श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअतः सब कुछ अन्धकारसे आच्छन्न हो गया और बड़ा भयानक दृश्य दिखायी देने लगा। सूर्य अस्त हो गये, सब ओर अँधेरा फैल गया और रक्तके प्रवाहसे पूर्ण सहस्रों बड़ी-बड़ी नदियाँ बह चलीं॥ ३५-३६ ॥
मांसभक्षी भयंकर जन्तु अपनी वाणीद्वारा भयानक शब्द प्रकट करने लगे। उस समय न तो वायु चलती थी और न आग ही प्रज्वलित होती थी॥ ३७ ॥
महर्षिगण बोल उठे— 'संसारका कल्याण हो।' उस समय गन्धर्वोंको बड़ा संताप हुआ। वे चारणोंके साथ वहाँसे भाग चले॥ ३८ ॥
तदनन्तर लक्ष्मणने चार बाण मारकर उस राक्षससिंहके सोनेके आभूषणोंसे सजे हुए काले रंगके चारों घोड़ोंको बींध दिया॥ ३९ ॥
तत्पश्चात् रघुकुलनन्दन श्रीमान् लक्ष्मणने दूसरे तीखे, पानीदार सुन्दर पंखवाले और चमकीले भल्लसे जो इन्द्रके वज्रकी समानता करता था तथा जिसे कानतक खींचकर छोड़ा गया था, रणभूमिमें विचरते हुए इन्द्रजित्के सारथिका मस्तक शीघ्रतापूर्वक धड़से अलग कर दिया। वह वज्रोपम बाण छूटनेके साथ ही हथेलीके शब्दसे अनुनादित हो सनसनाता हुआ आगे बढ़ा था॥
सारथिके मारे जानेपर महातेजस्वी मन्दोदरीकुमार इन्द्रजित् स्वयं ही सारथिका भी काम सँभालता— घोड़ोंको भी काबूमें रखता और फिर धनुषको भी चलाता था। युद्धस्थलमें उसके द्वारा वहाँ सारथिके कार्यका भी सम्पादन होना दर्शकोंकी दृष्टिमें बड़ी अद्भुत बात थी॥
इन्द्रजित् जब घोड़ोंको रोकनेके लिये हाथ बढ़ाता, तब लक्ष्मण उसे तीखे बाणोंसे बेधने लगते और जब वह युद्धके लिये धनुष उठाता, तब उसके घोड़ोंपर बाणोंका प्रहार करते थे॥ ४४ ॥
उन छिद्रों (बाण-प्रहारके अवसरों)-में शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले सुमित्राकुमार लक्ष्मणने समराङ्गणमें निर्भयसे विचरते हुए इन्द्रजित्को अपने बाण-समूहोंद्वारा अत्यन्त पीड़ित कर दिया॥ ४५ ॥
समरभूमिमें सारथिको मारा गया देख रावणकुमारने युद्धविषयक उत्साह त्याग दिया। वह विषादमें डूब गया॥
उस राक्षसके मुखपर विषाद छाया हुआ देख वे वानर-यूथपति बड़े प्रसन्न हुए और लक्ष्मणकी भूरिभूरि प्रशंसा करने लगे॥ ४७ ॥