श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘अतः अब तुम सावधान हो जाओ और शत्रुके रथकी ओर आगे बढ़ो। जैसे हवा उमड़े हुए बादलोंको छिन्न-भिन्न कर डालती है, उसी प्रकार आज मैं शत्रुके रथका विध्वंस करना चाहता हूँ॥ ११ ॥
‘भय तथा घबराहट छोड़कर मन और नेत्रोंको स्थिर रखते हुए घोड़ोंकी बागडोर काबूमें रखो और रथको तेज चलाओ॥ १२ ॥
‘तुम्हें देवराज इन्द्रका रथ हाँकनेका अभ्यास है; अतः तुमको कुछ सिखानेकी आवश्यकता नहीं है। मैं एकाग्रचित्त होकर युद्ध करना चाहता हूँ। इसलिये तुम्हारे कर्तव्यका स्मरणमात्र करा रहा हूँ। तुम्हें शिक्षा नहीं देता हूँ’॥ १३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके इस वचनसे देवताओंके श्रेष्ठ सारथि मातलिको बड़ा संतोष हुआ और उन्होंने रावणके विशाल रथको दाहिने रखते हुए अपने रथको आगे बढ़ाया। उसके पहियेसे इतनी धूल उड़ी कि रावण उसे देखकर काँप उठा॥ १४-१५ ॥
इससे दशमुख रावणको बड़ा क्रोध हुआ। वह अपनी लाल-लाल आँखें फाड़कर देखता हुआ रथके सामने हुए श्रीरामपर बाणोंकी वृष्टि करने लगा॥ १६ ॥
उसके इस आक्रमणसे श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा क्रोध हुआ। फिर रोषके साथ ही धैर्य धारण करके युद्धस्थलमें उन्होंने इन्द्रका धनुष हाथमें लिया, जो बड़ा ही वेगशाली था॥ १७ ॥
साथ ही सूर्यकी किरणोंके समान प्रकाशित होनेवाले महान् वेगशाली बाण भी ग्रहण किये। तत्पश्चात् एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखकर श्रीराम और रावण दोनोंमें बड़ा भारी युद्ध आरम्भ हुआ। दोनों दर्पसे भरे हुए दो सिंहोंके समान आमने-सामने डटे हुए थे॥ १८ ॥
उस समय रावणके विनाशकी इच्छा रखनेवाले देवता, सिद्ध, गन्धर्व और महर्षि उन दोनोंके द्वैरथ युद्धको देखनेके लिये वहाँ एकत्र हो गये॥ १९ ॥
उस युद्धके समय ऐसे भयंकर उत्पात होने लगे, जो रोंगटे खड़े कर देनेवाले थे। उनसे रावणके विनाश और श्रीरामचन्द्रजीके अभ्युदयकी सूचना मिलती थी॥
मेघ रावणके रथपर रक्तकी वर्षा करने लगे। बड़े वेगसे उठे हुए बवंडर उसकी वामावर्त परिक्रमा करने लगे॥ २१ ॥
जिस-जिस मार्गसे रावणका रथ जाता था, उसी-उसी ओर आकाशमें मँडराता हुआ गीधोंका महान् समुदाय दौड़ा जाता था॥ २२ ॥