भारतकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

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पृष्ठ 2072

‘जम्बुमाली, महामाली, तीक्ष्णवेग, अशनिप्रभ, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, राक्षस वज्रदंष्ट्र, संह्रादी, विकट, अरिघ्न, तपन, मन्द, प्रघास, प्रघस, प्रजङ्घ, जङ्घ, दुर्जय अग्निकेतु, पराक्रमी रश्मिकेतु, विद्युज्जिह्व, द्विजिह्व, राक्षस सूर्यशत्रु, अकम्पन, सुपार्श्व, निशाचर चक्रमाली, कम्पन तथा वे दोनों शक्तिशाली वीर देवान्तक और नरान्तक—ये सभी मारे जा चुके हैं॥ ११–१४ ॥

‘इन अत्यन्त बलशाली बहुसंख्यक राक्षस-शिरोमणियोंका वध करके तुमलोगोंने हाथोंसे तैरकर समुद्र पार कर लिया है। अब गायकी खुरीके बराबर यह छोटा-सा राक्षस बचा हुआ है। अतः इसे भी शीघ्र ही लाँघ जाओ॥ १५ ॥

‘वानरो! इतनी ही राक्षससेना और शेष रह गयी है, जिसे तुम्हें जीतना है। अपने बलपर घमंड करनेवाले प्रायः सभी राक्षस तुमसे भिड़कर मारे जा चुके हैं॥ १६ ॥

‘मैं इसके बापका भाँई हूँ। इस नाते यह मेरा पुत्र है। अतः मेरे लिये इसका वध करना अनुचित है, तथापि श्रीरामचन्द्रजीके लिये दयाको तिलाञ्जलि दे मैं अपने इस भतीजेको मारनेके लिये उद्यत हूँ॥ १७ ॥

‘जब मैं स्वयं मारनेके लिये इसपर हथियार चलाना चाहता हूँ, उस समय आँसू मेरी दृष्टि बंद कर देते हैं; अतः ये महाबाहु लक्ष्मण ही इसका विनाश करेंगे॥ १८ ॥

‘वानरो! तुमलोग झुंड बनाकर इसके समीपवर्ती सेवकोंपर टूट पड़ो और उन्हें मार डालो।’ इस प्रकार अत्यन्त यशस्वी राक्षस विभीषणके प्रेरित करनेपर वानरयूथपति हर्ष और उत्साहसे भर गये तथा अपनी पूँछ पटकने लगे॥ १९ १/२ ॥

फिर वे सिंहके समान पराक्रमी वानर बारंबार गर्जते हुए उसी तरह नाना प्रकारके शब्द करने लगे, जैसे बादलोंको देखकर मोर अपनी बोली बोलने लगते हैं॥ २० ॥

अपने यूथवाले समस्त भालुओंसे घिरे हुए जाम्बवान् तथा वे वानर पत्थरों, नखों और दाँतोंसे वहाँ राक्षसोंको पीटने लगे॥ २१ ॥

अपने ऊपर प्रहार करते हुए ऋक्षराज जाम्बवान्को उन महाबली राक्षसोंने भय छोड़कर चारों ओरसे घेर लिया। उनके हाथमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्र थे॥

वे राक्षस सेनाका संहार करनेवाले जाम्बवान्पर युद्धस्थलमें बाणों, तीखे फरसों, पट्टिशों, दंडों और तोमरोंद्वारा प्रहार करने लगे॥ २३ ॥