥

‘जिनके पृष्ठभागमें सोने मढ़े हुए हैं, ऐसे अनेकानेक सुसज्जित धनुष उसके श्रेष्ठ रथकी सब ओरसे उसी तरह शोभा बढ़ा रहे हैं, जैसे इन्द्रधनुष आकाशको सुशोभित करता है॥ १५ ॥

‘यह राक्षसोंमें सिंहके समान पराक्रमी और रथियोंमें श्रेष्ठ वीर अपने सूर्यतुल्य तेजस्वी रथके द्वारा रणभूमिकी शोभा बढ़ाता हुआ मेरे सामने आ रहा है॥ १६ ॥

‘इसके ध्वजके शिखरपर पताकामें राहुका चिह्न अङ्कित है, जिससे रथकी बड़ी शोभा हो रही है। यह सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले बाणोंसे दसों दिशाओंको प्रकाशित कर रहा है॥ १७ ॥

‘इसके धनुषका पृष्ठभाग सोनेसे मढ़ा हुआ तथा पुष्प आदिसे अलंकृत है। वह आदि, मध्य और अन्त तीन स्थानोंमें झुका हुआ है। उसकी प्रत्यञ्चासे मेघोंकी गर्जनाके समान टंकार-ध्वनि प्रकट होती है। इस निशाचरका धनुष इन्द्र-धनुषके समान शोभा पाता है॥ १८ ॥

‘इसका विशाल रथ ध्वजा, पताका और अनुकर्ष (रथके नीचे लगे हुए आधारभूत काष्ठ)-से युक्त, चार सारथियोंसे नियन्त्रित और मेघकी गर्जनाके समान घर्घराहट पैदा करनेवाला है॥ १९ ॥

‘इसके रथपर बीस तरकस, दस भयंकर धनुष और आठ सुनहरे एवं पिङ्गलवर्णकी प्रत्यञ्चाएँ रखी हुई हैं॥ २० ॥

‘दोनों बगलमें दो चमकीली तलवारें शोभा पा रही हैं, जिनकी मूँठें चार हाथकी और लंबाई दस हाथकी है॥ २१ ॥

‘गलेमें लाल रंगकी माला धारण किये महान् पर्वतके समान आकारवाला यह धीरवीर निशाचर काले रंगका दिखायी देता है। इसका विशाल मुख कालके मुखके समान भयंकर है तथा यह मेघोंकी ओटमें स्थित हुए सूर्यके समान प्रकाशित होता है॥ २२ ॥